बुधवार, दिसंबर 04, 2019

जीवन आनंद और साहित्य:सुरेन्द्र कुमार पटेल का आलेख


मनुष्य जाति में जन्म लेने का यह लाभ है कि मनुष्य भौतिक, दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक तमाम तरह की सुखानिभूति कर सकता है। अन्य जीव दैहिक सुखानुभूति तो प्राप्त कर सकते हैं परन्तु अन्य सुखों का अनुभव वे नहीं कर सकेंगे। किन्तु क्या मनुष्य जाति में जन्म लेने मात्र से कोई मनुष्य तमाम प्रकार के सुखों को प्राप्त कर सकेगा? उत्तर अत्यन्त सरल है। मनुष्य जाति में जन्म लेने मात्र से मनुष्य सभी सुखों का भागी नहीं होता बल्कि सभी प्रकार के सुखों का भागी बनने के लिए उसे अपने भीतर उस तरह की क्षमता और पात्रता अर्जित करनी होती है। यह पात्रता मनुष्य में शनैः शनैः आती है।

मनुष्य जिन सुखों एवं आनंदों की अनुभूति करता है उनमें एक तरह की  क्रमिकता है। हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में सत्संग और प्रवचन को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। ये सत्संग या प्रवचन मनुष्य को उस सुखानुभूति का पूर्व प्रशिक्षण है जिसे विशद आध्यात्मिक साधना द्वारा प्राप्त किया जाता है। चूंकि उस समय शिक्षा का सार्वभौम अधिकार नहीं था अतः जिनके पास शिक्षा का अधिकार था, वे सत्संग व प्रवचन के माध्यम से लोगों को साहित्य का रसास्वादन कराया करते थे।

ओशो अपने अनुयायियों को आनंद के एक स्तर से दूसरे स्तर में ले जाने का प्रयास करता है। वह प्रथमतः आनंद के एक स्तर को अनूभूत करने की क्षमता पैदा करने की कोशिश करता है ताकि उसके अनुयायी दूसरे स्तर के आनन्द की अनुभूति कर सकें। किन्तु ओशो के इस विचार को समझने के लिए थोड़े गहरे उतरने की जरूरत है।

सुखों की अनुभति के लिए हमें एक विशेष मानसिक प्रकिया से गुजरने की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में हम अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। प्राचीन समय में ऋषि-मुनियों के द्वारा गुफाओं एवं कंदराओं में योग-साधना इसी का एक रूप था। यदि हम अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित न कराएं और सुखानुभूति के दूसरे स्वरूपों का प्रशिक्षण प्रदान न करें तो मनुष्य पहले से उपलब्ध सुख के स्वरूप को ही अधिक महत्व देता है। यही कारण है कुछ लोग धन को अधिक महत्व देते हैं। उन्हें लगता है कि बहुत अधिक धनसंचय ही सुखों का कारण है। वे इस पर इतना अधिक समय खर्च करते हैं कि उनका सारा जीवन धनसंचय करने में खत्म हो जाता है किन्तु वे सुख के अन्य उत्तम स्तरों पर कभी नहीं पहुंच पाते।  कुछ अधिक निम्नश्रेणी के व्यक्ति दैहिक सुख से ही आगे नहीं निकल पाते। कुछ भौतिक विलास को ही आनंद और सुख का परमधाम मानते हैं। वस्तुतः एक उत्तम मनुष्य अपने जीवन में इन सारे सुखों एवं आनंदों की अनुभूति एक क्रमिकता से करते हुए आगे बढ़ता है। जिसने आनंद के सभी स्वरूपों का विवेकपूर्ण उपभोग किया है वह उन सुखों एवं आनंदों की अनुभति में वापस नहीं लौटता क्योंकि उसे यह बात ठीक तरह से मालूम है कि आनंदानुभति का जो दूसरा स्तर है वह इससे कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

किसी के पास कितनी ही अथाह धन-सम्पदा क्यों न हो वह उनकी अनुभूति ही कर सकता है। न तो वे धन-सम्पदा उसमें समाहित हो सकती हैं और न वह व्यक्ति उन धन-सम्पदाओं में समाहित हो सकता है। उन धन-सम्पदाओं से विकसित कुछ सुविधाओं का वह लाभ अवश्य  उठाता है वे सुविधाएं भी मनुष्य को तभी सुखानुभूति कराती हैं जब उन सुविधाओं को मस्तिष्क स्वीकृति प्रदान करता है। अतः सुख एक प्रकार का मानसिक प्रशिक्षण है जिसे मनुष्य सीख सकता है।

शिक्षा और साहित्य वह साधन हैं जो मनुष्य को तमाम तरह के सुखों की अनुभूति करने योग्य बनाती हैं। शिक्षा भले ही अनौपचारिक हो परन्तु शिक्षा ही मनुष्य को आनंदानुभूति कराने में सक्षम होती है। यदि किसी व्यक्ति को मनुष्य समाज की व्यवस्था, संगति-विसंगति, पर्यावरण और अन्य जैव-अजैव की समझ नहीं है तो मनुष्य बहुत सारे आनंदों से विरत ही रहता है। वहीं दूसरी ओर इन सब चीजों की समझ रखने वाला व्यक्ति वाद-संवाद और साहित्य में वह रस ढुंढ़ लेता है जिसके स्वादमात्र से ही उसका जीवन रसमय हो जाता है।

समाज में तमाम तरह की विकृतियों का कारण हमारा साहित्य से दूर होना है। जब मानव मस्तिष्क बोझिल होता है तब वह इस बोझ को उतारने का कोई न कोई सरल उपाय अवश्य ढूंढ़ता है। कोई संगीत सुनता है, कोई फिल्में देखता है। कोई संगी-साथियों के साथ सैर-सपाटा करता है। कोई अपने किसी अतिप्रियजन के साथ संवाद करता है। कुछ लोग साहित्य का अवलम्बन भी करते हैं। जिन्हें इनमें से कुछ नहीं रुचता वे बाहरी औषधि के द्वारा मनोरंजन करने का उद्यम करते हैं। यह खुशी की बात है कि इनमें से सबसे अच्छा और सस्ता साधन साहित्य ही है। वास्तव में साहित्य अध्ययन मनुष्य को एक प्रकार के आनंद के स्वरूप से परिचित तो कराता ही है वह अन्य उत्तम आनंदानुभूति के लिए मानव मस्तिष्क को प्रशिक्षित भी करता रहता है। एक साहित्यिक अध्येता और एक आध्यात्मिक साधक के मध्य बहुत कम फर्क बचता है। जिस प्रकार अध्यात्म व्यक्ति को एक अनंत यात्रा पर ले चलने का प्रयास करता है उसी प्रकार एक उत्तम साहित्य भी व्यक्ति को एक अमूर्त संसार में ले चलने का प्रयास करता है।
प्रेमी-प्रेयसी के मनोभावों को उभारने का काम कविताओं और गीतों के माध्यम से खुले मंच में किया जाता है और उसे समाज की स्वीकृति प्राप्त है, वह इसलिए कि यह आनंद का वह स्वरूप है जिसके समक्ष दैहिक सुख तुच्छ लगने लगता है और  भावनात्मक लगाव चरम पर होता है। जिसमें एक व्यक्ति दूसरे की न केवल अहमियत को महसूस करता है बल्कि वह उसका आदर करता है, प्रेम को एक मूल्य प्रदान करता है। इस स्थिति में प्रेम में जोर-जबरदस्ती, क्रूरता और हिंसा का कोई स्थान नहीं होता। इसमें किसी और की प्रेयसी या पत्नी को अपना बना लेने की कोई जद्दोजहद नहीं है बल्कि उस स्थिति को स्वीकार करने और उस विरह में खुद को तपा लेने का भाव है। किन्तु इन भावों को कौन समझेगा? जिसे इन गीतों और कविताओं का रस लेना नहीं आता उसका अभीष्ट तो दैहिक सुख ही रहेगा! साहित्य के समाज से दूर होते जाने का यह दुष्परिणाम है कि आज स्त्री जाति नोचने की वस्तु बन गई है। आए दिन की घटनाएं हमें यह कहने के लिए मजबूर करती हैं। जबकि गीतों और कविताओं में प्रेम गीत पढ़ते-सुनते व्यक्ति कब गीतों और कविताओं को ही अपनी प्रेमिका बना बैठता है उसे पता नहीं लगता। फिर उसे व्यक्ति रूप में किसी प्रेयसी की आवश्यकता नहीं रह जाती।

इसी प्रकार धन के पीछे सारा जीवन होम करते लोग भी देखे गए हैं। मनुष्य का लक्ष्य जीविकोपार्जन नहीं  है। जीविकोपार्जन तो साधन मात्र है। विकास के  जो भी मूल मानक हैं वे सब  मनुष्य जाति को सुख और आनंदानुभूति के उच्चतम स्तर में पहुंचाने के लिए ही हैं किन्तु विडम्बना ही कहा जाएगा कि मनुष्य अभीष्ट को भूलकर पथगामीमात्र हो गया है। हम अपना सारा समय जीविकोपार्जन के कई तरीकों में लगा रहे हैं। इसकी वजह क्या है? इसकी एक कटु वजह यह है कि हम अपने अभीष्ट को भूलते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप हम जीविकोपार्जन के जिस रास्ते पर हैं वहीं ठहर से गए हैं। उसी को जीवन का अभीष्ट मान लिया है।

हर कोई किसी न किसी प्रकार के सुख की तलाश में है। और यह भी कि हर व्यक्ति स्वयं यह नहीं जानता कि वह किस प्रकार के सुख की तलाश में है। व्यक्ति एक ऐसे प्यासे पथिक के समान है जिसे यह ही नहीं पता कि उसे किस चीज की प्यास है। ऐसी स्थिति में उसके वातावरण में उपलब्ध उस किसी भी चीज से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करता है जो उसे सुख दिला सकते हैं। साहित्य के रसास्वादन में किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। यह व्यक्ति का न तो बहुत अधिक खर्च कराता है, न किसी तरह की शारीरिक क्षति पहुंचाता  और न ही समाज द्वारा स्वीकार्य नैतिक जिम्मेदारियों से विमुख होने का कुमार्ग दिखाता है। साहित्य व्यक्ति का अधोपतन भी नहीं करता। फिर न जाने क्यों लोग इससे मुंह बिचकाते फिरते हैं। साहित्य का अध्ययन और लेखन व्यक्ति को  परावलम्बन से स्वाबलम्बन की ओर ले जाने वाला साधन है। वह गैरों और औरों की तलाश में पूर्णविराम लगाकर स्वयं को खोजने का साधन है।

साहित्य के अभाव में व्यक्ति उन रास्तों पर चल सकता है जो एक नैतिक समाज में सर्वस्वीकार्य नहीं हैं। साहित्य अध्ययन मनुष्य को उन समस्त सुखाुनभूति कराने में सक्षम है जिसे मनुष्य को अनुभत करने की पात्रता है। अतः समय-समय पर साहित्य अध्ययन व स्वाध्याय की ओर प्रवृत्त रहना मनुष्य की दिनचर्या का अंग होना चाहिए।

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रविवार, दिसंबर 01, 2019

एड्स:रमेश प्रसाद की कविता


एड्स

रमेश प्रसाद पटेल

 विश्व एड्स दिवस, 1988 के बाद से 1 दिसंबर को हर साल मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य एचआईवी संक्रमण के प्रसार की वजह से एड्स महामारी के प्रति जागरूकता बढाना, और इस बीमारी से जिसकी मौत हो गई है उनका शोक मनाना है।(विकिपीडिया से)


सजग रहना साथियो, एक भयावह रोग आया।
न है उपचार इसका, यह समझ अंधेरा छाया।।

यह अनैतिक संपर्क से एक दूजे में है आता,
एक्वायर्ड इम्यूनोडिफिशिएंसी सिंड्रोम कहलाता।।

समझदारी रखो, नहीं जग से बच पाएगी  काया,
नहीं उपचार इसका, यह समझ अंधेरा छाया।

संक्रमित सिरिंज या सुई से व्यक्ति में स्थान पाता।
रक्त की जांच कराने पर ही यह पहचान में आता।

यह संकट विश्व में एक दानव बन कर आया,
न है उपचार इसका यह समझ अंधेरा छाया।

दवा कोई भी वैज्ञानिक न कर पाए तैयार,
सावधानी ही एकमात्र जीवन का आधार।

समझदारी अपनाकर, मंगलमय जीवन बनाया।
न है उपचार इसका यह समझ अंधेरा छाया।
रचना:रमेश प्रसाद पटेल, माध्यमिक शिक्षक 
पुरैना, ब्योहारी जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)
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शनिवार, नवंबर 30, 2019

धरती के बेटे: कुलदीप की कविता


धरती के बेटे
किसान, माँ धरती के बेटे
देश कृषि प्रधान हुआ करता था।
करते थे पूजा धरती की
मिट्टी का सम्मान हुआ करता था।

लहराती थी हरियाली
सुंदर खेत-खलिहान हुआ करता था।
घर- आँगन, गाँव- गली चहुँ ओर
खुशहाल हुआ करता था।
                          
टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डी
खेतों को जाने वाली, मोह मन लेती थी।
मन्द-मन्द बहती स्वच्छ हवा
सबको स्वस्थ जीवन देती थी।

दिनभर खेतों में मेहनत कर
सब भरपूर नींद में सोते थे।
भाईचारे का संबंध थे रखते
सुख-चैन कभी नहीं खोते थे।

प्रकृति से तब लोगों का
एक घनिष्ठ संबंध हुआ करता था।
खाने से लेकर रहने की
कुटिया तक प्रबन्ध हुआ करता था।

मगर आधुनिकता निगल गई
कृषि की अर्थव्यवस्था को।
फिर सारी हद पार किये
कम करने के लिए व्यस्तता को।

हरित क्रांति आने से ही जैसे
धीरे-धीरे हरियाली छीन रही।
कम अवधि में अधिक उपज से
जैसे ख़ुशहाली छीन रही।

रासायनिक उर्वरक से कम समय में 
पैदावार तो बहुत बढ़ी।
मगर प्रकृति से छेड़छाड़ में 
धरती और जीवों की उम्र घटी।

मंहगाई बढ़ी लेकिन फिर भी
बढ़ी न फसलों की कीमत।
मेहनत को छोड़कर कमाई में
वापस आती बस लागत।

संसाधनों के अभाव में
अब जाये तो जाये कहाँ किसान।
देखकर भी दिल्ली चुप बैठी है
कुछ कर नहीं रहा प्रधान।

कल्लेह, तहसील-जयसिंहनगर,जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)
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शुक्रवार, नवंबर 29, 2019

रास्ता नया बनाना है:सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविताएँ


रास्ता नया बनाना है
मन में ले संकल्प,
रास्ता नया बनाना है!
हर मुश्किल है आसान,
बस पथबाधाओं से टकराना है!

तुम हो चले हो बूढ़े,
पर उनको यह सन्देश न दो,
इस धरती पर आया जो अभी-अभी,
उसको थकने का परिवेश न दो!
दुःख ही में तो,
दुःख रोक मुस्काना है!                        
...मन में ले संकल्प 1

जब रास्ता लगे कठिन,
आहिस्ता-आहिस्ता पग धारो!
मन जब डूबे गहरी उदासी में,
भर उल्लास खुद को उबारो!
मोती डूबा गहरे सागर में,
ढूंढ उसे ही लाना है!                                       ...
मन में ले संकल्प 2

दुनिया में नहीं है ऐसी उलझन,
जो सुलझ न पाए अप्रतिम प्रयासों से,
करनी होती है कोशिश अथाह,
दारिद्र्य दूर होता नहीं सिर्फ कयासों से
शनैः शनैः किये काजों का भी
परिणाम एक दिन आना है!                                
...मन में ले संकल्प 3

पथ नहीं यह दुर्गम,
यह तो पथचिन्त्य का बंटवारा है!
स्वचिन्त्य का हो विस्तार
फिर तो पूरा संसार हमारा है!
कितने गये यहाँ से दिए बिना कुछ,                        
कुछ ने भरा खजाना है!                                  
...मन में ले संकल्प 4

तुम आये अभी-अभी जग में,
इस जग से ऊब गए?
लगता है किसी गहरे खंदक में
उतरे और डूब गए!
रोको सांस, फिर डूबो,
इस दरिया से पार तुम्हें पाना है!                           
...मन में ले संकल्प 5

निश्चयात्मक वृत्ति करो और बढ़ो,
अनिश्चयवृत्ति से विस्तारित होती है पथबाधा
प्रेम-प्रफुल्लित हो जो स्वागत करते
मंजिल आती ऐसे जैसे कृष्ण को राधा
पथ बाधाएं होंगी काँटों वाली
उन्हें ही तो गले लगाना है!                                 
...मन में ले संकल्प 6

बहुत सरल है यह सब कहना,
करके दिखलाने का भी उद्यम करना है,
होगी ही कठिन तपस्या इस तप की,
हो सफल साधना, ऐसा संयम करना है.
सस्ता तप तो सब कर लेते हैं
वीरोचित तो कठिन साधना अपनाना है                      
...मन में ले संकल्प 7

हार नहीं वो जो रण में हारे,
हार वही है जो मन में हारे!
मन की जीत जो जिन्दा रख लेते,
मंजिल मिलती, होते मंजिल के रखवाले!
अपने चिन्तन में सिर्फ
जीत का जश्न मनाना  है                                
...मन में ले संकल्प 8


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गुरुवार, नवंबर 28, 2019

क्या अब भी वैसा ही है वो मेरा गाँव:सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविताएँ

क्या अब भी वैसा ही है वो  मेरा गाँव 
क्या अब भी वैसा ही है,
वो मेरा गांव!
जेठ की दुपहरी धूप, 
और पीपल की छांव!

बछड़ों के रंभते स्वर,
उस पर श्यामा की पुचकार!
लिए रोटियां हाथ में,
हाथ फेर दादी करे दुलार!
वह स्मृति बाल-टोलियों की,
गोधूल में खेलते नंगे पांव!                                ....क्या अब भी वैसा ही है 1

न बाल हाथ में, न गिल्ली
न क्रिकेट का साजो-सामान!
मैले-कुचले कपड़ों से जो बन जाता
उन गेंदों में थी कितनी शान!
नदी किनारे जबरन जाना 
और बहाना सचमुच की नाव!                             ....क्या अब भी वैसा ही है 2

खेल-खेल में लड़ जाना,
और रेफरी बना करवाना फैसला!
गिरे जो कोई खेलमें,
धूल झाड़ बढ़ा देते हौसला!
छोटे-छोटे झगड़ों में भी,
ढूंढ़ते थे अजब-गजब के दाव!                             ....क्या अब भी वैसा ही है 3

एक पेड़ आम का, नीचे उसके
बालझुण्ड अपार!
दिन-दिनभर टिके बगीचे में,
बहना चाहे कितनी ही गरम बयार!
बांट-चूंट के घर आ जाते, जो पाते,
देते नहीं किसी को घाव!                                  ....क्या अब भी वैसा ही है 4

इसके घर या उसके घर में
बीत जाती थी सबकी शाम!
लिए टोकरी भर कण्डा सिर में,
कितनी ही लगती तन में घाम!
राजा बन जब करते नाटक
जल जाता मन का अभाव!                                 ....क्या अब भी वैसा ही है 5

नींद ऊंघते सो-जाते पर
सुनते नित्य नया किस्सा!
‘‘ऐसे-ऐसे’’ होता था,
हर किस्से का हिस्सा!
उन किस्सों का जीवन पर 
निश्चित ही पड़ गया होगा प्रभाव!                         ....क्या अब भी वैसा ही है 6

सुबह-सबेरे उठकर पढ़ना,
काम कोई हो गया महान!
चार लाइनें जोड़ बन जाता,
कोई तुलसी, या रसखान!
एक-दूसरे का छप्पर छाते,
ऐसा था सभीजनों का भाव!                                ....क्या अब भी वैसा ही है 7

खुलकर हंसते, लगा ठहाके,
नहीं किसी का था उपहास!
कारण-अकारण ही मिल जाता
जिससे करते वे विनोद और परिहास!
खुलकर जीवन जीना, बातें खुलकर
ऐसा था उनका स्वभाव!                                   ....क्या अब भी वैसा ही है 8

त्यौहारों की तो बात गजब थी,
गांव की गलियों में लगती भीड़!
रंग-बिरंगे कपड़ों में बढ़ते सब
अपार जनसमूह को चीर!
रिश्तों की मिठास में घुल जाता
होता भी जो मन का दुराव!                               ...क्या अब भी वैसा ही है 9

सब के संकट टल जाते 
जब मिल जाते मनमीत!
कीचड़ मध्य खड़ा हो रोपित करतीं
और गातीं खेती के मंगलगीत!
श्रम-साधना को जीवित रखतीं,
और रखतीं मन में उराव!                             ....क्या अब भी वैसा ही है 10

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...