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बरसात पर मनोज कुमार चंद्रवंशी की एक अच्छी कविता

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बरसात का मौसम रिमझिम - रिमझिम बरसो घनश्याम, प्यासी धरती माँ  का प्यास मिटाओ। नन्हा सुप्त बीजअंकुरित हों खेतों में, प्रकृति की  गोद में हरियाली लाओ॥ धरा  का  तीक्ष्ण  तपन  मंद हो गई, सुखद  बरसात का मौसम आने से। सर्व चराचर शीतलता की अनुभूति, चहुँ ओर  काली घटा  छा जाने से॥ भीषण उष्णता का हुआ गृह गमन। धरा  में  चहुँ  ओर  हरियाली छाई, प्रकृति  परिदृश्य  अति मनभावन॥ काली   घटाओं  के  तीव्र गर्जना से, कानन  में  नाचे   मोर  पंख  पसार। द्रुम डाल पर कलियाँ प्रस्फुटित हुई, विहग  फुदक  रहें हैं वृक्षों के डार॥ उमड - घुमड  कर  काले  मेघ चले, शीतल,  मंद,  सुगंध  चले  पुरवाई। टप टिप-टप टिप धरा में मेघ बरसे, सकल वसुंधरा में हरियाली छायी॥ हरित - हरीतिमा धरा  की  परिधान, कृषक खेतों में श्रम साधना करतें हैं। खग,मृग,मोर, पपीहा, मुदित होकर , कानन में स्वच्छंद विचरण करते हैं॥ keywords: पावस पर कविता pawas par kavita,  वर्षा ऋ...

वृक्ष पर कविता : मनोज कुमार चंद्रवंशी

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वृक्ष (चौपाई) पादप   जगत   हरे  परितापा। मिटे  दुख अरु  मिटे  संतापा॥ विटप दल  लता  महि  श्रृंगारा। तरु तृण मनुज प्राण आधारा॥                         तरुवर  भूषण   बहुत  सुहाई।                         बेला  हरित  पर्ण  मन  भायी॥                         झुरमुट कानन दल मन मोहा।                         सुरम्य  वन  प्रसून दल सोहा॥   पादप   जगत  जीव  रखवारे। कानन  तरु  दल प्रानन प्यारे॥ तरुवर सरस सुहृद ...

कविता(काव्य): मनोज कुमार चंद्रवंशी की कविता पर कविता

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'कविता' पर कविता  कविता अनमोल भावों से सुसज्जित, वसुंधरा  में   पीयूष  होकर  बहती है। हृदय के  असीम  गहराइयों से उपजे, भाव -भंगिमाओं  को  बयां करती है॥ सुधि पाठक काव्य का रसपान कर, रसस्वादन   को हृदयंगम   करते हैं। अलौकिक  आनंद  की अनुभूति को,  कवि वृंद  लेखनी से  बयाँ  करते हैं॥ प्रस्फुटित  काव्य  की  प्रत्येक  बूंद में, साहित्य  का  अथाह  वेग  समायी है। मृद कविता साहित्य को उत्कृष्ट  कर, साहित्य  को भाव  प्रधान बनायी है॥ कोमल  कविता  में  शब्द अगणित हैं, काव्य भाव प्रवाह का आदि न अंत। कविता  सरस,  सुहृद  मधुरस  सम, काव्य  सौंदर्य  का  अनुभूति अनंत॥ काविता में  कवि का मर्म तिरोहित, कविता मार्मिक भावों का चित्रण है। कविता की हर पंक्तियां हृदयस्पर्शी, काव्य जीवन यथार्थ का चित्रण है॥ #keywords: kavita par kavita, kavita par kavya, kavita #keyword: कविता पर कविता, कविता पर काव्य, कवि...

फगुनाहटी बघेली कविता : अशोक त्रिपाठी 'माधव'

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फगुनाहटी बघेली कविता  सनन्-सनन् सुर्रा चलय, बिरबा झारैं पात। लगत झकोरा हिय कंपै,फगुनाहटी कय बात।। कबौ निचंदर कबौ बदरिया,कबौ बरसि चंहदर्रा। कबौ धुंध पुनि कबौ बड़ेबर,कबौ बहै खरभर्रा।। महुआ पत्ता झारि रहा है,बौर आम मा आई। गय पियराय उन्हारी सगली,बहै लाग पुरबाई।। गेहूं है गदरान चना अउ अरहर मसुरी साथय। गा झुराय सरसबा लगे हां माहू झोंथय-झोंथय।। सोंध महक भुंइया से आबय मादक बहै बयारी। बूढ़ सयान सबय एंह रित मा मारि परैं हुलकारी।। गा सिहिलाय मौसमउ खासा सबके मन उमहान। लूमरि-डांगरि सब कुलकारैं हां खासा बउरान।। सूर मकरगत तिल-तिल बाढ़ैं घट का बहुंकय लमहरि। सांझ सकारे नगदि जड़ाबय कसमसाय दिन दुपहरि।। पाकत देख उन्हारी खेतिहर देउता -पितर मनाबय। पाथर अउर दौंगरा के भय जगि के रात बिताबय। कोइली कुहुक करेजा सालय बिरहिन के मन माहीं। जेकर प्रियतम छांड़ि बसे हां जाय बिदेसे माहीं।। सिहरै देहिंया लगतय सुर्रा करै करेजा घायल। मांग सिन्दुरबा अंगरा लागय बैरी करधन पायल।। फाग-ददरिया परै जो काने बजुर बान अस लागय। बसे जाय बालम परदेसय सुधि कय राति मा जागय। मादक महिना फागुन आबा रितु बंसंत रितुराजा। माधव मगन निरखि के सोभ...

ओरहन :बघेली कविता-अशोक त्रिपाठी माधव

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ओरहन :बघेली कविता आपन लिहा सम्हार जमाना। बात-बात पर दिहा ना ताना। पहिले खुद के टेंटर निरखा, फेर कहा दुसरे का काना।। चोर आजु कोटबार का डांटय। सूध के मुंह का कूकुर चाटय। आजु हियन अंधेर मचा हय, इहां लुटइया बायन बांटय।। करकस कउआ गाबय गाना। कोइली के अब नहीं ठिकाना। उहौ उतान फिरै अब माधव, रुपिया किलो खाय जे दाना।। अंधे पोमैं कूकुर खांय। दुर-दुर कहैं ता मारे जांय। राज करैं अब जबरा-लबरा, सत्तमान के दइउ सहांय।। जे घोड़े के पायेंन धाबय। ओके कइत अढ़इया आबय। धक्का खाय सेमाली काकू, रामपदारथ मजा उड़ाबय।। एकर लाई उहां लगामैं। एक-दुसरे के घर फोरबामैं। गली-गली मा भेदी बगरे, घर-घर, मेहरी-मनुस लड़ामै।। अइसन बिगड़ा हबै समाज। आबा लड़िकोहरिन के राज। खानपान पहिनाउ बदलि गा, संसकार मा परि गय गाज।। केखा कही अउ केसे रोई। हमहूं आपन दीदा खोई। अब ता केबल एक सहारा, करिहैं राम उहै अब होई।। पीठ देय जस बहय बयार। इहय आय करतब्ब हमार। जे बइहर के उलटा भागय, ओखर हंसी करय संसार।। अबहूं भरे मा चेतय चाही। परे रही ना घुरबा साही। अइसन कउनौ जुगुत बनाई, आबय बाली रुकय तबाही।। और पढ़ें : अशोक त्रिपाठी "माधव' की बघेली कविता ...

मान देश का (कविता) : अशोक त्रिपाठी 'माधव' की देशभक्ति पर कविता

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मान देश का (कविता)   #keywords:- देशभक्ति पर कविता, राष्ट्रप्रेम पर कविता, राष्ट्र पर कविता, राष्ट्रभक्ति पर एक सुन्दर कविता जय जय मां भारती उदयांचल से अस्तांचल तक। हेम शिखर से वारिधि तल तक। हो अखंड वैभव मां तेरा चहुं दिशि गूंजे आरती। जय भारत जय भारती।। जगमग ज्योति जले आंगन में। ओम् उच्चरित हो कण-कण में। देव बधूटी तेरा आंचल,  हरदम रहें संबारती। जय भारत जय भारती।। देव तरसते हैं आने को। तेरा पावन रज पाने को। आदिशक्ति लक्ष्मी भी तुझपर। धन-वैभव,यश बारतीं। जय भारत जय भारती।। पुन्य धरा है तू राघव की। परम प्रेमिका है माधव की। सीता तू ही तू राधा है। दूनिया तुझे पुकारती। जय भारत जय भारती।। तुमने वेदों को उपजाया। शान्ति-शौर्य दोनों सिखलाया। तू उर्वरा शक्ति सम्पन्ना। वीर सदा अवतारती। जय भारत जय भारती।। रत्नगर्भिणी तू जग माता। हरिप्रिया जन मन सुखदाता। रक्त श्वेत अरु हरित रंगत्रय। चारु चुनरिया धारती। जय भारत जय भारती।। रवि नित प्रथमहिं करत सबेरा। जग यशगान करे नित तेरा। अवनि और अंबर में दश दिशि। गूंजे तेरी आरती। जय भारत जय भारती।।  रचना :  अशोक त्रिपाठी "माधव" शहडोल, मध्यप्रद...

बघेली गजल : अशोक त्रिपाठी माधव

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बघेली गजल   केखा खोटहा कही केखा हीरा कही। है निठुर जब जमाना केसे पीरा कही।। केसे रोई बताई हम आपनि बिपति। केहू पिरबेदना दुनिया मा अइसन नही।। जेखा मानेन हम आपन ऊ दीन्हिसि दगा। करी केखर भरोसा साथ केखे रही।। अब उचटि गा हय बिसुआस संसार से। हर घड़ी अब जुलुम बोला कइसे सही।। टोरि दीन्ह्या तुहूं सगली उम्मीद का। एक भरोसा रहा तोंहसे आशा रही।। सुधि रही या मरत तक जउनु दीन्ह्या सजा। नाउ से तोंहरे आंसू या बहतय रही।। ठीक भा तू किहा जउनु जानिन गयन। पय पारुख तोहांरय उमिर भर रही।। तूं मिला ना मिला दुःख न होई कबौ। ना बिसरि पउबय सुधि आय अउतय रही।। तूं जहां जा खुशहाल जीबन जिया। रात-दिन माधव मांगन या मगतय रही।। खेल किसमत के जाने न पाबय कोऊ। दूध बिगड़े के बादय बनत है दही।। रचना: अशोक त्रिपाठी "माधव" शहडोल मध्यप्रदेश और पढ़ें : अशोक त्रिपाठी "माधव' की बघेली कविता " ओरहन " अशोक त्रिपाठी "माधव" की बघेली कविता  " फगुनाहटी" अशोक त्रिपाठी "माधव" की  बघेली गजल  अशोक त्रिपाठी माधव की कविता मान देश का  इस ब्लॉग में प्रकाशित अन्य कवियों की बघेली कविता इस ब्लॉग म...

आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय #बघेली_कविता: जोगेश्वर सिंह 'जख्मी'

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आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय (#मोबाइल_पर_बघेली_कविता)  ओह जमाने का का कही दादू मास्टरजी पढावे खातिर एहर ओहर लईका पकड़त रहेन महतारी के अचरा मे हमन,लुकाय जात रहेन  हाथ पकड़ के बाऊ फेर मास्टरजी के ईहाँँ  पहुंचाई देत रहेन अब बतावा कुल काम घर बैठे होई जात हय आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले (मोबाइल) मे होई जात हय लड़िका सबे कुदत् फांदत  बहिरे भीतरे करिके  चहल पहल कर देत रहेन बोबा और दाई के मनवा धरी लेत रहेन,  जलेबी लाये हेन !  ई त बहाना रहा  एही मे अपनौ के लइका समझ लेत रहेन अब बतावा समसवो स्विगी से मिल जात हय आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय माई हमार कहत ही की ई लईका  का जानी, केतना  दिनभर पिक्चर देखत हय थोड़ीके पढ़ी लिखि लेत त  का होई जा भला हमरे ही भाग मे आवा ई कोरौना स्कूल बंद कराई दिहिस हमरे लड़िका के  जिंदगी बरबाद कर दिहिस हम ओके कैसे समझाई अम्मी मैडम जी के स्कूल, गूगल मीट से होई जात हय आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय थोड़ीके बइबे निकला करा दादु खेला ख़ुदा,  शरीर पे ध्यान देत ...

वर्षा ऋतु पर कविता : राम सहोदर

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वर्षा ऋतु (कविता) (प्रस्तुत है श्री राम सहोदर पटेल जी की वर्षा ऋतु पर कविता ) आई है ऋतु की रानी, धरणी श्रंगार करने। काली घटा घनेरी, घम-घम-घमा घुमड़ने॥ गरजे घुमड़-घुमड़ के ज्यों ढोल लगे बजने। चम-चम से चपला चमके, अम्बर लगा है सजने। झम-झम-झमा से झूमे, झर-झर लगा है झरने। चहुओर छाई खुशियाँ, वृष्टि हिलोर उठने। भये दादुरादि चारण, गायें है गीत सबने। केकी बनी है नर्तक , वर्षा के रंग में रंगने। उमड़ी है तटनी तट की, सीमा को लगी लघने। सूखा का कहर भागा, श्यामल धरा है लगने। थी सूर्य की प्रखर से तापिश हो जगु झुलसने। थी जेठ की ऊमस में, छाया भी छाँव तकने। अब आई वर्षा रानी, लागे है मन हुलसने। उमंगें प्रकृति है सारी, खग-मृग खुशी छलकने। खेतों में बीज रोपे, कृषकों के हल हैं चलने। धरणी की प्यास भागी, अंकुर से लगी सजने। बीथिन में कीच प्रसरी, केचुले लगे सरकने। मल-मूत्र, कूड़ा-कचरा, धारा के संग में बहने। सन्देश देता जग को, निर्मल हो रब के गहने। सम्पूर्ण हुई वसुधा, नहिं जीव कोइ दुख में। रानी है वर्षा ऋतु की, चाहे सहोदर लिखने। रचना: राम सहोदर पटेल (शिक्षक) ग्राम-सनौसी, त...

जाने कहां गए, वो बचपन के दिन....

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जाने कहां गए, वो बचपन के  दिन.........       समाज में परिवर्तन होता आया है और होता ही रहेगा। शहर में बदलाव आया भौतिक भी और सामाजिक भी।यह परिवर्तन गांवों में भी बहुत तेजी के साथ हुआ।वैश्वीकरण के युग में सब कुछ बाजार आधारित हो गया।विकास ने न केवल हमारे भौतिक परिवेश को ही प्रभावित किया बल्कि सामाजिक ताने बाने को , मानसिक फलक को भी अछूता नहीं रहने दिया।कहावत है कि अजब तेरी महिमा , गजब तेरी लीला।वह भी क्या जमाना था जब दरवाजे पर बैल , भैंस , गाय , बकरी , घोड़ा , मुर्गी , कुत्ता आदि अपनी उपस्थिति से कोलाहल पूर्ण परिवेश का सृजन करते थे , और जीवंतता का एहसास कराते थे।सुबह सूर्य की स्वर्ण रश्मियां ओस की बूंद को सुनहली बना देती थी , चिड़ियों का चहचहाना , भौरों का गुंजन वातावरण को संगीतमय बना देते थे।कुएं पर चरखी की आवाज क्या सिहरन पैदा कर देती थी नहाने से पूर्व ही , जाड़े में रोएं खड़े हो जाते थे। दरवाजे पर इन जानवरों की अधिकता उस व्यक्ति की संपन्नता और शौक के द्योतक थे , उस गाँव में उसे बड़ मनई कहा जाता था ।दरवाजे पर नीम का दरख्त और दाएँ या बाएँ पक्का कुंआ , ...

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)

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आलेख : हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श - रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)           स्त्री मायने ’’ माँ ’’ । माँ से ही इस सृष्टि का सृजन हुआ है। माँ ही इस भूमण्डल को स्पंदित करती है। माँ के ममतामयी रूप को साहित्य प्रतिबिंबित करता है ; साथ ही स्त्री की हृदय विदारक पीड़ा का प्रतिबिंबन भी साहित्य में मिलता है। सृष्टि विधायक , भूमण्डल का हे जननि! हृदय तुझे है समर्पित।   ममता की धागों से बुनती हमको , जीवन का कण-कण है अर्पित।। साहित्य और समाज दोनों एक-दूसरें के संपूरक हैं। साहित्य समाज को चित्रित करता है और समाज साहित्य को चित्रण करने की शक्ति प्रदान करता है। साहित्य विभिन्न भाव-चित्रों का संकलन है जिसे साहित्य समाज से ही सोखता है। हिन्दी साहित्य में स्त्री की शक्ति और उसका गुणगान भली-भाँति की गई है। साहित्य स्त्री विमर्श के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन करती है ; उसके सामाजिक पहलुओं , आर्थिक पक्षों , धार्मिक आचार-विचारों , गृहस्थी पक्षों आदि का प्रकटीकरण करता है। जब तक साहित्य स्त्री पक्षों का स्पंदन नहीं करता तब तक साहित्य का संचित कोष अधूरा ही होता...