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पावस का आगमन: सुरेन्द्र कुमार पटेल

पावस का आगमन धरा पर नाचने लगे  जब  तेज तपन लौ-लपट का  पहनकर आभासी वसन पवन बिछाने लगे जब पावक-सा शयन धरा पर तब होता है पावस का आगमन। सागर हिय मिलने धरा से जाये मचल कहने भाव सागरजल जब जाये उछल तापांतर का वेग  सह नहीं पाता गगन धरा पर तब होता है पावस का आगमन। कृषकों का देह गिरने लगे बनकर तरल तपन बन जाये जब जीवों के लिए गरल मुरझाने लगें जब धरा के श्रृंगार वन-सुमन धरा पर तब होता है पावस का आगमन। बीज नवांकुर बनने हो जाएँ जब विकल पौध-प्रसूता लालायित हो जब धरा सकल लौटाना हो जब प्रकृति को धरा का यौवन धरा पर तब होता है पावस का आगमन। करने भीषण ग्रीष्म का वीभत्स रूप हरण हर जीर्णता धरा का पहनाने हरित वसन रखना हो मोर, पपीहा और दादुर का मन धरा पर तब होता है पावस का आगमन। (सर्वाधिकार सुरक्षित,मौलिक एवं स्वरचित) © सुरेन्द्र कुमार पटेल ब्योहारी, जिला-शहडोल (मध्यप्रदेश) [इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर इमेल करें अथवा ✆ 8982161035 नंबर पर व्हाट्सप करें, कृपया देखें- नियमावली]  

कुदरत का करिश्मा: बी एस कुशराम

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रचनाकार--- बी एस कुशराम बड़ी तुम्मी शहर--- अनूपपुर (मध्य प्रदेश) दिनांक--- 30 जून 2020 दिन--- मंगलवार विषय--- कुदरत का करिश्मा विधा--- कविता      🙏 कुदरत का करिश्मा🙏 वरदान है मानव के लिए,देखो करिश्मा कुदरत का। अभिशाप भी है जग के लिए,ये तो करिश्मा कुदरत का।।    अस्तित्व को बचाए रखें, वरदान साबित होगा,    गर करोगे छेड़छाड़,अभिशाप होगा कुदरत का।    वरदान है मानव के लिए---------- पूजा करें कुदरत का, यश गान करें शोहरत का, फल मिलेगा पक्ष में, मौका न होगा शिकायत का। वरदान है मानव के लिए-----------    हम ऐसा करें उपक्रम, पर्यावरण सुधारें हम,    समाज देश उन्नत करें, विकास हो भारत का।    वरदान है मानव के लिए--------- प्रकृति से न करें खिलवाड़, प्रगति का लगाके आड़,        असर विपरीत पड़ेगा, एहसान मानो कुदरत का।    अभिशाप भी है जग लिए----------     बिन मांगे सब कुछ देता, हमसे कुछ भी नहीं लेता,    संरक्षण व संवर्धन करें, ...

यह जांच का विषय है

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यह जांच का विषय है यदि पृष्ठभूमि हो सरल और सहज तो किसी आरोपी पर आरोप तय है। पृष्ठभूमि हो जरा-सी गम्भीर उसकी तो कहते यह जांच का विषय है। एक इंच भी  सरकारी जमीन पर गरीब का हो दखल तो हटना तय है। बड़े-बड़े शहरों में बड़े आशियाने बने है सरकारी यह जांच का विषय है। मामूली धाराओं के आरोप में सलाखों के पीछे पहुंचना तय है। संगीन अपराध-आरोपी संसद पहुँचकर कह जाते यह जांच का विषय है। पूरे न हों कागजात गाड़ियों के तो चालान कटना सरकारी निश्चय है। ले-देकर निपटाने के मामले पर, चुप रहना यह जांच का विषय है। इतिहास के पन्नों से लिया है हिसाब, उस पर हो रहा खूब अभिनय है। वर्तमान के बिगड़ते भूगोल पर चुप, बिगड़ा भूगोल यह जांच का विषय है। छोटी-छोटी मछलियां जाल में फँसीं, बड़ों का जाल से निकलना विस्मय है। ऐसे अजूबे जाल को बनाया किसने ज्ञानी कहते यह  जांच का विषय है। मृतक  खोद जाते कागदों पर ताल, वही पीते पानी हमें तो भूतों का भय है। भूतों को दिया है राशन-पानी जो, है उनका संसार यह जांच का विषय है। क्यों नहीं रख पाते वे वोटरों का मान, क्यों अब पार्टी से अलग उनका ल...

आषाढ़ का पानी(कविता)

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आषाढ़ का पानी ये आषाढ़ का पानी है, घनघोर बरसता है हरदम। बादल रोज घुमड़ता है, पुरजोर गरजता है हरदम।। चिड़ियों का कलरव लगता है, जैसे बजता हो सरगम। बिजली भी तेज कड़कती, तेज चमकती है हरदम।। झूमे गायें तृण-लताएं, पवन शोर मचाये हरदम। आजादी उत्सव के दिन, सब लहरायेंगे परचम।। विपथ न हों पर्वत से, बहती नदियाँ; ये झरना। धरती रहे खुशहाल सदा, पेड़ लगाते ही रहना।। नभ मंडल में इंद्रधनुष, विखराये अपना रंग। नदियाँ भी उफनाती है, बरखा रानी के संग।। लेकर बादल; पानी को, सूरज का लाज बचाये। ये बारिस के मौसम में, वन-उपवन ताज लगाये।। खुशियां लाती वसुधा पर, ये आषाढ़ का पानी। बसुधा भी हरियाली लाती, प्रेम प्रगाढ़ की बानी।। धरती अपनी प्यास बुझाकर, नदियों की सत्कार करे। पानी बरसे आषाढ़ माह का, जीवों पर उपकार करे।। बीज अंकुरित हो जाते हैं, पाकर आषाढ़ का पानी। कृषक मगन हो जाते हैं, पाकर आषाढ़ का पानी।। ©®डी.ए.प्रकाश खांडेकर शासकीय कन्या शिक्षा परिसर             पुष्पराजगढ़,अनूपपुर (म.प्र....

हाइकु (भारत में कविता की नयी विधा): अविनाश सिंह

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1. हाइकु:-पिताजी संबंधित ******************* पेड़ की छाया उसके फल-फूल होते हैं पिता। धूप में छांंव गागर में सागर होते हैं पिता। उठाये बोझ जिम्मेदारी से दबे होते हैं पिता। घर की खुशी मंदिर के देवता होते हैं पिता। पिता हमारे है चाँद और तारे लगते न्यारे। पिता महान दे वो जीवन दान करो सम्मान। पिता का प्यार न दिखता हमेशा है एक जैसा। मुश्किल कार्य हो जाते है आसान पिता के साथ। घर की नींव भोजन का निवाला जुटाये पिता। पिता का रूप अदृश्य महक सी चारों तरफ। पिता दुलारे करे मार्गप्रशस्त गुरु समान। पिता की डाँट सफलता का राज रखना ध्यान। घर की शान रखे सभी का ध्यान करो सम्मान। 2. *हाइकु:-हार या जीत*💐 ******************** हार या जीत सिक्के के दो पहलू ना करो भेद। हार या जीत होते मन के भ्रम भरे अहम। हार या जीत कर्म के होते फल कम या ज्यादा। जीत या हार जीवन के दो मंत्र रहो तैयार। हार या जीत गाड़ी-चक्का समान उलट फेर। हार या जीत सावधानी से चुनो आगे को बढ़ो। हार या जीत परिवर्तन शील नही अडिग। हार या जीत न मिले लगातार करो संघर...

गुरु दक्षिणा(कहानी): राम सहोदर

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    मथुरा निकट के ही शहर के एक कंपनी में मैनेजर था । वह प्रतिदिन घर से अप डाउन किया करता था और दोपहर के भोजन के लिए साथ   टिफिन लेकर जाया करता था सुबह 9:00 बजे घर से निकल जाता और शाम 5:00 बजे तक ड्यूटी करने के बाद छः   7:00 बजे तक घर आ जाता और घर आते ही मां के सामने बडबडा ने लगता । क्या किया पिताजी ने ? शिक्षक की नौकरी करते जीवन बिता दिया लेकिन न तो कोई ठिकाने का घर बनवाया और न ही अच्छा खासा जागीर ही बनाया जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके । बस वही पुरानी झोपड़ी का घर और प्रत्येक माह खरीद कर खाना । जवाब में मां कहती - बेटा क्या यही कम है कि तुम्हारा और तुम्हारे दोनों बहनों का लालन-पालन किया ; पढ़ाया लिखाया । फिर तुम यह भी जानते हो कि तुम्हारे दादा अधेड़ अवस्था में ही तुम्हा री दोनों बुआ की शादी का भार छोड़कर स्वर्ग सिधार गए । तुम्हारे पिता ने अपने वेतन के भरोसे पर ही अप नी दोनों बहनों का विवाह किया । साथ ही भाई की भी तीन लड़कियों के विवाह में भी पूरा सहयोग दिया । फिर तुम्हारी । सोचो कि वेतन भी तो कम ही मिलता है । मथुरा मां के जवाब से खुश...

नीलगगन (कविता): मनोज कुमार चंद्रवंशी

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नील      गगन       में    उन्मुक्त, विचरण   तुच्छ   कीट    पतंगा। पावस      ऋतु     में    सुरचाप, निज  छटा   बिखेरता   बहुरंगा॥ नीलांबर    परिधान      विस्तृत, अखिल  ब्रह्मांड   के चहुँ  ओर। नीलगगन     अति      रमणीय, नहीं  दृष्टिपात  नभ   की  छोर॥ शशि    उदित   नील  गगन  में, चारू  सितारे  झिलमिला  उठे। मोतियों  से  परिपूर्ण   नीलांबर, धवल  सुप्त नक्षत्र फिर से उठे॥ नील पट  आच्छादित गगन  में, मानो   नवविवाहिता   सादृश्य। व्योम,  नक्षत्र  नभ  के  श्रृंगार, अति  सुन्दर  नभ  छवि  दृश्य॥ नभ   में...

फिर बाद में: रजनीश (हिन्दी प्रतिष्ठा)

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आती है न याद :जागेश्वर सिंह

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आती है न याद  जब नींद नही आती और बीत जाता है , रात का तीसरा भी पहर लोरी गाकर सुलाने वाली मेरी माँ ,मुझे याद आती है जब साथ खाना खाते रोटी कम पड़  जाता है न , बचपने मे अपने हिस्से की रोटी देकर भुखे रह जाने वाली मेरी माँ, मुझे याद आती है। जब चलते चलते लड़खड़ा जाता हूँ न , हाथ पकड़ कर चलना सिखाने वाली मेरी माँ ,मुझे याद आती है। भयानकता का डर और अकेलेपन का साया जब सताती है न , वो अपने आँचल में छुपा लेने वाली मेरी माँ ,मुझे याद आती है। जब बाजार का भाव  बढ़ जाता है जरुरत ही भर का  समान खरीदने में  पैसा कम पड़ जाता है न , हर शौक पुरा करने वाले मेरे पापा ,मुझे  याद आते हैं कम नंबर आने पर मन जब उदास हो जाता है न मेरी हर नाकामयाबियों  में   "फिर कोशिश करो"कहकर सांत्वना देने वाले मेरे पापा ,मुझे याद आते हैं। जब कोई चीज नही दिखता और बहुत ढुँढने पर भी नही मिलता है न मेरी हर गलती पर दांट  देने वाले मेरे बड़े भैया ,मुझे याद आते हैं। जब किसी से तंग आकर चिढ जाता हूँ बातों में बहक सा जाता हूँ न , तब मेरी हर बात को ...

बादलों से सीख : राम सहोदर

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ये बादल वर्षा करने के लिए आए या धमकाने। दमकती दामिनी दमखम कलेजा दहला देती है॥ तपन ग्रीष्म मिटाकर प्यास धरणी की मिटाती है। कि वसुधा बेकरारी ब्रेक कर खुशियां जो देती है॥ ये बादल सीख देते हैं ये वर्षा शीत देती है।   क्षितिज सौंदर्य देता है , प्रकृति सभी जीवों को सेती है॥ कृषक को चैन देती है , धरा को धैर्य देती है। फसल सुख शांति देती है , सकल उपकार देती है॥ न छोटा है कोई माने , बड़ा का भेद न जाने। बराबर सबको देती है बराबर सबसे लेती है॥ ये बारिद हमसे कहते हैं बराबर जीव हैं सारे। ना नीचा जग में है कोई ना ऊंचा मान देती है॥ छिपा जो वृष्टि छाया में , उसे बिल्कुल ना ये जाने। मगर यह छल कपट से दूर निज दामन में लेती है॥ हरी धरती , हरे पौधे , हरे मैदान हरियाली।   हरे अरण्य में खग मृग सभी , खुशियां समेटी हैं॥ खुशी से मोर नाचे हैं , खुशी दादुर भी गाते हैं। जलद ये नभ सजाते हैं , खुशी डीजे बजाते हैं॥ बिजलियां चमचमाती हैं , चमक चिंदी गिराते हैं। मगन मदमस्त हो तटिनी , मधुर कल कल की गाते हैं॥ खुशी चहुँ ओर छाई है रितू पावस के आने से।...

वर्तमान का चलचित्र: सुरेन्द्र कुमार पटेल

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वर्तमान का चलचित्र एक के बाद एक  जब  कई सुखद या दुःखद घटनाएं, हमारे मन-मस्तिष्क से होकर तीव्रगति से गुजर जाएं। जैसे चलचित्र तेजी से आंखों को छूकर निकल जाए, हमने क्या देखा, आसान नहीं है वह पकड़ में आये। हमें याद रहता है हमारा भी दुःख अगले दुख तक, कोई दुख, दुख देता है हमें मात्र वहीं तक रुककर। यही मनोवैज्ञानिक प्रयोग जनमन पर किया जाता है, गतदुख निवारण हेतु गत से बड़ा दुःख दिया जाता है। नितनवीन समाचारों ने तत्क्षणता का स्वाद चखाया है, कल के छोटे दुख को आज के बड़े दुख ने मिटाया है। पुरा स्मरण शक्ति को आज की दुःखद खबर हड़प रही है, वर्त हो रहा अतीत, अतीत को झांकने की तड़प नहीं है। आप स्वयं देश के गत कुछ दिनों के गंभीर संकटों को लें, फिर एक-एक घटना की परतों को मस्तिष्क में खंगालें। आपके मनोमस्तिष्क में वही घटनायें स्थान बनाती हैं, जो घटनाएं आपके समाचार पत्र के कोनों में समाती हैं। इस प्रक्रिया से देख लें मस्तिष्क की संचित स्मृति को, यहाँ देखा जाता है मानव-मस्तिष्क की इसी विकृति को। सड़कों का चीत्कार, निर्भया पर अत्याचार भूल जाता है, आ...

तकदीर की लिखावट: बी एस कुशराम

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तकदीर की लिखावट ये कहा जाता है कि , विधि लिखता तकदीर। जो वह मस्तक लिख दिया , वही अटल तहरीर॥    कोई रहे सुख चैन से , मिले किसी को पीर।    कोई ठहाका हंस रहे , किसी के लुट रहे है चीर॥ खाने के लाले किसी को , कोई बन रहे अमीर। कोई तो कृष गात रहे , कोई पुष्ट    शरीर॥    किसी को प्रिय रांझा मिले , मिले किसी को  हीर।    किसी को रोटी ना मिले , किसी को हलवा खीर॥ कोई डुबक डुबक मरे , किसी को मिल गया तीर। किसी को पीने जल नहीं , कोई बहाए नीर॥    कोई रंक के रंक रहे , कोई रंक से   वजीर।    किसी की रहे बादशाहत , बन रहे कोई फकीर॥       कोई जुल्मी स्वच्छंद घूमे , कोई बंधे जंजीर।     कोई निठल्ला खुश रहे , आफत में श्रमवीर॥     विधि-विधान बनायके , वह लिखता तकदीर।    जिसके हक में जो मिला , यही तो है तकदीर॥ समय चक्र यह घूमता , तनिक तो रखिए धीर। लाचारी का भाव छोड़ , बनके रहें गंभीर॥    इसीलिए कुशराम कहें ,...