आभासी दुनिया:सुरेन्द्र कुमार पटेल
उस पवि़त्र दिवस को याद कर आज भी मस्तक विनम्रता से झुक जाता है। ईश्वरीय कृपा इस दुनिया में है या नहीं इसकी अवधारणा स्पष्ट न होने पर भी हृदय किसी अदृश्य, शाश्वत और सर्वोच्च शक्ति को याद कर कृतज्ञता के भाव से भर जाता है। उस एक दिवस ने मुझे जगत प्रसिद्व कर दिया। और तो और, जिस ‘‘सामाजिक‘‘ होने के लिए लोग न जाने किस-किसके दर ठोंकरे खाते रहते हैं घर बैठे ही मैं सामाजिक हो गया! सोशल मीडिया पर मेरा उस रोज खाता खुला था। उसके पहले तक मैं वैसे ही सर्व सभ्य समाज से अलग प्राणी समझाा जाता था जैसे आपके ही जान-पहचान में हो रहे शादी-ब्याह के कार्यक्रम में सभी को पूछा गया हो पर आपको जानबूझकर छोड़ दिया गया हो। सच कहूं तो उस रोज मेरा नया अवतार हुआ था। न जाने क्यों लोग उस रोज को हैप्पी नया अवतार नहीं मनाते! आपको विश्वास नहीं होगा, उस रोज से मैंने घर से रहा सही निकलना भी बन्द कर दिया। ऐसा क्यों? इसे आगे बताते हैं। मैंने देखा, क्यों लोग इस प्लेटफाॅर्म को सोशलमीडिया कहते हैं। इस प्लेटफार्म में लोगों के व्यवहार का पूरा हिसाब-किताब रहता है। आपने कोई पोस्ट डाला, किस-किस ने लाइक किया, कमेंट किया इसका लेखा-...