॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। ताही दूर राखे हित होई॥ मित्र करे जो घात पिछारी। ताहि न नियर रखो दिन चारी॥ समझ बूझकर मित्र बनाबहु। ज्यों बाजार में माल पटाबहु॥ सखा रहत सुख-दुख को साथी। ज्यों रवि तिमिर हरे परमार्थी॥ कपट कुचली होय पड़ोसी। रहहु सजग जो अवसर पोसी॥ कबहु न बैर करब काहू से। बैर किये बल घट बाहू से॥ निर्मल मन राखहु सब ही सो। निश्छल प्रेम राख रब ही सो॥ दोहा तन मन निर्मल राखकर, श्रेष्ठ आचरण धार। मधुरी वाणी बांटकर, सबहि जनाबहु प्यार॥ चौपाई झूठ कपट जो लेय सहारा। ताहि न जीवन में भिनसारा॥ मान घटे अपयश है बाढे़। बाह्य आडंबर यदि पग धारे॥ बात बनाबटि काम दिखाबा। ते नर मानव जनम नशावा॥ विश्वास किये विश्वास पनपता। बिन विश्वास न मिले सफलता॥ भाई चारा राखहु सबसो। यदि चाहत उजियारा तम सो॥ जिन मुख दुग्ध कुंभ विष होई। तिन सो दूर रहे सुख होई॥ ...
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