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शनिवार, मई 02, 2020

पिया कब आओगे(कविता):मनोज कुमार


       (1)  विरह वेदना

विरह वेदना क्या कहूं ?
              स्वर नहीं है रागों में l
बहु कुसुम प्रस्फुटित है,
         ओ सुमन नहीं है बागों मेंll
हे !प्रियतम कब आओगे?

उर मे तन्हा छाया है,
              पिया के अनुराग मेंl
उषा की बेला कब ?आए,
           अली गुंजन करे पराग मेंll
हे !प्रियवर कब आओगे?

गम की हयात में जी रही हूं,
           रब कब? आएगा सावनl
घना मेघ घनघोर छाया है,
               कौन? थामेगा दामनll
हे !साजन कब आओगे?

विकल है तन और मन,
                मानो सरिता की मीनl
हे! नाथ दर्शन कब होगा?                                           
             कब उर होगा तल्लीनll
हे !प्राणनाथ कब आओगे?

राह निरख रही हूं,
                   मानों चंद चकोरl दृग से आंसू टपक रहे हैं,
           निज कपोलों की ओरll
हे! स्वामी कब आओगे?

             (2)पिया का आगमन

पिया आगमन के  संदेश से,
                    हर्ष व्याप्त अपारl
  मानो दिवाकर उदित हुआ,
       सम चातक युगल की प्यारll

चित्त चंचल हो रहा है,
            अंतस्थ में मिटा उदासीl उम्मीद की रश्मि घुती,
      अब आएगी सुख की राशिll

अब आया वह शुभ पल,
         खुशियां सज गई डोली मेंl   अब मन अहलादित् हो गई,
             कांति आ गई रोली मेंll

निज जीवन में कुसुम खिलेंगे,
              निजआशा की मुस्कानl
जीवन में सुख दुख की चक्र चली
             अवशेष है  स्वाभिमानll

प्रमुदित हुआ  स्वा चित्,
                    निज घट के अंदरl
हे ?नाथ ऐसी मिले,
    मानो तरणी को मिला समंदरll

काव्य रचना~ मनोज कुमार चंद्रवंशी प्राथमिक शिक्षक संकुल खाटी एम  भूगोल एवं अंग्रेजी साहित्य SET  double NET
(किसी भी लेखक की योग्यता की पुष्टि ब्लॉगर टीम नहीं करती। यह सूचना लेखक के बताए अनुसार है)
03/04/2020 

शनिवार, अप्रैल 11, 2020

पिय तेरे आने से:कोमल चंद कुशवाहा की कविता


पिय तेरे आने से
जीवन तरु हरा हुआ है।
रोम-रोम हो गया प्रफुल्लित
जब से तुमने स्पर्श किया है।
अंग अंग रंग चढ़ा प्रेम का
भय वियोग का दूर हुआ है।
पिय तेरे आने से
जीवन तरु हरा हुआ है।

आ गई मधुरिमा नैनों में
अधरों में लाल कली।
पिय तेरे आने से
जीवन तरु हरा हुआ है।
झड़ते थे पहले भी आंसू
आज भी आंसू भरे हुए हैं।
पिय तेरे आने से
जीवन तरु हरा हुआ है।

रो-रो कर काटी थी रातें
नींद नहीं मैंनें जानी थी।
बीत गईं वह दुख की घड़ियां
अब आंखें अलसानी हैं।
पिय तेरे आने से
जीवन तरुण हरा हुआ है।

रोम-रोम हो गया प्रफुल्लित,
जब से तुमने स्पर्श किया है।
वर्षा शीत बसंत जलातीं
अब लू भी मन को भाती है।
पिय तेरे आने से
जीवन तरु हरा हुआ है।

रोम-रोम हो गया प्रफुल्लित
जब से तुमने स्पर्श किया है।
रितु बसंत छा गई है तन पर
अंग कलियां सब खिली हुई हैं।
पिय तेरे आने से
जीवन तरु हरा हुआ है।
रोम-रोम हो गया प्रफुल्लित
जब से तुमने स्पर्श किया है।
काव्य रचना: कोमल चंद कुशवाहा
(शोधार्थी हिंदी)
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा
मोबाइल 7610103589
[इस ब्लॉग में प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया यहाँ क्लिक करें। कृपया  अपनी  रचनाएं हमें whatsapp नंबर 8982161035 या ईमेल आई डी akbs980@gmail.com पर भेजें,देखें नियमावली ]

बुधवार, अप्रैल 08, 2020

श्रृंगार के दोहे: कोमल चंद

              श्रृंगार के दोहे
राधा रानी दान दे मोहन करें सहाय।
रस की सरिता मांग लूं जामें रसिक नहाय।।1।।

देह धरा उर ताल पर विकसे पंकज लाल।
जिनको सेवन बैठे हैं षठपद दुई वाल।।2।।

पांव पंकज पंखुड़ी अंगूरी अरविंद नाल।
शिर जानो मलया गिरि भुजगन मानो बाल।।3।।

उडत नहीं नहि जात कहूं बसे रहत इक ठौर ।
मन में ऐसे सोच के रस न पिवे कोई और।।4।।

मस्सा गोरे गाल पर बैठा है गतिहीन।
सरसिज पर भंवर ज्यो बैठा हो रस लीन।।5।।

आस लगी पिया मिलन की आ गयो बसंत।
कोयल कू कू करन लगी पिय बिन सवै दुखंत।।6।।

नयन कटीले बयन सुरीले नैनो के पल गीले गीले।
याद पिया की करते करते आनन हो गए पीले।।7।।

कनक कर में कनक लिए खड़ी कनक के खेत।
चारिहु दिस पिय देख के कनक कर में लेत।।8।।

जब तक पिय के पास थी बही प्रेम की धार।
पिय वियोग में हो गया जीवन मेरा भार।।9।।

अंग-अंग रस की झलक केश प्रेम के फंद।
कमल न  विकसे ह्रदय के सोच रहे मुख चंद।।10।।

अंग अंग में रस भरा दिखे प्रेम की गंग
प्रेम पियासे प्रेम से पिए प्रेम की भंग।।11।।

अंग बिखरे लालिमा आंखों से अनुराग।
दर्शन करले पीव का जागे सोए भाग।।12।।

रसन दशन अरु वसन की कहिए प्रीत अपार।
बिन बोले नैन दोउ करें प्रेम व्यवहार।।13।।

नैनों में अनुराग है अधरों में मधुराग।
अंगों में मधु रस भरा सेवन हो तो जाग।।14।।

हाथ हमारे आरसी मुंह देखो  केहि काज।
सजना है सजना नहीं सजन में लागे लाज।।15।।

नील नयन नीले वसन नीली काजल रेख।
नील श्याम घनश्याम है नीला नीला देख।।16।।

हिरनी जैसे नैन हैं चंपा जैसी बास।
कोमल ऐसे रूप को लोचन मरत पियास।।17।।
काव्य रचना:
कोमल चंद कुशवाहा
शोधार्थी हिंदी
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा
मोबाइल 7610103589
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सोमवार, अप्रैल 06, 2020

आओगी न तुम मुझसे मिलने: सुबोध झारिया

Subodh jhariya
सुनो ...अ!
हम मिलेंगे एक बार जरूर,
बुढापे में लकड़ी लेकर,
आऊंगा मैं तुमसे मिलने...
जानती हो क्यों?
क्योंकि उस समय,
कोई बंदिशें नहीं होंगी।
ना तुम्हारे ऊपर ,ना मेरे ऊपर
वो दौर भी कैसा होगा!
कितना सुन्दर कितना खुशहाल,
ना किसी का डर होगा,
ना कोई दायरा।

तुम आओगी ना मुझसे मिलने ?
आँखों पर मोटा-सा चश्मा होगा,
उस चश्मे से निहारूंगा,
तुम्हारी आंखो की शरारत को।
तुम रख देना सर अपना,
हौले से मेरे कंधे पर।
मैं संवार दूंगा तुम्हारी जुल्फों को,
अपने झुर्री पड़े...कोमल हाथों से..!

सुनो तुम...
एक सपना देखा हैं मैंने भी,
आखिर सपने देखना भी तो,
तुमने ही सिखाया...
कहो ना !...
तुम मुकम्मल करोगे ना ?
मेरे इस सपने को ..!

मैं छूना नहीं चाहता तुम्हें....
बस हवाओं की हर पुरवाई में,
महसूस करना चाहता हूँ,
बेहद करीब से...
तुम्हारे सुवास में,
अपने अहसास को।
ईश्वर की प्रार्थना की तरह,
बोलो ना !!
आओगे ना तुम मुझसे मिलने...
अंततः
अनवरत
अंतहीन
अन्वी
#प्रतीक्षा_में_प्रेम
#शुभ
काव्य रचना: सुबोध झारिया,जबलपुर

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...