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कर उनकी जय-जयकार कलम तू: राम सहोदर पटेल

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कर उनकी जय-जयकार कलम तू कर उनकी जय-जयकार कलम तू, सरहद पर जान गंवाते जो। जो मातृभूमि के सच्चे सपूत हैं, निज भाल से थाल सजाते जो॥ अचल अथक कर्तव्य मार्ग पर, हमरे सुख की खातिर जो। अदम्य शूरमा भटमानी हैं, रहते निडर मुखातिर जो॥ बीबी बच्चों का मोह त्यागकर, मातृ धरणी से मोहे जो। भारत माता का कर्ज चुकाने, अनिमेष दृष्टि खल जोहे  जो॥  हे! कलम दुहाई उनको दे तू, अग्रिम कतार में रहते जो। आन मान सम्मान बचाने, है क्षुधा पिपासा सहते जो॥ बलिदान हुए सीमा रक्षण में, खलदल हैं मार गिराये जो। माता के अखण्ड सुरक्षा हित दुश्मन की नींद उड़ाये जो॥ कर उनकी जय-जयकार कलम तू, परस्वार्थ में स्वाहुति देते जो। निजप्राण हथेली पर रखकर, कोरोना मरीज को सेते जो॥ विकट कोरोना काल कलह पर, निर्भय सेवा देते जो। कहे सहोदर वे कर्मवीर बन, जन्मभूमि हित जीते जो॥ कर उनकी जय-जयकार कलम तू, देशभक्ति हित जीते जो॥ [इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर इमेल करें अथवा ✆ 8982161035 नंबर पर व्हाट्सप करें, कृपया देखें- नियमावली ] 

व्यक्तित्व निर्माण में साहित्य की भूमिका:सुरेन्द्र कुमार पटेल

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व्यक्तित्व निर्माण में साहित्य की भूमिका वह एडीजे के पद पर पदस्थ था। न्याय करना उसका पेशा था। जाहिर है उसने संविधान पढ़ा होगा। अपराध की धाराएं पढ़ी होंगी। उसने संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्यों को भी पढ़ा होगा जिसमें वर्णित है कि भारत का प्रत्येक नागरिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद व ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे। उसकी और उसके बेटे की संदिग्ध विषाक्तता के कारण मौत हो जाती है। पुलिस संदेह के आधार पर कुछ लोगों को गिरफ्तार करती है। जांच से पता चलता है कि एडीजे को एक महिला ने तंत्र-मंत्र का सहारा लेने का सलाह दिया था ताकि पारिवारिक कलह दूर हो और स्वास्थ्य अच्छा हो। जिसके बाद महिला और एडीजे के बीच आटे का आदान-प्रदान हुआ था। एडीजे ने स्वयं अपने बयान में बताया कि उस रात उसने उसी मिश्रित आटे की बनी चपाती खाई थी, उसके दोनों बेटों ने भी चपाती खाई थी जबकि पत्नी ने चावल खाया था। छोटे बेटे को जल्दी ही उल्टी हो गई जिससे उसकी तबियत गंभीर रूप से उतनी खराब नहीं हो पाई जबकि एडीजे और उसके बड़े बेटे की तबियत बिगड़ी और अंन्ततः उन दोनों की मौत हो गई। आटा देने वाली महिला का पुराना परिचय था। शक है ...

गीत मल्हार: मनोज कुमार चंद्रवंशी

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"गीत मल्हार" पिया गए  परदेश  सुनसान  हृदय  आँगन। स्निग्ध स्मित नीरस विरह वेदना है साजन॥               कैसे गाऊँ मैं गीत मल्हार। निष्ठुर  काली   कोयलिया  कुहुक  रही  है। हृदय में अंतर्द्वंद स्वास  कंठ सूख  रही  है॥              कैसे गाऊँ मैं  गीत मल्हार। दर्द  भरा  है  बदन  में सदन में  हूँ  अकेली। हिंडोला झूलते दृष्टिगोचर न कोई अलबेली॥               कैसे गाऊँ  मैं गीत मल्हार। आशा  की  असंख्य  रश्मियाँ  बुझ  चुकी  है। अब  स्वास  डोर  अधर   में   रुक  चुकी   है॥             कैसे गाऊँ मैं  गीत मल्हार। क्रोध अग्नि ज्वलित हिय  में  मन  है बेहाल। नित  दिन खटक  रहा कोरोना का  जंजाल॥             कैसे गाऊँ मैं  गीत मल्हार। बंद पड़े  हैं  मंदिर,  मस्जिद,  चर्च,  गुरुद्वारे। चारु  चंचल  चित्त  स्थिर   मन  के  हूँ  मारे॥           कैसे गाऊँ मैं  गीत मल्हार। सावन  कजरिया  की  सुन मधुर  सुर ताल। मन विक्षिप्त  तन अग्नि  ज्वलंत विकराल॥          कैसे गाऊँ मैं  गीत मल्हार। असहनीय कसक  सकल बदन अकुलाए। स्वर्णिम  स्वप्न  अधूरी  कुछ  न  मन भाये॥           कैसे गाऊँ मैं  गीत मल्हार। सजल नयन टकटकी  ...

हे! मेघ बरसो (वर्ण पिरामिड): मनोज कुमार चंद्रवंशी

हे! मेघ बरसो: (वर्ण पिरामिड)             (१)              हे!              मेघ              बरसो              घनघोर              धरती पर               उमड़ घुमड़               चारों दिशाओं की ओर।               (२)                तू                धरा                तपन                विनाशक                सुखदायक                जग चराचर                सुख शांति प्रदाता।                (३)                तू                सदा                बादल                आया कर                काली घटाओं                को साथ लेकर                रिमझिम बूंदों में।                (४)                हे!                मेघ                तुम्हारे                सुरम्य घटा                मनभावन                अति सुहावन                प्रमुदित हो गया।                 रचना✍                स्वरचित एवं मौलिक                मनोज कुमार चंद्रवंशी                जिला अनूपपुर मध्य प्रदेश                रचना दिनांक-२१|०७|२०२०

बचपन (कविता) : बी एस कुशराम

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‼️" बचपन" ‼️ काश बहुरि के दुबारा , आ जाता मेरा बचपन। झमेला न झेलता , सदा रहता खेलता , यही तो है बचपन।।    बार-बार आता है याद , दस-ग्यारह का मियाद ,    परिवार की परवरिश में , अब उम्र पार पचपन।    काश बहुरि के---------------- मातु-पिता से जिद करना , बात-बात में मचलना , बिन रोष मांग पूरी करते , हों चाहे निर्धन। काश बहुरि के-----------------    भाई- बहनों से रूठ जाना , तुरंत फिर मान जाना ,    बचपन में दोस्तों से , कई बार हो जाता अनबन।    काश बहुरि के----------------- अमराई में पहुंच जाते , पके आम तोड़ लाते , माली से छुपते छुपाते , खाते मिल सखा जन। काश बहुरि के-------------------    लुका- छुपी का खेलते खेल , गुल्ली डंडा का मेल ,    आपस में होता हेलमेल , ऐसा होता है बालपन।    काश बहुरि के-------------------- " कुशराम" की है नसीहत , करो ना कभी शरारत , लिखाओ सु- इबारत , कोरा कागज है बाल मन। काश बहुरि के दुबारा , आ जाता मेरा बचपन , झमेला न झेलता , सदा रहता खेलता...

इंसान (कविता) :राम सहोदर पटेल

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                          इंसान सोचो तो इंसान गिरगिट का नमूना है। किसी से प्रेम करे,  बैर  किसी से दूना है ॥ स्वारथ के पीछे भागे, कोर-कसर न कुछ भी राखे। रिश्ता-नाता पीछे राखे, परमारथ दिल सूना है ॥ सम्मुख में शुभचिंतक बनकर, बसी करे प्रिय वाणी से। पीठ के पीछे कसर न छोड़े, भितरघात करे दूना है ॥ लल्लो-चप्पो बात करे वह, स्वारथ सिद्धि होने तक। झूठी शान बघारत निशदिन, चले लगावत चूना है ॥ शेखी करे सबा शेर बने, सिख देत शिखा के शिरोमणि बन। शक्त सूरमा यदि पड़ जाए, फिर नौ दो ग्यारह हूना है ॥ स्वर्थार्थ हित करे प्रशंसा, धोखा-धडी में नंबर वन। बनावटी शान सजाबत है, बना हाथी का दांत नमूना है ॥ बक-बक बक बकबास करे, बचकानी बनाय रखे सबको। माता-पिता को भी मात करे, चहे स्वारथ डोर पिरूना है । स्वर्थार्थ वह घुटने टेके, पाँव चूमकर मतलब सेके । मतलब सरका वह भी सरका, सरक चला चढ़ लूना है। अपना मतलब तुमसे साधे, तुम्हारे काम में डाले बाधा। ज्यों पृथ्वीराज की बढ़ती न सह जयचंद लगाया हूना ह...

शिक्षा सफलता के दरवाज़े खोलती है-अविनाश सिंह

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शिक्षा सफलता के दरवाज़े खोलती  है-अविनाश सिंह जिस प्रकार हमें जीने के लिए वायु की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जीवन में सफल व्यक्ति बनने के लिए शिक्षा का बेहद महत्व है, शिक्षा के बिना जीवन में सफलता की किसी भी सीढ़ी को नही चढ़ा जा सकता है। यह किसी बच्चे के सर्वांगीण विकास से लगाये देश के विकास और सशक्तिकरण का स्तम्भ होता है। शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान से न होकर वास्तविक ज्ञान से होना चाहिए, शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के नैतिक मूल्यों का विकास होना चाहिए। भारत के संविधान रचयिता बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर जी का तीन ही सूत्र था- शिक्षा, संगठन और संघर्ष। वे आह्वान करते थे, शिक्षित करो, संगठित करो और संघर्ष करो। पढ़ो और पढ़ाओ। शिक्षा में कभी भी भेद भाव नही होता है यह सबके लिए समान होती है। हमारे समाज में बेटियों को शिक्षा से वंचित किया जाता, उसे घर के कामों में उलझाया जाता है पिता को उसके जन्म से उसकी शादी की चिंता होती है किन्तु वही पिता उसकी शिक्षा के बारे में नही सोचता। ऐसा करना किसी पाप से कम नही है, शिक्षा शेरनी के दूध की तरह होती है जो जितना पिएगा उतना ही द...

गाँव की ओर (कविता): मनोज कुमार चंद्रवंशी

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                  गाँव की ओर हम ग्रामीण संस्कृति के उन्नयन में अग्रणी रहें, गाँव में समरसता, सद्भाव का रसधार  बहायें। हर    विकट  परिस्थितियों   में   अडिग   रहें, सदाचार, सद्  मार्ग  को   हृदय  में  अपनाएँ, हम  गाँव  को  ले  जायें   शिखर  की  ओर॥         हमारा एक कदम गाँव की ओर।               निज   हृदय  पटल   में   शुचि   संस्कार  हो, हमारे  हृदय  में  विश्व  बंधुत्व  की  भाव  हो। हम   ग्रामीण  विरासत  के  परिपोषक   हों, हम ग्राम अशांति,अव्यवस्था के नाशक  हों, परपीड़ा दृष्टिपात कर हो जाएँ भाव विभोर॥       हमारा एक कदम गाँव की ओर। हम  गाँव  में  जन  जागृति के अलख जगायें, दीन, दुखियों के सुख - दुख  में   काम  आयें।   ग्राम स्वराज्य उन्नयन में समर्पण का भाव हों, ग्राम पल्लवित, पुष्पित में हमारा सहयोग हों, गाँव में  संकट का  साया  मंडराता चहुँ ओर॥       हमारा एक कदम गाँव की ओर।          जब हम ग्रामीण गरीबी उन्मूलन के प्रेरक हों, स्वर्णिम   गाँव  के  निर्माण   के  उत्प्रेरक  हों। शिक्षा की ज्योति जलाने का प्रयास करते हों, ग्राम्य चहुँमुखी विकास में हमारी भूमिका हों, गाँव में  मिटाने  को ...

परीक्षा में कम अंक आने पर भी नही होना निराश या परेशान :-अविनाश सिंह

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परीक्षा में कम अंक आने पर भी नही होना निराश या परेशान :-अविनाश सिंह। जी हां,जैसा कि आपको विदित है कि बोर्ड के रिजल्ट आने  शुरू हो गए हैं और हर बोर्ड में एक से एक धुरंधर निकल रहे हैं। कोई 100 प्रतिशत तो कोई 99 प्रतिशत अंक प्राप्त कर रहा है और इसमें कुछ ऐसे भी हैं जो कि विभिन्न परिस्थितियों के कारण अनुत्तीर्ण हो रहे या कम अंक प्राप्त कर कर रहे हैं। किन्तु इसका यह मतलब नही कि जिंदगी यही खत्म हो गयी है या इसके आगे कुछ नही है। यह तीन घंटे का पेपर आपकी जिंदगी नहीं बदल देगा, किन्तु आप यदि प्रयास करेंगे तो अनेक सफलताएं हासिल कर सकते हैं। अक्सर अखबारों में यह पढ़ने को आ रहा कि कम अंक आने की वजह से वह डिप्रेशन या आत्मदाह कर लिया,यह एकदम अनुचित कदम है जीवन में सफल सिर्फ 90 प्रतिशत अंक लाकर नही हुआ जा सकता है इसके अन्य माध्यम भी हैं सफल होने के, जो अध्यापक आपकी कॉपी की जाँच कर रहा होगा वह भी जीवन में आपसे कम अंक प्राप्त किया होगा किन्तु आज वह इस लायक है कि आपको अंक दे रहा है। जीवन में सफल होने का मतलब है आप एक अच्छे नागरिक बनिये, एक अच्छा बेटा बनिये, एक अच्छा शिष्य बनिये, एक अ...

हृत-वंदन : रजनीश

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हृत-वंदन   -रजनीश हिंदी(प्रतिष्ठा)                   हूँ मैं श्रवण हूँ मैं लक्ष्मण चिरकाल से हूँ मैं सदाचारी स्मरण मुझको सेवा , सद्भाव आदिकाल से हूँ हृत-विचारी धरा नूतन , राग नूतन सच हूँ मैं अनुराग विस्तारी स्मृति सदा मुझको पूर्वजों की अप्रतिम अवतारी सच , पूर्वकाल से हूँ व्यावहारी रतन हूँ , चमन हूँ मातृभूमि का अनुगमन हूँ शीष अपनी भेंट करता भारत भूमि का हवन हूँ है समर्पित जीवन-त्याग मेरे स्वीकार कर ऐ माँ मेरी धरती मैं तेरी कभी भाई , कभी छोटी बहन हूँ हूँ मैं शुभचिन्तक हूँ मैं विस्तारक और दीर्घकाल से हूँ आचारी सृष्टि मेरी पूजा , सेवा मेरा कर्म मैं सर्वजन का हूँ कल्याणकारी नर हूँ , नारी हूँ जल हूँ , जीव संचारी हूँ                          प्यारी माँ धरती को  सब मेरे मातृ-बन्धुत्व       ...

तिरंगा: बी एस कुशराम

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"तिरंगा" भारत भू के लिए  वरदान है तिरंगा। भारतीयों का ये स्वाभिमान है तिरंगा।।    तिरंगा में है रंग तीन, घबरा गया है चीन-2    अब ना लेगा वह,भारतीय भूमि से पंगा।    भारत भू के लिए------------ केसरिया श्वेत हरित, संविधान में है पारित-2 भारतीय संविधान कहता, सभी रहे चंगा। भारत भू के लिए----------     प्रतीक है ऑन का,  जांबाजों के बलिदान का-2    जज्बा जगाएं जवानों का, ना होंगे तब दंगा।    भारत भू के लिए--------- श्वेत है सादगी रंग,स्वच्छता भी है संग-2 स्वच्छ रखो तटिनी,है जो पावन गंगा। भारत भू के लिए------------    सोंधी माटी यहां की, प्रेरक है जहां की-2    कोई ना रहेगा अब, भूखा और नंगा।    भारत भू के लिए----------- "कुशराम"करो सम्मान,यह तिरंगा है महान-2 लहराएगा तिरंगा, जिस में समाया त्रय रंगा। भारत भू के लिए, वरदान है तिरंगा। भारतीयों का ये, स्वाभिमान है तिरंगा।।    रचनाकार- बी एस कुशराम बड़ी तुम्मी    जिला-अनूपपुर (मध्य प्रदेश) [इस ब्लॉग में रच...

वसुधा:बी एस कुशराम

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🌲वसुधा🌲 वसुधा को हमें सजाना है,पर्यावरण बचाना है। इस का मान बढ़ाना है,पर्यावरण बचाना है।।    धरा धरातल धरनी धरती,    हम सबके ये उदर को भरती।    हमसे ना कुछ मांगे धरती,    बिन मांगे पालन है करती।। धानी चुनर ओढा़ना है,पर्यावरण बचाना है। वसुधा को हमेंसजाना है,पर्यावरण बचाना है।।     आओ सब मिल पेड़ लगाए ,    वसुधा में हरियाली लाएं।     वायु प्रदूषण करें नियंत्रण,    स्वच्छता का लेवें हम प्रण।। ये प्रण हमें निभाना है, पर्यावरण बचाना है। वसुधा को हमें सजाना है,पर्यावरण बचाना है।।    माना प्रगति है अति आवश्यक,    अति लोलुपता बना विनाशक।     सीमा रहित कर रहे हैं दोहन,    प्रदूषण को नहिं करते नियंत्रण। उद्योगों को अब चेताना है,पर्यावरण बचाना है। "कुशराम"ने यह ठाना है,पर्यावरण बचाना है।। वसुधा को हमें सजाना है, पर्यावरण बचाना है। इसका मान बढ़ाना है,पर्यावरण बचाना है।। दिनांक 11/07/ 2020 दिन-शनिवार Ⓒरचनाकार- बी एस कुशराम बड़ी तुम्मी   ...

सावन गीत: धर्मेन्द्र कुमार पटेल

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🌧️🌧️सावन गीत🌧️🌧️ 🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️ बहुत ही व्यथित भाव से यह सावन गीत लिख रहा हूं,जिस सावन में घनाघोर वारिस होती थी, ठण्डी हवा प्रवाहित होती थी,आज परिस्थितियां उल्टी हो गयी हैं उमस और गर्मी से हालत गंभीर बनी हुई है...... एहसास करें🙏   1. सावन का महीना,धूप है चहुं ओर। गर्मी ऐसे लागे, जैसे आग लगे  चारों ओर।। गर्मी ऐसे लागे.......... सावन का महीना...........2        2. कहां गये बदरिया , कहां पवन का झकझोर। मेघ गर्जन बिजली चमकन, का थम गया है शोर।। मेघ गर्जन बिजली चमकन........ सावन का महीना............2        3. धान का पौधा तैयार हो गया ,रोपा का है इंतजार। बिन पानी सब सून पड़ी है, खेत बाड़ी खनिहार।। बिन पानी सब सून........ सावन का महीना...............2                  4. किसान भाई हैरान हो रहे,और हो रहे परेशान। जल्दी आओ बरसने वाले , बनकर तुम मेहमान।। जल्दी आओ बरसने.......... सावन का महीना.............2 आ...

हाइकु:-श्रावण मास: अविनाश सिंह

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हाइकु:-श्रावण मास ****************** श्रावण मास रिमझिम बारिश मनमोहक। कोयल कूक रंग बिरंगे खेत आया सावन। गरजे मेघ कड़कती बिजली चले पवन। कजरी गाये रोपे धान के खेत मन को भाये। चले बहार रिमझिम फुहार मिले ठंडक। सजनी ओढ़े हरी भरी चुनरी खोजे साजन। सूखी धरती हुई जल से धन्य आये सुगंध। सावन माह भोलेनाथ की पूजा चढ़ाओ जल। श्रावण बेला रिमझिम फुहार मेघ मल्हार। साजन देख सजनी इठलाई खूब रिझाई। भोले की भक्ति राखी का है त्योहार आया सावन। पपीहा बोले कहाँ हो रे साजन आओ आँगन। पुतरी पीटे सखिया झूले झूला गगन नीला। हुआ सपना कागज़ वाली नाव फिर बनाओ। दिखे नभ में काले घने बादल फिर उजाला। हे भोलेनाथ तुमसे है ये भक्ति दो हमें शक्ति। Ⓒअविनाश सिंह गोरखपुर [इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर इमेल करें अथवा ✆ 8982161035 नंबर पर व्हाट्सप करें, कृपया देखें- नियमावली ] 

"भारत का युवा शक्ति" : मनोज कुमार चंद्रवंशी

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"भारत का युवा शक्ति"                               (१) हे! भारत का युवा शक्ति, भारत में नव विहान करो। कर्मवीर,  रणधीर,   राष्ट्र   का   नव  निर्माण  करो॥             हृदय में  नव  स्वर  सृजन  कर,             युग प्रवर्तन का दामन थाम लो।             तरुण  भारत  के  अभ्युदय  में,             संकल्प शक्ति का गाँठ बांध लो॥                             (२) हे!  साहसी वीर पुत्र, राष्ट्र के लिए कुछ कुर...

बी एस कुशराम की दो कविताएँ

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🌹 प्रशंसा 🌹 यह सत्य है प्रशंसा से , बढ़ता है हौसला , विरोधी की प्रशंसा से , घटता है फासला।    प्रशंसा करो ऐसी कि , दिखावा ना होवे- 2    सच्ची हो प्रशंसा तो , सुलझता है मसला।   यह सत्य है--------- झूठी प्रशंसा तो , चापलूसी कहलाती- 2 भेद खुल जाने से , बढ़ जाता है फासला। यह सत्य है-----------    चापलूसी भरी प्रशंसा , गुलामी की निशानी- 2    आज की प्रशंसा में , झलकती है यह कला।    यह सत्य है----------- सच्ची प्रशंसा से , निखरता है कौशल- 2 झूठी प्रशंसा से , होता नहीं है भला। यह सत्य है----------    प्रशंसा करो वीरता , कर्मठता व साहस की- 2    प्रशंसा स्वीकारो नहीं , जो होवे दिलजला।    यह सत्य है------------- " कुशराम" कहें प्रशंसा करो , कवियों कलमकारों की- 2 जिनमें विविध आयामों में , लिखने की है कला। यह सत्य है प्रशंसा से , बढ़ता है हौसला। विरोधी की प्रशंसा से , घटता है फासला।। 🌷 अधूरापन 🌷 गर समाज में न हो अपनापन , छाया हो अकेलापन। अपूर्ण रहे सामाजिक जी...