संदेश

नवंबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

धरती के बेटे: कुलदीप की कविता

चित्र
धरती के बेटे किसान, माँ धरती के बेटे देश कृषि प्रधान हुआ करता था। करते थे पूजा धरती की मिट्टी का सम्मान हुआ करता था। लहराती थी हरियाली सुंदर खेत-खलिहान हुआ करता था। घर- आँगन, गाँव- गली चहुँ ओर खुशहाल हुआ करता था।                            टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डी खेतों को जाने वाली, मोह मन लेती थी। मन्द-मन्द बहती स्वच्छ हवा सबको स्वस्थ जीवन देती थी। दिनभर खेतों में मेहनत कर सब भरपूर नींद में सोते थे। भाईचारे का संबंध थे रखते सुख-चैन कभी नहीं खोते थे। प्रकृति से तब लोगों का एक घनिष्ठ संबंध हुआ करता था। खाने से लेकर रहने की कुटिया तक प्रबन्ध हुआ करता था। मगर आधुनिकता निगल गई कृषि की अर्थव्यवस्था को। फिर सारी हद पार किये कम करने के लिए व्यस्तता को। हरित क्रांति आने से ही जैसे धीरे-धीरे हरियाली छीन रही। कम अवधि में अधिक उपज से जैसे ख़ुशहाली छीन रही। रासायनिक उर्वरक से कम समय में  पैदावार तो बहुत बढ़ी। मगर प्रकृति से छेड़छाड़...

रास्ता नया बनाना है:सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविताएँ

चित्र
रास्ता नया बनाना है मन में ले संकल्प, रास्ता नया बनाना है! हर मुश्किल है आसान, बस पथबाधाओं से टकराना है! तुम हो चले हो बूढ़े, पर उनको यह सन्देश न दो, इस धरती पर आया जो अभी-अभी, उसको थकने का परिवेश न दो! दुःख ही में तो, दुःख रोक मुस्काना है!                          ...मन में ले संकल्प 1 जब रास्ता लगे कठिन, आहिस्ता-आहिस्ता पग धारो! मन जब डूबे गहरी उदासी में, भर उल्लास खुद को उबारो! मोती डूबा गहरे सागर में, ढूंढ उसे ही लाना है!                                       ... मन में ले संकल्प 2 दुनिया में नहीं है ऐसी उलझन, जो सुलझ न पाए अप्रतिम प्रयासों से, करनी होती है कोशिश अथाह, दारिद्र्य दूर होता नहीं सिर्फ कयासों से शनैः शनैः किये काजों का भी परिणाम एक दिन आना है!           ...

क्या अब भी वैसा ही है वो मेरा गाँव:सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविताएँ

चित्र
क्या अब भी वैसा ही है वो  मेरा गाँव  क्या अब भी वैसा ही है, वो मेरा गांव! जेठ की दुपहरी धूप,  और पीपल की छांव! बछड़ों के रंभते स्वर, उस पर श्यामा की पुचकार! लिए रोटियां हाथ में, हाथ फेर दादी करे दुलार! वह स्मृति बाल-टोलियों की, गोधूल में खेलते नंगे पांव!                                ....क्या अब भी वैसा ही है 1 न बाल हाथ में, न गिल्ली न क्रिकेट का साजो-सामान! मैले-कुचले कपड़ों से जो बन जाता उन गेंदों में थी कितनी शान! नदी किनारे जबरन जाना  और बहाना सचमुच की नाव!                             ....क्या अब भी वैसा ही है 2 खेल-खेल में लड़ जाना, और रेफरी बना करवाना फैसला! गिरे जो कोई खेलमें, धूल झाड़ बढ़ा देते हौसला! छोटे-छोटे झगड़ों में भी, ढूंढ़ते थे अजब-गजब के दाव!                             ....क्या अब भी वैसा ही है 3 ...

यादें:सतीश कुमार सोनी की कविता

चित्र
               यादें कुछ तो है बीते हुए कल में,  बसी है यादें हर एक पल में।  देकर नाम पुराने दिन का,  जीता हूं मैं उसी हलचल में।            खोकर मन स्वप्न दिखा जाता है, बीते हुए पल की याद दिला जाता है। भूला नहीं इसे मैं आज और कल में, कुछ तो है बीते हुए कल में,  कुछ तो है बीते हुए पल में।। अच्छी, नयी-पुरानी यादें, एक दिन सब धूमिल हो जाती हैं, न जाने क्यों सारी बातें  दिल में कहीं दब जाती हैं। लड़ते झगड़ते यारों के संग  दिन और साल गुजर जाता है, देकर अपनी याद सुहानी  न जाने  कौन किधर जाता है। हम बनते बिगड़ते थे एक ही पल में, कुछ तो है बीते हुए कल में, कुछ तो है बीते हुए पल में। किसी का रोना, किसी का गाना,  थोड़े-थोड़े में सब कह जाना। लड़कर मनभर फिर उसे मनाना, सब कुछ याद बहुत आता है। ऐसी मीठी-मीठी यादों के संग  जीवन का एक पन्ना और पलट जाता है। देखें पलट कर जब हम इसको, जीवन का एक चिट्ठा नजर आता है। करते हैं ...

राजनीतिक व्यवहार और समाज

चित्र
राजनीतिक व्यवहार और समाज राजनीति, समाज विज्ञान का ही एक विषय है। यह व्यवहार और सिद्धान्त दोनों रूपों में समान रूप से सत्य है। राजनीतिक व्यवस्था वास्तव में सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ही है। यदि समाज न हो तो अन्य किसी शास्त्र का होना न तो संभव है और न ही उसका कोई औचित्य है। तथापि समाज पर राजनीतिक व्यवहारों के बढ़ते प्रभाव के कारण राजनीतिक व्यवहार और समाज के संबंधों पर विमर्श करने की आवश्यकता महसूस हुई।  सूचना और संचार क्रान्ति ने घर की दीवारों को शब्दबेधी मात्र नहीं बना दिया अपितु सुंदर मखमली परदों को पारदर्शी भी बना दिया है। सोशल मीडिया ने समूचे संसार को आंखों के सामने जीवंत कर दिया है। लोग मात्र क्रिकेट का आंखों देखा हाल नहीं सुनते बल्कि किसकी रसोई में क्या पक रहा है, यह भी सुनते और देखते हैं। यही हाॅल देश और प्रदेश की राजनीतिक गतिविधियों का है। एक मायने में यह बहुत अच्छा है कि आप अपना प्रार्थना-पत्र घर बैठे अपने किसी अधिकारी को ईमेल करके तत्काल भेज सकते हैं। कोई प्रतिवेदन सौंप सकते हैं। किसी आदेश के अनुपालन की सूचना सम्प्रेषित कर सकते हैं। घर बैठे...

कि हां हां हो कि हूं हूं हो...विकास गीत:धर्मेन्द्र पटेल

चित्र
विकास गीत ( ब्याह गीत की धुन में)                   1. बदल रहो है समाज हमारा ,आओ खुशियां मनाई हो, कि हां‌ हां हो कि हूं हूं हो...... कुम्भकरणी नींद जो सोवत हैं , उन्हें भी आज जगाई हो, कि हां हां हो कि हूं हूं हो.....                 2. सामाजिक कुरीतियां और आडम्बर मिलकर दूर भगाई हो, कि हां हां हो कि हूं हूं हो.... बच्चों को शिक्षा दिलवाई उन्हें भी शिक्षित करवाई हो, कि हां हां हो कि हूं हूं हो...               3. बेरोजगारी दूर भगाई कौंनौं रोजगार अपनाई हो, कि हां हां हो कि हूं हूं हो... खूब करो कठिन परिश्रम होगी बहुत कमाई हो, कि हां हां हो कि हूं हूं हो.....                4. घर मुहल्ले गांव वालों से कबहूं न करियो लड़ाई हो, कि हां हां हो कि हूं हूं हो हो सके तो खुशियां बांटो उनकी करो  बड़ाई हो, कि हां हां हो कि हूं हूं हो.....             5. चारों ...

बढ़ै न पावैं तोहरौ लरिका: राम सहोदर का हास्य व्यंग्य

चित्र
 बढ़ै न पावैं तोहरो लरिका अइसन नीति बनावै  (आधुनिक शिक्षा नीति पर हास्य व्यंग्य) आज की शिक्षा पद्धति भैया, मोरे समझ न आवै। जन-जन में शिक्षा का नारा, बहुतै हंसी करावै। सभी पढ़ो और सभी बढ़ो ,यह नीति बहुत ही भावै। पर न होंय फेल, न मंजिल पामैं बस साक्षर कहलावै। बढ़ै न पावै तोहरौ लरिका, अइसन नीति बनावै।1। हर एक गांव में टोला-टोला, विद्यालय खोलबावै। एक-एक शिक्षक दइ-दईके जनता का बहलावै। आदेश नया नित भेज-भेजके शिक्षक का अरझावै। तिसरे रोज संकुल केन्द्र मांही शिक्षक का बइठावै। बढ़ै न पावै तोहरौ लरिका, अइसन नीति बनावै।2। हर माह परीक्षा उचित रहा, अब तिसरेउ माह करावै। प्रतिभा पर्व परीक्षा होइगा, मास्टर अतिथि कहावै। परीक्षाफल तैयार करावै अऊ ग्रेडवार छंटबावै। रिकाॅर्ड सम्हारा और सुधारा, नेट मांही अपलोड करावैं। बढ़ै न पावै तोहरौ लरिका, अइसन नीति बनावै।3। अनेकानेक पंजी शाला मंाही, नित्य नया बनवावै। एसएमसी बैठक, पालक सम्पर्क मुद्दा अहम बतावै। शिक्षक केर बदनामी डटके जनता से करबावै। कोऊ न मांगैं काम का लेखा, गुणवत्ता जंचबावैं। बढ़ै न पावै तोहरौ लरिका, अइसन नीति बनावै।4। ...

आप मुझे नहीं जानते:धर्मेन्द्र कुमार पटेल आलेख

चित्र
 आप मुझे नहीं जानते अगर कोई किसी को नहीं जानता तो इसमें किसका दोष है?उसका जो नहीं जानता या जिसे नहीं जाना जा रहा ?" असल में हम जितने छोटे होते हैं,हमारा अहंकार उतना ही बड़ा होता है, जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, अहंकार छोटा होता जाता है ।  इस बड़े-छोटे का उम्र से कोई रिश्ता नहीं है, यह आपके अंतर्मन की यात्रा और उसके फलने -फूलने के तौर-तरीकों पर निर्भर करता है । किसी अजनबी व्यक्ति से परिचय करनेकी पहल से इसे समझा जा सकता है। कई बार अपने पार्श्व में बैठे सहयात्री से परिचय जाने बिना ही सैकड़ों मील की यात्रा कट जाती है। और कई बार कुछ ही मिनटों में एक-दूसरे का हाल-चाल ऐसे जान लिया जाता है जैसे वे दोनों बहुत पुराने परिचित हों ।  वास्तव में दो व्यक्तियों के मध्य अहम् की ही दूरी होती है ।  यही अहम कई बार भय और शंका को जन्म देता है. ऐसे में जो व्यक्ति पहले पहल करता है बडप्पन दिखाने का श्रेय उसकी ही झोली में जायेगा क्योंकि उसने अपने अहम से ऊपर उठकर पहल करने की कोशिश की है ।  हो सकता है सामने वाला व्यक्ति परिचय देने में कोई रूचि न दिखाए और ऐसे में स्वयम के ...

बच्चों के अधिकार और वर्तमान समाज:सुरेन्द्र कुमार पटेल का आलेख

चित्र
आज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री भारत रत्न पंडित जवाहर लाल नेहरु का जन्मदिन है. वे बच्चों से बहुत प्यार करते थे और इसी कारण उनका  जन्मदिन बालदिवस के रूप में मनाये जाने का निश्चय किया गया. वास्तव में आज का दिन “बच्चों के अधिकार और वर्तमान समाज” विषय पर चिंतन करने का है. हमारे पास कोई आंकड़ा नहीं है किन्तु हम जिस समाज में रहते हैं, उसमें हमें जो दिखाई देता है, उससे हम सहजता से पता लगा सकते हैं कि वच्चों का भविष्य और उसमें वर्तमान समाज की भूमिका क्या है? बच्चों का जीवन जहाँ गुजरता है, वह है उसका परिवार, समाज   और उसका विद्यालय. इसके बाद वह बड़ा होता है और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है तब उसका समाज के अन्य क्षेत्रों से  सम्बन्ध निर्माण होता  है.  बच्चों का पहला जीवन निर्माण परिवार में  होता है. अपने परिवार के बीच रहकर वह बहुत सी बातों को सीखता है. परन्तु  क्या  परिवारों को इस जिम्मेदारी का एहसास होता है कि परिवार केवल कुछ जरूरतों को पूरा करने का साधन नहीं हैं बल्कि वह बच्चों की एक खुली कार्यशाला हैं. क्या परिवार के सदस्य इतने सचेत हैं कि वह ...