सोमवार, फ़रवरी 02, 2026

॥ दगाबाजों से सावधान ॥
चौपाई
जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥
विश्वासघात अंगरखा होई। ताही दूर राखे हित होई॥
मित्र करे जो घात पिछारी। ताहि न नियर रखो दिन चारी॥
समझ बूझकर मित्र बनाबहु। ज्यों बाजार में माल पटाबहु॥
सखा रहत सुख-दुख को साथी। ज्यों रवि तिमिर हरे परमार्थी॥
कपट कुचली होय पड़ोसी। रहहु सजग जो अवसर पोसी॥
कबहु न बैर करब काहू से। बैर किये बल घट बाहू से॥
निर्मल मन राखहु सब ही सो। निश्छल प्रेम राख रब ही सो॥
दोहा
तन मन निर्मल राखकर, श्रेष्ठ आचरण धार।
मधुरी वाणी बांटकर, सबहि जनाबहु प्यार॥
चौपाई
झूठ कपट जो लेय सहारा। ताहि न जीवन में भिनसारा॥
मान घटे अपयश है बाढे़। बाह्य आडंबर यदि पग धारे॥
बात बनाबटि काम दिखाबा। ते नर मानव जनम नशावा॥
विश्वास किये विश्वास पनपता। बिन विश्वास न मिले सफलता॥
भाई चारा राखहु सबसो। यदि चाहत उजियारा तम सो॥
जिन मुख दुग्ध कुंभ विष होई। तिन सो दूर रहे सुख होई॥
बिहसि सबहि सो आदर कीजै। रितु बसंत सो समता दीजै॥
परिजन स्वजन सबहि सनमानहु। भाषा बक जिन बेद बखानहु॥
दोहा
सोंच समझ सांची शबद, सरल सत्य व्यवहार।
सफल सहोदर सिद्धि सब, सबल काज आचार॥
रचनाकार:
राम सहोदर पटेल
शिक्षक - हाई स्कूल नगनौडी
संकुल: आमडीह, जिला: शहडोल (मध्यप्रदेश)
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शनिवार, जनवरी 31, 2026

प्रेम: कविता

प्रेम — राम सहोदर पटेल

प्रेम

— श्री राम सहोदर पटेल
दोहा
प्रेम बनाए काम सब, प्रेमहि सुख आधार ।
वशीकरण यह प्रेम है , प्रेम जीवनाधार ।।
चौपाई
प्रेम से प्रेम बढ़े दिन दूना। प्रेम बिना यह जीवन सूना।। प्रेम प्रसंग पवित्र पियारा। प्रेम पराग मधुप पग धारा।। प्रेम पियासे सुर नर मुनि सब। प्रेमहि बसी भये खगमृग सब।। प्रेम के बसी होहि भगवंता। प्रेम में रति का बास अनंता। प्रेम से राष्ट्र अमित अखंडा। प्रेम दिलावे नहि कछु दंडा।। दंपति प्रेम कुटुंब सुधारहि। संपत्ति प्रेम शकल निस्तारहि।। कर्तव्य से प्रेम प्रतिष्ठा देई। लोगन प्रेम सुखद फल होई।। प्रेम का भूखा हर नर नारी। प्रेम से मिले महातम भारी।।
दोहा
जे निज स्वारथ रत रहहि, करे न कछु उपकार।
ते नर पशुवत जियत हैं, पावत नहिं सत्कार ।।
चौपाई
प्रेम सकल रस की है खाना। प्रेमहि बसी होहि भगवाना। प्रेम अकर्षण और उजाला। प्रेम उमग उत्साह का प्याला। प्रेम दिलों दिल का है मेला। प्रेम स्वभाविक भावुक खेला। प्यार मोहब्बत नाम अनेका। स्नेह इश्क लव एक से एका। ढाई आखर का यह नामा। व्यापक अर्थ शकल सुख धामा जाकी होहि भावना जैसी। प्रेम प्रकट होवे तिन तैसी।। प्रेम बीज अंकुरन समाना। तरुवर होहि फूल फल नाना।। धरणी मन उपजाऊ जैसे। प्रेम फले मन तरुवर तैसे ।।
दोहा
अपनापन ही प्रेम है, प्रेम समर्पण भाव ।
प्रेम समन्वय भाव का, संकट प्रेम बचाव ।।
चौपाई
प्रेम होय दुख-सुख का साथी। प्रेम से शीतल हो द्विछाती।। परम पवित्र है प्रेम पिपाशा। अंतर्मन अभिव्यक्ति दिलासा।। प्रेम न टूटे काहू तोड़े। प्रेम बसी होवे हैं जोड़े।। प्रेम बिखरना नहीं चाहता। लेकिन निष्छल भाव चाहता।। प्रेम शक्ति है प्रेम भक्ति है। निस्वार्थ चाह की अनुरक्ति है।। मानव को मानवता देता। जीवन को अनुशासन देता ।। प्रेमहि जीवन हो आबादा। कपटी प्रेम करे बरबादा ।। निश्छल प्रेम करे जो कोई। जीवन शकल जनम फल होई।
दोहा
तन-मन-धन सब प्रेम है, प्रेम मानवी मूल्य।
प्रेम बिना सृष्टि नहीं, प्रेम प्रकृति अनुकूल ।।

प्रेम रंग व्यापक अती, प्रेम बिना सब सून।
प्रेम ही जीवन मृत्यु है जीवन प्रेम सुकून
चौपाई
वत्सल प्रेम माता उपजाये। गुरु प्रेम मारग दिखलाये।। जीवन साधे प्रेम पिता का। जग साधे ज्यों लौ सविता का।। परिजन प्रेम उठाये ऊपर। ज्यों गिरिवर चोटी ले ऊपर।। सभ्य समाज सो प्रेम बढ़ाये। सदा सुखी आनंद मनाये।। प्रेमहि प्रेम बढ़े दिन राती। प्रेम बिना नहीं ठंडक छाती।। राष्ट्र प्रेम सम नहीं कछु सेवा। यह विचार मन में धरि लेवा। प्रेम भार्या जीवन साथी। जिससे जीवन होवे हाथी ।। सुत का प्रेम बुढ़ापा साधे। सुता प्रेम रिश्ता में बांधे।।
दोहा
प्रेम सहोदर राखिए, सब सो नित प्रति जोय।
प्रेम तार टूटे नहीं, राखहु याहि संजोय ।।
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सोमवार, जनवरी 26, 2026

कविता: शोभा न पाता है

शोभा न पाता है

बिना आयुध के रन में शूर भी शोभा न पाता है।
बिना मंत्री के राजवाड़ा सुशासन कर न पाता है।
बिना शक्ति के कोई स्वामी सियासत दुर्ग के बिन हो।
बिना दांतों के हाथी भी कभी शोभा न पाता है।

बिना बुद्धि के कोई मानव या मानव धर्म के बिन हो।
बिना महकाई के फ्लावर कभी शोभा ना पाता है।
हो छाया बिन कोई तरुवर जो फल भी दे नहीं सकता।
जलासय हो बिना जल के कभी शोभा ना पाता है।

बिना लज्जा के कुल की हो वधू, मद के बिना हाथी।
बिना नीती के हो राजा कभी शोभा ना पाता है।
बधिर होवे अगर मंत्री हो अलसाया स्वयं भूपति।
नरमता के बिना शिष्य भी कभी शोभा ना पाता है।

लवण रहिता अगर भोजन क्षमा बिन होवे विज्ञानी।
बिना रफ्तार के घोटक कभी शोभा ना पाता है।
बिना उद्यम के ना खेती बिना पानी के ना फसलें
बिना उत्तम के बीजों के अन्न उन्नत न पाता है।।

गगन मंडल बिना तारे प्रखर आभा बिना सविता।
बिना सम्मर्द जन मेला कभी शोभा ना पाता है।
पुताई बिन कोई बिल्डिंग रंगाई बिन कोई प्रतिमा।
कुशल नेतृत्व बिन मुखिया कभी शोभा ना पाता है।

बिना हो शिष्य के गुरुवर बिना भक्तों के हों भगवन।
बिना देवों के देवालय कभी शोभा ना पाता है।
बिना पति के कोई पत्नी बिना पत्नी के कोई पति भी।
सहोदर बिन कोई सहचर कभी शोभा ना पाता है।

✒️
कलमकार
राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल (म.प्र.)
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शनिवार, जनवरी 24, 2026

तुलना का शोर

जिंदगी की असंतुष्टि की सारी वजह, बस एक — बेमेल तुलना है। हर इंसान अपने खालीपन को भरने, झांकता है किसी और की जिंदगी में, जहाँ उसे दिखते हैं रंग, रौशनी, हँसी — और वह भूल जाता है कि हर उजाले के पीछे एक परछाई होती है। वह तुलना करता है अपने खालीपन की, और पाता है दूसरों की झोली में कुछ न कुछ भरा हुआ। फिर मन कह उठता है — “काश! वैसा जीवन मेरा होता।” पर वह नहीं देख पाता, दूसरे की आँखों में छिपा वही खालीपन, जो उसके अपने जीवन से भी गहरा है। एक आदमी देखता है किसी संत को — मौन, शांत, निर्मल। सोचता है, "कितना सुखी होगा यह!" पर वह नहीं जानता, संत का सुख ही नहीं, संत की पीड़ा भी केवल संत को ही मिल सकती है। बाहर दिखती शांति, अंदर तपता हुआ व्रत होती है। एक शासन का सेवक देखता है व्यापारी को, जिसके पास धन की नदी बहती है। वह मन ही मन कहता है, "क्यों मेरी तिजोरी खाली है?" पर वह भूल जाता है — भरी हो ही नहीं सकती, बिना व्यापारी हुए, बिना उसके जोखिम, उसके डर, उसकी नींद और उसकी रातों के जागरण के। हर कोई किसी और का जीवन चाहता है, जैसे कोई बच्चा चाँद को छूना चाहता है। पर जो जीवन हमारे भीतर धड़कता है, वही सबसे सच्चा, सबसे उपयुक्त है। कभी ठहरकर देखो — जो कुछ तुम्हारे पास है, वह किसी और की कमी हो सकता है। जो तुम्हें अधूरा लगता है, वह किसी और का पूरा सपना हो सकता है। जीवन का अर्थ तुलना में नहीं, स्वीकार में छिपा है। जो अपने हिस्से की धूप और छाँव को एक साथ जीना सीख ले, उसी के भीतर भर जाती है शांति। बाकी सब — बस दूसरों की खिड़कियों में झाँकने का शोर है।
रचनाकार:
सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी जिला शहडोल
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श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें: कविता

विषय - श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें

दुष्ट की दुष्टता कभी जाती नहीं,
चाहे कितनी भी विद्या सुशोभित करे।
विष को विषधर न छोड़े किसी हाल में,
क्यों न मणि ही वह मुख में सुशोभित करे।

समझो दारा पराई सदा मातृ सम,
न परद्रव्य हरगिज सुशोभित करे।
मन में सोचो सदा कार्य अच्छा बने,
श्रेष्ठ उद्यम ही मन में सुशोभित करे।

सुस्त सोने से सिद्धि नहीं मिलती कभी,
सिद्धि चाहो तो जागृति सुशोभित करे।
आत्म सम सभी प्राणियों को समझो सदा,
खुदा खुद ही खुदाई सुशोभित करे।

मुख से वाणी निकालो सदा छानकर,
वाक्य वेदों के दिल में सुशोभित करें।
आचरण को सुधारो मणि की तरह,
सभी लोहा को सोना सुशोभित करे।

कार्य संभव हो, निश्चित उसी को करो,
दुविधा वाले कर्म न सुशोभित करें।
मन मरुस्थल न बन जाए संयम बिना,
शीलता, नम्रता, सत्य सुशोभित करें।

समय नाहक न खर्चो, ये मिलता नहीं,
समय जीवन समझकर सुशोभित करो।
अच्छा देखो सदा, सदा अच्छा सुनो,
बनो अच्छा ही अच्छा सुशोभित करो।

तजो जीरो को तुम सदा हीरो बनो,
आचरण से बड़प्पन सुशोभित करो।
क्रोध शत्रु भयानक, रहो इससे बच,
क्षमा करने का गुण ही सुशोभित करे।

कर्म ही पूजा है, धर्म सत्कर्म है,
बस सहोदर की सिखावन सुशोभित करे।


✍️ कलमकार

राम सहोदर पटेल, "शिक्षक"
हाई स्कूल नगनौडी, संकुल - आमडीह
जिला शहडोल (मध्य प्रदेश)

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...