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लड़ाकू महिला का हृदयपरिवर्तन: श्री रामसहोदर पटेल

लड़ाकू महिला का हृदयपरिवर्तन रामपुर नामक गाँव में एक फुलझड़ी नाम की महिला थी। नाम के अनुसार उसके मुख से फूल से सुन्दर वाणी झड़नी चाहिए लेकिन नाम के विपरीत उसका स्वभाव था। वह जरा सी बात में गुस्सा करती और जो भी महिला पुरुष सामने मिल जाय वह छोटे-बड़े का ध्यान दिये बिना बेतहाशा लड़ती। जब वह लड़ने लगती तब शब्दों के सारे सीमा लाघ जाती थी। उसके जेहन में गालियों की इतनी विशाल शब्दकोष थी जो कभी खत्म ही नहीं होती थी। सुबह से गाली-गलौज शुरू करती तो शाम हो जाती किन्तु वह न तो थकती और न ही उसके गालियों के भण्डार खत्म होते थे। गनीमत थी कि वह किसी को भी नहीं छोड़ती थी, सभी से बराबर लड़ती रहती थी। बिना लड़े उसका भोजन ही हजम नहीं होता था। सारे गाँव के लोग फुलझड़ी से त्रस्त हो चुके थे। जो भी सामने से गुजरता उससे बेवजह लड़ाई छेड़ लेती, समय बर्बाद कर देती, काम नुकसान कर देती। कोई भी उससे बचकर अपने काम में नहीं जा पाता था। एक दिन गाँव के भले लोगों ने आपस में मशविरा किया कि गाँव की पंचायत बुलायी जाय और फुलझड़ी को भी उस पंचायत में बुलाकर कोई निर्णय लिया जाय जिससे इसके लड़ाई से छुटकारा मिले।...

एक समझ : श्री राम सहोदर पटेल

— एक समझ — दिनांक: 15/10/2022 समझदारों की समझ जब, समझ से बेसमझ हो जाती है॥ मानो तब तो समाज का, जनाज़ा ही निकल जाती है। समझ तेरे को देख लगा, ज्यों नासमझों का ही राज है॥ तुम्हारे रुतबे से यों लगा, जहांन का तू ही सरताज है। करते प्रार्थना निज देश-जाति में बलिदान होने का। मौका तलाशते समाज की किडनी निकाल लेने का॥ शेखी बघारते-बघारते तुम, मर्यादा ही डकार बैठे। समाज को कुछ दिया तो नहीं, उलटे झोली ही फाड़ बैठे॥ अरे! स्वयं को समझदार कहने वाला मूर्ख ही होता है। बुजुर्गों का अपमान करने वाला, कोई धूर्त ही होता है॥ अपने को सुयोग्य कहने वाला, द्वापर का कंस था। जिसने पिता की गद्दी छीन, दिया जेल का डंस था॥ अपना उल्लू साधने वालों, जरा भी तो समझो। जिसको तुम अपमानित करते, वही असली हंस था॥ यह अहंकार तुम्हारा, कब तक साथ देगा तुझे। एक दिन समझ आयेगी कि, तुममें न समझदारी का अंश था॥ समझदार वह ...
॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। ताही दूर राखे हित होई॥ मित्र करे जो घात पिछारी। ताहि न नियर रखो दिन चारी॥ समझ बूझकर मित्र बनाबहु। ज्यों बाजार में माल पटाबहु॥ सखा रहत सुख-दुख को साथी। ज्यों रवि तिमिर हरे परमार्थी॥ कपट कुचली होय पड़ोसी। रहहु सजग जो अवसर पोसी॥ कबहु न बैर करब काहू से। बैर किये बल घट बाहू से॥ निर्मल मन राखहु सब ही सो। निश्छल प्रेम राख रब ही सो॥ दोहा तन मन निर्मल राखकर, श्रेष्ठ आचरण धार। मधुरी वाणी बांटकर, सबहि जनाबहु प्यार॥ चौपाई झूठ कपट जो लेय सहारा। ताहि न जीवन में भिनसारा॥ मान घटे अपयश है बाढे़। बाह्य आडंबर यदि पग धारे॥ बात बनाबटि काम दिखाबा। ते नर मानव जनम नशावा॥ विश्वास किये विश्वास पनपता। बिन विश्वास न मिले सफलता॥ भाई चारा राखहु सबसो। यदि चाहत उजियारा तम सो॥ जिन मुख दुग्ध कुंभ विष होई। तिन सो दूर रहे सुख होई॥ ...

प्रेम: कविता

प्रेम — राम सहोदर पटेल प्रेम — श्री राम सहोदर पटेल दोहा प्रेम बनाए काम सब, प्रेमहि सुख आधार । वशीकरण यह प्रेम है , प्रेम जीवनाधार ।। चौपाई प्रेम से प्रेम बढ़े दिन दूना। प्रेम बिना यह जीवन सूना।। प्रेम प्रसंग पवित्र पियारा। प्रेम पराग मधुप पग धारा।। प्रेम पियासे सुर नर मुनि सब। प्रेमहि बसी भये खगमृग सब।। प्रेम के बसी होहि भगवंता। प्रेम में रति का बास अनंता। प्रेम से राष्ट्र अमित अखंडा। प्रेम दिलावे नहि कछु दंडा।। दंपति प्रेम कुटुंब सुधारहि। संपत्ति प्रेम शकल निस्तारहि।। कर्तव्य से प्रेम प्रतिष्ठा देई। लोगन प्रेम सुखद फल होई।। प्रेम का भूखा हर नर नारी। प्रेम से मिले महातम भारी।। दोहा जे निज स्वारथ रत रहहि, करे न कछु उपकार। ते नर पशुवत जियत हैं, पावत नहिं सत्कार ।। चौपाई प्रेम सकल रस की है खाना। प्रेमहि बसी होहि भगवाना। प्रेम अकर्षण और उजाला। प्रेम उमग उत्साह का प्याला। प्रेम दिलों दिल क...

कविता: शोभा न पाता है

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शोभा न पाता है बिना आयुध के रन में शूर भी शोभा न पाता है। बिना मंत्री के राजवाड़ा सुशासन कर न पाता है। बिना शक्ति के कोई स्वामी सियासत दुर्ग के बिन हो। बिना दांतों के हाथी भी कभी शोभा न पाता है। बिना बुद्धि के कोई मानव या मानव धर्म के बिन हो। बिना महकाई के फ्लावर कभी शोभा ना पाता है। हो छाया बिन कोई तरुवर जो फल भी दे नहीं सकता। जलासय हो बिना जल के कभी शोभा ना पाता है। बिना लज्जा के कुल की हो वधू , मद के बिना हाथी। बिना नीती के हो राजा कभी शोभा ना पाता है। बधिर होवे अगर मंत्री हो अलसाया स्वयं भूपति। नरमता के बिना शिष्य भी कभी शोभा ना पाता है। लवण रहिता अगर भोजन क्षमा बिन होवे विज्ञानी। बिना रफ्तार के घोटक कभी शोभा ना पाता है। बिना उद्यम के ना खेती बिना पानी के ना फसलें । बिना उत्तम के बीजों के अन्न उन्नत न पाता है।। गगन मंडल बिना तारे प्रखर आभा बिना सविता। बिना सम्मर्द जन मेला कभी शोभा ना...
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तुलना का शोर जिंदगी की असंतुष्टि की सारी वजह, बस एक — बेमेल तुलना है। हर इंसान अपने खालीपन को भरने, झांकता है किसी और की जिंदगी में, जहाँ उसे दिखते हैं रंग, रौशनी, हँसी — और वह भूल जाता है कि हर उजाले के पीछे एक परछाई होती है। वह तुलना करता है अपने खालीपन की, और पाता है दूसरों की झोली में कुछ न कुछ भरा हुआ। फिर मन कह उठता है — “काश! वैसा जीवन मेरा होता।” पर वह नहीं देख पाता, दूसरे की आँखों में छिपा वही खालीपन, जो उसके अपने जीवन से भी गहरा है। एक आदमी देखता है किसी संत को — मौन, शांत, निर्मल। सोचता है, "कितना सुखी होगा यह!" पर वह नहीं जानता, संत का सुख ही नहीं, संत की पीड़ा भी केवल संत को ही मिल सकती है। बाहर दिखती शांति, अंदर तपता हुआ व्रत होती है। एक शासन का सेवक देखता है व्यापारी को, जिसके पास धन की नदी बहती है। वह मन ही मन कहता है, "क्यों मेरी तिजोरी खाली है?" पर वह भूल जाता है — भरी हो ही नहीं सकती, बिना व्यापारी हुए, बिना उसके जोखिम, उसके डर, उसकी नींद और उसकी रातों के जागरण के। हर कोई किसी और का जीवन चाहता है, जैसे कोई बच्चा चाँद को छू...

श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें: कविता

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विषय - श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें दुष्ट की दुष्टता कभी जाती नहीं, चाहे कितनी भी विद्या सुशोभित करे। विष को विषधर न छोड़े किसी हाल में, क्यों न मणि ही वह मुख में सुशोभित करे। समझो दारा पराई सदा मातृ सम, न परद्रव्य हरगिज सुशोभित करे। मन में सोचो सदा कार्य अच्छा बने, श्रेष्ठ उद्यम ही मन में सुशोभित करे। सुस्त सोने से सिद्धि नहीं मिलती कभी, सिद्धि चाहो तो जागृति सुशोभित करे। आत्म सम सभी प्राणियों को समझो सदा, खुदा खुद ही खुदाई सुशोभित करे। मुख से वाणी निकालो सदा छानकर, वाक्य वेदों के दिल में सुशोभित करें। आचरण को सुधारो मणि की तरह, सभी लोहा को सोना सुशोभित करे। कार्य संभव हो, निश्चित उसी को करो, दुविधा वाले कर्म न सुशोभित करें। मन मरुस्थल न बन जाए संयम बिना, शीलता, नम्रता, सत्य सुशोभित करें। समय नाहक न खर्चो, ये मिलता नहीं, समय जीवन समझकर सुशोभित करो। अच्छा देखो सदा, सदा अच्छा सुनो, बनो अच्छा ही अच्छा सुशोभित करो। ...