शनिवार, जनवरी 24, 2026

तुलना का शोर

जिंदगी की असंतुष्टि की सारी वजह, बस एक — बेमेल तुलना है। हर इंसान अपने खालीपन को भरने, झांकता है किसी और की जिंदगी में, जहाँ उसे दिखते हैं रंग, रौशनी, हँसी — और वह भूल जाता है कि हर उजाले के पीछे एक परछाई होती है। वह तुलना करता है अपने खालीपन की, और पाता है दूसरों की झोली में कुछ न कुछ भरा हुआ। फिर मन कह उठता है — “काश! वैसा जीवन मेरा होता।” पर वह नहीं देख पाता, दूसरे की आँखों में छिपा वही खालीपन, जो उसके अपने जीवन से भी गहरा है। एक आदमी देखता है किसी संत को — मौन, शांत, निर्मल। सोचता है, "कितना सुखी होगा यह!" पर वह नहीं जानता, संत का सुख ही नहीं, संत की पीड़ा भी केवल संत को ही मिल सकती है। बाहर दिखती शांति, अंदर तपता हुआ व्रत होती है। एक शासन का सेवक देखता है व्यापारी को, जिसके पास धन की नदी बहती है। वह मन ही मन कहता है, "क्यों मेरी तिजोरी खाली है?" पर वह भूल जाता है — भरी हो ही नहीं सकती, बिना व्यापारी हुए, बिना उसके जोखिम, उसके डर, उसकी नींद और उसकी रातों के जागरण के। हर कोई किसी और का जीवन चाहता है, जैसे कोई बच्चा चाँद को छूना चाहता है। पर जो जीवन हमारे भीतर धड़कता है, वही सबसे सच्चा, सबसे उपयुक्त है। कभी ठहरकर देखो — जो कुछ तुम्हारे पास है, वह किसी और की कमी हो सकता है। जो तुम्हें अधूरा लगता है, वह किसी और का पूरा सपना हो सकता है। जीवन का अर्थ तुलना में नहीं, स्वीकार में छिपा है। जो अपने हिस्से की धूप और छाँव को एक साथ जीना सीख ले, उसी के भीतर भर जाती है शांति। बाकी सब — बस दूसरों की खिड़कियों में झाँकने का शोर है।
रचनाकार:
सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी जिला शहडोल
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