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कोविड –19 दूसरी लहर:आपदा, अवसर या कहर: डॉ ओ पी चौधरी

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कोविड –19 दूसरी लहर:आपदा, अवसर, कहर?    मशहूर पाकिस्तानी गायिका नसीबो लाल का गीत " मिट्टी वही मुझ पर गिरेगी,जो बादशाहों पर गिरी होगी", यह जितनी हकीकत लिए हुए है,उतनी ही दूर भी है। कोरोना के इस कातिल दौर में परेशान हर इंसान है, लेकिन मायने सभी के अलग अलग हैं।कोई दो जून की रोटी की जुगाड़ में, कोई आपदा को अवसर के रूप में बदलकर लाखों का वारा न्यारा कर रहा है,वह उसी में परेशान है कि इस विपत्ति में भी संपत्ति में इजाफा कैसे होगा? जबकि अगले पल का कोई ठिकाना नहीं।मैं अपनी दो भतीजियों की शादी 22 एवम् 25 अप्रैल को अपने गांव(अंबेडकरनगर जनपद)से संपन्न कराने के उपरांत काशी आया।व्हाट्सएप से मिले संदेश ने अंतर्मन को झकझोर दिया। डा राम सुधार चौधरी, भू वैज्ञानिक जिया लाल चौधरी, अखिलेश चौधरी, कामता प्रसाद वर्मा,पूर्व सैनिक राम निहोर पटेल,पड़ोसी और समवयस्क भाई शिवनायक राजभर एवम् कई अन्य के तिरोहान का समाचार हृदय विदारक रहा,सभी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि,यह अत्यंत सूक्ष्म प्रतिदर्श है,जो निकटस्थ हैं, बाकी तो तांडव हर तरफ मचा है। कोरोना कितनों का जीवन तबाह करेगा, तय  नहीं लेकिन जो स्वजन और आत...

पंचायत चुनाव लोकतंत्र या शक्ति प्रदर्शन बनाम आधी आबादी *–डा ओ पी चौधरी

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पंचायत चुनाव लोकतंत्र या शक्ति प्रदर्शन बनाम आधी आबादी –डा ओ पी चौधरी        पंचायती राज दिवस 24 अप्रैल के विशेष संदर्भ में            कोविड –19 की प्रचंड लहर के बीच त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव उत्तर प्रदेश में चल रहा है और अंतिम चरण 29 अप्रैल को समाप्त होगा।शक्ति से तात्पर्य,धन बल, बाहु बाल आदि अर्थात साम, दाम,दंड,अर्थ,येन केन प्रकारेण।चुनाव  की तैयारी चुनाव आयोग अपने सरकारी अमले के साथ कर रहा था तो दूसरी ओर गांवों में बहुत पहले से ही बड़ी बड़ी होर्डिंग और सादी(प्रायः दाल बाटी, चोखा,खीर) एवम् रंगीन पार्टी (जो नॉन वेज और दारू के साथ होती है)के साथ शादी विवाह, मरनी, जियनी, भागवत,मुंडन अनेकानेक कार्यक्रमों में प्रत्याशियों के शामिल होने की होड़  मची है।" कच्ची दारू कच्चा वोट,पक्की दारू पक्का वोट " , पंचायत चुनाव में अब यह नारा पुराना हो गया है,क्योंकि मतदाता अबकी बार के चुनाव में हर प्रत्याशी की ओर से मिल रही सौगात को समेटकर सभी से वोट देने का वादा कर रहा है।वह वोट किसे देगा यह भविष्य के गर्त में है, लेकिन लेन देन के खेल में मतदाताओं...

मृत्युभोज (व्यंग्य आलेख) :रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)

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                              मृत्युभोज : व्यंग्य आलेख                  (-रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)      जैसे ही सैकड़ों-हजारों की भीड़ को मृत्युभोज का हरा सिग्नल मिला वैसे ही सब अपनी-अपनी दो-दो फिट की जगह अपने नाम रजिस्ट्री कर खाने की तैयारी में जुट गए। खाना परोसा गया। घी-छोले-पनीर आदि सब बाँटे गए। लग ही नहीं रहा था कि हम मृत्युभोज में आये हैं या कोई शाही दावत या फिर देसी मैरिज पार्टी।          हाँ सबों ने दबा के गर्दन तक भरा। सब खाने में व्यस्त; किसी को कोई पहचान ही नहीं रहा।ऐसा लग रहा था मानों बहुत दिनों से भूखे हैं। सब अपने-अपने पत्तलों से कबड्डी और कुस्तियाँ लड़ रहे हैं पर किसी ने उस तड़पते-बिलखते परिवार को पुनः जीवन जीने का ढाढ़स नहीं दिलाया। खाए और तुरंत गोल हो लिए।        भीखू यह सब देखकर मन ही मन रो पड़ा और स्वयं उस टूटे परिवार को अपने निश्छल भावों से धोया और कहा-“सदैव आपके साथ ही हैं, अपने को अकेला मत समझिए।“...

प्राकृतिक संपदा के कोष और नैसर्गिक सुषमा के आगार:हमारे वृक्ष –डा ओ पी चौधरी

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प्राकृतिक संपदा के कोष और नैसर्गिक सुषमा के आगार:हमारे वृक्ष –डा ओ पी चौधरी          वन है तो भविष्य है,यह कथन बहुत ही सटीक है।मानव जीवन का अस्तित्व ही छोटे छोटे हरे भरे पौधो व वृक्षों के साथ ही प्रारंभ हुआ, जब प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाना शुरू किया।भारतीय संस्कृति में तो वृक्षों की पूजा की जाती है।पीपल, नीम,तुलसी,शमी,  आंवला,बरगद,केला,आम आदि अनेक वृक्ष बहुत ही पवित्र माने जाते हैं और उनकी विविध रूपों में विधिवत पूजा – अर्चना की जाती है। मां की आंचल की भांति वृक्ष हमें छाया देते हैं,क्षुधा शांति के लिए फल देते हैं,जो हमारे शरीर को हृष्ट और पुष्ट बनाते हैं।जल संरक्षण व बरसात करवाने में इनकी अत्यंत महत्ता है।हमारे अनेक तरह के जीव जंतुओं को आश्रय देते हैं,जो जैव विविधता के लिए आवश्यक है। कोविड –19 जैसी महामारी फैलने से रोकते हैं,क्योंकि पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं और अनेक हानिकारक जीव इन्हीं की गोंद में समाए रहते हैं।औद्योगीकरण के बढ़ते कदम और अनियंत्रित गति से बढ़ती हुई जनसंख्या वृद्धि के कारण आबादी के लिए वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटान हो ...

कपटी और आडम्बरी जन (कविता) : राम सहोदर पटेल

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कपटी और आडम्बरी जन भिनसार कबहॅूं हो न पावहिं , जो मनुष कपटी भये। सन्देह का व्यवहार पावहुं , जो अपनयों सब गये॥ दोस्त गाढ़े भी डरें सब , दूर से करते नमस्ते। खाया जो धोखा बार एक भी , फिर न फंसना चाह सकते॥ दूध में जलकर विलाई , छाछ भी डरकर पिये। डरना रहा तो ठीक हद तक , दूर रिश्ता से किये॥ अपनी है उन्नति कर न पाये , अन्य की उन्नति खले। कैसे घटायें शान इनकी , सोचकर मन में जलें॥ देखकर अपनों को आगे , दोष किस्मत पर न मढ़े॥ नीचा दिखाने कर इरादा , जयचन्द मारग पर चढ़े। भावना ईर्ष्या की जागी , जलजला जिद पर पगे। नींद इनकी साथ त्यागी , द्वेष से कुढ़ने लगे॥ अवसर तलाशें रात दिन , नीचा करें कैसे इसे। हम तो खुद बरबाद हैं , बरबादी दें कैसे इसे॥ पग बढ़े आगे स्वजन के , पीछे खींचन में लगे। अन्य गीदड़ भी जो देखी , दुम दबाकर भागन लगे॥ शेखी बघारे ज्ञान की पर शब्द बाचत न बने। गर सीख इनको देन चाहो , तो उल्टी गिनती भी गिने॥ न बड़ों का ज्ञान इनको , न समझ सम्मान की। लात घूंसा भूख इनकी , खेद न अपमान की॥ राज श्री गुटका , तम्बाकू शौक मदिरा पान की॥ घर किसी का लूट मारै , चाहत करें अरम...