मंगलवार, अप्रैल 27, 2021

कोविड –19 दूसरी लहर:आपदा, अवसर या कहर: डॉ ओ पी चौधरी

कोविड –19 दूसरी लहर:आपदा, अवसर, कहर?
   मशहूर पाकिस्तानी गायिका नसीबो लाल का गीत " मिट्टी वही मुझ पर गिरेगी,जो बादशाहों पर गिरी होगी", यह जितनी हकीकत लिए हुए है,उतनी ही दूर भी है। कोरोना के इस कातिल दौर में परेशान हर इंसान है, लेकिन मायने सभी के अलग अलग हैं।कोई दो जून की रोटी की जुगाड़ में, कोई आपदा को अवसर के रूप में बदलकर लाखों का वारा न्यारा कर रहा है,वह उसी में परेशान है कि इस विपत्ति में भी संपत्ति में इजाफा कैसे होगा? जबकि अगले पल का कोई ठिकाना नहीं।मैं अपनी दो भतीजियों की शादी 22 एवम् 25 अप्रैल को अपने गांव(अंबेडकरनगर जनपद)से संपन्न कराने के उपरांत काशी आया।व्हाट्सएप से मिले संदेश ने अंतर्मन को झकझोर दिया। डा राम सुधार चौधरी, भू वैज्ञानिक जिया लाल चौधरी, अखिलेश चौधरी, कामता प्रसाद वर्मा,पूर्व सैनिक राम निहोर पटेल,पड़ोसी और समवयस्क भाई शिवनायक राजभर एवम् कई अन्य के तिरोहान का समाचार हृदय विदारक रहा,सभी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि,यह अत्यंत सूक्ष्म प्रतिदर्श है,जो निकटस्थ हैं, बाकी तो तांडव हर तरफ मचा है। कोरोना कितनों का जीवन तबाह करेगा, तय  नहीं लेकिन जो स्वजन और आत्मीय जन बिछड़ जा रहे हैं,उनका अभाव हमें ताउम्र सालता रहेगा,जिसकी पीड़ा हमें इस मनहूस कोविड –19 की याद दिलाती रहेगी।
         आज सभी कह रहे हैं की कोविड –19 की दूसरी लहर दस्तक देने वाली है पर हुकूमतों का ध्यान कहीं और था।लोकतंत्र के नाम पर समूची जनता को चुनाव में झोंक देना सीधे मौत के मुंह में ठेलना है।चुनाव आयोग के लिए तो मद्रास के मा उच्च न्यायालय ने "सबसे गैर जिम्मेदार संस्था" बताते हुए तीखी टिप्पणी की है कि निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के खिलाफ हत्या के आरोपों में भी मामला दर्ज किया जा सकता है।लेकिन उन सियासत के मनसबदारों का क्या होगा जो बड़ी बड़ी चुनावी रैलियां कर रहे थे और  कहने में भी जरा सा गुरेज नहीं कर रहे हैं कि इससे बड़ी रैली कहीं हुई है क्या?मित्रों वहां न मास्क है, न दो गज की दूरी, सेनेटाइजर हाथी के दांत की तरह, लेकिन दहाड़ ऐसी की कोरोना से बचाव के लिए मास्क,साबुन से हाथ धोना,दो गज की दूरी है बहुत ज़रूरी है दिल्ली से पूरे देश में सुनाई पड़ जाती है।जो सुनने से वंचित रह जाते हैं वे मन की बात से पकते हैं, क्या पकुसाते हैं।मद्रास हाईकोर्ट का यह कहना कि दूसरी लहर के लिए निर्वाचन आयोग "अकेले" जिम्मेदार है, बहुत उचित है।किंतु बड़ी बड़ी चुनावी सभाओं को संबोधित करने वाले हमारे नेताओं को भी इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता है, जिनके सामने सभी बिना मास्क और सामाजिक दूरी के लोग एक के ऊपर एक चढ़कर, बढ़ चढ़कर रैलियों में,जन सभाओं में आ जा रहे हैं।चुनावों की व्यस्तता, है सभी को पस्त किए है।चिकित्सा व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही है, ऑक्सीजन की कमी लोगों का दम घोंट रहा है, चिकित्सालयों में बेड का अभाव, वेंटिलेटर का पूरी क्षमता से काम न कर पाने से पूरा जनमानस सशंकित व भयग्रस्त है।इतनी वेबशी पहले कभी नहीं दिखी।
        मैने पहले लिखा है कि भतीजियों की शादी के सिलसिले में घर(गांव) में था,जिसमें 25 + 25 लोगों की अनुमति थी,किसी तरह हुई, घर के ही सभी सदस्य नहीं सम्मिलित हो सके।दूसरी ओर  उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था की मजबूती के लिए चुनाव का अब अंतिम चरण ही शेष है जो 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे,उसका और कई राज्यों के विधान सभाओं में हो रही चुनावी रैलियों की झलक की कुछ बानगी प्रस्तुत है।इस दौरान बिना मास्क के झुंड में महिलाओं की टोली चुनाव प्रचार में बिना मास्क, सेनेटाइजर, सामाजिक दूरी के,मशगूल थीं।पुरुषों की अलग टीम,जिसमें कुछ मास्कधारी दिखे।सभी के हाथ हैंडविल से लैस, सभी देने को आतुर, हाथ में न पकड़िए तो नाराज़,मेरे और मेरे अनुज जो अधिवक्ता हैं, का सामना जिला पंचायत सदस्य के एक महिला उम्मीदवार के प्रचारकों से हो गया पर्चा हाथ में न पकड़ने से नाखुश, गेट पर चिपका दिया उसके लिए बहस अलग।आप मन की बात में तीन चार उपाय  कोरोना से बचाव की सुनते हैं,उसका पालन करें? या इन चुनाव प्रचार वालों से बचें।आप स्वयं सतर्क रह सकते हैं,लेकिन अगला आपको टक्कर मार कर चल देगा।
                हिंदुस्तान ने सही ही लिखा है कि अभाव और दर्द की हर तरफ बिखरी गाथाएं गवाह हैं,निश्चित ही देश में जमकर जमाखोरी और कालाबाजारी हुई है,हमारी सरकारों से आने वाले समय में जरूर पूछा जायेगा कि जब लूट मची थी,तब लुटेरों का हिसाब किताब कितना किया गया?,जमाखोरों के खिलाफ सख्ती की बात प्रधानमंत्री की बैठक में भी उठी थी,लेकिन जमीन पर कितनी सख्ती हुई?हमारी व्यवस्था में आम और खास का फर्क तो हर जगह और हर स्तर पर है,इसमें भी संदेह नहीं कि अनेक ऐसे खास लोग ही लूट या जमाखोरी की स्थिति पैदा करते हैं।जब व्यवस्था के ही कुछ खास हिस्से जमाखोरी के लिए माहौल तैयार कर रहे हों,तब जमाखोरों के खिलाफ कदम कितनी ईमानदारी से उठेंगे?इतिहास में दर्ज किया जायेगा कि देश में जब जरूरत थी ,तब लोगों को कई गुना कीमत पर दवाइयां बेची गईं और दोगुनी कीमत पर सामान।कच्चे नारियल की कीमत किसान को बमुश्किल प्रति नग दस रुपए मिलते हैं लेकिन यही नारियल सामान्य ठेलों पर आठ गुना दाम पर बेचे जा रहे हैं।आपदा को कैसे अवसर में बदला जा सकता है यह कई अस्पतालों ,कंपनियों से लेकर सामान्य ठेलों वालों ने बता दिया ?इसमें सरकार क्या कर सकती थी ,यह उन्हें आगे चलकर जवाब देना होगा।
            बस निवेदन इतना है की यह समय रोगियों की सेवा का है, उनका मनोबल बढ़ाने का है।किसी भी सोशल मीडिया पर लोगों को अनावश्यक अवसाद में डालने वाली पोस्ट पर लगाम कसना होगा,वहीं सही आलोचनाओं के आलोक में आगे बढ़ना होगा और नसीबो लाल के बोल को दिमाग में रखना होगा।निश्चित ही हम जीतेंगे, कोरोना हारेगा।जोहार प्रकृति!जोहार किसान!
              डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी
मो:9415694678
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शनिवार, अप्रैल 24, 2021

पंचायत चुनाव लोकतंत्र या शक्ति प्रदर्शन बनाम आधी आबादी *–डा ओ पी चौधरी



पंचायत चुनाव लोकतंत्र या शक्ति प्रदर्शन बनाम आधी आबादी –डा ओ पी चौधरी
       पंचायती राज दिवस 24 अप्रैल के विशेष संदर्भ में
           कोविड –19 की प्रचंड लहर के बीच त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव उत्तर प्रदेश में चल रहा है और अंतिम चरण 29 अप्रैल को समाप्त होगा।शक्ति से तात्पर्य,धन बल, बाहु बाल आदि अर्थात साम, दाम,दंड,अर्थ,येन केन प्रकारेण।चुनाव  की तैयारी चुनाव आयोग अपने सरकारी अमले के साथ कर रहा था तो दूसरी ओर गांवों में बहुत पहले से ही बड़ी बड़ी होर्डिंग और सादी(प्रायः दाल बाटी, चोखा,खीर) एवम् रंगीन पार्टी (जो नॉन वेज और दारू के साथ होती है)के साथ शादी विवाह, मरनी, जियनी, भागवत,मुंडन अनेकानेक कार्यक्रमों में प्रत्याशियों के शामिल होने की होड़  मची है।" कच्ची दारू कच्चा वोट,पक्की दारू पक्का वोट " , पंचायत चुनाव में अब यह नारा पुराना हो गया है,क्योंकि मतदाता अबकी बार के चुनाव में हर प्रत्याशी की ओर से मिल रही सौगात को समेटकर सभी से वोट देने का वादा कर रहा है।वह वोट किसे देगा यह भविष्य के गर्त में है, लेकिन लेन देन के खेल में मतदाताओं के बीच एक नया नारा बुलंद किया जा रहा है कि " नोट लियो सबसे, वोट दियो मन से "।सूरज के अस्त होते ही गावों में उम्मीदवारों की कृपा से वोटर मस्त हो जा रहे हैं,क्योंकि आजकल प्रत्याशी वोटरों पर दिल खोलकर मेहरबान हैं।"मयकदे किसने कितनी पी खुदा जानें, मयकदा तो मेरी बस्ती के कई घर पी गया" मेराज फैजाबादी की ये लाइनें पंचायत चुनाव में मुफ्त बंट रही शराब पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है।ऐसे में पति सुबह कमाने की बात कहकर घर से निकलता है और पहुंच जाता है प्रत्याशी के प्रचार में,जहां मुफ्त में खर्च और दारू मिलती है।लड़खड़ाते पांव शाम को जब यह प्रचारक घर पहुंचता है, तो पत्नी घर की साग सब्जी के लिए पैसे मांगती है तो उसे पिटाई नसीब होती है,जिससे आधी आबादी परेशानी की हालत में उस प्रत्याशी को कोसती नजर आती है,जिसने उसके परिवार के दो जून की रोटी का इंतजाम करने वाले को मुफ्त में शराब पिलाकर परिवार के प्रति लापरवाह बना दिया है।फिलहाल इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है।प्रत्याशी वोटों की खातिर शराब का दरिया बहा रहे हैं,कई मजदूर तबके का रोजगार छीनकर उन्हें अपने परिवार के प्रति लापरवाह बना रहा है  (हिंदुस्तान, 22 एवम् 23 अप्रैल,2021)।इसी तर्ज पर प्रथम एवम् द्वितीय चरण का समाप्त हो चुका है।आखिरी चरण के प्रत्याशी सबसे अधिक परेशान व लंबे समय तक भागदौड़ तथा खर्चे का शिकार हो रहे हैं।एक बड़ा मजेदार वाकया बताता हूं,मैं कुछ दिन पूर्व वाराणसी में अपनी भतीजी की शादी का कार्ड बांटने गया – रमसीपुर, सगहट, मनकइयां भोरकला,वहां के लोगों की आपस में चर्चा सुनकर बड़ा मजा आया कि अबकी नवरात्र में चुनाव हो जाने से प्रत्याशी बहुत राहत में हैं, मुर्गा, मीट, फ्राईड फिश और मदिरा का सेवन काफी लोग नही कर रहे हैं,खर्च काफी कम हो गया है, केवल पनीर तक ही लोग रह गए।खाने खिलाने का दौर बदस्तूर जारी है।उम्मीदवार भी एक से बढ़कर एक हैं। सबसे मजे में सहायताप्राप्त अशासकीय डिग्री व माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक हैं, पगार कोषागार से लिया, काम क्षेत्र में भ्रमण कर जनता का ; पठन– पाठन के अतिरिक्त, अन्य सभी कार्य करते हैं,हमारे विधान सभा क्षेत्र जलालपुर,अम्बेडकरनगर के वर्तमान सदस्य, विधान सभा,उत्तर प्रदेश एक कॉलेज में अध्यापक रहते हुए अपने इतने दिनों के कार्यकाल में कितने दिनों तक अध्यापन कार्य किए होंगे वही बता सकते हैं। मैं स्वयं जलालपुर का रहने वाला हूं,और काशी में अध्यापन करने का सौभाग्य प्राप्त है,बहुत कोशिश करने के बाद भी प्रत्येक रिश्तेदारी की शादी विवाह व शोक के समय संवेदना व्यक्त करने नही जा पाता,अवकाश होते हुए भी,छुट्टी नहीं खर्च कर पाता, क्योंकि पूरा पाठ्यक्रम समाप्त करने के चक्कर में सामाजिक रिश्तों का निर्वहन नहीं कर पाता, लेकिन विधायक जी पूरे क्षेत्र में सभी लोगों के यहां पहुंचते हैं,कब अपने उस दायित्व का निर्वहन करते हैं,जिस निमित्त सरकारी खजाने से एक मोटी रकम हर माह आहरित करते हैं।वहीं से बी जे पी के उम्मीदवार जो डा राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या में प्रोफेसर हैं, ये लोग प्रायः क्षेत्र में रहते हैं, कब पढ़ते – पढ़ाते हैं, अल्लाह जानें।यह तो प्रभावशाली लोग हैं।अपने जनपद में हम ऐसे दर्जनों लोगों को जानते हैं जो अध्यापन पेशे में है,लेकिन पेशेवर राजनीतिज्ञ हैं, चुनाव लड़ना और लड़ाना इनका पेशा है,और अध्यापन गौड़ हो गया है।यही हाल पूरे प्रदेश या देश का है,जहां ऐसे माननीय हैं,जो सरकारी खजाने से वेतन आहरित कर रहे हैं, लेकिन चुनाव लड़ रहे हैं।हमारे कर्मक्षेत्र काशी में भी एक ऐसे ही प्रोफेसर कोषागार से वेतन प्राप्त कर, विधायक बन जनता की सेवा में रत हैं,उनके अध्यापन कला का वर्णन विद्यार्थी ही कर सकते हैं।सबसे मजेदार बात यह है की समाज में इनका सम्मान भी है, क्योंकि ये अपना मूल कार्य(अध्यापन) नहीं करते हैं, जो मूल कार्य करते हैं वे केवल मदर्रिश ही रह जाते है।ऐसे माननीयों की तनख्वाह तो ऐशो आराम के लिए है। ऐसे अध्यापक प्रधानी, जिला पंचायत सदस्य/अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख, बी डी सी तक के लिए भी मैदान में उतरने के लिए आतुर।इससे अच्छा होगा भी क्या, तनख्वाह सरकार देगी,वोट जनता देगी,फिर चुनाव जीतकर या अपनी पत्नी, मां किसी अन्य को जिताकर लोकतंत्र का खुला माखौल उड़ायेगे।शिक्षक स्वयं में एक अत्यंत सम्मानित पेशा है, जिसमें नौकरी से ज्यादा सेवा भाव और सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का दायित्व है, बच्चों को एक सजग और जागरूक नागरिक बनाने की जिम्मेवारी है।लेकिन कुछ लोग प्रधान बनकर या अपनी पत्नी को प्रधान बनवाकर, प्रधानपति कहलाने में ज्यादा गौरवबोध का अनुभव करते हैं।अब बात प्रधानपति की आ गई तो इस बात का जिक्र भी जरूरी है।मेरे निकटस्थ गांव की प्रधान महिला थी, लेकिन लोग उनके पति को ही प्रधान कहकर बुलाते थे और उन्हीं के पास जाते थे और तो और वही मीटिंग में भी जाते थे,यही हाल जिला पंचायत सदस्यों का भी है।ऐसे में कैसा लोकतंत्र?किसका लोकतंत्र? कैसा महिला सशक्तिकरण? कैसा महिला आरक्षण?सभी कोई मायने नहीं रखता?केवल थोथा लोकतंत्र।ऐसे में आधी आबादी में निर्णय लेने की क्षमता कैसे विकसित हो ?वैशाखी के सहारे गांव, संस्थाएं व लोकतंत्र, जनतंत्र।ग्राम प्रधान या ऐसा कोई नेता सदैव अपने व्यक्तिगत लाभ हानि की ही सोचता है।मनरेगा में जॉब कार्ड का भी चक्कर है।जनपद मीरजापुर में दो वर्ष पहले खबर आई थी की एक दुधमुंहा बच्चा भी मनरेगा में काम करता है। गांव में पंचायत बैठकों की परम्परा समाप्त हो चुकी सभी निर्णय प्रधान,सेक्रेटरी और लेखपाल मिल कर लेते हैं।किस कार्य के लिए बजट मिला हैं ? गांव में कौन सा काम आवश्यक है?lकिस कार्य में ज्यादा लोगों का फायदा इस बात की गांव पंचायत में चर्चा किये जाने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं करता, सच बोलने-सुनने की इच्छा  व साहस किसी में नहीं रह गया है, गांव के विकास या अन्य किसी मामले में विमर्श या सार्वजनिक चर्चा की आवश्यकता कोई महसूस नहीं करता है।इस चुनावी मौसम में बच्चे क्रिकेट खेलने के लिए इक्कठा होते हैं, व्यस्क या तो दारू मुर्ग़ा, बाटी चोखा की पार्टी या फिर तास खेलने के लिए जुटते हैं।सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए  ग्राम सभा की कदाचित ही कोई मीटिंग होती हो। क्या विवाद या भलाई बुराई के डर से पंचायत राज की अवधारणा समाप्त हो रहीं हैं? क्या गांव का लोकतंत्र केवल एक दिन वोट डालने तक सीमित है ? मुझे गांव से लेकर ऊपर तक सभी स्तरों पर लोकतंत्र खतरे में नज़र आता है,अर्थात उसका यही स्वरूप नजर आता है ।इस विषय पर विचार और सार्थक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है कि गांव का सामाजिक ताना-बाना सही बना रहे गांव के विकास तथा साफ सफाई में और समारोहों में सबकी सहभागिता हो तभी लोकतन्त्र को बचाया जा सकेगा अन्यथा सत्ता और ताकत प्रायः लोगों को भ्रष्ट और तानाशाह बनाती ही है, बनाती ही रहेगी।कुछ माह पूर्व वोटर लिस्ट में नाम बढ़वाने और कटवाने के फेर में अंबेडकरनगर के जहांगीरगंज ब्लॉक में दो सगे भाइयों को मौत के घाट उतार दिया गया था,ऐसे न जाने कितने लोग प्रदेश में चुनावी हिंसा का शिकार होते हैं।प्रधानी के चुनाव में हिंसा अब आम बात हो गई है।ऐसे में लोक का क्या होगा?लोकतंत्र का क्या होगा?समाज का क्या होगा? हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए,ताकि हमारा लोकतंत्र सभी स्तर पर मजबूत हो सके,जनतंत्र की रक्षा हो सके।जोहार प्रकृति!जोहार किसान!
     डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग
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शनिवार, अप्रैल 03, 2021

मृत्युभोज (व्यंग्य आलेख) :रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)

               

             मृत्युभोज : व्यंग्य आलेख   
              (-रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)

     जैसे ही सैकड़ों-हजारों की भीड़ को मृत्युभोज का हरा सिग्नल मिला वैसे ही सब अपनी-अपनी दो-दो फिट की जगह अपने नाम रजिस्ट्री कर खाने की तैयारी में जुट गए। खाना परोसा गया। घी-छोले-पनीर आदि सब बाँटे गए। लग ही नहीं रहा था कि हम मृत्युभोज में आये हैं या कोई शाही दावत या फिर देसी मैरिज पार्टी। 
        हाँ सबों ने दबा के गर्दन तक भरा। सब खाने में व्यस्त; किसी को कोई पहचान ही नहीं रहा।ऐसा लग रहा था मानों बहुत दिनों से भूखे हैं। सब अपने-अपने पत्तलों से कबड्डी और कुस्तियाँ लड़ रहे हैं पर किसी ने उस तड़पते-बिलखते परिवार को पुनः जीवन जीने का ढाढ़स नहीं दिलाया। खाए और तुरंत गोल हो लिए।
       भीखू यह सब देखकर मन ही मन रो पड़ा और स्वयं उस टूटे परिवार को अपने निश्छल भावों से धोया और कहा-“सदैव आपके साथ ही हैं, अपने को अकेला मत समझिए।“ लोग इस मृत्युभोज में ऐसे ठहाके मार रहे थे कि जैसे किसी बेहतरीन शादी के उत्सव में आये हों।
       भीखू अपने घर रवानगी के लिए उस व्यथित परिवार से आज्ञा ली और घर की ओर चल दिया। कइयों ने बिना बताए घर जाने के बहाने दारुओं के अड्डों तक जा पहुँचे और पीकर खूब लड़ाई की-“कि हमने पी है।“ भीखू अपने मित्र चीखू से एक दिन बैठक लगाई और मृत्युभोज पर बातें छेड़ दी। चीखू तू ही बता क्या मृत्युभोज समाज के लिए आवश्यक है? इससे वास्तव में क्या-क्या फायदे होते हैं? मुझे तो कुछ ठीक नजर नहीं आता। तब चीखू ने कहा कि सुन भाई एक गरीब अपनी कमाई का कुछ हिस्सा इसमें तो लगा ही देता है। कुछ तो कर्ज माँगकर इस दिखावे को पूरा करते हैं। अगर यह सब नहीं करेंगे तो अपने को छोटा महसूस करेंगे-आई समझ में बात।
      हाँ, आ तो रही है किन्तु क्या इस बारह-तेरह और चौदह दिन के मृत्युभोज  को एक दिन में नहीं समेटा जा सकता? अरे! भाई समेटा जा सकता है लेकिन आज के सामाजिक-गुरिल्ला मानव बमगोला है; तैयार ही नहीं होता। थोड़ी-थोड़ी बातों में तुनुक जाते हैं। यहाँ कोई-कोई तो शराब आदि पीकर भी मृत्युभोज का आनंद लेने आ जाते हैं। जिससे पता चल जाता है कि यह अनपढ़ की ट्राफी लेने में माहिर हैं। भीखू भाई मुझे लगता है कि इस मृत्युभोज को बंद कर देनी चाहिए। चौदह-पंद्रह दिनों के इस दिखावे में क्या आनंद?-कुछ भी नहीं। तड़प तो उनको है जिन्होंने अपनों को खोया है।
          क्या वह परलोकवासी इन पंद्रह दिनों के ढकोसलों से वापस आ सकता है? क्या मतलब इतना सब खर्च करने से। इसके वजाय हम उन मृतक परिवार के साथ तीन-चार दिनों तक स्नान-शुद्धि में जाएँ। लौटकर उस मृतक के फोटो में फूल-रोली-चन्दन चढ़ाकर चुपचाप अपने घर लौट आएँ, यही उचित है।
   उस मृतक परिवार को क्या एक ही बार सहभोज कराना है? इस मृत्युभोज में सहभोज नहीं कराया तो क्या हो गया?- कुछ भी नहीं। अरे उसे तो आगे कथा-भागवत-अन्नप्रासन भी तो करनी है। उन भूख के बीमारों को इसमे खा लेनी चाहिए। हम टूटे हुए परिवार को और क्यों तोड़ें? कुछ दिन-महीने-साल बाद आँखों की हरियाली आ जाने पर खा-पी लेते। हाँ ये तो तूने सौ प्रतिशत बात सही की। समाज में यही होना चाहिए। समाज पुराने ढर्रों को छोड़े और नई नीतियों जैसे शार्टकट नीति अपनाकर निपट ले। कुछ कामों के लिए शार्टकट ठीक नहीं होता पर इस मृत्युभोज के लिए उचित है। हम सब खा-पीकर अपने-अपने घर को आ जाते हैं और वहाँ वह शक्तिहीन परिवार अपनी व्यथा से व्यथित होकर अपने को जैसे पाता ही नहीं है। घर के अन्दर से रोने की चीत्कार और बाहर खाने वालों की असीमित भीड़- ये कैसा मामला है? मेरे तो कुछ समझ नहीं आता कि किन लोगों ने समाज को पंगु बना दिया और दिखावे का ना छूटने वाला प्लास्टर चढ़ा दिया।
        चीखू भाई हमें लगे कि हम मृत्युभोज में आये हैं। ऐसी वहाँ की व्यस्था होनी चाहिए। न जाने इस मृत्युभोज में ढकोसले और बिना घास-फूस के घोसले क्यों शामिल है। सबों ने अपने-अपने पत्तलों में अपने दो-चार ग्रास छोड़ दिए उन कौवों और चीलों के नाम पर। कभी-कभी उन कौवों-चीलों को भोजन के ये दाने नहीं मिल पाते। उस मृतक के नाम से ये उड़ने वाले जीव फलीभूत तो होते ही हैं साथ ही घर के थानेदार-कुत्ते भी चाव से इस मृत्युभोज का लुत्फ जरूर उठाते हैं।
          अरे, चीखू न जाने कब तक इस प्रथा को लोग अपने गले से चिपकाये रहेंगे। मुझे तो लगता है कि लोगों को यही करने में आनंद मिलता है। जीवित हाल में उस मृतक को हमने कुछ अच्छा पौष्टिक वाला फल-दूध-दही-मक्खन-घी नहीं खिलाये किन्तु आज उसी के नाम पर यह सब भूख के बीमारों को खिलाया जाता है। उस मृतक के मुँह में नहीं पड़ा होगा यह सब। यह तो केवल नाम का खेल है, वास्तविकता का तो ज़माना ही नहीं रहा। इस मृत्युभोज में केवल भोजन का रेलम-रेल ही प्रमुख है।
       आज समाज को यथार्थ का साबुन लगाकर मल-मलकर नहलाने की जरूरत है। तब समाज में कुछ सकारात्मक परिवर्तन के शुभ दर्शन होंगे।
  “धन्य है समाज और धन्य हैं समाज के लोग”।
 हाँ, मित्र बहुत बातें हो गयी, चल अब घर चलें। 
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('आधुनिकता का शिलालेख' से)
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प्राकृतिक संपदा के कोष और नैसर्गिक सुषमा के आगार:हमारे वृक्ष –डा ओ पी चौधरी



प्राकृतिक संपदा के कोष और नैसर्गिक सुषमा के आगार:हमारे वृक्ष –डा ओ पी चौधरी
         वन है तो भविष्य है,यह कथन बहुत ही सटीक है।मानव जीवन का अस्तित्व ही छोटे छोटे हरे भरे पौधो व वृक्षों के साथ ही प्रारंभ हुआ, जब प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाना शुरू किया।भारतीय संस्कृति में तो वृक्षों की पूजा की जाती है।पीपल, नीम,तुलसी,शमी,  आंवला,बरगद,केला,आम आदि अनेक वृक्ष बहुत ही पवित्र माने जाते हैं और उनकी विविध रूपों में विधिवत पूजा – अर्चना की जाती है। मां की आंचल की भांति वृक्ष हमें छाया देते हैं,क्षुधा शांति के लिए फल देते हैं,जो हमारे शरीर को हृष्ट और पुष्ट बनाते हैं।जल संरक्षण व बरसात करवाने में इनकी अत्यंत महत्ता है।हमारे अनेक तरह के जीव जंतुओं को आश्रय देते हैं,जो जैव विविधता के लिए आवश्यक है। कोविड –19 जैसी महामारी फैलने से रोकते हैं,क्योंकि पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं और अनेक हानिकारक जीव इन्हीं की गोंद में समाए रहते हैं।औद्योगीकरण के बढ़ते कदम और अनियंत्रित गति से बढ़ती हुई जनसंख्या वृद्धि के कारण आबादी के लिए वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटान हो रही है।परिणामस्वरूप अनेक जंगली जीव जंतु जो मानव जीवन को क्षति पहुंचा सकते हैं,वे आबादी क्षेत्र में आ जा रहे हैं और हमें नुकसान पहुंचा रहे हैं।
    यद्यपि 1950 से वन महोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया जाता रहा है लेकिन खानापूर्ति तक ही सीमित हो रहा है।वृक्षों को कटाई के लिए भी अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है,लेकिन फिर भी विकास के नाम पर अंधाधुंध कटाई जारी है।पुराने और बड़े वृक्षों को काटकर हम अपना रास्ता तो चौड़ा कर ले रहे हैं लेकिन जीवन का मार्ग बाधित कर रहे हैं।नए पौधे लगा रहे हैं,लेकिन उचित देखभाल के अभाव में वे जीवित ही नहीं बच पा रहे हैं और यदि बच भी गए तो उन्हें पूरा वृक्ष बनने में एक अरसा लगेगा।इस तरह हम पुराने की भरपाई नहीं कर पा रहे हैं।मैं अपने गांव मैनुद्दीनपुर,जलालपुर, अंबेडकर नगर में पेड़ लगाकर अपने कर्मक्षेत्र काशी चला आता हूं।इस अवधि में उनको पानी और खाद देने का काम मेरे सहोदर बड़े भाई श्री राधे श्याम चौधरी(अवकाश प्राप्त जेल अधीक्षक)बड़ी शिद्दत के साथ करते हैं,इस कार्य में मेरे भतीजे शिशिर का योगदान भी  कमतर नहीं आंका जा सकता है।इस तरह एक नन्हा सा पौधा वृक्ष बनकर हमें तो सुख देता ही है, धरती मां की भी शोभा और आयु बढ़ाता है तथा मुफ्त में सभी को प्राण वायु ऑक्सीजन देता है व मानवों सहित जानवरों को भी छाया प्रदान करता है।इस तरह एक पेड़ को तैयार होने में काफी समय,श्रम लगता है।
      इनकी हरीतिमा अत्यंत मनोहारी दृश्य उत्पन्न करती है, मन को सकून देती है।फिर भी हम इन्हें काट रहे हैं। अनेक प्राकृतिक आपदाओं का कारण वनों की कटान है–अतिवृष्टि,अनावृष्टि, बाढ़, सूखा,भूकंप,भूस्खलन,धूल भरी आंधी आदि वन संपदा की अनियंत्रित कटाई के फलस्वरूप ही उत्पन्न हुई है।इतना ही नहीं इसका यह भी दुष्परिणाम हुआ है की वन्य जीवों की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं और प्रतिदिन लुप्त होती जा रही हैं,जिनका असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।प्रदूषण बढ़ने के कारण हम अनेक रोगों की चपेट में आ रहे हैं।वनों से ही हमें अनेक प्रकार की जड़ी –बूटियां व औषधियां प्राप्त होती हैं,जो हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।वृक्ष अपनी सघन जड़ों से मिट्टी को पकड़े रहते हैं और हमारी कृषि योग्य जमीन की उर्वरकता बनाए रखते हैं,उन्हें क्षरण से रोकते हैं,रेगिस्तान के प्रसार को भी रोकते हैं।इनकी पत्तियां नीचे जमीन पर सड़कर खाद के रूप में काम आती हैं।इनसे हमें फल – फूल तो मिलता ही है, भवनों एवम् अन्य कार्यों हेतु लकड़ियां भी प्राप्त होती हैं।वनों से अनगिनत लाभ हैं उन्हें गिनाना मुश्किल है।अभी कोरोना काल में गिलोय,तुलसी, अश्वगंधा आदि का जन मानस ने बहुत प्रयोग किया एवम् अपनी इम्यूनिटी बढ़ाकर महामारी को शिकस्त दिया।जीव वैज्ञानिक इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि हमारे इकोसिस्टम को ये संतुलित करते हैं।लेकिन जिस तरह से इन संसाधनों का अनियंत्रित ढंग से उपयोग हो रहा है उससे चिंता की लकीरों का उभरना स्वाभाविक ही है। हम जरूरत से ज्यादा दोहन प्राकृतिक संपदा का कर रहे हैं,तो उसका खामियाजा भी हमें ही या आगे आने वाली पीढ़ी को ही भुगतना पड़ेगा।
      प्रकृति का अनुपम सौंदर्य हमसे दूर होता जा रहा है।ऑक्सीजन की कमी होती जा रही है,हम इसके लिए बड़े शहरों में क्लबों में जा रहे हैं।पर्यावरण का सीधा संबंध प्राकृतिक संसाधनों से है। अतएव हमें अधिक से अधिक वृक्ष लगाना चाहिए, उनके बड़े हो जाने तक परिवार के एक सदस्य की भांति उनका पालन पोषण करना चाहिए।अभी उद्घोष (पर्यावरण को समर्पित, एक संस्था,पलामू) के कर्ता धर्ता भाई कमलेश जी तथा पीपल, नीम, तुलसी के संस्थापक और सम्पूर्ण धरा को हरा भरा करने का संकल्प लेकर अपने जीवन को पर्यावरण के लिए समर्पित कर देने वाले डा धर्मेंद्र कुमार सिंह (पटना,बिहार)के सहयोग से एक बड़ा पर्यावरण सम्मेलन 9 मई, 2021 को झारखंड के पलामू जिले के लेसलीगंज प्रखंड के कुंदरी गांव में जहां एशिया का दूसरा सबसे बड़ा लाह का बागान है,आयोजित किए हैं, मुझे भी अतिथि के रूप में,एक पर्यावरण सेवक के नाते आमंत्रित किया गया है, यह मेरा सौभाग्य है कि देश के पर्यावरण प्रेमियों, पर्यावरणविदों के सानिध्य में कुछ सोचने –समझने का सुअवसर प्राप्त होगा।
           पर्यावरण संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है।प्रदूषण को दूर भगाना है, तो पर्यावरण का स्वच्छ होना,प्राणियों के जीवन के लिए बहुत जरूरी है।अतएव हमें पेड़ –पौधों के प्रति "आत्मवत सर्वभूतेषु" के भाव का विस्तार करना होगा और "माता भूमि: पुत्रो अहम पृथिव्याः"का अनुगामी बनना होगा।जोहार धरती!जोहार प्रकृति!
        डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
मा.राज्यपाल नामित कार्य परिषद सदस्य वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर।
मो: 9415694678
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कपटी और आडम्बरी जन (कविता) : राम सहोदर पटेल



कपटी और आडम्बरी जन

भिनसार कबहॅूं हो न पावहिं, जो मनुष कपटी भये।

सन्देह का व्यवहार पावहुं, जो अपनयों सब गये॥

दोस्त गाढ़े भी डरें सब, दूर से करते नमस्ते।

खाया जो धोखा बार एक भी, फिर न फंसना चाह सकते॥

दूध में जलकर विलाई, छाछ भी डरकर पिये।

डरना रहा तो ठीक हद तक, दूर रिश्ता से किये॥

अपनी है उन्नति कर न पाये, अन्य की उन्नति खले।

कैसे घटायें शान इनकी, सोचकर मन में जलें॥

देखकर अपनों को आगे, दोष किस्मत पर न मढ़े॥

नीचा दिखाने कर इरादा, जयचन्द मारग पर चढ़े।

भावना ईर्ष्या की जागी, जलजला जिद पर पगे।

नींद इनकी साथ त्यागी, द्वेष से कुढ़ने लगे॥

अवसर तलाशें रात दिन, नीचा करें कैसे इसे।

हम तो खुद बरबाद हैं, बरबादी दें कैसे इसे॥

पग बढ़े आगे स्वजन के, पीछे खींचन में लगे।

अन्य गीदड़ भी जो देखी, दुम दबाकर भागन लगे॥

शेखी बघारे ज्ञान की पर शब्द बाचत न बने।

गर सीख इनको देन चाहो, तो उल्टी गिनती भी गिने॥

न बड़ों का ज्ञान इनको, न समझ सम्मान की।

लात घूंसा भूख इनकी, खेद न अपमान की॥

राज श्री गुटका, तम्बाकू शौक मदिरा पान की॥

घर किसी का लूट मारै, चाहत करें अरमान की॥

देखें परायी बहन बेटी, जात या परजात की।

अस्मत को लेते लूट जबरन, फिक्र न मरजाद की॥

हिन्दी का इनको ज्ञान ना हीं, बात अंग्रेजी की करें।

दस्तखत भी न कर सकें। पाकेट में पेन दो-दो धरें॥

देखा नहीं कस्बा निकट का, बात दिल्ली की करें।

जेब खाली नोट से पर, बात लाखन की करें॥

अरहर की टट्टी घर बनी, ताला लगे गुजरात की।

घटने न पाये शान तनिकौ, घर पानी घुसे बरसात की॥

सज-धज में कमती होत न, लालच लगी है ब्याह को।

लड़की जो देखी ठीक सी, आगे जा छेंकत राह को॥

भन्ना सिफारिश ब्याहें यदि, शान सतवें असमान पर।

मास दो एक चल न पाये, किश्ती रुकी मझधार पर॥

ब्याह घर आयी बहू जो, नइहर चली मुंह मोड़कर।

हेकड़ी गुम हो गयी, दारा चली सब छोंड़कर॥

पत्नी के सम्मुख हाथ जोड़े, जो न जुड़ते थे कभी।

जो कहोगे वह करेंगे, है कसम खाते अभी॥

मन मतंग जब लौ न जाहीं, तो लौ न धक्का खात हैं।

समझे सहोदर बात जब लौ, आबे समझ सब बात है॥

मन मतंग मानत नहीं, जब लौ धका न खाय।

समझ सहोदर शब्द को, नहिं जग होत हंसाय॥

रचना-

राम सहोदर पटेल, शिक्षक

ग्राम-सनौसी, थाना-ब्योहारी, तहसील-जयसिंहनगर, जिला-शहडोल (मध्यप्रदेश)

 

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