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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रकृति (कविता) : शोभा तिवारी 'समीक्षा'

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   शीर्षक  -  प्रकृति (कविता) प्रकृति के ये नजारे              कितने सुंदर कितने प्यारे , नौका मे  करूँ विहार            कभी इस आर कभी उस पार, नीले  गगन तले                      चले  ठंडी -ठंडी पवन, देख कर दृश्य यह               भाव विभोर हो रहा मन  । नदियॉ रहती अपनी धुन में                आसमान नीला - नीला  खुबसूरत इन वादियों में                  पक्षी उड़ते मस्तमौला मन करता  हैं मै भी                    पक्षी  बन उड़ जाऊँ  छू   लूँ  जाके गगन              हवा के साथ लहराऊँ । सुबह का सूरज उगता जैसे                 नयी प्रेरणा  लाये  उठो , ज...

कोविड-19:बेपटरी अर्थव्यस्था को सुदृढ़ करने में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान

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कोविड-19:बेपटरी अर्थव्यस्था को सुदृढ़ करने में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान                    कोविड-19,वर्ष 2020 की एक अत्यंत भयंकर महामारी व त्रासदी है,जिसके कारण 24 मार्च, 2020 से लगातार 68 दिनों के लॉक डाउन,उसके बाद अनलॉक डाउन की लंबी श्रृंखलाओं ने हमारे जन- जीवन के साथ ही हमारी अर्थ व्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया है।हमारी पूरी अर्थ व्यवस्था बेपटरी हो गई है।बहुत बड़ी संख्या में कामगारों का पलायन शहरों से गांवो की ओर हुआ।उद्योग धंधे,कल - कारखाने,निर्माण कार्य सभी ठप हो गए।सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार पिछले साल भर में 98 लाख लोगों की नौकरी गई है। कोरोना की दूसरी लहर ने दोबारा नया संकट पैदा कर दिया है।पहली लहर के बाद भारतीय अर्थ व्यवस्था तेजी से सामान्य होने की ओर बढ़ रही थी और इसमें ग्रामीण क्षेत्र बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है।सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी)में कृषि क्षेत्र की भागीदारी 13 फीसदी है,जो तीसरे नंबर पर आती है। कोरोना काल में भी रबी की फसल का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था।कटाई व मड़ाई के समय थोड़ी राहत से निर...

बचपन के वो दिन,गांव की मस्ती बनाम विकास: डॉ. ओ.पी. चौधरी

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बचपन के वो दिन,गांव की मस्ती बनाम विकास              पनघट, पगडंडी,पैड़ा,डगर, खोर, डहर, मेड़ –डांड, हल –जुवाठ, सैल,पैना,हेंगा,नाधा, हरजोत्ता, हर्ष,फार,खोंपी,पचवासी,बरारी,रसरी, नाथी, –पगहा,गेराव,मोहड़ी,सिंघौटी,खूंटा, मुद्धी, खुंटा, सकरमुद्धी, बैठनी,कूंड–बरहा, चरखी,हौदा, धन्न, उबहन,जगत, घिर्री,गगरा,गुलौर,कईन, झुकवा, हंकवा, पकवा,बोझवा,सईका, सईकी,हौदी, गगरी, परयी,पुछिया,कड़ाह–कड़ाही,कोल्हू, कातर,तौला,कूड़ा,कमोरी, रहट, पुरवट, बेड़ी,सैर,घोल,ताल,पोखरा,गड़ही, छान –छप्पर,छनौती, बाती, बन्हन, पाती, सरपत,बेड़ा,कोरो, बड़ेर,खपड़ा,नारियां,करी, अनगब,मोखब,कोसा, कोहा,दवरी, गांज,पैर,खलिहान, अखनी, पांचा, टेडूवा, गोबरहा, लेहना,बोझ,बिसरवार, हलवाह, उपरी –चिपरी, गोइंठी, गोइंठा,मौनी, मौना, दौरी,दौरा,  सिकहुला, डेहरी,जबरा, चूल्ह,चूल्हा, लगौना, थवना,बोरसी, पोतनहर, भितरही,मझेरिया, लीपना,पोतना,अहरा, जांता, चाकी, कांडी,सूप, चलनी,अंगिया, झन्ना, अरगनी,सिल –बट्टा, पहरुवा, पीढ़ा, पिरहई,भदेली, भदेला, पतेली,बटुली, हंडा –लोटा,भुजिया, बहुरी,गोजई, जौ–मटरा, सतुआ,पंजीरी आदि अनेक शब्द जो म...

आधुनिकता में विलुप्त होती बैलगाड़ी,पहले थी गांव की सवारी: डॉ. ओ.पी. चौधरी

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आधुनिकता में विलुप्त होती बैलगाड़ी,पहले थी गांव की सवारी                                भारत गांवों का देश कहा जाता है।बापू हमेशा कहते थे कि देश का विकास गांवों के विकास से ही होगा।काफी पहले जब सड़के नहीं थीं और न ही आवागमन के इतने साधन थे ,तब अनेक कार्यों में बैलगाड़ी का ही उपयोग किया जाता था।पहले काठ के पहिए होते थे उस पर लोहे की हाल चढ़ी होती थी, बाद में विकास के क्रम में बैलगाड़ी का नया संस्करण डनलप आ गया, अब पहिए ट्रक वाले रबर वाले हो गए।बैल तीन होते थे दो एक साथ जुए में नधे होते थे एक आगे बिडियहा होता था, जो केवल कभी कभी जोर लगाता था, जब गाड़ी चढ़ाई पर होती थी या पहिया सड़क(मिट्टी की खोर हुआ करती थी)पर फंसती थी,लेकिन यह बड़ा दुलारा और मजबूत होता था प्रायः हम लोगों के यहां उतरहा होते थे।अनाज ढोने, व्यापार,ईंट भट्टे, बाजार तक इस बैलगाड़ी से माल,अनाज, ईंट, गन्ना या अन्य सामग्री के ढुलाई में उपयोग किया जाता था।इसके अलावा ऊंट पर भी अनाज बाजार में बिकने जाता था,खच्चर का उपयोग भी करते थे।कहीं-कहीं तो अकेले...

लोक ऑक्सीजन की तलाश में, तंत्र वोट की तलाश में: डॉ. ओपी चौधरी

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           विश्व प्रसिद्ध विचारक लेव टोलेस्टॉय की अमूल्य और अनुपम कृति है,"युद्ध और शांति"।उन्होंने अपनी एक कहानी " वर्क,डेथ एंड सिकनेस" को 1903 में लिखा था।आज 2020 –2021में जब सम्पूर्ण विश्व कोविड –19 से जूझ रहा है, कितना सटीक है," .........अभी थोड़े दिन ही हुए,जब कुछ मनुष्यों ने काम की अहमियत जानी।उन्होंने समझा की काम के आधार पर मनुष्य को कमतर या उच्चतर नहीं समझा जाना चाहिए।काम से हर मनुष्य को सुख मिलना चाहिए।काम ऐसा होना चाहिए की मनुष्यों के बीच एक जुटता का भाव बना रहे।अब वे समझ गए हैं कि जीवन क्षण भंगुर है और मृत्यु कभी भी आ सकती है।इसलिए जीवन का जितना भी समय हमारे हाथ में है,उसका प्रत्येक साल,महीना,दिन,घंटा और मिनट हमें प्रेम और सौहार्द्र से बिताना चाहिए।वे समझने लगे हैं कि रोग हमें एकता की ताकत समझाने ही आते हैं।इसलिए दूसरे के दुख ,बीमारी और कष्ट में उसकी मदद करना हर इंसान का कर्तव्य है"। आज के कोरोना काल में यह कितना सटीक है।काम का महत्व हम अब समझ पाए जब महामारी के कारण पिछले साल भर में लगभग 98 लाख लोगों की नौकरी गई है,यह सी एम आई ई की एक ताजा रिपोर...

अच्छा-अच्छा सोचो जी: धर्मेंद्र कुमार पटेल

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अच्छा अच्छा सोंचो जी 🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔 जो करता है वो भरता है, अच्छा अच्छा सोंचो जी। दुनिया से जब जाना तय है, तो मीठा मीठा बोलो जी।। अच्छा अच्छा सोंचो ..... हंसी - खुशी से जीवन जी लो, याद यही तो आएगा। अमन चैन से रहना सीखो,  झगड़े टंटे छोड़ो जी।। अच्छा अच्छा सोंचो...... जलना, कुढ़ना, नफरत, धोखा, तकलीफें ही देता है। प्यार ,मोहब्बत के दरवाजे, अपने अपने खोलो जी।। अच्छा अच्छा सोंचो...... मिलना- जुलना,आना -जाना, मीठा मीठा बतियाना। जरा जरा सी बात पकड़ कर, रिश्ते यूं न तोड़ो जी।। अच्छा अच्छा सोंचो...... रब ही जाने ,जाने कैसी, फितरत है इंसानों की। कदम कदम पर क्यूं देते हैं, अपनों को ही धोखा जी।। अच्छा अच्छा सोंचो...... आपका भाई धर्मेन्द्र कुमार पटेल✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️ [इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर इमेल करें अथवा ✆ 8982161035 नंबर पर व्हाट्सप करें, कृपया देखें- नियमावली ] 

गूँज उठी रणभेरी : कवि गोलेन्द्र

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*★रणभेरी★* *(गूँज उठी रणभेरी)* काशी कब से खड़ी पुकार रही पत्रकार निज कर में कलम पकड़ो गंगा की आवाज़ हुई स्वच्छ रहो और रहने दो आओ तुम भी स्वच्छता अभियान से जुड़ो न करो देरी गूँज उठी रणभेरी घाटवॉक के फक्कड़ प्रेमी तानाबाना की गाना कबीर तुलसी रैदास के दोहें सुनने आना जी आना घाट पर आना --- माँ गंगा दे रही है टेरी गूँज उठी रणभेरी बच्चे बूढ़े जवान सस्वर गुनगुना रहे हैं गान उर में उठ रही उमंगें नदी में छिड़ गई तरंगी-तान नौका विहार कर रही है आत्मा मेरी गूँज उठी रणभेरी सड़कों पर है चहलपहल रेतों पर है आशा की आकृति आकाश में उठ रहा है धुआँ हाथों में हैं प्रसाद प्रेमचंद केदारनाथ की कृति आज अख़बारों में लग गयी हैं ख़बरों की ढेरी गूँज उठी रणभेरी पढ़ो प्रेम से ढ़ाई आखर सुनो धैर्य से चिड़ियों का चहचहाहट देखो नदी में डूबा सूरज रात्रि के आगमन की आहट पहचान रही है नाविक तेरी पतवार हिलोरें हेरी गूँज उठी रणभेरी धीरे धीरे जिंदगी की नाव पहुँच रही है किनारे देख रहे हैं चाँद-तारे तीरे-तीरे मणिकर्णिका से आया मन देता मंगल-फेरी गूँज उठी रणभेरी ©गोलेन्द्र पटेल छात्र, बीएचयू ईमेल : corojivi@gmail.com पता : ग्राम-खजूरगाँव, जिला-चं...

बढ़ती भौतिकता विलुप्त होती संवेदनाएं–डा ओ पी चौधरी

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            प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ’ यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो,तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो?यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रही हों,तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो’?इसी संदर्भ में मुजफ्फरपुर के जनाब आदित्य रहबर लिखते हैं,यदि इसका जवाब हां है तो मुझे आपसे कुछ नही कहना है,क्योंकि आपके अंदर की संवेदना मर चुकी है और जिसके अंदर संवेदना न हो ,वह कुछ भी हो लेकिन मनुष्य तो कत्तई नहीं हो सकता है।आज कोरोना महामारी ने जिस तरह से हमारे देश में तबाही मचा रखी है,उसमें किसी की मृत्यु,किसी की पीड़ा पर आपको दुःख नहीं हो रहा है,तो निश्चित ही आप अमानवीय हो रहे हैं।जब देश में चारों ओर कोहराम मचा है,प्रतिदिन चार लाख से भी अधिक लोग( जो एक दिन में विश्व के किसी भी देश में हुए संक्रमितों की संख्या सेअधिक है)कोविड–19 का शिकार हो रहे हैं, ऐसे में आई पी एल का जारी रहना कहां तक उचित है?सुखद संयोग है कि यह लिखते समय ही ज्ञात हुआ कि कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रकोप के कारण आई पी एल स्थगित कर दिया गया। पांच राज्यों के व...

मजबूरी मे भी हँस कर काम करता है मजदूर : शोभा

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सादर नमन माँ शारदा 🙏 सादर नमन मंच 🙏   दिन  - शनिवार  दिनांक  - 01 - 05 - 2021  विधा - कविता   मजदूर दिवस पर विशेष  **************** दूसरों के घरों को बनाता        है मजदूर   पर खुद झोपड़ी में रह लेता है       मजदूर,   बनाता है जो अपने हाथों से       शहर  को   उससे भी पराया हो जाता       है मजदूर । दुनिया का बोझ ढोता है मजदूर   पर उसके पास कुछ नही होता है ,  चैन की नींद हम सोते हैं घरों में   पर कल की आस मे रोता है मजदूर । परिवार के लिए अपने हर दुःख     सहता है मजदूर  ठंड मे ठिठुरता और गरमी मे     तपता है मजदूर  , अपनी इच्छाओ को जलाकर भी फिर से काम पर निकलता है मजदूर । हमेशा चुप रह कर , बिना  लड़े   मेहनत और लगन से काम करता   है मजदूर ,  क्यों उसे उसका हक नही मिल     पाता है  क्यों बनाया गया उसे हर पल       मजबूर । ग़रीबी मे ...