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दो कविताएँ:रमेश प्रसाद

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दो कविताएँ रमेश प्रसाद पटेल   1. सरस्वती वंदना हे माँ सरस्वती, हमें शक्ति दे। हे वीणावादिनी, हमें रोशनी दे। अज्ञान हमारे हृदय से दूर हो। ज्ञान-गंगा छलकता कलश हो। माँ निर्मल विचारों की दृष्टि दे हे वीणावादिनी, हमें रोशनी दे। मातापिता की सेवा में ध्यान हो, भारत माता के गीतों का गान हो , सत पथ में अड़ जाने की मति दे , हे वीणावादिनी, हमें रोशनी दे। दीन-दुखियों की सेवा में रत हों, दूसरों की भलाई में निरत हों, सदाचार, उपकार, संयम का वर दे, हे वीणावादिनी, हमें रोशनी दे। शब्द मुख से सदा उच्चरित हो, सुन सब जन, सदा प्रमुदित हों, विद्या का ऐसा, वर माँ हमें दे, हे वीणावादिनी, हमें रोशनी दे। 2. बनावटी श्रृंगार श्रृंगार बना तुम पथ से, कभी विचलित न होना,  यह है बनावटी, तुम अपना  पथ भुला न देना । हथियार बनते वहाँ युद्ध करने की होती लालसा,  सही पथ अपनाने से टल जाता भयानक हादसा । श्रृंगार वीर तुम अपने पथ से भ्रमित न होना, यह है बनावटी, तुम अपना  पथ भुला न देना । बाजार में व्याप्त श्रंगार के साधन जो नकली, ...

नवरात्र:सतीश कुमार की कविता

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नवरात्र सतीश कुमार सोनी रंगीन, रंगीन यह नवरात्र की बेला, जिस पर ना होगा कोई अकेला। सब मस्ती में रम जाएंगे, और जमकर नाचेंगे अब शैला।। होगी भक्ति बड़ी निराली, जैसे हो नवरात्र दिवाली। झूम झूम कर गाएंगे अब, मैया के रंग रंगजाएंगे सब। जैसे नाची मैया काली, आने वाली है खुशहाली।। सब मिलकर नवरात्र मनाएंगे, हर जगह खुशी रंग फैलाएंगे। माता रानी को  हर्षाएंगे, और इन दीपों की होड़ में, एक दीप अमन सुख शांति का भी जलाएंगे।। रचनाकार: सतीश कुमार सोनी जैतहरी जिला अनूपपुर मध्य प्रदेश [ इस ब्लॉ ग पर प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया  यहाँ क्लिक  करें।  अपनी   रचनाएं हमें whatsapp नंबर 8982161035 या ईमेल आई डी akbs980@gmail.com पर भेजें,  देखें  नियमावली   ]

बड़का बाँध

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बड़का बाँध: सुरेन्द्र कुमार पटेल   श्यामू फफक-फफक रो रहा है। उसे  सारा संसार असार मालूम पड़ता है। छाती में असह्य शूल उठता  है। एक हाथ माथे पर है और दूसरा छाती को सम्हाले है। वह सोचता है उघरे बदन पर आज गाज ही क्यों नहीं गिर गया, कम से कम यह शूल तो नहीं सहना पड़ता। यह धरती फट जाती तो वह इसमें समा जाता। वह  जब दहाड़ मारकर रोता है तो  आँँसुओं की धार बह निकलती  है फिर वह खुद ही आँँसुओं की धार को पोछ लेता है। जिधर नजर दौड़ाता है वही काट खाने को दौड़ रहा है। अभी-अभी चिता को मुखाग्नि देकर सब कुछ खोने के बाद भी उसे  लग रहा है कि कुछ ऐसा हो जाएगा जिससे उसका बेेटा उसके सामने खड़ा हो जाएगा। उसके कान सड़क की ओर तक रहे हैं कि हमेशा की तरह उसके बेटे के आने की पदचाप उसे सुनाई दे देगी। लेकिन विधाता तो अपना खेल खेल चुका था। जो कुछ सहना है अब उसे ही सहना है। बराबर का बेटा  इस दुनिया में नहीं रहा। उधर बूढ़ी माॅं का रो-रोकर  बुरा हाल  है। क्या यही दिन देखने के लिए वह जीवित रही। इस जीवन में न जाने कितनी बार वह  बीमार पड़ी। भगवान ने तभी उसको क्यों नहीं प...

जीत का संघर्ष जीवन है:इंजी.प्रदीप पटेल

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जीत का संघर्ष जीवन है इंजी. प्रदीप पटेल  अंधेरा है, अंधेरा है चिल्लाना जीवन नहीं है, खुद बाती बनकर जलना जीवन है। दूसरों को आदर्श बताना जीवन नहीं है, जिन्हें हम दूसरों को बताते हैं उन आदर्शों को स्वयं जीना जीवन है । हार जीवन नही है,जीत जीवन नहीं है जीत का संघर्ष जीवन है। उंगली उठाकर मार्ग बताना जीवन नहीं है, स्वयं मार्ग पर चलना और नए मार्ग बनाना जीवन है। दुनिया को बदल देना, संसार को बदल देना औरों में बदलाव लाना जीवन नहीं है। स्वयं में बदलाव लाना जीवन है। अपने विचारों को लेकर, अपने कर्म और पुरुषार्थ  पर अकेले रह जाओ तब भी, संघर्ष करना, खड़े रहना, डटे रहना जीवन है। रचनाकार : इंजी. प्रदीप पटेल [इस ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया  यहाँ क्लिक  करें।  अपनी   रचनाएं हमें whatsapp नंबर 8982161035 या ईमेल आई डी akbs980@gmail.com पर भेजें,  देखें  नियमावली   ]

हर रोज एक जंग

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हर रोज एक जंग सुरेन्द्र कुमार पटेल   जब टूटकर मैं बिखर गया, लोगों ने कहा तू निखर गया लड़ रहा अपने आप से ही सोचता हूँ मैं गलत तो नहीं मैं नहीं था तो था क्या अब मैं हूँ तो क्या हो गया नया मेरे होने का आशय ढूँढता हूँ हर कहीं मेरा होना कहीं यूं ही तो नहीं पग-पग चलूँ वसुंधरा  नाप लूँ ये क्षितिज भी न दूर हो आसमां मुझसे मजबूर हो आसमान को चीरकर उडूँ पाषाण को पानी कर मुडूँ सूरज को रोशनी दूँ शीतल हिमालय को करूँ मौन भी बोल पड़े संयम जब अधैर्य से लडे मन में फूटे थे  संकल्प ऐसे करील वन में फूटता हो जैसे इस संसार में अकेला मैं ही तो नहीं होते हैं अनेक जन जाता हूँ जहाँ कहीं सीख अपनी जब वे  देने लगे, प्रेमरस में अपने जब वे भिगोने लगे अब पहचानूं कैसे रंग अपना संसार यह सच है, या है सपना जब नाम हो गया गुमनाम अपना देने लगा उसे पहचान अपना अब खुद को पहचानता कहाँ  हूँ इसकी वजह से या उसकी वजह से हूँ, जहाँ हूँ मैं था अकेला, मुझे बनना था जो था मैं कौन  कहेगा कि मैं वो हूँ जो था मैं खुद के साथ चलना, और चलना इनके साथ भी रहना होता...

बेटी:अंजली सिंह

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बेटी अंजली सिंह बेटी है   जान   से  प्यारी, मोहक, चंचल और न्यारी। बेटी  है  एक  पवित्र जान्हवी, जिसमें जीवन का सार समाया । अनाथों की भगिनी है बेटी, दीनों     की      है     नाथ ।। हर विपदा  सहने  के   लिए,  बना       तुम्हारा     गात ।। बनिता ,पुत्री ,अनुजा बनकर, रहती         सबके     साथ।। एक घर की  दीपक  बनकर, दूसरे घर के तम को देती मात। इतनी सरल ,सहज बाला , समय कहर से कुट पिट कर,    बन    जाती  है   ज्वाला। हे निर्मल ,सलिला ,इन्दुमुखी, प्यारी बेटी करुणमूर्ति  तुम हो सबकी नाज ।। सुख में, दु:ख में, जग में,      वैभव    की     पहचान,।। कोयल की मीठी तान तुम,  और हर अम्माँ  की जान ।।               रचनाकार        ...

हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था:सुरेन्द्र कुमार पटेल का आलेख

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गांवों का चाल-चलन शहर का अनुगामी होता है परन्तु पिछले कुछ वर्षों से गांवों के चाल-ढाल में अचानक परिवर्तन आ गया है। गांव के लोग अब सब्जियाँ शहर से खरीद कर ले जाते हैं जिसमें लौकी, भिंडी, आलू, प्याज, कद्दू, करेला आदि सब्जियाँ शामिल हैं। सब्जी के  मसाले जैसे लहसुन, धनिया, मिर्च, आदि भी लोग  बाजार से खरीदते हैं। पहले लोग  तिथि-त्योहारों में पकवान आदि बनाने के लिए कुछ खास सामग्री  ही बाजार से खरीदते थे, अब अधिकांश सामग्री बाजार से खरीदी जाती है।  इसे दो तरीकों से देखा जा सकता है। एक तो यह माना जा सकता है कि गांव की क्रय शक्ति में वृद्धि हुई है और गांवों में भी प्रतिव्यक्ति आय बढ़ी है। दूसरा यह कि गाँव पहले की अपेक्षा शहरों पर अधिक निर्भर हो गए हैं। दोनों अंशतः सत्य हैं। यातायात एवं संचार के अभाव में पहले लोगों की आय का स्रोत केवल कृषि थी। अब यातायात की सुविधा के कारण लोग नजदीकी शहरों में  काम करके  भी आय बना लेते हैं। लोगों की निर्भरता अब शहरों एवं बाजारों पर अधिक बढ़ गयी है और इस प्रकार गाँव की अर्थव्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था से सीधे-सीधे जुड़ ...

माॅं से होती दुनिया शुरू है:आर्यन की कविता

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माॅं से होती दुनिया शुरू है आर्यन पटेल  माॅं दुनिया की सबसे पहली गुरू है, माॅं से होती दुनिया शुरू है। माॅं ने मुझको खुश रखने के लिए कई कष्ट झेले हैं, माॅं ने मुझको साथ रखने के लिए कई खेल खेले हैं। माॅं मारती जरूर है पर प्यार भी करती है, माॅं स्कूल भेजती जरूर है पर घर आने का इंतजार भी करती है। माॅं से बड़ा परोपकारी इस विश्व में नहीं है कोई लेकिन बच्चे को डाॅंटने के बाद अकेले में माॅं बहुत रोई। मेरी माॅं त्याग एवं बलिदान करने वाली है मेरी माॅं हर तरफ बाॅटती खुशहाली है। माॅं चलना सिखाती है हमको माॅं प्यार से सहलाती है हमको। माॅं खाना खिलाती है हमको माॅं दुनिया के साथ चलने के काबिल बनाती है हमको। माॅं से सुन्दर, माॅं से प्यारा इस दुनिया में न कोई आया है, न कोई आएगा, अगर हमने माॅं की सेवा न की तो कोई सुख न मिल पाएगा। माॅं से प्यारी, माॅं से न्यारी न कोई अब तक आयी है, आज फिर से माॅं हमेशा की तरह खाने का निवाला खिलायी है। रचना:   आर्यन पटेल, कक्षा-9वीं ख्रिश्ता ज्योति मिशन हायर सेकेंडरी स्कूल  गोदावल रोड ब्यौहारी जिला-शहडोल (मध्यप्रदेश) ...

एक वक्त की रोटी

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एक वक्त की रोटी जीवन के सफर में आज भौतिकवादी इंसान ने समय के साथ-साथ पूरे वायुमंडल में मीठा जहर घोल दिया  है। किसी के पास खाने का वक्त नहीं है, और किसी के पास एक वक्त का खाना नहीं है। लोग कहते हैं सब कुछ बदल गया है । लेकिन सच तो यह है कि लोग बदल गए हैं। आइए इसे इस कहानी से समझें। एक  दिन की बात है  एक अमीर व्यक्ति  की पत्नी रमा  सब्जी लेने गई। वह  सब्जी वाले के पास पहुंचती है। टमाटर उठा कर बोली,"टमाटर क्या भाव दिए ?"  गरीब सब्जीवाला धीरे से बोलता है, "ले लो दीदी, 20 का एक किलो है"  रमा   बोली-"15 लगाओ और आधा किलो दे दो"  सब्जी वाला -"नहीं दीदी, नहीं पड़ेगा"     रमा  -"क्यों नहीं पड़ेगा?"  सब्जी वाला-"महंगाई ज्यादा है ,नहीं पड़ेगा।" रमा  -"अरे! तुम्हारे घर की सब्जी है। क्यों नहीं पड़ेगा?"  सब्जी वाला -"बच्चे भूखे रह जाएंगे दीदी !"                  रमा  ने आधा किलो टमाटर तौलने के लिए कहा  और उसने  सब्जीवाले को...

जब हम लाश हो गए

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जब हम लाश हो गए सुरेन्द्र कुमार पटेल थोड़ी सी पाई जिंदगी और उदास हो गए? हम पैदा हुए तो कब? जब हम लाश हो गए। लाशों की बहुत जरूरत है जिंदा थे तो कोई पूछता न था अपने बेटों को भी याद आई तो कब? जब हम लाश हो गए। हम सोते भी रहे, हम रोते भी रहे खबरनबीशों की आंखों में रही पट्टी अखबारों ने भी छापे तो कब? जब हम लाश हो गए। वो कुत्ता भी सरकारी महकमे की तरह इंतजार में था आया भी सूँघने तो कब? जब हम लाश हो गए। लुटती रही यूपी में आबरू बचे रहे तो बचना मुश्किल था लोगों को फुर्सत भी मिली तो कब? जब हम लाश हो गए। गिड़गिड़ाती रही मैं बेटी बन हिफाजत के लिए कानून के सामने तुम्हारा न्याय भी आया तो कब? जब हम लाश हो गए। बहुत बुरे थे हम बुझा रहा दुश्मनों का चिराग उजाला भी हुआ उनके घर तो कब? जब हम लाश हो गए। मुनासिब नहीं था चुनाव जीतना जिन्दा रहती इंसानियत अगर वो कुर्सी पर चढ़े भी तो कब? जब हम लाश हो गए। मैंने पूछा ये बोलता क्यों नहीं है गूँगा, बहरा, लचर समाज अरे! तूने बोलना भी सीखा तो कब? जब हम लाश हो गए। पिता होने के दम्भ में डाँटा तुमने साक्ष...

ऐसा भ्रम तुम नहीं पालो:सुरेन्द्र कुमार पटेल

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ऐसा भ्रम तुम नहीं पालो सुरेन्द्र कुमार पटेल   आया था जो वो  पल , वो पल  तुम सम्हालो आएगा फिर से वो पल  ऐसा भ्रम तुम नहीं पालो है  अँधेरा जो मन का  वो अँधेरा तुम हटा लो  फिर से जल उठेगा दीया  ऐसा भ्रम तुम नहीं पालो तुमने मुझको बुलाया है  जैसे  ऐसे किसी को फिर  बुला लो  दौड़ा आएगा कोई तुम तक  ऐसा भ्रम तुम नहीं पालो  सुनाई थी जो मजबूरी मुझको  जरा तुम  इसको भी सुना लो  मरहम लगा देगा कोई  ऐसा भ्रम तुम नहीं पालो पूजा करो तुम चाहे जितनी  चाहे जितना  अश्क  बहा लो  जीवन संवारेगा कोई और  ऐसा भ्रम तुम  नहीं पालो  तुम माँझी बनाओ खुद को  खुद ही राह बना डालो  तुम्हारे रोने पर न हँसे जमाना  ऐसा भ्रम तुम नहीं पालो रचना : सुरेन्द्र कुमार पटेल   [इस ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया  यहाँ क्लिक...