रविवार, सितंबर 29, 2019

बड़का बाँध

बड़का बाँध:
श्यामू फफक-फफक रो रहा है। उसे  सारा संसार असार मालूम पड़ता है। छाती में असह्य शूल उठता  है। एक हाथ माथे पर है और दूसरा छाती को सम्हाले है। वह सोचता है उघरे बदन पर आज गाज ही क्यों नहीं गिर गया, कम से कम यह शूल तो नहीं सहना पड़ता। यह धरती फट जाती तो वह इसमें समा जाता। वह  जब दहाड़ मारकर रोता है तो  आँँसुओं की धार बह निकलती  है फिर वह खुद ही आँँसुओं की धार को पोछ लेता है। जिधर नजर दौड़ाता है वही काट खाने को दौड़ रहा है। अभी-अभी चिता को मुखाग्नि देकर सब कुछ खोने के बाद भी उसे  लग रहा है कि कुछ ऐसा हो जाएगा जिससे उसका बेेटा उसके सामने खड़ा हो जाएगा। उसके कान सड़क की ओर तक रहे हैं कि हमेशा की तरह उसके बेटे के आने की पदचाप उसे सुनाई दे देगी। लेकिन विधाता तो अपना खेल खेल चुका था। जो कुछ सहना है अब उसे ही सहना है। बराबर का बेटा  इस दुनिया में नहीं रहा।

उधर बूढ़ी माॅं का रो-रोकर  बुरा हाल  है। क्या यही दिन देखने के लिए वह जीवित रही। इस जीवन में न जाने कितनी बार वह  बीमार पड़ी। भगवान ने तभी उसको क्यों नहीं पूछ लिया। अब तो शरीर में इतनी जी भी नहीं रही कि वह दहाड़ मारकर रो सके। जिधर नजर दौड़ाती उसे अपना बेटा खड़ा दिखाई देता, परन्तु वह नहीं होता। उसकी आँखें हर कोने की तरफ देखती  जिधर कभी उसका बेेटा था। उस चारपाई को देखती जिसमें वह  हर रोज बैठकर  जूते का फीता बांधता और चलते वक्त कहता, ‘‘अम्माॅं जाता हूँ ।’’ उसके पीछे-पीछे अम्माॅं भी चली जाती और जहाॅं तक वह दिखाई देता देखती रहती और  यह कहना नहीं भूलती, ‘‘बेटा, गाड़ी ठीक से चलाना।’’  हर रोज की तरह उसने उस रोज भी दुआ की थी कि बेटा सही वक्त पर घर लौट आए। परन्तु आज वह नहीं लौटा" 

श्याम किशोर को लोग श्यामू कहा करते थे। श्यामू एक गरीब किसान था। कहने को वह खेती करता परन्तु केवल खेती के भरोसे सालभर का गुजारा नहीं चलता। तीन-चार बेटियों का ब्याह वह खेती के भरोसे नहीं कर लिया। वह गाड़ी चलाना नहीं सीखा होता तो निरा मजदूरी करनी पड़ती। खेती के टाइम पर खेती करा देता, बचे हुए समय में मालिक की गाड़ी चला लेता जिससे हुई आमदनी से घर खर्चा चल जाता। बेटियों का ब्याह बहुत अच्छे घर में तो नहीं कर सका परन्तु किसी लोक-लाज का सामना नहीं करना पड़ा, यही उसके लिए सबसे बड़ी बात थी। संतान के रूप में यह बेटा आखिरी था। वह यह  क्या जानता था कि जिस मोटरगाड़ी के काम ने उसके  जीवन को सहारा दिया उसी  मोटरगाड़ी का  काम उसके बेटे की जीवनलीला समाप्त कर देगा।

चारों तरफ सिर्फ विलखने की ही आवाज  है। उसकी तीनों लड़कियाँ भी आई हुई हैं। तीनों दहाड़ मारकर रो रही हैं। आज के बाद वह किसकी कलाई पर राखी बाँधेंगी। किसको भाई कहकर बुलाएंगी। सभी की आत्मा चीख-चीखकर बस यही कह रही हैं  कि उनमें  से कोई क्यों नहीं मर गया। किसी के पैरों में जान नहीं है। पग भर भी चलने की हिम्मत नहीं  है।रो-रोकर सब अधमरी हो चुकी हैं। घर के पिछवाड़े बाप दहाड़ मारकर रो रहा है। घर की परछी में ये चारों दहाड़ मारकर रो रही हैं। 
...और इधर बिरादरी के लोग जमा हैं। घर के सामने चुरुल का एक वृक्ष है। उसी की छांव में सब बैठे हैं। दुर्घटना कैसे हुई? इसी का पोस्टमार्टम चल रहा है। कोई बूढ़े को कोस रहा है। कोई समय को। क्या जरूरत थी, लड़के को ड्राइवरी लाइन में भेजने की। अपना गया इस लाइन में तो गया, बेटे को तो नहीं भेजता। कुछ गरीबी को कोसते। क्या करता बेचारा। उसे जो सरल लगा, उसने वही किया। इसमें उसका क्या दोष? इतनी गाड़ियां चलती हैं। इतने लोग ड्राइवरी करते हैं। सबके साथ तो दुर्घटना नहीं हो जाती। उसका समय ही खराब था।
इतने में बातचीत को चीरते हुए एक वृद्ध ने  सवाल किया-
''आश-बुलौवा हुआ कि नहीं?'' 
परंतु किसी ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। कुछ देर के लिए वृद्ध भी चुप रहा। आज दुःख की बात थी, इसलिए वह जोर नहीं दे सकता था। 
" कौन कहे, वह तो दहाड़ मारकर रो रहा है।"
एक अधेड़ ने वृद्ध के सवाल पर एक और सवाल किया।
"कोई कहे भी तो कैसे? पता भी तो हो कि भीतर इन्तजाम ठीक है कि नहीं।" दूसरे अधेड़ ने वृद्ध की तरफ देखकर कहा। वृद्ध चुप ही रहा। अनुभव इसी को कहते हैं। वृद्ध उस बूढ़े के साथ घटित हृदय विदारक घटना के दुःख की मात्रा जानता था। वह बात शुरू करे तो कैसे करे,इसी उधेड़बुन में वह चुप था।...लेकिन चुप रहने से काम बनने वाला नहीं था। श्यामू के  बड़े दामाद का  बुलावा हुआ।
"बेटा, जो होना था, सो तो हो गया। अब गया, वापस नहीं लौटेगा।...देर ज्यादा हो रही है। बिरादरी के लोगों का आश-बुलौवा हो जाता तो महिलाएं खाना-पीना बनाने में लग जातीं।" 
वृद्ध ने  समझाइश दी।
बड़े दामाद की आंखों से अश्रुधार बह निकली। कुछ जवाब न दिया। ...अश्रुधार पोछने लगा तो रुंधा गला अचानक फट गया. दहाड़ मारकर रोने लगा," मैं कैसे कहूँ, मेरा तो सब कुछ लुट गया। इस घर में आने का मेरा सहारा उठ गया।
कुछ देर तक सिर्फ बड़े दामाद के विलखने की आवाज सुनाई दी।

"जाओ बेटा, ससुर जी को कहो. बिरादरी में आश-बुलौवा कह दें. उसका इस संसार में इतना दिन ही लिखा था लेकिन कम से कम उसका परलोक तो न बिगड़े."  वृद्ध ने जोर देकर कहा.
"हाँ, भाई। इस संसार में जिसके साथ जो कुछ होता है उसी को सहन करना पड़ता है, परन्तु जो लोकाचार है वह तो करना ही पड़ता है। ज्यादा देर न करें। आश-बुलौवा कह दें।"
उस वृद्ध से कम उम्र के आदमी ने समर्थन किया।

बड़े दामाद जी को भीतर की हालत मालूम थी लेकिन पहल उसे ही  करनी होगी. बड़े दामाद ने जिम्मेदारी पूरी की. वह ससुर साहब के सामने जाकर सिर झुकाकर  खड़ा हो गया।

जिम्मेदारी इंसान को समझदार बना देती है। वह श्यामू के पास जाकर वृद्ध का सन्देश कहने की हिम्मत जुटा रहा था। श्यामू के पास पहुंचा तो श्यामू और दहाड़ मारकर रोने लगा।  बड़े दामाद ने सांत्वना देते हुए धीरे से कहा-“ पिताजी, वो बिरादरी को खाने के लिए आश-बुलौवा कह देते तो ठीक था महिलाएं खाना बनाने में लग जाती। काफी देर हो चुकी है

“दामादजी,अपनी  सासू से पूछ लो भीतर की हालत वही जानती होगी’’

दामाद ने भीतर का जायजा लिया। सब्जियाँ घर में बीते सप्ताह से ही नहीं थीं इस साल खेत में दाल की उपज भी नहीं हुयी थी। बीच-बीच में बेटा  खरीदकर ले आता था जिससे काम चलता थाआटा भी न के बराबर था। भोजन सामग्री के नाम पर था तो मात्र चावल वह भी आज को तो हो जाए लेकिन अगले दिन के कर्म के लिए नहीं होगा। बिना आटे के तो आज काम चल जाएगा परन्तु दाल और सब्जी तो चाहिए ही फिर तेरहवीं  तक चार आदमी बने ही रहेंगे उतने दिनों का इंतजाम करना  पड़ेगा एक दिन के अंतर में हाड़-फूल ले जाने का भी इंतजाम करना पड़ेगा पैसों का जायजा लिया तो पता लगा बीते महीने तक का पगार सेठ दे चुका है बाकी है तो केवल इस महीने का। लेकिन घर में जमा पूँजी कुछ नहीं है घर में जमा पूंजी के नाम पर उसी के जेब से निकले 100-100 के दो नोट थे 

दामाद ने अपना जेब टटोलकर देखा 50-50 के दो नोट थे इतने से कुछ नहीं होने वाला। 

श्यामू को कुछ बताता उसके पहले ही श्यामू, दामाद के चेहरे से अपने घर की हालत भाँप गयाबराबर का बेटा मरा है उसके इस दुःख की तुलना  संसार के किसी दुःख से नहीं की जा सकतीपरन्तु रिवाजों को किसी दुख से कोई लेना-देना नहीं है उसे तो  निभाना ही पड़ेगा। मृत पुत्र के दहाड़ मारकर रोते बाप का विलखना सिसकियों में बदल गया

बेटे ने जबसे गृहस्थी सम्हाली थी, तबसे श्यामू घर-गृहस्थी की एक बात नहीं जानता वही बेटा  जो ले आता उससे घर चलता था। फिर आज तो पहला दिन है। तेरहवीं तक का इंतजाम करना होगा घर में खाने के नाम पर चावल के सिवा कुछ नहीं था फिर चावलभर  से क्या होता है दोना-पत्तल भी चाहिए ब्राह्मण भोज और महापात्र भोज के लिए भी सामग्री चाहिए कम से कम एक साल की खानगी तो महापात्र को देनी होगी तमाम खर्चों का लेखा-जोखा 50 हजार से कम नहीं बैठता था। 50 हजार तो फिर भी बड़ी रकम थी 5 हजार भी होता तो भी इस बूढ़े के लिए इस जन्म में कमाकर इतनी बड़ी धनराशि जुटा पाना संभव नहीं था फिर अभी एक साल पहले हुए  बेटी  की शादी का कितनों ही दुकानों में रकम जमा करना बाकी है बेटे ने जिम्मेदारी ले ली थी इसीलिये सेठ-साहूकार कुछ नहीं बोलते थे वह जानते थे सूद जमा जरने की पूंजी बूढ़े के पास है...लेकिन उसके इस पूंजी के डूबने के चार दिन बाद ही सेठ-साहूकार घर गेरने लगेंगे वह किस-किसको जवाब देगा 

बिरादरी की जो महिलाएं घाट से सीधे उसके घर आ गयीं थीं, वह अब अपने घरों की ओर  जाने के लिए फुसफुसाने लगीं आखिर बेचारी क्या करतीं, उन्हें अभी तक आश-बुलौवा भी नहीं हुआ था कि सीधे-सीधे उसके किचन में घुस जाएँ और काम में लग जाएँ श्यामू  यह सब देख और सुन रहा थातभी एक वृद्ध ने आवाज दी
“श्यामू! यह  महिलाएं अपने घर जा रही हैं अपने-अपने घर में चूल्हा चौका करने लगीं तो तुम्हारे घर में चूल्हा नहीं जलेगा आश-बुलौवा कर दो तो काम में लग जाएँ

समय कितना निष्ठुर होता है, आज किस हिम्मत से उसके मुंह में कौर जायेगा, फिर भी बिरादरी के लिए उसे वह सब करना पड़ेगा जो लोग आज  तक करते चले आयें हैं
श्यामू ने वृद्ध को संबोधित किया-
“काकू! रमा प्रसाद के सहयोग के बिना कर्म न होगा
“क्या? आज का भी न होगा?”
“चावल तो हो जाए, पर दाल-सब्जी की व्यवस्था न होगी फिर आगे भी तो पैसे ही लगने है
“तो वह क्या उधार देगा?”
“वह उधार क्यों देगा? बड़का बांध बेचूंगा!” 
श्यामू के मन में उपाय कौंधा  श्यामू के पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं था
बड़का बाँध श्यामू की पैतृक जमीन है एक मात्र ऐसी जमीन जिस पर धान की खेती होती है जिसके भरोसे सालभर खाने को चावल हो जाता है। रमा प्रसाद की नजर हमेशा से उस खेत पर थी । वह काफी दिनों से इस प्रयास में था कि वह खेत उसे मिल जाए बडका बाँध, केवल कहने को बड़का बाँध नहीं है, उसमें  बडप्पन भी है थोड़ी भी बारिश जो जाए तो उसमें धान की इतनी फसल तो हो ही जाती कि चावल के लिए परिवार को मोहताज न होना पड़ता

रमा प्रसाद  की तो जैसे बांछे खिल गयी रमा प्रसाद कोई गैर न था, परन्तु जमीन बनाने के मामले में वह एक नंबर का धूर्त और कपटी था श्यामू की गरज भांपकर बोला- “इस समय मेरा भी वक़्त अच्छा  नहीं चल रहा काकू चाहें तो किसी और से सौदा कर ले। जब बेटी की शादी की थी तभी दे दिए होते तो ले भी लेता और तब शायद आज ऐसा दिन भी न देखना  पड़ता। कर्ज उतारने में ही बेटे को अपने प्राण गंवाने पड़े।"

श्यामू  के हृदय में जो शूल उठा, उसे उसने आज के पहले कभी महसूस नहीं किया था रमाप्रसाद पहले भी बड़का बाँध का मोल-भाव कर चुका था पर काकी (श्यामू की पत्नी) ने भांजी मार दी थी। बड़का बाँध बेचने न दिया। वह कहती भगवान की दया से बराबर  का लड़का है कर्जा तो फिर भी एक न एक दिन छूट जायेगा परन्तु जमीन बनाये न बनेगी उसी ने बड़का बाँध बेचने न दिया था पर आज वह क्या कहेगी? आज जो कर्जा चढ़ेगा उसे कौन चुकता करेगा, और मरने के दिन आए बूढ़े-बुढ़ियों पर किस मुंह से कोई भरोसा करेगा?

शादी-विवाह ख़ुशी का काम है उसमें जितना खर्चा करना हो, करो न करना हो तो मना करा दोलोग चार बात कहेंगे पर लांछन न लगायेंगे परन्तु, मरनी के क्रियाकर्म में वैसी बात नहीं होती। दूसरे न भी कहें तो परलोक के डर से  सब करना पड़ता है  श्यामू मन ही मन सोच रहा था कि  रमा प्रसाद ने एक ताना और जड़ दिया,
“काकू, काकी से पहले ही पूछ लेना मोलभाव के बाद मुकरना ठीक नहीं रहता
“रमा प्रसाद! काकी अब किसके भरोसे मना करेगी ?मोलभाव कर लो मुझे तो पिछला मोलभाव मंजूर है
“काकू, मैं आज उस कीमत पर लेने से रहा मेरे सिर भी कर्जा कम नहीं है उसके आधे दाम पर बात बनती हो तो बताओ। मेरी गरज नहीं पड़ी है बाँध लेने की
श्यामू दांत पीसकर रह गया। उसे यह बाँध हिस्से में ऐसे ही नहीं मिला  था निरा बगार मिला थापरन्तु एक-एक जून का अपने बाल-बच्चों का पेट काटकर उसने जो बचत की थी, उसी से मेड डलवाया था तब जाकर कहीं वह बड़का बाँध बना था। वह उस बाँध से उतना ही प्रेम करता था जितना अपने बेटे से। उसका बेटा उसके बुढ़ापे का सहारा था तो यह बड़का बाँध भी उसका कमाऊ बेटा ही था। इसी के चलते उसके परिवार को कभी भूखे पेट नहीं सोना पड़ा। आज उसके एक नहीं दो-दो बेटे उसके हाथ से निकल गए पर वह क्या कर सकता था ज्यादा मोल-भाव का वक़्त नहीं था। बेटा जीवित होता तो उसे आज यह दिन न देखना पड़ता। 

चार जनों के बीच बात हो गयी परन्तु रमा प्रसाद कहा सुनी को  नहीं मानता उसने पिछले मोलभाव का हवाला दिया कौन कब पलट जाए, आजकल भरोसा नहीं। श्यामू के नाम का स्टाम्प पेपर आया घर-बिरादरी के चार लोग जमा हुए, कुछ श्यामू के तरफ से गवाह हुए कुछ रामप्रसाद की तरफ से स्टाम्प पेपर में श्यामू के अंगूठे के निशान ले लिए गये

दामाद बाबू के   भी संकट दूर हो गये । दामाद बाबू बाजार से सामान लाने चले गये बिरादरी के ही एक वृद्ध को आश-बुलौवा की जिम्मेदारी सौंप दी गयी। बिरादरी की अपने  घर गई महिलाएं नए कपड़ों में फिर उसी आँगन में भोज तैयार करने पहुँच गयीं रमा प्रसाद की पत्नी कुछ अधिक ही सजी-धजी रही उसके घर में जैसे उत्सव छा गया हो एक साल पहले वही बाँध लेते तो आज से दोगुनी कीमत में मिलता  आज आधी कीमत में मिल गया ऊपर से औरतों के बीच इस बात का एहसान जताने का मौका भी मिल गया कि उसके आदमी ने आज ऐन वक़्त पर बड़का बाँध खरीद न लिया होता तो श्यामू के  बेटे का कर्म नहीं होता श्यामू के सिर कलंक रह जाता 

भोज में किसी किस्म की कोई कमी न रही जहाँ चार सौ पत्तलों की जरूरत थी, वहां पांच सौ पत्तल लाए गये एकाध सब्जी से भी काम चल जाता परन्तु दो-तीन सब्जी और दाल बनवाई गईभोज में सभी आए।  न आते तो मृतक का परलोक बिगड़ जाता मृतक का कर्म है सो खाने जायेंगे, ख़ुशी का होता तो चाहे न जाते तेरहवीं तक घर में लोगों का ताँता लगा रहा खूब दान-पुन्य किये गये बाम्हनों को भी खूब खिलाया गया महापात्र को साल भरका राशन दिया गया और वो सब बर्तन दिए गये जिसका उपयोग जीते जी श्यामू का  बेटा करता

समाज के लोग आते उसके दुःख में शामिल होते वह हाथ जोडकर अभिवादन करता। सभी को पता था कि उसका एक बेटा मरा है। उसने एक ही चिता को मुखाग्नि दी है। परन्तु  जिन हाथों से उसने अपने बेटे की चिता को मुखाग्नि दी थी उसी हाथ में बड़का बाँध को बेचने के लिए स्टाम्प में लगाये गये अंगूठे के स्याही के निशान भी थे। वह निशान चीख-चीखकर  कह रहे थे कि  यह कर्म उसके एक नहीं दो-दो बेटों का है! परन्तु शायद ही किसी ने उनकी यह बात सुनी हो!
रचना:सुरेन्द्र कुमार पटेल 
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6 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Nice

सुरेन्द्र कुमार पटेल ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद प्रदीप जी।

ARV Patel ने कहा…

बहुत सुंदर लगा आपकी यह कहानी।

सुरेन्द्र कुमार पटेल ने कहा…

बहुत-बहूत धन्यवाद आपका।

सुरेन्द्र कुमार पटेल ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद आपका।

अखिलेश कुमार पटेल ने कहा…

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