शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

मुक्तक

मुक्तक 

शोषण के ज़हर से
कुंडलनी और ग्रंथियाँ
सूख चुकी हैं
उनमें न रंध्रों के रिसाव हैं
और न ही जीवन के लिए झुकाव।
एक आदमी धोखा देता है
एक आदमी धोखा खाता है
एक आदमी और है
जो धोखे को चाव से उपजाता है
यही उसका परम साध्य है।
कहाँ गए घिसपिटू?
जो अत्याचार निरोधक गोलियाँ और चूर्ण
बड़े मज़े से बेचते हैं
देश की गरीबी उन्हें नहीं दिखती?
शिक्षा में लगा दीमक उन्हें दिखाई नहीं देता
इन्हें चाहिए केवल हिंसा-हिंसा-हिंसा।
रे मलधारी!
विषधारी!
क्यों उचारता है अहंकार की पोथी
नहीं पढ़ी क्या मानवता के पाठ
क्या घुन लग गया तेरी बुद्धि को?
तेरे शोषण की कोख में क्यों पलती हैं गालियाँ।
शोषण की तिजोरी में
खून और हिंसा की लपट ही पूँजी है
जीवन कटी पतंग की तरह
तिलमिला रहा है।
गरीबी के पेट में
शोषण के चाबुक की चोट है
गोल-गुम्बद की तरह
हम सत्ताधारियों के ही वोट हैं
गिने जाते हैं केवल पॉपुलेशन-रजिस्टर में
थमा दी जाती है हवा से बनी चूर्ण।
शोषण की चोट को
एक आदमी झेलता है
एक आदमी रेलता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो केवल अपनी फटी विवशता को सीता है
ये तीनों आदमी कौन हैं
मेरी भाषा मौन है
अरे! ये तो किसान, साहूकार और मज़दूर हैं।
मैं पूछता हूँ कि
क्यों नहीं जुगाड़ है
रोटी का मेरे देश में
क्यों बिलबिलाते हैं लोग
क्यों रोकर नसें सुखा रहे हैं
अपने अस्थिपंजर की।
इस प्रजातंत्र की पट्टी में
धोखे की लिट्टी है
बाँचते हैं अंधभक्त
बिना चोखे के ही
जो फिरंगियों के ही
वंशज हैं।
मैं पूछता हूँ
क्यों चुप है जनता
क्यों नहीं फूँकती
शोषणधारी कुर्सियों को।
क्यों निर्धनता की कोख में
भूख तीखी होती है
सूझती क्यों नहीं
जीवन की बारहखड़ी
ए.बी.सी. की टूटी पगडंडी में
ज़ेड बड़ी दूर है।
जनाब! पेट रोटी माँगता है
पेट के छेद में भूख रोती है
चाहे घुन शोषण की हो
या टोपीधारियों की
जोंक की तरह ये बम्बूधारी हो गए हैं।
मैं नहीं उगाता
अपनी कला के खेत में
शृंगार के दानों से अंकुरित
वासना की गंध।
शोषण के इस भूगोल में
गरीबी की जलवायु
उष्ण-सी हो गई है
क्यों कोई विवशता के मरुस्थल में
समानता के छायादार पेड़ नहीं लगाता।
भूख उपजाती है विद्रोह
और लाचारी
अब आशा की किरणें
धूमिल-सी पड़ गई हैं।
सत्ताधारी क्यों खेलते हैं
'बूझो तो जानें'
क्यों हाथ को पाँव
और पाँव को हाथ कहते हैं
क्यों निर्लज्जता की रेखाओं से
शोषण के भद्दे चित्र खींचते हैं।
मुर्दों की मशीन में
चिपके प्राण बोल रहे हैं
वे आज थोथे प्रजातंत्र की
पोल खोल रहे हैं
खोज रहे हैं सलीके की पगडंडी में
बुदबुदाते पानी के छींटे।
लोथ के चीथड़ों...
और मुर्दास्थलों की चिकचिकाती चिंगारियाँ
किसी रक्त-मानव ने दिए हैं
ये घाव...
हे संपोषक! शोषण को पहनाएगा सूती कफ़न क्या?
पानी की परतों में
निर्लज्जता के पेट फूल गए हैं
मन में चढ़ाया जाने वाला
आधुनिकता का घोल
बिल्कुल लाल लिटमस की तरह
पीला हो गया है।
पढ़ता हूँ मौन की भाषा
गरीबी के उखड़े शब्द
शोषण के पीड़ादायी संयुक्ताक्षर।
हाँ, तिलमिलाती अभिव्यक्ति के कोटर में
रक्तरंजित घाव फूट पड़े हैं
और नव-मानव के प्रतिस्थापन में
जैसे अक्षर से बने शब्द और शब्द से बने वाक्य चकमक हो गए हैं।
कुछ शेर हाथी हैं
और कुछ हाथी शेर नहीं हैं वाली
कहावतें छोड़िए
अ से आम नहीं
अधिकार माँगिए।
न जाने क्यों गरीबी की छुअन
इतनी तीखी है
कि भूख तिलमिल है;
मन के छेद से
नाभि की दूरी कितनी है।
क से कबूतर...
और ख से खरगोश...
पढ़ने पर ठीक है**
यदि ग से गाली पढ़ें
तो प्रलय की संभावना तीव्र होती है***
जो पेट पर लात मारते हैं
उन्हें गाली की भाषा ज़्यादा पोषण देती है।
चोट पत्थर की हो... या...**
जिह्वा की...**
दोनों दुधारी होते हैं...
इनकी धार से रक्त के लाल रंग नहीं
चित्तीदार डर बहते हैं
शोषण की पट्टिकाओं में किसी ने
पसीने की ओस को रौंदा है...
और दी हैं गंदी गालियाँ...
छीनी हैं साड़ियाँ...
लूटी है आबरू...
और फुलाया है दुर्गंधित मन को।

रचनाकार:
रजनीश कुमार जायसवाल
ग्राम+ पोस्ट : झारा, तहसील : सरई
जिला : सिंगरौली (म०प्र०)
[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर email करें।]

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