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दिसंबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नए वर्ष के शुभ बेला पर:राम सहोदर पटेल

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नए वर्ष के शुभ बेला पर स्वीकार मुबारक हो मेरा। शुभकामनाओं का भाव सदा आप सभी को हो मेरा।। करबद्ध निवेदन मेरा सबसे एकजुटता हो, संगठित बने। उत्कर्ष समाज का करने को संकल्पित और सत्य निष्ठ बने।। अज्ञानता का करें सर्वनाश पराधीनता से दूर रहें। स्वार्थपरता भाव तुच्छ है इस विचार से दूर रहें।। जितने जयचंद समाज में हों, उन्हें समाज रहस्य सिखलाना है। वैमनस्य का भाव त्याग कर समाज को सभ्य बनाना है।। बीती पराजय से निराश न हों सीख समझिए आगामी को। सीख हार से ही मिलती है जब मिलता धक्का खाने को।। संगठित बनो, मत एक रखो आन बान से जीने को। समाज नीति मजबूत करो अब समय नहीं है खोने को।। समय दुहाई देता तुमको, अधिकार करो समाज नीति पर। रखो सहोदर भाव सभी से, और जलवा खींचो कूटनीति पर।।  साल 2019 की शुभ विदाई। साल 2020 की करें अगुआई। इस अवसर पर सहृदय, सभी प्रिय स्वजनों को, मंगलमय भविष्य के लिए, मुबारकबाद एवं बारम्बार बधाई। रचनाकार : राम सहोदर पटेल,एम.ए.(हिन्दी,इतिहास) स.शिक्षक, शासकीय हाई स्कूल नगनौड़ी  गृह निवास-सनौसी, थाना-ब्योहारी जिला शहडोल(मध्यप्रदेश)...

नया साल: धर्मेंद्र कुमार पटेल

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💐💐नया साल💐💐 आया आया देखो आया, देखो कैसे रंग है लाया। 365 दिन और 12 महीने, जीवन में हम ऐसे ही गिनें।। पहला रंग जनवरी का महीना, जिसमें धूम होगी संक्रांति का। गणतंत्र दिवस का महापर्व भारत दिखता  दुनिया का स्वर्ग।। दूसरी रंग फरवरी का महीना, छाई होगी चहुं बसंत बहार। शिव की होगी आराधना । प्रकृति की अनुपम उपहार।। तीसरा रंग मार्च का महीना, होली की रंगों से सराबोर। दुनिया दिखती रंग बिरंगी, नाचें गाएं हो भाव विभोर।। चौथे रंग में अप्रैल का महीना, पहला दिन है फूल का। जब आए महुआ और बैसाखी, गर्मी के दिनों की हुई सुरुआती।। पांचवां रंग म‌ई का  महीना, गर्मी से बहने लगे पसीना। लू चले धधक धधक कर, आम के फल गिरें टपक टपक कर।। छठवां रंग जून का महीना, गर्मी ने कर दिया मुश्किल है जीना। बादल छाने लगे चारों ओर से, तूफान चलने लगे बड़े जोरों से।। सातवां रंग जुलाई का महीना, चलो बच्चों स्कूल है जाना। किसान भाई करें किसानी, खेतों में भर गया है पानी।। आठवां रंग अगस्त का महीना, सावन का मौसम बड़ा सुहाना। स्वतंत्रता दिवस की होती है धूम, राखी बिन भाई की कलाई र...

काल पढ़े सो आज पढ़: शिवम की दो कविताएं

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1. काल पढ़े सो आज पढ़: शिवम काल पढ़े सो आज पढ़,  आज पढ़े सो अब। फीस डबल हो जाएगी,  फिर पढ़ेगा कब। स्कूल में सुमिरन सब करें,  घर में करे न कोय। जो घर में सुमिरन करे,  तो फेल काहे को होय। पहली घंटी गई,  आने में हो गई देर। गेट आउट सुन चुप रहे,  देख समय का फेर। पोथी पढ़-पढ़ जग हुआ, पास भया न कोय। दिन में कुंजी पढ़े, पास तुरन्तै होय। एक भरोसा एक बल, एक आस विश्वास । मन से करो पढ़ाई, होंगे फर्स्ट डिवीजन पास ।। 2. जीतना है अगर तुझे जीतना है अगर तुझे,  विश्वास कायम रख। हार कर भी जीत,  प्रयास कायम रख।। मजबूत कर तू सोच को,  उससे तय होगा रास्ता। जहाॅ जाना चाहता है तू,  जहाॅ जाने का तेरा वास्ता ।। हो जा तू सावधान अब,  छाया है घोर तम । अधीन न होना कभी,  पथ है तेरा निर्मम ।। अगर सोच तेरी जीत है,  शुभ होगा तेरा परिणाम। गिरेगा तू तुझे उठना है,  यही है तेरा इम्तिहान ।। आगे बढ़े जो मिटा के तम, वही तो है महान । जीत पास मे खड़ी, करने तेरा सम्मान ।। रूकने न पाये ये बढ़ते कदम, जब तक...

प्रकाशन सूचना (आग्रह)

प्रिय महानुभाव,       साहित्य और शिक्षा का समाज से घनिष्ट सम्बन्ध रहा है. साहित्य समाज का दर्पण तो है ही. साहित्य व्यक्ति की अन्तर्निहित अभिव्यक्ति को मूर्त रूप देने का एक सहज माध्यम भी है. हमारे मध्य बहुत से  मूर्धन्य व्यक्ति हैं जिनमें साहित्यिक प्रतिभा है.ऐसी मूर्धन्य प्रतिभाओं की रचनाएं एक प्लेटफोर्म पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से  एक सूक्ष्म प्रयास किया जा रहा है, विगत कुछ महीनों से "आपस की बात सुनें" नाम से एक साहित्यिक ब्लॉग/ पोर्टल का संचालन किया जा रहा है. जिसमें क्षेत्र के नौनिहालों/ युवाओं और प्रबुद्धजनों की रचनाएं प्रकाशित की जा रही हैं. यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि आज हर व्यक्ति के हाथ में इन्टरनेट सुविधा युक्त मोबाइल हैंडसेट उपलब्ध है. ऐसे में इन्टरनेट पर अच्छी सामग्री उपलब्ध कराना और लोगों को रचनात्मकता की ओर उन्मुख करना हम सबकी जिम्मेदारी है.          आपसे अनुरोध है कि अपने भीतर के  साहित्यिक रुझान को बनाये रखें तथा आपकी मौलिक साहित्यिक  रचनाएँ व्हात्सप्प अथवा ईमेल के माध्यम से हमें भेजें. सम्पादन पश्च...

प्रतिभा खोज परीक्षा:आर्यन पटेल

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झाॅंपर उत्कर्ष युवक मण्डल समिति द्वारा आयोजित प्रतिभा खोज परीक्षा पर प्रस्तुत है आर्यन की ये पंक्तियाँ- प्रतिभा खोज परीक्षा आर्यन पटेल  झाॅंपर उत्कर्ष युवक मण्डल समिति, इसमें नहीं है कोई सोची समझी राजनीति। आइए दोेस्तो भर दीजिए इस परीक्षा के आवेदन को,  तो कृपया मान लीजिए अपने स्वजातीय साथियों एवं वंदनीय महिलाओं सहित पधारने के निवेदन को । विनम्र भाषण, जवाबदेही,सत्यनिष्ठा, कार्यनीति, सहयोग  समग्रता, प्रोत्साहन, समर्पण, पारदर्शिता अनुशासन है, उत्कर्ष होने के लिए ये दस सिंहासन है। झाॅंपर प्रतिभा खोज परीक्षा पाॅच स्तरों में विभाजित है, समिति  पूरी कोशिश कर रहा है कि भेदभाव न हो क्योंकि अच्छाई अपराजित है। हमें मिला यह एक उत्कर्ष पंचांग है, यह सुनहरे भारत की ओर एक लंबी छलांग है। साथ ही हमें मिला यह निमंत्रण पत्र है,  आगे चलकर इस परीक्षा को देने वाला हर परीक्षार्थी चमकेगा जैसे कोई नक्षत्र है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए हमें मिला यह पाठ्यक्रम, 27 दिसम्बर 2019 तारीख को होगा यह प्रतिभा खोज की परीक्षा का कार्यक्रम। प्रत्येक स्तर के लिए परी...

गुरूर छोड़ दो कि हम पालतू हैं: सुरेन्द्र कुमार पटेल

गुरूर छोड़ दो कि हम पालतू हैं! वह चाहता नहीं था, समंदर सुखाना ये बात तुम्हें पता है, मुझे पता है। गिरे तो ठहरे उसके ही अंक में पानी, इसीलिए सैकड़ों फ़ीट ऊपर उछालता है। उसे कहो, अंक में हो पानी तो बादल बनने की चाहत रखे, सबमें बादल बनने का हुनर आता नहीं है, गर्मी हो तो चढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं, सबको सलीके से उतरना  आता नहीं है। गुनाह किसका कहें हम, जिसने आग बांटी, या उसका जो जलती आग में घी डालता है। उन दोनों को नहीं समझा वो आम आदमी, जो अपना घर अपने ही हाथों उजाड़ता है। ये कुचक्र मौसमी राजनीति की इसे समझो, बारिश के पहले त्राहिमाम-त्राहिमाम करवा रहा है। हो जाओगे खाक अपने ही घर में एक दिन तुमसे आग लगवाके तुमको ही डरवा रहा है। तरबूज के फलकों की तरह वो बांटता है, किसी के हिस्से में ये आये, किसी के हिस्से में वो। देखा नहीं तुमने सत्ता बांटते हुए क्या अभी ये हैं, पूर्व में थे वो अभी किस्सों में हैं जो। यह इनकी चालाकियां हैं इन्हें पढ़ना सीखो, मंदिर बनवाते हैं यही, यही चादर चढाते हैं। इंसान रहे नहीं हम लौकी के बेल हो गए हैं, शाखाएं वो जालिम मुनगी काटकर बढ़ाते हैं। ...

ठंडी गीत:धर्मेन्द्र कुमार पटेल

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ठंडी गीत रात या बैरी लागे ठंडी के महिनवा हो। कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले दिनवा हो।। हां कैसी कटी कैसे कटी ठंडी वाले के महिनवा हो....2  धूप या ऐसी लागे, जैसे जले अगेठिया हो। कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले महिनवा हो।। हां कैसे कटी कैसे कटी......... रजाई या ऐसा लागे, जैसे सगे हों मितवा हो। कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले महिनवा हो।। हां कैसे कटी कैसे कटी......... कपड़े तो ऐसे लागे, जैसे लगे प्रियतमा हो। कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले महिनवा हो।। हां कैसे कटी कैसे कटी....... रचनाकार: धर्मेन्द्र कुमार पटेल नौगवां, मानपुर जिला-उमरिया(मध्यप्रदेश) [डिस्क्लेमर:इस ब्लॉग पर रचनाकर द्वारा भेजी गयी रचना इस विश्वास और उम्मीद के साथ प्रकाशित की जाती है कि वह रचनाकार की मौलिक और अप्रकाशित रचना है .अन्यथा के लिए रचनाकार स्वयं उत्तरदायी होगा.] ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाएं नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया  यहाँ क्लिक  करें। कृपया  अपनी   रचनाएं हमें whatsapp नंबर 8982161035 या ईमेल आई डी...

साथ रही सब:कुलदीप पटेल की कविता

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साथ रही सब कुलदीप पटेल साथ रही सब मिलजुल, आपस माहीं  न करी लड़ाई। संविधान केर आत्मा, धर्मनिरपेक्ष केर समझी गहराई। भाईचारा बाला भारत केर बुनियाद सदा बनी  रहै, एकै  छत के नीचे रहैं, हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ,ईसाई। वैचारिक मतभेद होय विचारन से, हिंसा न भड़कै। देशहित माहीं  होय फैसला सब, सियासत न चमकै। अमन , शांति अउर अहिंसा कायम रहै वतन माहीं, फेर दुबारा  भारत माँ के आँचल खून से न महकै। भगत, सुभाष, आजाद केर सपना बाला देश बनाई। गाँधी, नेहरू, पटेल, अम्बेडकर बाला सन्देश बताई। या देश आय सबकेर, अउर है सबके बराबर के हक, आपसी असमंजस भूल के आपन देश  बचाई। कुछ करके इतिहास बनाई, इतिहास का न बदली। काहे कि घर माहीं  जंग शुरू होइ ता, फेर न सम्भली। कुछ अइसन करी कि आमैं  बाला कल बेहतर होय, नही त रहि जईहै जुझतै सब, केहु केर न एक चली। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारिऊ माहीं  कुछ ध्यान बढ़ाई। गरीब, मजदूर, किसान केर खातिर आसमान बनाई। निजीकरण अउर उद्योग तक सब न सीमित करी, अवाम तक पहुंचै अईसन योजना आसान बनाई। हिंदुस्तान के मिट्टी से जनमै केर सब ...

माँ:सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविता

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माँ सुरेन्द्र कुमार पटेल  हर उस मां का वंदन है, अभिनंदन है। जिसके तपने से बेटा बनता कुंदन है। बेटे की किलकारी से, गूंजित होता जब घर-आंगन। धवल-चांदनी सा खिल जाता है मां का मन। बेटे की सेवा में माँ, न जाने कैसी दिव्य अनुभूति है तेरी। छोड़ सकल संसार तुम बन जाती हो उसकी चेरी। तुम्हारे संस्कारों से सुरभित होता जैसे वह चंदन है हर उस मां का वंदन है, अभिनंदन है। जिसके तपने से बेटा बनता कुंदन है। न जाने कैसा दिव्य आकर्षण है माँ की लोरी में। कैसा अद्भुत सुख है माँ से माखन की चोरी में। हाय, अजब धौंस माँ का, उस भय में मेला भावों का। हल्की खरोच लगे तो माँ ले लेती है हिसाब उन घावों का। बेटे को वह करे सुसज्जित और चीथड़ों में उसका तन है... हर उस मां का वंदन है, अभिनंदन है। जिसके तपने से बेटा बनता कुंदन है। बेटे की खातिर वह लड़ती, शेरनी बन जाती है। बेटे का हो हित तो ले कलंक कैकेयी भी बन जाती है। बेटा सोये निश्चिंत भाव से, रात-रातभर मां पहरा देती है। बेटे का मन कुम्हला न सके, ऐसा छांव वो गहरा देती है। बेटा घर से हो बाहर, हर आहट उसके कानों से टकराती है। जब भी बिगड़...

एक बेरोजगार का प्यार:अखिलेश पटेल की कविता

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एक बेरोजगार का प्यार अखिलेश पटेल एक-दूजे से प्यार था भारी, और प्यार पर भारी बेरोजगारी! हे! प्राणाधार, हे! प्रियवर, बतलाओ कब बसेगा हमारा घर? प्रेमी युवक ने कहा, हे प्रियतमा, हे सखी! शादी-शादी की रट तू क्यों लगा रखी? देखती हो प्रियतमा, कितनी मंहगाई है, चारो तरफ मंदी छाई है। ऐसे में घर में होगा उजाला कैसे, तुम मेरी याद में बसी रहो बस ऐसे। जैसे नदी के हों हम दो किनारे, जैसे चांद को चकोर निहारे! बहुत दिन हुए शहर में रहते! बहुत हो गया पढ़ाई करते-करते। अब लोग पूछते हैं बताओ क्या करते, उन्हें बताएं क्या पाया हमने शहर में रहके! हे प्रियतम! ये क्रम कब खत्म करोगे, सूनी है मांग, उस पर सिंदूर कब भरोगे? देखो, हे प्रियतमा, हे सखी सुकुमारी। कुछ समझो हम बेरोजगारों की लाचारी। फॉर्म जो चार साल पहले हमने भरा था, जिसकी आस में मन कुछ हरा था। कोई लेकर बहाना कोर्ट चला गया, क्या करूं मैं इसी तरह छला गया। कुछ और परीक्षाएं थी दी हमने, एक साल हो गए, लोग भी लगे कहने। कि परिणाम क्यों अभी तक नहीं आया, सरकार ने इस बीच दो झंडा फहराया। कोई कह रहा अगले चुनाव की प्रतीक्षा ...

सामाजिक कार्य व्यक्तिगत क्षमता का सही उपयोगः वीरेन्द्र कुमार पटेल

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सामाजिक कार्य व्यक्तिगत क्षमता का सही उपयोगः   वीरेन्द्र कुमार पटेल  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने व्यक्तित्व का विकास समाज में रहकर ही करता है। वह समाज में रहकर जीवन की कठिन चुनौतियों को देखते समझते हुए अपनी जीवन यात्रा में आगे बढ़ता है। फिर एक ऐसे चैराहे पर खड़ा हो जाता है जहां से उसे किसी एक रास्ते का चयन करना होता है। इस चयन के पीछे की बाध्यताएं कई बार उसे ऐसे क्षेत्र में ले जाती हैं जहां से उसे लगने लगता है कि उसे जो कुछ और करना चाहिए था ,  वह पीछे छूट गया है। यह छूट जाना ही व्यक्ति को समाज में पीछे मुड़कर देखने के लिए बाध्य करता है। एक दूसरी स्थिति यह होती है कि व्यक्ति जीवकोपार्जन के लिए जो कुछ करता है उसमें पूर्णता प्राप्त करने के बाद भी उसे ऐसा लगता है कि उसकी भावनात्मक संतुष्टि कहीं न कहीं अधूरी रह गई है। उस भावनात्मक संतुष्टि के लिए भी वह पीछे मुड़कर देखने की कोशिश करता है। कुछ अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भी सामाजिक कार्य की ओर प्रवृत्त होते हैं। हमारे देश के लोग भावप्रधान हैं। यह भाव प्रधानता सामाजिक रिश्तों में हमें ...

कितनी और कथाएं:कविता, सुरेन्द्र कुमार पटेल

कितनी और कथाएं ० सुरेन्द्र कुमार पटेल०  कितनी और कथाएं कितने लेख लिखे जाएं। मैं तो कहता हूँ  कि जब जल ही गई सचमुच की कविता तब इस कविता को क्या पढ़ना? चलो इसे भी आग लगाएं। जिस बाप की जली बेटी, उसकी वह ही कविता थी, गीता थी। जनक रह गया खड़ा स्वयंवर के उत्सव में जो छली गई वह ही उसकी सीता थी। इस समाज के रावण को चलो अपने ही हाथों फंदे पर लटकाएं।  ...कितनी और कथाएं निर्भया के साथ हुआ जो, ऐसा लगा यह अंतिम, लोगों में अब भय होगा। क्या मालूम था सत्ता के आश्रय में बलात्कारी का ऐसा आचरण निर्भय होगा। लकवा मार गया कण्ठों को किस मुंह से, ऐसे गीतों को गाएं।  ....कितनी और कथाएं किससे उसने की नहीं मनुहार, तमाशाई बने रहे सब दरबारी। राज्य बचा नहीं सका अपनी मर्यादा प्रकट हुई उसकी कलयुगी लाचारी। कर्तव्यविमुख रहे जो-जो अधिकारी, वे पिशाच, नराधाम भी फन्दे पर लटकाएं जाएं।  ....कितनी और कथाए वह कितना तड़पी होगी, कितना छटपटाई होगी। फिर कितना करके साहस आप बीती बताई होगी। जग रहा सुनता, वह सुनाती रही। जग भी हुआ लाचार, व...