संदेश

जुलाई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी

चित्र
कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी              किसी ने ठीक ही लिखा है कि जिंदगी कर्कश अनुभवों का पहाड़ होती है।अलग बात है कि इस पहाड़ पर कहीं कहीं सुख के कुछ सुकोमल डूब भी उग जाते हैं। सुख की इन्हीं चंद दूबों की चाहत में उम्र बीत जाती है।ऐसा ही है वर्तमान समय जब हम महामारी से जूझते हुए,अपनों को खोते हुए भी साहस और धैर्य जीवन के प्रति रखते हुए आशा की किरण खोजने में लगे हुए हैं। कोविड का पहला मरीज जनवरी 2020 में केरल में पहचान में आया,फिर तो मार्च,20 से लॉक डाउन की स्थिति और संक्रमितों की संख्या बढ़ने का सिलसिला,उसी दौरान महानगरों से कामगारों का अपने गांव घर जल्दी से पहुंचने की जो आपाधापी हुई वह महामारी से भी ज्यादा भयावह।ऐसी भागदौड़ देश के विभाजन के समय रही होगी।उसके बाद का यह मंजर तो बहुत खौफनाक था।समय बीता, महामारी की रफ्तार सुस्त पड़ते ही लोगों की जिंदगी अपने पुराने ढर्रे की ओर अग्रसर ही हो रही थी,कामगार पुनः अपने काम की तलाश में शहरों की ओर वापस जा ही रहे थे,कुछ पहुंच भी गए थे कि तब तक दूसरी लहर का प्रचंड रूप से प्रकट हो जाना...

अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर गीतिका छंद में कविता

चित्र
(अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर कविता) Ashok Tripathi "Madhav" ki Barish par Kavita) आधार छंद-गीतिका नहीं बरसना था तो बादल  क्यूँ निकले थे घर से। कृषि कर्षक सब जीव जगत के बूँद-बूँद को तरसे।। जेठ मास में कीच मचाया, आर्द्रा में नहिं बूँद गिराया। उमस कड़ी गर्मी दम तोड़े  बरसो तो मन हरषे।। घर के अन्न खेत में पहुँचे, खाली हुए भँडारे। अब तो रहम करो हे बादल, मिटे गरीबी सर से।। देर हुई सब नाश करो मत, इतना मत तड़पाओ। उबरे नहीं अभी कोविड से, तुम उधेड़ते चरसे।। बिन पानी के जग है सूना, मुश्किल जीवन जीना। पुनर्वसु ने बहुत रुलाया, पुख्ख सुख्ख से बरसे।। लाज रखो निज जलद नाम का, माधव विनती करता। टूट चुका मानव मानो तुम, अब भीतर बाहर से।। अशोक त्रिपाठी "माधव" शहडोल मध्यप्रदेश [इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर इमेल करें अथवा ✆ 8982161035 नंबर पर व्हाट्सप करें]  Lirerature books are availble on Your reachable Price...Hurry Up...

बरसि जई घनस्याम: अशोक त्रिपाठी "माधव"

चित्र
(अशोक त्रिपाठी 'माधव' की बारिश पर बघेली कविता) (Ashok Tripathi 'Madhav' ki baarish par bagheli kavita) बरसि जई घनस्याम जेठ मास मा चहला कीन्हेन,किहेन असाढ़े घाम। आय के बरसि जई घनस्याम।। दिहेन खेत मा खादा करसी, तबहूँ घाम उधेरिसि चरसी। फेकेन खेते अन्न घरे कय, सोचे रहेन जो थोरौ बरसी। लटे लम्मरे कइसौ-मइसौ जइहीं बिजहा जाम। आय के बरसि जई घनस्याम।। अरहर उरदा तिली बोबायन। सोयाबीन मूँग छिटबायन।। खादि खितिर चउगिरदा बागेन। तबहूँ भरे मा निन्चय पायन।। कोटेदार सेल्समैनन से, कीन्हेन ताम-झड़ाम।। आय के बरसि जई घनस्याम।। जब ते जनबुध भये रहेन ते। जेतना जोरे धये रहेन ते। कुछ लड़िकन के खाता माहीं, फिक्स-डिपाजिट कये रहेन ते। सगला खरच दिहेन बिजहा मा, बचा न एकौ दाम। आय के बरसि जई घनस्याम।। अद्रा मा नहिं बूँद गिराया। पुनरबसू मा खूब तिपाया। थरहे रहेन धान बंधी मा, ओहू का खुब नगदि जराया। त्राहि मची है चारिउ कइती, रोट लेबाला सबै चढ़ायन, तबौ किहा नहिं काम। आय के बरसि जई घनस्याम।। अब ता चिरई लीलय काँकर। परा हबय किसमत मा पाथर। माधव मरै बिपति के मारे, मरे जात हें गोरुअउ राकर।। सगले लड़िका खटिआ पकड़े, दी...

मन के पतंग -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)

चित्र
             मन के पतंग                                  - रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा) गीत हैं , गुलाल हैं बच्चे धरा के नूतन पैगाम हैं बच्चे                  जब ये गीत मधुर पिरोते हैं                ऐसा लगता है सुर के ताल हैं बच्चे कुमकुम , चंदन सरीखे सुगंधित हैं “मिट्टी और श्रम” के पहचान हैं बच्चे               अपनी मस्ती की पाठशाला में               अपने मन के मुस्कान हैं बच्चे जब कभी ये पतंगें उड़ाते हैं लगता है ऊँचाइयों के सलाम हैं बच्चे           जिनको “नीति” से...

सरकारी वन महोत्सव एवम् सामाजिक उत्तरदायित्व–डा ओ पी चौधरी का पर्यावरण के संबंध में आलेख

चित्र
सरकारी वन महोत्सव एवम् सामाजिक उत्तरदायित्व–डा ओ पी चौधरी            वन को हम फॉरेस्ट से समझें तो लैटिन शब्द के फोरिस से निर्मित,जिसका अर्थ है गांव के सीमा या चारदीवारी से बाहर की समस्त भूमि,जिस पर खेती न की गई हो तथा जो निर्जन हो।अब वन से तात्पर्य है कि जिसका उपयोग वानिकी के उद्देश्य से किया गया हो।वन किसी भी राष्ट्र की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा है और प्रकृति की मनोरम विशिष्टता है।वनों के महत्व को दर्शाते हुए कहा जाता है ," वन से जल,जल से अन्न, अन्न से जीवन"इसी तर्ज पर अब हम कहने लग गए हैं कि जल ही जीवन है।वन को लोगबाग हरा सोना भी कहते हैं।यह हमारे जीवन को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।हमें एक और इनसे फल,इमारती लकड़ी,पशुओं का चारा,पक्षियों का भोजन आदिअनेक चीजें प्राप्त होती हैं,वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को स्वच्छ,समृद्ध,मिट्टी के कटाव को रोकने व उसमें नमी बनाए रखने का कार्य करते हैं।ऑक्सीजन को बहुततायत मात्रा में प्रदान करने वाले ये वन हमारे जीवन के अविभाज्य अंग सरीखे हैं। कोरोना महामारी में ऑक्सीजन के लिए जो आपाधापी मची थी,उससे हमे सबक लेकर...

वो है मेरी प्यारी कविता: सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविता Kavita Par kavita in hindi

चित्र
कविता जो हमारे सुख-दुःख की साथी है, कविता जो हमारे हर्ष और विषाद की वाहिका है, कविता जो हमारी  मनःस्थिति और हृदयतल को स्पर्श करती है, कविता जो प्रेम और आक्रोश को अभिव्यक्त करती है, ऐसी कविता पर कोई कविता न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. एक छोटी सी कोशिश की है कविता पर कविता करने की. कविता पर कविता लिखने की. आशा है कविता पर यह कविता आपको जरूर पसंद आएगी. यदि यह आपके हृदयतल को अंश मात्र भी स्पर्श करने में सक्षम हो तो आपसे प्रार्थना है कि इसे अपने मित्रों एवं परिचितों तक अवश्य पहुंचाएं. प्रस्तुत है सुरेन्द्र कुमार पटेल   के ब्लॉग से ली गयी यह कविता.  Kavita Par  kavita in hindi - कविता पर एक कविता - . ...वो है मेरी प्यारी कविता जिसमें अन्तस को छूने की ललक है, जिसमें जीवन की चतुर्दिक झलक है, जिससे  जुड़ा कल-आज और कल है, जिसमें जीवन का निनाद कलकल है। वो है मेरी प्यारी कविता॥ जिसमें प्रिय-मिलन की मधुर स्मृति है, जिसमें समाहित प्रिय की सुन्दर कृति है, जिसमें सबके मन का सुन्दर स्वरूप है, जिसमें जीवन भर की छांव और धूप है वो है मेरी प्यारी कविता॥ जिसमें बादल और धरती की छुअन है, ज...

कोविड-19:महामारी के दौर में हमारे गांव- देहात–डॉ. ओ पी चौधरी

चित्र
कोविड-19:महामारी के दौर में हमारे गांव- देहात–डॉ. ओ पी चौधरी Kovid-19: Our village Countryside-Dr. O PChowdhary            कोविड-19 ने एक महामारी के रूप में बहुत तबाही मचाई,पूरे विश्व में त्राहि- त्राहि मच गई।एक साल से भी अधिक का समय बीतने के बाद भी अभी दहशत गर्दी और आशंका  का माहौल है।भला हो उन वैज्ञानिकों का जिन्होंने बहुत ही कम समय में वैक्सीन का ईजाद कर लिया और बड़ी आबादी का टीका करण भी हो चुका है।लगातार टीके लगवाने को प्रोत्साहित भी किया जा रहा है।क्योंकि कोरोना से बचने के लिए सावधानी बरतने के साथ ही टीका आवश्यक है।            कोरोना महामारी का प्रभाव अपने देश में मार्च, 2020 में बढने लगा तो भारत सरकार को लॉकडाउन की घोषणा करनी पड़ी।बहुत बड़ी संख्या में गांवों से रोजी - रोटी के लिए शहर गए कामगारों को अपने उसी गांव में शरण मिली जहां से वे चले गए थे,कितनों ने तो भुला ही दिया था की हम कहां से यहां तक की यात्रा किए हैं।शहर की चकाचौंध में अतीत की स्मृतियां विलुप्त हो गई थी।किंतु इस महामारी ने एक ही झटके में सब कुछ याद दिला ...

पौधारोपण से प्रेम: राम सहोदर पटेल

चित्र
पौधारोपण से   प्रेम क्या नेह बढ़ाना उचित नहीं, जो गले लगता है तुझको। निज स्वारथ की परवाह न कर जो, पोषण करता है तुझको ॥ धूप ताप सहकरके जो, छाँव मधुर देता तुझको। कष्ट अनेकों सहकर जो, प्यार अगम देता है तुझको॥ ज्यों सहती माता है विपदा, निज लालन के परिपालन पर। त्यों पौधा विपदा सहकरके, आराम सकल देता तुझको॥ आरी, टांगी का वार सहे पर, संताप नहीं देता तुझको। पत्थर तुझसे खाकर भी, फल मीठा देता है तुझको॥ उसको तुझसे कुछ चाह नहीं, सब वह ही देता है तुझको। तेरे जीवन का कण-कण, संचारित  करता है तुझको॥ निज जीवन का क्षण-क्षण, बलिहारी करता है तुझको। तू निर्मम आचार करे, वह सदाचार देता है तुझको॥ तू काट हवन करता इसको, निज स्वारथ की बलि वेदी पर। तेरे छज्जे की बल्ली बन, विश्राम मधुर देता है तुझको॥ पौधारोपण से रहे दूर क्यों न पौधा काटे गिन-गिन के। वह मेघ बुला वर्षा करता, दे उल्लास भरे जीवन तुझको॥ नन्हीं सी आवश्यकता के हित, दरख्त पेंड मिटाता तू। वह प्राण वायु आरक्षण दे, निष्कंटक जीवन दे तुझको॥ भीषण ग्रीष्म से तपकर जब, हो जलाभाव जल आलय पर। निज सीने में संचित जल से,...

वाणी (दोहा): मनोज कुमार चंद्रवंशी की कविता

चित्र
वाणी (दोहा)  ऐसी  वाणी  बोलिए,   जिसमें  होय मिठास। सुनकर मधुरस सम लगे,आवे जिमे मिठास॥ वाणी रम्य आभूषण,    वाणी  है   अनमोल। सबको  मनभावन  लगे,  ऐसी  वाणी बोल॥ सुडौल  वाणी बोलिए,  वाणी महिम अपार। वाणी से झलकन लगे,  सदा सद् व्यवहार॥ वाणी  ही  श्रृंगार  है,   वाणी  औषधि मूल। वाणी  से बन जाए,   ये  जीवन  अनुकूल॥ वाणी  जीवन मंत्र है,  सदा  दिलाता  मान। कर्कश वाणी कटु लगे,मिले सदाअपमान॥ कोयल कूकत डार में,  करती कुहू पुकार। काका वाणी कटु लगे,करते सभी दुत्कार॥ ऐसी वाणी बोलिए, खुशियाँ  मिले अपार। मीठी वाणी मधु लगे, हो  वाणी   में सार॥ वाणी तन शोभित करे, वाणी है परिधान। बदन झलके वाणी से,  वाणी है पहचान॥ कृपया इन्हें भी देखें:-   पर्यावरणीय कुण्डलियाँ: राम सहोदर बघेली पर्यावरण गीत: अशोक त्रिपाठी 'माधव' BAGHELI PARYAWARAN GEET जीवन और अन्तःकरण: इंजीनियर प्रदीप श्रावण (कविता) सपना (...

सावन आयो (मत्तगयन्द सवैया) मनोज चंद्रवंशी sawan aayo sawan par kavita

चित्र
🌹मत्तगयन्द सवैया 🌹 sawan aayo sawan par kavita विधान 211,211,211,211,211,211,211,22 भानस×7 +2 गुरु= एक चरण मेघ चले  अब  बारिस लेकर,               अंबर में  अब  बादल  छायो। शीतल मंद चले  अब मारुत,               भू पर  पावन  सावन आयो॥ सावन  माह  लगे   मनभावन,               कूकत कोयल कानन  भायो। नाचत  मोर   चराचर  मोहित,               मेघ  सुहावन  बारिश  लायो॥ कोकिल तान सभी सुनो अब,              कोयल की सुर मीठ जुबानी। भीग गयी अब भू तल अंबर,              सावन का बरसात सुहानी॥ सावन गीत अली मिल गावत।    ...

अशोक त्रिपाठी 'माधव' के बघेली गजल Ashok Tripathi Ke Bagheli Gazal

चित्र
बघेली गजल अशोक त्रिपाठी 'माधव' के बघेली गजल  Ashok Tripathi Ke Bagheli Gazal आपन फरज निबाहा आगे बढ़े रहा। खासा परगति के सीढ़ी मा चढ़े रहा।। पुरिखन हर सीख गांठ मा बांधि के राख्या। आय जई मंजिल खुद रसता गढ़े रहा।। थकि के बइठि न जया तूं कहौं छहांरे मा। धीरेन-धीरे चला गमय-गम कढ़े रहा।। निंगही से सीखा कुछ अकिल लगाबा थोरौ। मकड़ी कस जाला रातौ-दिन गढ़े रहा।। देखा सोच न मान्या कउनिउ बातन के। दोस न एक दुसरे के मूड़े मढ़े रहा।। हांथ मा हांथ धये बइठे से कुछू न होई। कमर कसे करतब्ब मा अपने ठढ़े रहा।। देई दइउ सहारा केबल करतब्बी का। पाठ करम योगी बाला सब पढ़ें रहा।। फल के इच्छा कबौ न कीन्ह्या जान लिहा। पढ़य के साथय-साथ अउरु कुछ लढ़े रहा।। आजु-काल बिन लढ़े पढ़ाई फीकी है सब। माधव के या सीख के मंतर पढ़े रहा।। अशोक त्रिपाठी "माधव"   शहडोल मध्यप्रदेश कृपया इन्हें भी पढ़ें: फगुनाहटी बघेली कविता : अशोक त्रिपाठी 'माधव' ओरहन :बघेली कविता-अशोक त्रिपाठी माधव आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय #बघेली_कविता: जोगेश्वर सिंह 'जख्मी कहिया बीतही रे भैया कोरोना के डरवा-2 डिजीलैप शि...

उमड़ घुमड़ जब आए बादल(बाल कविता)-रजनीश की बारिश पर बहुत सुन्दर कविता

चित्र
 keywords : School children who have written some poems or stories उमड़ घुमड़ जब आए बादल ( बाल कविता )          - रजनीश उमड़ - घुमड़ जब आए बादल मन को रस दे जाए बादल बादल की गर्जन को देखो   मन को भी कड़काये बादल।   नभमंडल में छाए बादल घुप्प अंधेरी लाए बादल अमृत - सा जल मोती से धरती को मन भर नहलाए बादल।   चमक - दमक की छवि को देखो श्वेत रेख की मणि को देखो यहाँ - वहाँ बस छाये बादल मन को मनभर लुभाये बादल।   बरस - बरस ललचाए बादल हम सबको हर्षाये बादल धरती की आभा को देखो नित - प्रतिदिन चमकाए बादल।   कदंब फूल गए डाली - डाली मदमस्ती बस फूलों वाली अपनी बीन बजाए बादल मन को मन भर तरसाए बादल।   दादुर , मोर , पपीहा को अपनी तान से बुलाए बादल देख - देख सब नाच रंग को मन से भी शर्माए बादल।   अकड़ू - बकड़ू जिया को पकड़ू देख - देख हहराता बादल पानी की जलबूँदों से सबका मन सहलाता बादल।   तपन खींचता ठंडक देता धरती पर यह प्यारा बादल मनभर म...

बघेली पर्यावरण गीत: अशोक त्रिपाठी 'माधव' BAGHELI PARYAWARAN GEET

चित्र
बघेली पर्यावरण गीत हेरे मिलै नहिं पीपर बहेरा मनई के जीबन मा होइगा अँधेरा हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा न आमा बगैचा न तेंदू न महुआ नहीं अब खरहरी न हर्रा न कहुआ। न चिरई चनूँगुन के खोंथइला बसेरा। हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा। न सालैं न गुँइजा न छुइला न सगमन। जामुन खम्हार नहीं न बीही न सहिजन। करौंदा बरारी अउ न बइरि मिलै हेरा। हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा। सीसम न नीलगिर सेमर न खैरा। कैथा न इमली बेल सेहेरुआ सजैरा। न चंदन चचेंड़ा न चिरुल चार चेरा।  हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा। सताबर पसारन न गुरिज अस्सगंधा। पेंड़ काट मनई बनाय लिहिस धंधा। बेंचि-बेंचि पेंड़न का बनाये है डेरा। हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा। एहिन के कारण आजु बगरा प्रदूषन। हेरत फिरैं सब आजु शुद्ध आक्सीजन। मरा रोइ-रोइ चाहे मूड़ का कचेरा। हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा। अबहूँ भरे भरे मा चेता बिरछा लगाबा। नाहक मा देखा खुद के नास ना कराबा। पइहा न हेरे कहौं जंगल-पतेरा। हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा। प्रकृति के कहर का माधव समझा न रोग हो। मनई के तन पा के रचा न कुजोग हो। अबहूँ भरे मा जागा करा न अबेरा। हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा। अशोक त्र...