शनिवार, जनवरी 17, 2026

जब बेजुबान बोलेंगे

कभी-कभी तंत्र को देखकर विस्मय होता है, यह कैसा तंत्र है — जो ख्याली बातें करता है, डींगे हांकता है, पर जिम्मेदारियों से भागता है। कुछ हद तक उन लोगों में मैं भी शामिल हूं, क्योंकि अगर उनकी तरह न रहूं — तो उनके बीच सांस लेना भी कठिन हो जाए। वे चटकारे लेकर बातें करते हैं, हंसी उड़ाते हैं उन पर, जो जिम्मेदारी की कुर्सियों पर बैठे हैं, और खुद कुछ करना नहीं चाहते। जब बात आती है अपनी जिम्मेदारी की, तो वे चुप कराने लगते हैं उन्हें — जो सवाल उठाते हैं। वे एक घेरा बुनते हैं अपने चारों ओर, जहां सवाल उठाने वाले ही कटघरे में हों, बोलने न दें उन्हें, सवाल करने न दें उन्हें। ऐसे हाल में भला परिवर्तन आए कैसे? पर यह स्वाभाविक है — क्योंकि यह लड़ाई है बेजुबानों की, उन मेहनतकश लोगों की जो खेतों में पसीना बहाना जानते हैं, कारखानों में काम करना जानते हैं, पर बोलना नहीं जानते। उन्होंने माना ही नहीं कि बोलने से कुछ होता है, वे जानते हैं — करने से होता है। और इसलिए जो उनके लिए बोलता है, उसे चुप कराना ज़रूरी समझा जाता है। क्योंकि जिस दिन ये बेजुबान बोलेंगे, उस दिन आज के बोलने वालों की लंका लग जाएगी। इसलिए बोलने वालों को पटाया जाता है, और जो पट नहीं सकते — उन्हें मिलता है अपमान का इनाम, और दुत्कार का सम्मान।

रचनाकार

सुरेन्द्र कुमार पटेल

ब्यौहारी, जिला शहडोल

[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर email करें।]

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