मुक्तक : रजनीश कुमार


कविताएँ — रजनीश कुमार जायसवाल

कविताएँ — रजनीश कुमार जायसवाल

कौन धुलेगा...? तुम्हारा पाप! पीड़ित जनता!! और शोषण से तपाए लोग!! कौन...? कब तक तड़पाएगा वह... हम निरीह प्राणियों को?
देखिए! टोपीधारियों को — निर्लज्ज! भकोस रहे हैं गरीबों की माटी को। पसीना गाढ़ा करना इन्हें क्या मालूम, अपनी बचाकर खेलते हैं दूसरों के फूलों से।
मेरे देश की घानी में तेल नहीं, गुलेल निकलते हैं... कभी वाणी-विष के, तो कभी निशाचरों के धारदार... नाखूनों से बोलती ज़हर की हिंसक ध्वनि।
आंधियों के लप्पड़ से देह सूखी डालियों की तरह चरमर हो गई है, और नीले रंग के गरीबी के थप्पड़ उभर गए हैं।
शोषणाधारियों के मुख में सड़े दही की गंध और गोबर की चोंथ उसी तरह शोभित है, जिस तरह पानी में सड़ने वाले चमड़े और मरे मच्छरों की लादियाँ।
फेसबुक टाइमपास का वह दाना है जिसे रोपित करने पर केवल मनरस के पौधे ही तैयार होते हैं। कैक्टस की तरह हमारे सुसमय को सोखकर यह हमारे उर्वर जीवन को बंजर बना देती है।
हवा की बदबूदार ‘सुगंध’, सड़े मवेशियों की मीठी गंध उन्हें समर्पित है जो दिन को रात और रात को दिन बड़े चावभरे प्रमाद से उच्चारते हैं।
फटे-बदहाली में अमीरी की कहावत ज़हर की पुड़िया है। ये नखविषधारी कौन हैं? मेरे देश की भाषा मौन है।
मैं नहीं टोहता सौंदर्य को, टाँकता हूँ मैं लोगों के मन को। हवा की सफ़ेदी से जलाता हूँ बुझी बत्तियों को।
गरीबी के चेहरे में लाचारी के टिक्के हैं। क्यों उपजाते हैं कुर्सीधारी अपने शोषण के खेत में मक्कारी के दाने?
क्यों निर्धनता की कोख में भूख तीखी होती है? सूझता क्यों नहीं जीवन की बारहखड़ी? ए.बी.सी. की टूटी पगडंडी में ‘ज़ेड’ बड़ी दूर है।
रजनीश कुमार जायसवाल
ग्राम + पोस्ट: झारा, तहसील: सरई
जिला: सिंगरौली (म.प्र.)
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