रविवार, जनवरी 18, 2026

मन केय पंछी

मन केय पंछी

(अंगिका रचना)

चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।

धुरदा-धुईयां धूप केय साथे,
गिट्टी से रिश्ता पैलहियों;
हवा मोड़ी केय दौरी घूपी केय,
छाया मेय भी हड्डी सुखैलिहों।

समय केरो चक्र ऐन्हो चल्लहों,
खुद के झोंकी देलहियों;
प्लेटफार्म पर खड़े रही गेलहियों;
छुटी गैलहों सब गड़िया,
की पाय केय रहे, की पाय लेलहियों—
सब ताकतेंह रही गेलहियों।

चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।

रचनाकार

अंगरक्षक सूरज (सूरज कुमार सोनी)

शिक्षा: परास्नातक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)

ईमेल: angrakshaksuraj2001@gmail.com

स्थान: कदवा, नवगछिया, भागलपुर, बिहार (853204)

यह रचना बिहार के अंग प्रदेश (भागलपुर, मुंगेर, बांका) की मधुर मातृभाषा अंगिका में है।
[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर email करें।]

2 टिप्‍पणियां:

रजनीश रैन ने कहा…

सुंदर भाव -चित्र

सूर्यांश ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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