मन केय पंछी
(अंगिका रचना)
चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।
धुरदा-धुईयां धूप केय साथे,
गिट्टी से रिश्ता पैलहियों;
हवा मोड़ी केय दौरी घूपी केय,
छाया मेय भी हड्डी सुखैलिहों।
समय केरो चक्र ऐन्हो चल्लहों,
खुद के झोंकी देलहियों;
प्लेटफार्म पर खड़े रही गेलहियों;
छुटी गैलहों सब गड़िया,
की पाय केय रहे, की पाय लेलहियों—
सब ताकतेंह रही गेलहियों।
चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।
धुरदा-धुईयां धूप केय साथे,
गिट्टी से रिश्ता पैलहियों;
हवा मोड़ी केय दौरी घूपी केय,
छाया मेय भी हड्डी सुखैलिहों।
समय केरो चक्र ऐन्हो चल्लहों,
खुद के झोंकी देलहियों;
प्लेटफार्म पर खड़े रही गेलहियों;
छुटी गैलहों सब गड़िया,
की पाय केय रहे, की पाय लेलहियों—
सब ताकतेंह रही गेलहियों।
चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।
रचनाकार
अंगरक्षक सूरज (सूरज कुमार सोनी)
शिक्षा: परास्नातक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)
ईमेल: angrakshaksuraj2001@gmail.com
स्थान: कदवा, नवगछिया, भागलपुर, बिहार (853204)
यह रचना बिहार के अंग प्रदेश (भागलपुर, मुंगेर, बांका) की मधुर मातृभाषा अंगिका में है।

2 टिप्पणियां:
सुंदर भाव -चित्र
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