एक प्रेम गीत
कभी वक्त मिले तो आना,
दरिया किनारे बैठ तुम्हें,
इश्क के अल्फाजों को
कविता बना सुनाऊंगा।
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो
किसी और का हो जाऊंगा।
दरिया किनारे बैठ तुम्हें,
इश्क के अल्फाजों को
कविता बना सुनाऊंगा।
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो
किसी और का हो जाऊंगा।
हां इश्क है, बताया नहीं तुमसे;
अगर तुमको था, तो जताया क्यों नहीं तुमने?
अगर तुमको था, तो जताया क्यों नहीं तुमने?
दिल की बातें तुम सुनती कहां हो?
आंखों को मेरे तुम पढ़ती कहां हो?
बातों में मेरी तुम उलझती कहां हो?
तुम, तुम, तुम... हां तुम!
सिर्फ इश्क मेरा तुमसे है।
अगर आज मैं बता दूं तो,
क्या तुम मेरी हो जाओगी?
मेरी आंखें, मेरी बातें, क्या तुम समझ पाओगी?
मेरे चेहरे को, क्या तुम पढ़ पाओगी?
आंखों को मेरे तुम पढ़ती कहां हो?
बातों में मेरी तुम उलझती कहां हो?
तुम, तुम, तुम... हां तुम!
सिर्फ इश्क मेरा तुमसे है।
अगर आज मैं बता दूं तो,
क्या तुम मेरी हो जाओगी?
मेरी आंखें, मेरी बातें, क्या तुम समझ पाओगी?
मेरे चेहरे को, क्या तुम पढ़ पाओगी?
हां करूंगा इश्क, सिर्फ तुमसे,
तुम जता के तो देखो।
तुम्हारी सांसों में न पिघल जाऊं तो कहना,
तुम्हारी धड़कन न बन जाऊं तो कहना।
तुम जता के तो देखो।
तुम्हारी सांसों में न पिघल जाऊं तो कहना,
तुम्हारी धड़कन न बन जाऊं तो कहना।
मैं इश्क का आवारा परिंदा हूं,
मुझे अपने दिल के पिंजरे में कैद कर लो।
कहीं उड़ जाऊं तो मेरा दोष मत देना।
चलो तुम्हें इश्क के अल्फाजों को,
कविता बना सुनाऊंगा;
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो किसी और का हो जाऊंगा।
मुझे अपने दिल के पिंजरे में कैद कर लो।
कहीं उड़ जाऊं तो मेरा दोष मत देना।
चलो तुम्हें इश्क के अल्फाजों को,
कविता बना सुनाऊंगा;
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो किसी और का हो जाऊंगा।

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