रविवार, जनवरी 18, 2026

एक प्रेम गीत

एक प्रेम गीत

कभी वक्त मिले तो आना,
दरिया किनारे बैठ तुम्हें,
इश्क के अल्फाजों को
कविता बना सुनाऊंगा।
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो
किसी और का हो जाऊंगा।
हां इश्क है, बताया नहीं तुमसे;
अगर तुमको था, तो जताया क्यों नहीं तुमने?
दिल की बातें तुम सुनती कहां हो?
आंखों को मेरे तुम पढ़ती कहां हो?
बातों में मेरी तुम उलझती कहां हो?
तुम, तुम, तुम... हां तुम!

सिर्फ इश्क मेरा तुमसे है।
अगर आज मैं बता दूं तो,
क्या तुम मेरी हो जाओगी?
मेरी आंखें, मेरी बातें, क्या तुम समझ पाओगी?
मेरे चेहरे को, क्या तुम पढ़ पाओगी?
हां करूंगा इश्क, सिर्फ तुमसे,
तुम जता के तो देखो।
तुम्हारी सांसों में न पिघल जाऊं तो कहना,
तुम्हारी धड़कन न बन जाऊं तो कहना।
मैं इश्क का आवारा परिंदा हूं,
मुझे अपने दिल के पिंजरे में कैद कर लो।
कहीं उड़ जाऊं तो मेरा दोष मत देना।
चलो तुम्हें इश्क के अल्फाजों को,
कविता बना सुनाऊंगा;
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो किसी और का हो जाऊंगा।

रचनाकार

नाम: अंगरक्षक सूरज (सूरज कुमार सोनी)

परास्नातक: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)

ईमेल: angrakshaksuraj2001@gmail.com

पता: कदवा, नवगछिया, भागलपुर (बिहार) - 853204

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मन केय पंछी

मन केय पंछी

(अंगिका रचना)

चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।

धुरदा-धुईयां धूप केय साथे,
गिट्टी से रिश्ता पैलहियों;
हवा मोड़ी केय दौरी घूपी केय,
छाया मेय भी हड्डी सुखैलिहों।

समय केरो चक्र ऐन्हो चल्लहों,
खुद के झोंकी देलहियों;
प्लेटफार्म पर खड़े रही गेलहियों;
छुटी गैलहों सब गड़िया,
की पाय केय रहे, की पाय लेलहियों—
सब ताकतेंह रही गेलहियों।

चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।

रचनाकार

अंगरक्षक सूरज (सूरज कुमार सोनी)

शिक्षा: परास्नातक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)

ईमेल: angrakshaksuraj2001@gmail.com

स्थान: कदवा, नवगछिया, भागलपुर, बिहार (853204)

यह रचना बिहार के अंग प्रदेश (भागलपुर, मुंगेर, बांका) की मधुर मातृभाषा अंगिका में है।
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लूट की कला

लूट की कला

यदि उन्हें मैं सीधे-सीधे व्यापारी कहता,
वे पुरज़ोर विरोध करते।
मैं इसे गलत नहीं मानता कि वे
धन कमाने में बड़े जतन से लगे हैं।

मेरे आसपास के ही ये लोग
अक्लमंदी की परीक्षा देकर आए थे,
क्योंकि उनके पास सेवा-संबंधी
एक से बढ़कर एक कौशल प्रमाणपत्र थे।

अब जब मैं उन्हें देखता हूँ —
किसी एक को नहीं, सभी को भी नहीं,
परंतु उनमें से बहुतों को —
तो पाता हूँ कि उनकी सारी अक्लमंदी,
उनका सारा कौशल
बस एक ही कला का है —
पैसे कमाने का।

उनके पास यह कौशल है
कि वे अनीति का धन
कुछ इस तरह अर्जित करते हैं
कि वह अनीति न लगे।

हालाँकि वे लुटेरे ही हैं, किंतु लूटते नहीं।
पट्टी पढ़ाते हैं कुछ ऐसी,
कि इंसान खुद लुटने को तैयार हो जाए।

वे हाथ बाँधकर, नतमस्तक होकर कहते हैं —
“नहीं, नहीं, यह पाप नहीं करना हमें।”
और इंसान गिड़गिड़ाता है —
“नहीं, नहीं, यह पाप नहीं है,
जब हम स्वयं समर्पित हैं आपके समक्ष।”

यह कौशल इतना व्यापक है
कि इसमें प्रवीण हैं —
छोटे से लेकर बड़े तक,
तंत्र के हर कलाकार।

— सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला शहडोल
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नीतिपरक दोहे

नीतिपरक दोहे – राम सहोदर पटेल
*नीतिपरक दोहे*
++++++++++
बातन से बातें बने, बातन बात नशाय।
बातन से गौरव मिले, बातन लात दिलाय।।
फरिका करत बयान है, भीतर की सब हाल।
ताल नीर मैलो दिखा, प्यास भगे तत्काल।।
मन मैंला जब होत है, बाहर से दिख जात।
कूड़ा दरवाजा पड़ी, भीतर की क्या बात।।
दरवाजे कचरा पड़ा, भीतर कचरा होय।
भीतर वाहर एक सम, जान परत सब कोय।।
अनपढ़ की संगोष्ठी, अरु दुर्जन का साथ।
जबरा केरी मित्रता, निश्चित करें विहाथ।।
अहं प्रेम दोनों अरी, दोनों रहें न संग।
एक रहे दूजा भगे, या होबेगा जंग।।
एक बेर तरु के लगे, बेर-बेर फल होय।
फल चाखे नर तोष से, सिद्ध जनम फल होय।।
विनय सहोदर करत है, जाय सहोदर पास।
मोहि सहोदर मान कर, राख सहोदर खास।।
चंचल मन चंचल सदा, रहे न स्थिर जान।
चंचल जल की भांति है, संयम से रख ध्यान।।
मानुष पानी के गये, बैठन को नहीं ठौर।
पानी जतन बचाबहू, गर चाहो निज मौर।।
अंबर घन बरसे बरुण, गिरि पीतांबर धार।
अंबर भी भीगा नहीं, इंद्रदेव गे हार।।
चिकनी चुपड़ी बात में, छिपी कपट जंजाल।
सुंदर फूल गुलाब के, कांटे खींचें खाल।।
जान हथेली पर लिए, सीमा पर जो ज्वान।
धन्य मात वह जन्म दे, किया बड़ा एहसान।।
कड़वी बोलन की सजा, खीरा जैसा होय।
अलग किया सिर काटकर, निंदत हैं सब कोय।।
अहंकार दुश्मन बड़ा, करे समूल विनाश।
धरा रह गया राजपद, दुर्योधन के पास।।
नारी के अपमान से, बच नहीं पाया कोय।
चीर हरण के कारणे, दुर्योधन गया खोय।।
रेती की दीवार हो, हवा लगे ढह जाय।
ओछे की ज्यों दोस्ती, स्थाई न रह पाय।।
कर्म करो औकात भर, कार्य सफल निति होय।
गर सीमा बाहर हुए, हंसी करें सब कोय।।
मदिरा सेवन के किये, मान जाए तब टूट।
धन-बल यश का नाश हो, प्रेम सबों से छूट।।
समय अपव्यय मत करो, यह जीवन का सार।
समय गये मिलता नहीं, फिर जीवन निस्सार।।
हीरो बनना सीख तू, जीरो को कर दूर।
जीरो यदि खोया नहीं, हीरो चकनाचूर।।
देखो अच्छा सब जगह, अच्छा बनना सोच।
अच्छा करना कर्म सब, बुरा न रखना सोच।।
लूट किया सब बेशरम, छिपा बेशर्म ओंट।
बना बेशरम लाज ताज, गया बेशर्म सोंट।।
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✍️ राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)
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शनिवार, जनवरी 17, 2026

मुक्तक : रजनीश कुमार


कविताएँ — रजनीश कुमार जायसवाल

कविताएँ — रजनीश कुमार जायसवाल

कौन धुलेगा...? तुम्हारा पाप! पीड़ित जनता!! और शोषण से तपाए लोग!! कौन...? कब तक तड़पाएगा वह... हम निरीह प्राणियों को?
देखिए! टोपीधारियों को — निर्लज्ज! भकोस रहे हैं गरीबों की माटी को। पसीना गाढ़ा करना इन्हें क्या मालूम, अपनी बचाकर खेलते हैं दूसरों के फूलों से।
मेरे देश की घानी में तेल नहीं, गुलेल निकलते हैं... कभी वाणी-विष के, तो कभी निशाचरों के धारदार... नाखूनों से बोलती ज़हर की हिंसक ध्वनि।
आंधियों के लप्पड़ से देह सूखी डालियों की तरह चरमर हो गई है, और नीले रंग के गरीबी के थप्पड़ उभर गए हैं।
शोषणाधारियों के मुख में सड़े दही की गंध और गोबर की चोंथ उसी तरह शोभित है, जिस तरह पानी में सड़ने वाले चमड़े और मरे मच्छरों की लादियाँ।
फेसबुक टाइमपास का वह दाना है जिसे रोपित करने पर केवल मनरस के पौधे ही तैयार होते हैं। कैक्टस की तरह हमारे सुसमय को सोखकर यह हमारे उर्वर जीवन को बंजर बना देती है।
हवा की बदबूदार ‘सुगंध’, सड़े मवेशियों की मीठी गंध उन्हें समर्पित है जो दिन को रात और रात को दिन बड़े चावभरे प्रमाद से उच्चारते हैं।
फटे-बदहाली में अमीरी की कहावत ज़हर की पुड़िया है। ये नखविषधारी कौन हैं? मेरे देश की भाषा मौन है।
मैं नहीं टोहता सौंदर्य को, टाँकता हूँ मैं लोगों के मन को। हवा की सफ़ेदी से जलाता हूँ बुझी बत्तियों को।
गरीबी के चेहरे में लाचारी के टिक्के हैं। क्यों उपजाते हैं कुर्सीधारी अपने शोषण के खेत में मक्कारी के दाने?
क्यों निर्धनता की कोख में भूख तीखी होती है? सूझता क्यों नहीं जीवन की बारहखड़ी? ए.बी.सी. की टूटी पगडंडी में ‘ज़ेड’ बड़ी दूर है।
रजनीश कुमार जायसवाल
ग्राम + पोस्ट: झारा, तहसील: सरई
जिला: सिंगरौली (म.प्र.)
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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...