रविवार, जनवरी 18, 2026

नीतिपरक दोहे – राम सहोदर पटेल
*नीतिपरक दोहे*
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बातन से बातें बने, बातन बात नशाय।
बातन से गौरव मिले, बातन लात दिलाय।।
फरिका करत बयान है, भीतर की सब हाल।
ताल नीर मैलो दिखा, प्यास भगे तत्काल।।
मन मैंला जब होत है, बाहर से दिख जात।
कूड़ा दरवाजा पड़ी, भीतर की क्या बात।।
दरवाजे कचरा पड़ा, भीतर कचरा होय।
भीतर वाहर एक सम, जान परत सब कोय।।
अनपढ़ की संगोष्ठी, अरु दुर्जन का साथ।
जबरा केरी मित्रता, निश्चित करें विहाथ।।
अहं प्रेम दोनों अरी, दोनों रहें न संग।
एक रहे दूजा भगे, या होबेगा जंग।।
एक बेर तरु के लगे, बेर-बेर फल होय।
फल चाखे नर तोष से, सिद्ध जनम फल होय।।
विनय सहोदर करत है, जाय सहोदर पास।
मोहि सहोदर मान कर, राख सहोदर खास।।
चंचल मन चंचल सदा, रहे न स्थिर जान।
चंचल जल की भांति है, संयम से रख ध्यान।।
मानुष पानी के गये, बैठन को नहीं ठौर।
पानी जतन बचाबहू, गर चाहो निज मौर।।
अंबर घन बरसे बरुण, गिरि पीतांबर धार।
अंबर भी भीगा नहीं, इंद्रदेव गे हार।।
चिकनी चुपड़ी बात में, छिपी कपट जंजाल।
सुंदर फूल गुलाब के, कांटे खींचें खाल।।
जान हथेली पर लिए, सीमा पर जो ज्वान।
धन्य मात वह जन्म दे, किया बड़ा एहसान।।
कड़वी बोलन की सजा, खीरा जैसा होय।
अलग किया सिर काटकर, निंदत हैं सब कोय।।
अहंकार दुश्मन बड़ा, करे समूल विनाश।
धरा रह गया राजपद, दुर्योधन के पास।।
नारी के अपमान से, बच नहीं पाया कोय।
चीर हरण के कारणे, दुर्योधन गया खोय।।
रेती की दीवार हो, हवा लगे ढह जाय।
ओछे की ज्यों दोस्ती, स्थाई न रह पाय।।
कर्म करो औकात भर, कार्य सफल निति होय।
गर सीमा बाहर हुए, हंसी करें सब कोय।।
मदिरा सेवन के किये, मान जाए तब टूट।
धन-बल यश का नाश हो, प्रेम सबों से छूट।।
समय अपव्यय मत करो, यह जीवन का सार।
समय गये मिलता नहीं, फिर जीवन निस्सार।।
हीरो बनना सीख तू, जीरो को कर दूर।
जीरो यदि खोया नहीं, हीरो चकनाचूर।।
देखो अच्छा सब जगह, अच्छा बनना सोच।
अच्छा करना कर्म सब, बुरा न रखना सोच।।
लूट किया सब बेशरम, छिपा बेशर्म ओंट।
बना बेशरम लाज ताज, गया बेशर्म सोंट।।
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✍️ राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)
[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर email करें।]

1 टिप्पणी:

रजनीश रैन ने कहा…

नीति से पगे बयान कितने रोचक हैं....
धन्यवाद सर

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