रविवार, जुलाई 18, 2021
कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी
कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी
किसी ने ठीक ही लिखा है कि जिंदगी कर्कश अनुभवों का पहाड़ होती है।अलग बात है कि इस पहाड़ पर कहीं कहीं सुख के कुछ सुकोमल डूब भी उग जाते हैं। सुख की इन्हीं चंद दूबों की चाहत में उम्र बीत जाती है।ऐसा ही है वर्तमान समय जब हम महामारी से जूझते हुए,अपनों को खोते हुए भी साहस और धैर्य जीवन के प्रति रखते हुए आशा की किरण खोजने में लगे हुए हैं। कोविड का पहला मरीज जनवरी 2020 में केरल में पहचान में आया,फिर तो मार्च,20 से लॉक डाउन की स्थिति और संक्रमितों की संख्या बढ़ने का सिलसिला,उसी दौरान महानगरों से कामगारों का अपने गांव घर जल्दी से पहुंचने की जो आपाधापी हुई वह महामारी से भी ज्यादा भयावह।ऐसी भागदौड़ देश के विभाजन के समय रही होगी।उसके बाद का यह मंजर तो बहुत खौफनाक था।समय बीता, महामारी की रफ्तार सुस्त पड़ते ही लोगों की जिंदगी अपने पुराने ढर्रे की ओर अग्रसर ही हो रही थी,कामगार पुनः अपने काम की तलाश में शहरों की ओर वापस जा ही रहे थे,कुछ पहुंच भी गए थे कि तब तक दूसरी लहर का प्रचंड रूप से प्रकट हो जाना,प्रलय के समान ही हो गया। लोक और तंत्र दोनों मस्त थे और आत्ममुग्ध होकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि मित्रों दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा सबसे कम हानि भारत में हुई। लेकिन दूसरी लहर ने बहुत ही भयावह स्थिति पैदा कर दी, सरकारी प्रबंध की कलई खोलकर रख दिया।ऑक्सीजन के लिए लोग पागलों की तरह घूम रहे थे। मरीज बेड की तलाश में अस्पताल में और परिजन दवाओं और ऑक्सीजन की तलाश में बाजार में। लाशों का अंबार लग गया, मनमाने दाम पर लोग परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए मुंहमांगी कीमत चुकाने को तैयार ही नहीं हुए बल्कि अंतिम संस्कार किए।कुछ को तो,सरकारी अधिकारियों ने जेसीबी की सहायता से गंगा में उतराये शवों को गंगा किनारे दबा दिया,जिसका वीडियो सभी ने देखा।मरने के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं हो सका।मुखाग्नि क्या दो मन लकड़ी की चिता भी नहीं मुअस्सर हुई।
इतनी पीड़ा और बेबसी कभी नहीं दिखी।हमारी पूरी मशीनरी उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में व्यस्त थी,जनता भी उसी में मस्त थी,मरीज और परिजन बेहाल थे,लेकिन मजबूर और बेबस थे।पांच राज्यों के विधान सभाओं ने भी आग में घी का काम किया।मद्रास उच्च न्यायालय की टिप्पणी कि इन मौतों के पीछे "चुनाव आयोग अकेले जिम्मेदार है",उसके ऊपर हत्या का मुकदमा चलाया जा सकता है, काबिले गौर है।ठीक उसी राह पर योगी जी का हठ योग कि कावंड यात्रा आयोजित की जाएगी और बार बार उत्तराखंड के नव नियुक्त मुख्यमंत्री जी को भी कावड़ के लिए तैयार करने का प्रयास किसी तुगलकी फरमान से कमतर नहीं दिखता।ऐसे समय में जब अभी काशी दौरे पर आए मा प्रधानमंत्री जी ने तीसरी लहर के आगमन से लोगों को सचेत और ढिलाई न बरतने का साफ साफ संदेश उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री जी के समक्ष दिया।उन्होंने कहा कि देश आज ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहां तीसरी लहर की आशंका लगातार जताई जा रही है।लेकिन कावड़ यात्रा में युवाओं का बहुत बड़ा समूह आता है,भगवा परिधान ही नहीं बल्कि कावड़ व लोटा जिसमें गंगाजल भरते हैं,वह भी बहंगी समेत उसी रंग में रहता है।उससे एक परिवेश निर्मित होगा,जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रदेश में आसन्न चुनाव में एक बड़ा वोट बैंक साबित होगा।कुल मिलाकर लोक की चिंता कम,तंत्र की ज्यादा।यह स्थिति बहुत भयावह होगी।भला हो मा उच्चतम न्यायालय का जिसने स्वत:संज्ञान लेकर कावड़ यात्रा के संबंध में सरकार से अपनी स्थिति को 19 जुलाई तक स्पष्ट करने के साथ ही यह भी पीठ ने कह दिया कि यदि सरकार फैसला लेती है तो ठीक है नहीं तो हम आदेश देंगे।ऐसी कड़ी टिप्पणी मा न्यायालयों को क्यों करनी पड़ रही है,क्या यह कहीं न कहीं से सरकारों का जनता के हित व उनके कल्याण से अनदेखी तो नहीं है?आम जनमानस के स्वास्थ्य और जान माल का ख्याल नही है?इस पर हमें विचार करना चाहिए।भारतीय संस्कृति की सम्यक विकास की अवधारणा रही है वह स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए मानव के सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित करे।किसी समाज को सभ्य तभी कहा जा सकता है या कोई देश तभी प्रतिष्ठित कहलाता है,जब उसका सर्वांगीण विकास हो।हमें तो ऐसा लगता है कि अपनी अपनी आस्था को कायम रखते हुए घर पर अपना कार्य करते हुए, सुरक्षित रहते हुए अपने आराध्य का ध्यान पूजन करें।अपना कार्य करना भी इबादत ही है।शास्त्रों में कहा गया है कि कर्म ही पूजा है।सरकार को भी पूरा ध्यान टीकाकरण और स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ बनाने पर अपना ध्यान पूरी मुस्तैदी से केंद्रित करते हुए,शिक्षा संस्थाओं के संचालन को सुगम और सफल बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगानी चाहिए।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं.ब्लॉगर टीम का सहमत होना आवश्यक नहीं)
डा ओ पी चौधरी
समन्वयक,अवध परिषद उत्तर प्रदेश;
संरक्षक, अवधी खबर,सम्प्रति एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग, श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
शनिवार, जुलाई 17, 2021
अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर गीतिका छंद में कविता
(अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर कविता)
Ashok Tripathi "Madhav" ki Barish par Kavita)
आधार छंद-गीतिका
नहीं बरसना था तो बादल
क्यूँ निकले थे घर से।
कृषि कर्षक सब जीव जगत के
बूँद-बूँद को तरसे।।
जेठ मास में कीच मचाया,
आर्द्रा में नहिं बूँद गिराया।
उमस कड़ी गर्मी दम तोड़े
बरसो तो मन हरषे।।
घर के अन्न खेत में पहुँचे,
खाली हुए भँडारे।
अब तो रहम करो हे बादल,
मिटे गरीबी सर से।।
देर हुई सब नाश करो मत,
इतना मत तड़पाओ।
उबरे नहीं अभी कोविड से,
तुम उधेड़ते चरसे।।
बिन पानी के जग है सूना,
मुश्किल जीवन जीना।
पुनर्वसु ने बहुत रुलाया,
पुख्ख सुख्ख से बरसे।।
लाज रखो निज जलद नाम का,
माधव विनती करता।
टूट चुका मानव मानो तुम,
अब भीतर बाहर से।।
अशोक त्रिपाठी "माधव"
शहडोल मध्यप्रदेश
बरसि जई घनस्याम: अशोक त्रिपाठी "माधव"
(अशोक त्रिपाठी 'माधव' की बारिश पर बघेली कविता)
(Ashok Tripathi 'Madhav' ki baarish par bagheli kavita)
बरसि जई घनस्याम
जेठ मास मा चहला कीन्हेन,किहेन असाढ़े घाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।
दिहेन खेत मा खादा करसी,
तबहूँ घाम उधेरिसि चरसी।
फेकेन खेते अन्न घरे कय,
सोचे रहेन जो थोरौ बरसी।
लटे लम्मरे कइसौ-मइसौ
जइहीं बिजहा जाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।
अरहर उरदा तिली बोबायन।
सोयाबीन मूँग छिटबायन।।
खादि खितिर चउगिरदा बागेन।
तबहूँ भरे मा निन्चय पायन।।
कोटेदार सेल्समैनन से,
कीन्हेन ताम-झड़ाम।।
आय के बरसि जई घनस्याम।।
जब ते जनबुध भये रहेन ते।
जेतना जोरे धये रहेन ते।
कुछ लड़िकन के खाता माहीं,
फिक्स-डिपाजिट कये रहेन ते।
सगला खरच दिहेन बिजहा मा,
बचा न एकौ दाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।
अद्रा मा नहिं बूँद गिराया।
पुनरबसू मा खूब तिपाया।
थरहे रहेन धान बंधी मा,
ओहू का खुब नगदि जराया।
त्राहि मची है चारिउ कइती,
रोट लेबाला सबै चढ़ायन,
तबौ किहा नहिं काम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।
अब ता चिरई लीलय काँकर।
परा हबय किसमत मा पाथर।
माधव मरै बिपति के मारे,
मरे जात हें गोरुअउ राकर।।
सगले लड़िका खटिआ पकड़े,
दीदिउ हबय बेराम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।
बिनती सुनी रहम कइ देई।
धरती का शीतल कइ देई।
बरसि के सबके जान बचाई,
पुनि के चकाचक्क कइ देई।।
जब तक जिअब करब नित पूजा।
हे सीता पति राम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।
अशोक त्रिपाठी "माधव"
शहडोल मध्यप्रदेश
मन के पतंग -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)
मन के पतंग
-रजनीश
(हिंदी प्रतिष्ठा)
गीत हैं, गुलाल हैं बच्चे
धरा के नूतन पैगाम
हैं बच्चे
जब ये गीत मधुर पिरोते
हैं
ऐसा लगता है सुर
के ताल हैं बच्चे
कुमकुम, चंदन सरीखे सुगंधित
हैं
“मिट्टी और श्रम”
के पहचान हैं बच्चे
अपनी मस्ती की
पाठशाला में
अपने मन के मुस्कान
हैं बच्चे
जब कभी ये पतंगें
उड़ाते हैं
लगता है ऊँचाइयों
के सलाम हैं बच्चे
जिनको “नीति” से
पगे संदेश मिले हैं, वे
हर जगह सम्मान
हैं बच्चे
क्या फूलों को
बोलते किसी ने देखे हैं?
मधुर, सुहावने, हृदय के वरदान हैं बच्चे।।
💐 सम्पूर्ण बाल-मंडली को सादर
समर्पित💐
बुधवार, जुलाई 07, 2021
सरकारी वन महोत्सव एवम् सामाजिक उत्तरदायित्व–डा ओ पी चौधरी का पर्यावरण के संबंध में आलेख
सरकारी वन महोत्सव एवम् सामाजिक उत्तरदायित्व–डा ओ पी चौधरी
वन को हम फॉरेस्ट से समझें तो लैटिन शब्द के फोरिस से निर्मित,जिसका अर्थ है गांव के सीमा या चारदीवारी से बाहर की समस्त भूमि,जिस पर खेती न की गई हो तथा जो निर्जन हो।अब वन से तात्पर्य है कि जिसका उपयोग वानिकी के उद्देश्य से किया गया हो।वन किसी भी राष्ट्र की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा है और प्रकृति की मनोरम विशिष्टता है।वनों के महत्व को दर्शाते हुए कहा जाता है ," वन से जल,जल से अन्न, अन्न से जीवन"इसी तर्ज पर अब हम कहने लग गए हैं कि जल ही जीवन है।वन को लोगबाग हरा सोना भी कहते हैं।यह हमारे जीवन को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।हमें एक और इनसे फल,इमारती लकड़ी,पशुओं का चारा,पक्षियों का भोजन आदिअनेक चीजें प्राप्त होती हैं,वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को स्वच्छ,समृद्ध,मिट्टी के कटाव को रोकने व उसमें नमी बनाए रखने का कार्य करते हैं।ऑक्सीजन को बहुततायत मात्रा में प्रदान करने वाले ये वन हमारे जीवन के अविभाज्य अंग सरीखे हैं। कोरोना महामारी में ऑक्सीजन के लिए जो आपाधापी मची थी,उससे हमे सबक लेकर अधिक से अधिक वृक्षारोपण और उनका संरक्षण करना चाहिए।यह हमारा सामाजिक और नैतिक दायित्व है।
सरकारी वन महोत्सव जो प्रदेश सरकारें आयोजित करती हैं,उसकी एक बानगी देखी जाए।उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वृक्षारोपण जन आंदोलन-2021 के तहत बृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम 04 जुलाई,2021 को महामहिम श्री राज्यपाल जी ने पहूज नदी,सिमरधा डैम,झांसी तथा मा मुख्यमंत्री जी ने पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बड़ाडांड,बल्दीराय,सुल्तानपुर से वृक्षारोपण कर वन महोत्सव का आगाज किया गया।सम्प्रति यह भी निर्देश/आग्रह किया गया है कि "मेरा पेड़ –मेरा साथी" से संबंधित फोटो व वीडियो अपलोड करें।साथ ही प्रदेश में इस सीजन में 30 करोड़ वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा गया है।04 जुलाई को 12 घंटे में 25 करोड़ पौधे लगाए गए।इसी तर्ज पर 2017 18 में 5.71 करोड़,2018 19 में 11.77 करोड़,वर्ष 2019 20 में 22.60 करोड़,2020 21 में 25.87 करोड़ पौधे तथा इस वर्ष 2021 22 में 30 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य है।इस तरह पांच वर्षों में सरकार ने कुल 95.95 करोड़ पौधे लगाए गए, उत्तर प्रदेश सरकार के वन मंत्री श्री दारा सिंह चौहान ने वन विभाग के मुख्यालय में पत्रकार वार्ता में बताया है कि मा मुख्यमंत्री जी ने 100 करोड़वा हरिशंकरी का पौधा रोपित किया है।इससे स्पष्ट है कि इस सरकार में 100 करोड़ पौधे केवल सरकारी महकमों ने लगाए हम जैसे लाखों लोगों की जो अपने से लगा रहे हैं,उनकी गिनती नहीं है,और पूर्ववर्ती सरकारों ने भी ऐसे ही योजना बद्ध तरीके से वृक्षारोपण अभियान चलाया था।लेकिन सरकार द्वारा रोपित इसमें से कितने पौधे बचे हैं,इसका अभी तक विवरण प्राप्त नहीं हुआ है,इस ओर ध्यान देकर हम कम खर्च में अधिक पौधो को सुरक्षित रख सकते हैं।मुझे भी वृक्षारोपण का शौक बचपन से ही है( 1971 में बांग्ला देश बनने की खुशी में अपने अग्रज स्मृतिशेष डा घनश्याम चौधरी की प्रेरणा से पहला पेड़ आम का लगाया था),तबसे अभी तक विराम नहीं लिया है,अब यह मेरे जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा हो गया है।लेकिन एक पेड़ को लगाकर उसे बड़ा करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है,बहुत सारा वक्त लगता है,फिर वह पौधा पेड़ बनकर समस्त प्राणियों को शुद्ध ऑक्सीजन, पुष्प व फल प्रदान करता है। एक पेड़ अपने जीवनकाल में लाखों लीटर ऑक्सीजन के साथ आजीविका के दर्जनों साधन,जहर सोखने की क्षमता,ठंडक,छाया,औषधि,फल-फूल, ईंधन, इमरती लकड़ी,और जीवन भर सकून देने के साथ ही हमारे मन को प्रफुल्लित करता है,उमंग और जोश से भर देता है।ऐसी ही अभिव्यक्ति,हमारे मित्र और प्रधान न्यायाधीश,पारिवारिक न्यायालय हरदोई श्री एम पी चौधरी,जो स्वयं वृक्षारोपण का शौक रखते हैं,कहते हैं कि अपने द्वारा रोपे गए पेड़ में जब पहला फल लगता है तो उसे देखकर उतनी ही खुशी होती है, जितनी पहली बार तनख्वाह मिलने पर होती है,व्यक्त करते हैं।पेड़ लगाना अच्छा कार्य है,उससे भी महत्वपूर्ण उसे बचाना है,उसकी परवरिश है। अन्यथा एक पौधे की हत्या उसके बाल्यकाल में ही कर देना है,यदि हमने उसे लगाकर केवल छोड़ दिया।हमने अपने आस- पास जो देखा है वह पौधों की बाल हत्या ही ज्यादा हो रही है।किसान या कोई भी व्यक्ति प्रति वर्ष 2 –4 पौधों को ही लगाने और उसे सुरक्षित रखने में पसीना छोड़ देता है,छुट्टा जानवरों व घड़रोज की बाढ़ सी आ गई है,देखते ही देखते वे इन पौधों को नष्ट कर देते हैं।फिर जिसे लोग लगाकर फोटो/वीडियो बनाकर चले जाते हैं,फिर उनका क्या हश्र होता होगा? कभी सोचा या देखा? एकइसलिए जितने बड़े पैमाने पर सरकार वृक्षारोपण करती है,उतने पौधों को जिंदा और सुरक्षित रख पाना एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है।बावजूद इसके वन महोत्सव कार्य एक बहुत ही सराहनीय कदम है,पर्यावरण को स्वस्थ व स्वच्छ बनाने का,इसे जनमानस से जोड़कर एक जन आंदोलन का रूप देना होगा।लोगों को उनके सामाजिक दायित्व का एहसास कराना होगा।तभी सही मायने में वन महोत्सव की सरकार की योजना परवान चढ़ेगी।सरकार के कुछ अधिकारी गण पर्यावरण को लेकर बहुत संवेदनशील हैं।ऐसे ही संवेदनशील व्यक्तित्व हैं श्री सिया राम वर्मा जी,एआर टी ओ,प्रयागराज,
जिन्होंने न केवल अपने कार्यालय को ही हरा भरा कर दिया अपितु अपने गृह जनपद में भी अभियान चलाकर वृक्षारोपण के पुनीत कार्य को अंजाम देकर,प्रकृति की गोंद को सजोने का कार्य करते आ रहे हैं।
विश्व के कुछ देश ऐसे हैं जहां बिना पौधारोपण किए विद्यार्थियों को उपाधि नहीं प्रदान की जाती है।हमारे पूरे प्रदेश में स्नातक द्वितीय वर्ष में पर्यावरण एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है,लेकिन प्रत्येक विद्यार्थी को छोड़ दीजिए 100 में ही एकाध मिलेंगे जो सचेत होंगे पर्यावरण के प्रति,लगभग कमोवेश यही हाल हम शिक्षकों का भी है। हमें वनों के प्रति ज्यादा सजग व संवेदनशील होने की जरूरत है,क्योंकि वन ऑक्सीजन के संचित कोष स्थल हैं जो कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित कर हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं तथा पर्यावरण में विविध गैसों का संतुलन बनाए रखते हैं।आजकल मियावकी तकनीक से हम कम क्षेत्रफल में अधिक पेड़ लगा सकते हैं।इस पद्धति में पौधों को एक दूसरे से बहुत कम दूरी पर लगाया जाता है,जिससे पौधे अगल बगल की अपेक्षा केवल ऊपर की ओर सूर्य की रोशनी प्राप्त कर बढ़ते हैं।प्रयागराज नगर निगम द्वारा इस विधि से पौध लगाने की घोषणा की गई है।केरल सरकार द्वारा इस विधि को अपनाया गया है।इस पद्धति से एक हेक्टेयर में दस हजार तक पौधे लगाए जा सकते हैं।वन अनेक जीव जंतुओं व पशु पक्षियों के आश्रय स्थल हैं जो पारस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में हमारी मदद करते हैं।जल के प्रवाह को कम करके मृदा अपरदन को रोकते हैं।वायु प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण,जल प्रदूषण को नियंत्रित करने में वनों की महत्व पूर्ण भूमिका होती है।हमारी अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ करते हैं।मानव के लिए वन संपदा अमृत के समान है।इसका संरक्षण व संवर्द्धन हम सभी का सामाजिक और नैतिक दायित्व है।
डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
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