बुधवार, जनवरी 27, 2021

जाके पांव न फटे बिवाई, का जाने ते पीर पराई- ओम प्रकाश चौधरी

जाके पांव न फटे बिवाई, का जाने ते पीर पराई(कहानी)- ओम प्रकाश चौधरी   

 आज कुछ मित्र हमारे विभाग में आ गए बोले चौधरी साहब ठंड बहुत है,हीटर या ब्लोअर नहीं रखे हैं। कैसे इतनी ठंडक में कार्य कर रहे हैं? मैंने कहा कि मैं ठेठ गांव वाला जो ठहरा, मूलत: किसान हूं,कैसे भी रहने का अभ्यस्त हूं।असली ठंड देखनी हो तो हमारे गाँव में चलें, मैं इस कड़कड़ाती ठंढ की एक झलक दिखाता हूं।विगत कई दिनों से हाड़ कॅपा देने वाली कड़ाके की ठंढ पड़ रही है ।शहर और बड़े-बड़े महानगरों में,क्या कस्बों में भी रहने वाले लोग हीटर,गर्म हवा देने वाला ब्लोअर चलाकर रजाई और कंबल में दुबककर आराम से रात में सो रहे हैं और 26 - 27 नवंबर,2020 की रात से 60 से भी अधिक दिनों से लगातार दिल्ली सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन से लेकर ट्रंप - बाइडेन व देश-विदेश की चर्चा करने में मशगूल हैं।दिन में ऑफिस में भी हीटर आदि लगाए हुए हैं।दूसरी ओर भारत की एक बहुत बड़ी आबादी जो गावों में रहती है और उनका जीवन यापन खेती - किसानी पर ही आश्रित है।आज भी उनमें से एक तबका ऐसा है जो कि फटे-पुराने चद्दर/कंबल को ओढकर इस कड़ाके की ठंढ में भी रात भर जागकर भोर तक खेतों में गेहूं की सिंचाई कर रहा है,मिट्टी में पाहा मुठियाने के वक्त वर्फ़ जैसा ठंडा पानी हाथ की अंगुलियों को सुन्न कर देता है,संज्ञा शून्य हो जाती हैं, फिर आग जलाकर सेंकने के बाद ही उंगुलिया सीधी होती हैं, फिर गीली होकर वैसी ही हो जाती हैं,यह क्रम रात में कई बार दुहराना पड़ता है।उसकी मजबूरी है,क्योंकि रात में ही अक्सर बिजली आती है।इतने के बाद भी जब फसल थोड़ी तैयार होने लगती है तो छुट्टा पशु और नील गाय(सियार, साही,जंगली सुअर भी कभी कभार आ ही जाते हैं) पूरी फसल बर्बाद कर देते हैं।किसान दिन भर व रात में जागकर इन छुट्टा जानवरों से अपनी फसल की रक्षा के लिए तत्पर रहता है, फिर भी फसल चर ही जाते हैं।इसका अनुभव मुझे भी है घर (गांव)जाने पर रतजगा करना ही पड़ता है,अभी 23 जनवरी की रात 9.30 बजे बिस्तर में घुसकर अपने मित्र डॉ अनिल जी से बात कर ही रहा था कि सामने जौ के खेत में छुट्टा जानवरों का झुंड टूट पड़ा, मैंने मित्र से कहा कि फोन रखा जाय अब साड़ भागने जायेगे, बोले इतने ठंड में, मैंने कहा जी सर , और लाठी उठाकर भतीजे शिशिर को लेकर चल पड़ा, यह रोज की बात है, में तो केवल एक रात की बात कर रहा हूं।मेरे तो घर के बिल्कुल सामने ही खेत है,परन्तु विगत तीन वर्षों से मटर और अरहर की एक फली भी मिलनी मुश्किल हो जाती है।यही हाल मेरे ही नहीं लगभग सभी गांवों का है, कहीं - कहीं पर तो रखवाली के लिए युवाओं की टीम बनी हुई है।कौन कहता है कि बेरोजगारी है, दिन में खेत में काम, रात में जानवरों को भगाने का काम।इन सब कष्टों और मुसीबतों को झेलते हुए जब किसी तरह बची - खुची फसल तैयार होती है और कटाई के पश्चात खेत - खलिहान से घर आ जाती है,तो शुरू होता है उसे बेचने के लिए जद्दो- जेहाद।सरकारी क्रय केंद्रों पर अनाज बेचना कितना बड़ा काम है,इसका उल्लेख भुक्तभोगी ही कर सकता है।हमारे पड़ोस के गांव के एक किसान 3 रात और 4 दिन धान क्रय केंद्र पर रहे, तब कहीं जाकर धान बेच पाए। इसी में उनकी गेहूं की बुवाई में भी विलंब हुआ,और गन्ने की पर्ची भी घायल हो गई। मैं तो इस बार लगातार धान बेचने हेतु 5 नवंबर,2020 से लगा हुआ था, कि क्रय केंद्र कहीं नजदीक में स्थापित हो जाय, क्योंकि अभी जो सरकारी क्रय केंद्र है वह 12 किमी की दूरी पर है।फिर धान बेचने के फिर में पड़ा,जिला प्रशासन से सरकार तक पत्र लिखकर निवेदन किया,लेकिन सफलता नहीं मिली।अंत में थक - हारकर बिचौलियों को ही औने - पौने भाव पर खतौनी, पासबुक, आधार की प्रति देकर बेचना ही पड़ा।रुपया खाते में आएगा, आंकड़ा प्रस्तुत कर सरकार और सरकारी अधिकारी खुश होंगे कि इतने किसानों के खाते में ,इतनी धनराशि आई, लेकिन यह हम किसान ही समझ पाते हैं कि वास्तव में हमें मिला कितना,यह दर्द वही महसूस कर सकता है ,जिसने भुक्ता हो।किसानों को तो ऐसा ही जीवन व्यतीत करते हुए पूरा जीवन बीत जाता है।बच्चों की पढाई - लिखाई,इलाज,कपड़ा - लत्ता के लिए, उसके पास कुछ रहता ही नहीं है।ऐसे ही नहीं लोग किसानी छोड़ शहरों के तरफ भाग रहे हैं, गांव उजड़ रहे हैं,उसके पीछे सरकार की नीतियां भी हैं।बिहार प्रदेश में केंद्र सरकार की सहयोगी पार्टी जनता दल यूनाइटेड की सरकार है, उस दल के प्रधान महासचिव के सी त्यागी जी ने अभी 24 जनवरी को लखनऊ में माननीय मुख्यमंत्री योगी जी से मिलकर "किसान आंदोलन को जायज ठहराया और कहा कि केवल 18 से 20 प्रतिशत की खरीद ही एम एस पी से होती है।इसके बाद की सारी खरीद बाज़ार के हवाले है।वहां की लूट से किसानों को कैसे बचाया जाए, यह भी ध्यान देने की बात है"(हिन्दुस्तान, 25 जनवरी,2021)। ऊपर से यह किसान बिल जिसे किसान लागू ही नहीं होने देना चाहता है, और सरकार है कि उस पर जबरदस्ती थोप रही है, जो हम किसान लेना नहीं चाहते वह जबरदस्ती दे रही है। कड़ाके की ठंड में भी किसान सड़क पर डटे हैं, 78 किसानों की बलि इस आंदोलन को चढ़ चुकी है,अभी आगे क्या होगा अनिश्चितता के गर्भ में छिपा हुआ है,बड़ा दर्द है,मंजर खौफनाक है, अन्नदाता बेहाल है। शशि शेखर जी लिखते हैं कि हर रोज दो से ढाई हजार धरती - पुत्र अपनी मिट्टी छोड़कर दूर - दराज के शहरों में मजदूरी के लिए बाध्य हो रहे हैं।अगर मौजूदा व्यवस्था इतनी ही कारगर है, तो फिर हमारे गांव उजड़ते क्यों चले गए?(हिन्दुस्तान,17 जनवरी,2021)।लेकिन धरती पुत्रों का धैर्य काबिले तारीफ है,दर्जनों बार की वार्ता का दौर विफल रहा, आगे अभी फिर होगी।बड़े - बड़े भवनों,ऊँची-ऊँची इमारतों में रहने वाले लोग क्या जाने कि गाँव में रहने वाले लोग कैसे अपना गुजर-बसर करते हैं,जिनका एक मात्र पेशा कृषि ही है।यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है - "जाके पाँव न फटे बिवाई का जाने ते पीर पराई"।जोहार किसान!जोहार प्रकृति!
//रचना//
ओम प्रकाश चौधरी 
ग्राम - मैनुद्दीनपुर,जलालपुर, अम्बेडकरनगर
मो : 9415694678
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