शनिवार, जनवरी 24, 2026

श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें: कविता

विषय - श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें

दुष्ट की दुष्टता कभी जाती नहीं,
चाहे कितनी भी विद्या सुशोभित करे।
विष को विषधर न छोड़े किसी हाल में,
क्यों न मणि ही वह मुख में सुशोभित करे।

समझो दारा पराई सदा मातृ सम,
न परद्रव्य हरगिज सुशोभित करे।
मन में सोचो सदा कार्य अच्छा बने,
श्रेष्ठ उद्यम ही मन में सुशोभित करे।

सुस्त सोने से सिद्धि नहीं मिलती कभी,
सिद्धि चाहो तो जागृति सुशोभित करे।
आत्म सम सभी प्राणियों को समझो सदा,
खुदा खुद ही खुदाई सुशोभित करे।

मुख से वाणी निकालो सदा छानकर,
वाक्य वेदों के दिल में सुशोभित करें।
आचरण को सुधारो मणि की तरह,
सभी लोहा को सोना सुशोभित करे।

कार्य संभव हो, निश्चित उसी को करो,
दुविधा वाले कर्म न सुशोभित करें।
मन मरुस्थल न बन जाए संयम बिना,
शीलता, नम्रता, सत्य सुशोभित करें।

समय नाहक न खर्चो, ये मिलता नहीं,
समय जीवन समझकर सुशोभित करो।
अच्छा देखो सदा, सदा अच्छा सुनो,
बनो अच्छा ही अच्छा सुशोभित करो।

तजो जीरो को तुम सदा हीरो बनो,
आचरण से बड़प्पन सुशोभित करो।
क्रोध शत्रु भयानक, रहो इससे बच,
क्षमा करने का गुण ही सुशोभित करे।

कर्म ही पूजा है, धर्म सत्कर्म है,
बस सहोदर की सिखावन सुशोभित करे।


✍️ कलमकार

राम सहोदर पटेल, "शिक्षक"
हाई स्कूल नगनौडी, संकुल - आमडीह
जिला शहडोल (मध्य प्रदेश)

[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर email करें।]

2 टिप्‍पणियां:

रजनीश रैन ने कहा…

👏बड़ा ही प्रेरणादायी और हृदयरंजित रचना....
धन्यवाद सर......हमारे बुद्धिपटल को विस्तारित करने हेतु....👏

बेनामी ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता श्री की कलम से

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