लूट की कला
यदि उन्हें मैं सीधे-सीधे व्यापारी कहता,
वे पुरज़ोर विरोध करते।
मैं इसे गलत नहीं मानता कि वे
धन कमाने में बड़े जतन से लगे हैं।
मेरे आसपास के ही ये लोग
अक्लमंदी की परीक्षा देकर आए थे,
क्योंकि उनके पास सेवा-संबंधी
एक से बढ़कर एक कौशल प्रमाणपत्र थे।
अब जब मैं उन्हें देखता हूँ —
किसी एक को नहीं, सभी को भी नहीं,
परंतु उनमें से बहुतों को —
तो पाता हूँ कि उनकी सारी अक्लमंदी,
उनका सारा कौशल
बस एक ही कला का है —
पैसे कमाने का।
कि वे अनीति का धन
कुछ इस तरह अर्जित करते हैं
कि वह अनीति न लगे।
हालाँकि वे लुटेरे ही हैं, किंतु लूटते नहीं।
पट्टी पढ़ाते हैं कुछ ऐसी,
कि इंसान खुद लुटने को तैयार हो जाए।
वे हाथ बाँधकर, नतमस्तक होकर कहते हैं —
“नहीं, नहीं, यह पाप नहीं करना हमें।”
और इंसान गिड़गिड़ाता है —
“नहीं, नहीं, यह पाप नहीं है,
जब हम स्वयं समर्पित हैं आपके समक्ष।”
यह कौशल इतना व्यापक है
कि इसमें प्रवीण हैं —
छोटे से लेकर बड़े तक,
तंत्र के हर कलाकार।
— सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला शहडोल
ब्यौहारी, जिला शहडोल

1 टिप्पणी:
इस रचना में वास्तविकता की डोर कितनी मजबूत है.... बहुत ही प्रभावी
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