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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...
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राही लौट जा इस राह से बाग में जो फूल खिले थे। अब वह फूल नहीं हैं। मिलने की आस थी जिनकी अब वही मीत नहीं हैं। राही लौट जा इस रा...
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कौन कहता है नहीं बदले हैं हम। सादगी छोड़कर विलासिता में डूबे हैं हम। नए नए अविष्कार करके बहुत आगे हैं हम। वह दौर और था जब, पी...
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हाय! मजदूर की भारी दुर्दशा, धरती न अम्बर में घर बसा । तन, वस्त्र पसीने से भींगे जब होती भारी गर्मी, काम नहीं छोड़ते, चाहे ठंडी मे...
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मैं सड़क हूँ. मैं खराब सड़क हूँ. मेरी महानता मानिए कि लोगों को उनके घरों तक पहुँचाती हूँ. जरा सोचिए, अगर मैं चलती होती तो क्या...
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" मुक्ति का मार्ग शिक्षा" शिक्षा है कल्पवृक्ष , शिक्षा सागर मंथन का सार। शिक्षा से है मुक्ति मार्ग , शिक्षा है ...
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पर्यावरण पर कुछ दोहे: सांसारिक रचना सभी , युक्त संगत ही होय। ये रचना तेरे लिए , कर उपभोग संजोय॥ धरती के उपमान सब , करे भलाई त...
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शिक्षा का उद्देश्य शिक्षा उस कल्पवृक्ष की भांति है जो जीवान्त तक मनवांछित फल प्रदान करता रहता है। शिक्षा से जीवन की सारी मनोकामनाएं सम्पू...
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1. हाइकु:-पिताजी संबंधित ******************* पेड़ की छाया उसके फल-फूल होते हैं पिता। धूप में छांंव गागर में सागर होते हैं पिता। ...
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स्वाभिमान से अत्याचारी, नहीं होंगे ये वचन हमारी। तुम एक दाता;जगत भिखारी, एक खुदा की एक पुजारी। कुटुम्ब कबीला ताना मारे, और क्या त...
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श्रमिक की अंतर्व्यथा हौसला बुलंद कर , निकले थे हम गाँव से। काफिला निकलक , आग बरसाती छाँव से। बहुत गुरुर था इन लम्बे सडको को , ...





1 टिप्पणी:
प्रकृति धरा की शीतल राग में आपने प्रकृति का जो मनोरम चित्रण किया है वह बहुत ही अच्छा है इसे आगे भी जारी रखें | धन्यवाद🙏💕
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