गुरुवार, अप्रैल 23, 2020

अफवाहों पर हत्या और मीडिया की भूमिका :सुरेश यादव


महाराष्ट्र के पालघर में जो हुआ समाज को शर्मशार करता है इससे पहले बुलन्दशहर के पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या, राजस्थान के बूंदी में करतब दिखाने वाले बच्चों की बेरहमी से पिटाई , राजकोट में कचरा बीनने वाले दम्पत्ति की पिटाई कर के हत्या, मनावर में इंदौर के किसानों की हत्या या ऊना में दलित युवकों की पिटाई की घटनाओं सहित अनेकानेक  घटानायें आप के अवचेतन में है तो आप जानते होंगे कि उक्त सभी घटनाओं का एक ही कारण है, "सन्देह"। इस प्रकार की घटनायें  बच्चा चोरी, चोरी, गौवध  के सन्देह के आधार पर कई वर्षों से होती आई हैं।

सोशल  मीडिया के इस दौर में इनकी घटनाओं की पुनरावृति बहुत तेजी से हो रहीं है। लेकिन हम देख रहें हैं, इन घटनाओं की  उत्पत्ति के पीछे  मुख्यधारा के मीडिया  की भूमिका भी संदिग्ध और गैर जिम्मेदाराना है। मैं ज्यादा नही लेकिन इंदौर औऱ रायसेन के ही कुछ उदाहरण आप के समक्ष प्रस्तुत करना चाहूँगा,  जहाँ  दो  फल बेचने वाले लड़कों को लॉकड़ाउन के प्रारंभिक समय में भीड़ ने उनकी गलत पहचान के आधार पर पीट दिया। घटना के बाद उनकी पहचान  हिन्दू निकली लेकिन मुख्यधारा के मीडिया ने उक्त घटना पर  गलत रिपोर्टिंग की और सच्चाई सामने आने पर  कोई सफाई प्रस्तुत नही की। इसी तरह पैसा फेंकने की दो घटनाएँ  मीडिया  में  इस प्रकार रिपॉर्ट  की गईं जैसे किसी ने कोरोना फैलाने के उद्देश्य से नोट फेंके हों,  उक्त दोनों ही घटनाओं में पैसों के दावेदार  एक LPG गैस हॉकर और एक पुलिसकर्मी निकले, लेकिन मीडिया ने उक्त घटनाओं की गलत रिपोर्टिंग  पर कोई  सफाई प्रस्तुत नहीं  की। आज भी वही समाचार कतरने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहीं हैं और नोट फेंकने की तथाकथित अन्य घटनाओं का कारण बन रही हैं। इसी प्रकार रायसेन में फलों पर थूक लगा कर बेचने का जनवरी माह  का वीडियो  कोरोना के दौरान वायरल हुआ और पुलिस ने बुजुर्ग पर प्रकरण दर्ज कर लिया जांच में यह जानकारी मिली कि  यह वीडियो जनवरी माह का है और बुजुर्ग मानसिक बीमार है।

सम्भवतः आपको मालूम होगा, वर्ष 2000 में जब हम नई सदी में प्रवेश कर रहे थे दुनिया भर की एक  सबसे बड़ी अफवाह आकार ले रही थी, ' सदी बदलते ही दुनिया के सभी कम्प्यूटर समाप्त हो जायेगें’ इसे Y2K कहा गया था। इस अफवाह की उत्पत्ति इंगलैण्ड के एक टेबलॉयड (अखबारों का एक प्रकार जो शाम को छपते हैं और उनकी खबरे सनसनी फैलाने का कार्य करतीं है) से हुई थी जिसने एक सॉफ्टवेयर कंपनी के हवाले से यह समाचार छापा था। इस अफवाह का हश्र आप जानते ही हैं।

असल में पालघर जैसी घटनाएँ हमारे समाज की उस विकृत मानसिकता का परिचायक है जो चाहती है कि फैसले का अधिकार भीड़ के पास हो, यह मानसिकता विधि द्वारा स्थापित न्याय और प्रक्रिया में समय व्यतीत नही करना चाहती।

मुझे आशंका है कि लॉकडॉउन के दौरान अविश्वास का जो वातावरण बनाया गया है। लॉकडॉउन के बाद पैसा फेंकने,फलों को दूषित करने या थूकने की घटनाओं के नाम पर कई विवाद होंगे।

आप सभी से निवेदन है कि  आप को किसी पर कोई सन्देह है तो कानून की सहायता लें और उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनने से स्वयं भी बचें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बचाएं।

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

जब कोरोना महामारी से गरीब लोगो को बचाने का पर्याप्त समय था बेहतर रणनिति बनाकर अर्थव्यवस्था को भी संभाला जा सकता था ,तब सरकार विधायको की खरीददारी मे व्यस्त थी और मिडिया भी कोरोना तथा अपना मुल कर्तव्य भुलकर पुत्र धर्म निभा रही थी।

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