संदेश

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। ताही दूर राखे हित होई॥ मित्र करे जो घात पिछारी। ताहि न नियर रखो दिन चारी॥ समझ बूझकर मित्र बनाबहु। ज्यों बाजार में माल पटाबहु॥ सखा रहत सुख-दुख को साथी। ज्यों रवि तिमिर हरे परमार्थी॥ कपट कुचली होय पड़ोसी। रहहु सजग जो अवसर पोसी॥ कबहु न बैर करब काहू से। बैर किये बल घट बाहू से॥ निर्मल मन राखहु सब ही सो। निश्छल प्रेम राख रब ही सो॥ दोहा तन मन निर्मल राखकर, श्रेष्ठ आचरण धार। मधुरी वाणी बांटकर, सबहि जनाबहु प्यार॥ चौपाई झूठ कपट जो लेय सहारा। ताहि न जीवन में भिनसारा॥ मान घटे अपयश है बाढे़। बाह्य आडंबर यदि पग धारे॥ बात बनाबटि काम दिखाबा। ते नर मानव जनम नशावा॥ विश्वास किये विश्वास पनपता। बिन विश्वास न मिले सफलता॥ भाई चारा राखहु सबसो। यदि चाहत उजियारा तम सो॥ जिन मुख दुग्ध कुंभ विष होई। तिन सो दूर रहे सुख होई॥ ...

प्रेम: कविता

प्रेम — राम सहोदर पटेल प्रेम — श्री राम सहोदर पटेल दोहा प्रेम बनाए काम सब, प्रेमहि सुख आधार । वशीकरण यह प्रेम है , प्रेम जीवनाधार ।। चौपाई प्रेम से प्रेम बढ़े दिन दूना। प्रेम बिना यह जीवन सूना।। प्रेम प्रसंग पवित्र पियारा। प्रेम पराग मधुप पग धारा।। प्रेम पियासे सुर नर मुनि सब। प्रेमहि बसी भये खगमृग सब।। प्रेम के बसी होहि भगवंता। प्रेम में रति का बास अनंता। प्रेम से राष्ट्र अमित अखंडा। प्रेम दिलावे नहि कछु दंडा।। दंपति प्रेम कुटुंब सुधारहि। संपत्ति प्रेम शकल निस्तारहि।। कर्तव्य से प्रेम प्रतिष्ठा देई। लोगन प्रेम सुखद फल होई।। प्रेम का भूखा हर नर नारी। प्रेम से मिले महातम भारी।। दोहा जे निज स्वारथ रत रहहि, करे न कछु उपकार। ते नर पशुवत जियत हैं, पावत नहिं सत्कार ।। चौपाई प्रेम सकल रस की है खाना। प्रेमहि बसी होहि भगवाना। प्रेम अकर्षण और उजाला। प्रेम उमग उत्साह का प्याला। प्रेम दिलों दिल क...

कविता: शोभा न पाता है

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शोभा न पाता है बिना आयुध के रन में शूर भी शोभा न पाता है। बिना मंत्री के राजवाड़ा सुशासन कर न पाता है। बिना शक्ति के कोई स्वामी सियासत दुर्ग के बिन हो। बिना दांतों के हाथी भी कभी शोभा न पाता है। बिना बुद्धि के कोई मानव या मानव धर्म के बिन हो। बिना महकाई के फ्लावर कभी शोभा ना पाता है। हो छाया बिन कोई तरुवर जो फल भी दे नहीं सकता। जलासय हो बिना जल के कभी शोभा ना पाता है। बिना लज्जा के कुल की हो वधू , मद के बिना हाथी। बिना नीती के हो राजा कभी शोभा ना पाता है। बधिर होवे अगर मंत्री हो अलसाया स्वयं भूपति। नरमता के बिना शिष्य भी कभी शोभा ना पाता है। लवण रहिता अगर भोजन क्षमा बिन होवे विज्ञानी। बिना रफ्तार के घोटक कभी शोभा ना पाता है। बिना उद्यम के ना खेती बिना पानी के ना फसलें । बिना उत्तम के बीजों के अन्न उन्नत न पाता है।। गगन मंडल बिना तारे प्रखर आभा बिना सविता। बिना सम्मर्द जन मेला कभी शोभा ना...
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तुलना का शोर जिंदगी की असंतुष्टि की सारी वजह, बस एक — बेमेल तुलना है। हर इंसान अपने खालीपन को भरने, झांकता है किसी और की जिंदगी में, जहाँ उसे दिखते हैं रंग, रौशनी, हँसी — और वह भूल जाता है कि हर उजाले के पीछे एक परछाई होती है। वह तुलना करता है अपने खालीपन की, और पाता है दूसरों की झोली में कुछ न कुछ भरा हुआ। फिर मन कह उठता है — “काश! वैसा जीवन मेरा होता।” पर वह नहीं देख पाता, दूसरे की आँखों में छिपा वही खालीपन, जो उसके अपने जीवन से भी गहरा है। एक आदमी देखता है किसी संत को — मौन, शांत, निर्मल। सोचता है, "कितना सुखी होगा यह!" पर वह नहीं जानता, संत का सुख ही नहीं, संत की पीड़ा भी केवल संत को ही मिल सकती है। बाहर दिखती शांति, अंदर तपता हुआ व्रत होती है। एक शासन का सेवक देखता है व्यापारी को, जिसके पास धन की नदी बहती है। वह मन ही मन कहता है, "क्यों मेरी तिजोरी खाली है?" पर वह भूल जाता है — भरी हो ही नहीं सकती, बिना व्यापारी हुए, बिना उसके जोखिम, उसके डर, उसकी नींद और उसकी रातों के जागरण के। हर कोई किसी और का जीवन चाहता है, जैसे कोई बच्चा चाँद को छू...

श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें: कविता

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विषय - श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें दुष्ट की दुष्टता कभी जाती नहीं, चाहे कितनी भी विद्या सुशोभित करे। विष को विषधर न छोड़े किसी हाल में, क्यों न मणि ही वह मुख में सुशोभित करे। समझो दारा पराई सदा मातृ सम, न परद्रव्य हरगिज सुशोभित करे। मन में सोचो सदा कार्य अच्छा बने, श्रेष्ठ उद्यम ही मन में सुशोभित करे। सुस्त सोने से सिद्धि नहीं मिलती कभी, सिद्धि चाहो तो जागृति सुशोभित करे। आत्म सम सभी प्राणियों को समझो सदा, खुदा खुद ही खुदाई सुशोभित करे। मुख से वाणी निकालो सदा छानकर, वाक्य वेदों के दिल में सुशोभित करें। आचरण को सुधारो मणि की तरह, सभी लोहा को सोना सुशोभित करे। कार्य संभव हो, निश्चित उसी को करो, दुविधा वाले कर्म न सुशोभित करें। मन मरुस्थल न बन जाए संयम बिना, शीलता, नम्रता, सत्य सुशोभित करें। समय नाहक न खर्चो, ये मिलता नहीं, समय जीवन समझकर सुशोभित करो। अच्छा देखो सदा, सदा अच्छा सुनो, बनो अच्छा ही अच्छा सुशोभित करो। ...

एक प्रेम गीत

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एक प्रेम गीत कभी वक्त मिले तो आना, दरिया किनारे बैठ तुम्हें, इश्क के अल्फाजों को कविता बना सुनाऊंगा। समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो किसी और का हो जाऊंगा। हां इश्क है, बताया नहीं तुमसे; अगर तुमको था, तो जताया क्यों नहीं तुमने? दिल की बातें तुम सुनती कहां हो? आंखों को मेरे तुम पढ़ती कहां हो? बातों में मेरी तुम उलझती कहां हो? तुम, तुम, तुम... हां तुम! सिर्फ इश्क मेरा तुमसे है। अगर आज मैं बता दूं तो, क्या तुम मेरी हो जाओगी? मेरी आंखें, मेरी बातें, क्या तुम समझ पाओगी? मेरे चेहरे को, क्या तुम पढ़ पाओगी? हां करूंगा इश्क, सिर्फ तुमसे, तुम जता के तो देखो। तुम्हारी सांसों में न पिघल जाऊं तो कहना, तुम्हारी धड़कन न बन जाऊं तो कहना। मैं इश्क का आवारा परिंदा हूं, मुझे अपने...

मन केय पंछी

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मन केय पंछी (अंगिका रचना) चारो तरफ रोशनी, तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय; उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो, मन केय पंछी बहुत अकेला छैय। धुरदा-धुईयां धूप केय साथे, गिट्टी से रिश्ता पैलहियों; हवा मोड़ी केय दौरी घूपी केय, छाया मेय भी हड्डी सुखैलिहों। समय केरो चक्र ऐन्हो चल्लहों, खुद के झोंकी देलहियों; प्लेटफार्म पर खड़े रही गेलहियों; छुटी गैलहों सब गड़िया, की पाय केय रहे, की पाय लेलहियों— सब ताकतेंह रही गेलहियों। चारो तरफ रोशनी, तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय; उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो, मन केय पंछी बहुत अकेला छैय। रचनाकार अंगरक्षक सूरज (सूरज कुमार सोनी) शिक्षा: परास्नातक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) ईमेल: angrakshaksuraj20...