बचपन की बहार : रिश्तेदारों का प्यार बात जुलाई 1985 की है , जब खेलते खेलते प्राथमिक पाठशाला कराहिया ( रीवा जिले के ग्राम बारौ का एक टोला ) पहुंच गया , गणेश पंडित जी स्कूल के फरिकान में पढ़ा रहे थे बच्चों को। मुझे देखा तो इशारे से पास बुलाया (मेरा घर मात्र 200 मीटर दूरी पर था और पंडित जी कभी कभी घर आते थे , दादा जी के पास दरबार करने , इसलिए पहचानते थे) , पंडित जी के पास गया तो उन्होने प्यार से एक सवाल पूंछा , उत्तर सुनकर उनको लगा कि मै पढ़ने में ठीक हूं (हालांकि अवस्था में कुछ छोटा था ) , तो उन्होने बोला कि नाम लिख लेता हूं , जाकर दादा जी से पूछकर आओ , कितने साल के हो ?? दौड़ते हुए गया और लौटकर वापस आया , उत्तर मिला था - 5 साल। और इस प्रकार मेरी प्रवेश पाने की औपचारिकता (admission ceremony complete) पूर्ण हुई और स्कूली शिक्षा आरंभ। अब सोचता हूं तो ऐसा लगता है कि मेरे लिये वो आत्म निर्भरता की पहली सीख थी। बचपन के उस दौर में हमारे बैग में पाठ्य पुस्तकों से ज्यादा जरूरी चीज : बैठने की टाट पट्टी या पुरानी बोरी हुआ करती थी , बारिश के मौसम ...
वाह रे! चिड़िया तेरा ज्ञान अखिलेश कुमार पटेल वाह रे! चिड़िया तेरा ज्ञान तुझे क्या पता दर्पण में क्या छिपा है किसने सिखाया तुझे दर्पण में झांकना क्या करेगी अपना प्रतिबिंब देखकर क्या तुझे भी अपने जीवन पर गर्व है? वाह रे! चिड़िया तेरा ज्ञान क्या जरूरत तुझे मान - सम्मान का क्या जरूरत तुझे अवगुणों को दूर करने का क्या जरूरत तुझे लोगों को सीख देने की क्या जरूरत तुझे शान - शौकत का वाह रे! चिड़िया तेरा ज्ञान कहीं किसी ने तुझे भेजा तो नहीं पृथ्वी पर जा, मनुष्य को दर्पण दिखा क्यों तू बार - बार दर्पण के पास आती तुझे क्या पता मनुष्यता की बीमारी कहीं तू भी इसी का शिकार तो नहीं वाह रे! चिड़िया तेरा ज्ञान चिड़िया ने कहा हे! पृथ्वी के मनुज झाँक दर्पण को तू भूल तेरी दर्पण से न छिपा जिसने देखा, नये जीवन का सच दिखा है तुममें से कुछ को गगन दिखा कुछ तारे नभ के तोड़ रहे हैं कुछ परिंदे बिखर पड़े धन - दौलत में कुछ दरिंदे छिपे पड़े मोह माया में देख दर्पण क्या तेरी आभा है क्या तेरी आशा है जो आता है, वह जाता है...
मेरे दिल में छुपी है एक बात सतीश कुमार मेरे दिल में छुपी है एक बात, जो मैं ना कह पाया दिन रात कि मां मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं। मुझे सुलाने, मुझे खिलाने जो जगती थी सारी रात, उससे मैं न कह पाया यह बात। कि मां मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं। तुमने की मेरी हर जिद पूरी, रखकर अपनी ख्वाहिश अधूरी। चलती थी तुम मेरे साथ, पर मैं न कह पाया यह बात। कि मां मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं।.... जब भी थी जरूरत तुम्हारी, तुम खड़ी थी मेरे साथ। चाहे हो दिन का उजाला या हो आधी रात, पर मैं ना कह पाया यह बात। कि मां मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं।.... मुझ को सही राह दिखाने जब भी उठाया है तुमने हाथ, घर कर गई है दिल में यह बात। ऐसा लगा जैसे मै पा लूंगा सारी कायनात, पर मैं ना कह पाया है बात। कि मां मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं।.......... मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।... शब्द ए हकीकत सतीश कुमार यही रूप है, यही रंग है यही वेश है, यही है मेरा ढंग। करना है तो इसे पसंद क...
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