संसार में ऐशो आराम करने के लिए बहुत सारा सामान घर में ठूँस-ठूंसकर भर लेते हैं और दिनों दिन भरते जाते हैं। मानव अपने जीविका के लिए तरह-तरह
की योजना बनाता है, कुछ में उसकी पूंजी ही डूब जाती है, बस प्रयत्न ही करता रहता है। छोटी-सी दु कान को गली-गली, बाजार, मेले आदि में ले जाकर बैठे
रहना आदत हो जाती है। यह उस व्यक्ति की मजबूरी है, जो जहाँ भी मेला लगता है; वहाँ की जनता बेसब्री से इन्तजार
करती रहती है कि मेला आये और हम आंनद उठायें, कुछ सामान खरीदें।
मेला ऐसा माहौल है जहां लोग पैसो
में नहीं भावनाओ में जल्दी बंध जाते हैं। मेले में हर तरह के व्यक्ति जाते
हैं। जिनकी मनोवृत्ति दास प्रवृत्ति की होती है फिर उनका क्या कहना? मेले का सारा सुख भोगने का अवसर
उन्ही को मिलता है। मेले में अधिकतर कलाकार जाते हैं जिनको अपनी कलाओं के प्रदर्शन करने का अवसर प्राप्त होता है तथा
वे अपने कला को पुष्ट करने हेतु आवश्यक चीजें भी खरीदते हैं। मेले का दृश्य अतिसुन्दर था, विविध क्षेत्रों की वेश-भूषा, कलायें और मनमोहक प्रस्तुतियां जिसे देखकर मन प्रसन्नता
का गोता लगाता रहता है। मेले में कलाकार भी अपने मित्र
मंडली के साथ घूम रहे थे, हर दुकान
पर जाकर सामान देखते थे।
मेले के अंतिम छोर में एक सजी-धजी
दुकान देखकर कलाकारों की आँखे रुक गई। छाँटने लगे सस्ती-महंगी वस्तुएं। कोई हल्की है पर मोल ज्यादा है, कोई वजनी है पर कोई काम का
नहीं है। सारा दिन एक ही दुकान में खपा दिए। बेचारा दुकानकार भी परेशान था कि इन वस्तुओं को बहुत दिनों से रखा हूँ कोई पसंद
नहीं करता है। दुकानदार अपनी वस्तुओं पर भी खिसियाता रहा कि इनको कैसे करके बेचूं । वस्तुएं भी एक दूसरे से टकराकर
टूट रही थीं जैसे कि दुकानदार इन पर कोई ध्यान नहीं देता हो। कलाकारों ने पहले से
तय किया था। सभी लोग ऐसी चीजें खरीदेंगे जो हमारे बस में रहे। जिसको हम नचा सकें।
और एक ही दुकान से खरीदेगें। सभी ने वस्तुएं पसंद की और
मोल-भाव तय करना शुरू कर दिया। यहाँ दुकानदार भी अपनी जवाबदारी
से हटना चाहता था, उसका ध्यान
इधर-उधर होता रहता था। दुकान की प्रत्येक
वस्तुओं पर निगाहें दौड़ाये, प्रत्येक वस्तुओ को उल्टा-पलटाकर देखे। परन्तु पट नहीं पा रहा
था, दुकानदार
भी परेशान हो गया। कलाकार संसार
में ऐशो आराम करने के लिए बहुत सारा सामान घर में ठूँस-ठूंसकर भर लेते हैं और
दिनोंदिन भरते जाते हैं। मानव अपनी जीविका के
लिए तरह-तरह की योजना बनाता है, कुछ में उसकी पूंजी ही डूब जाती
है, बस प्रयत्न
ही करता रहता है। छोटी सी दुकान
को गली-गली, बाजार मेले आदि में ले जाकर बैठे रहना आदत हो जाती है, यह उस व्यक्ति की मजबूरी है। जंहा भी मेला लगता है; वहाँ की जनता बेसब्री से इन्तजार
करती रहती है कि मेला आये और हम आंनद उठायें, कुछ सामान खरीदें। कलाकारों ने ऐसी वस्तु ख़रीदी कि
दुकान ही खाली पड़ गया, सबने कठपुतली ही ख़रीदी। कठपुतली इसलिए ख़रीदी थी कि हम कम आंनद लेंगे हमारा परिवार ज्यादा मजा उड़ायेगा।
कलाकारों ने कठपुतली को इस तरह से
पकड़कर अपने मजबूत बैग में रखा कि मजाल किसी का कि देख सके। कठपुतली इतनी सुन्दर थीं कि हर किसी
का ध्यानक चला ही जाता था। जब मेले से घर आ रहे थे; रास्ते में एक नदी है; उसमें सभी कठपुतलियों को श्रृद्धापूर्वक स्नान कराया ;चरण वंदना की; इसके बाद उनका मोह बढ़ता ही गया,घर लाकर सभी साथियों ने
कठपुतलियों की सेवा खुशामद की, उनको तरह-तरह से सजाया और आरती भी उतारी । पूरे र गाँव में तमाम हल्ला हो
गया कि " मेले से भगवान लाये हैं, लोगों को दिखा भी नहीं रहे थे कि कहीं नजर न लग जाए ।"
कठपुतली खरीदना और नचाना भी एक
कला है जो हर किसी के पास नही होती है। कलाएं भी मनुष्य को महान बना देती है, जैसे-जैसे कला का विकास होता जाता
है, वह चतुर और चालाक होकर कहता है - हम जादूगर हैं किसी को भी वश
में कर सकते हैं । खेल ख़त्म
होते ही अपना बयान बदल देता है और कहता यह कोई जादू नही हैं, ये तो हाथों की सफाई है। अब एक कलाकार धंधे में निकलता है
और अपनी कला से कठपुतली का सौभाग्य बदलता है। कलाकार पहले दुनिया की लम्बी-चौड़ी
बातें करता है, दर्शकों की
मानसिक स्थिति का अध्ययन करता है फिर अपना खेल शुरू करता है। खेल ख़त्म होते ही कलाकार पैसे
पाकर खुश और दर्शक क्षणिक आंनद एवं पैसे लुटाकर खुश। कठपुतली नाच-नाचकर खुश होते जा
रही है, कितने सौभाग्य की बात है, मानो उसमे श्रृद्धापूर्वक प्राण
प्रतिष्ठा के मन्त्र फूंक दिया गये हैं जिससे वह इस तरह से समर्पित होकर अपने और अपनो का मोह ही ख़त्म कर दी है। कलाकार
भी अजीब है; कठपुतली से
स्नेहपूर्वक व्यवहार करता है जबकि जानता है कि यह निर्जीव है; अपनी सजीवता को खो चूका है। इसके मूल में जो प्राण था; विकास था वह नष्ट हो गया है, फिर भी चंचल है,थोड़ी सी फूंक मारो उड़ने लगती है। कठपुतली हलकी लकड़ी से बनती है तभी
तो शिल्पकार किसी भी भाग में तरासकर उसे रूप देता है। कलाकार और कठपुतली दोनों की एक ही
राशि है, दोनों के
मधुर सम्बन्ध हैं। कहते हैं
कि जो जिसकी संगति करता है उसके गुण आ जाते हैं, यहां पर कठपुतली ना तो कलाकार बन
जाती है; ना कलाकार कठपुतली हो जाता है। कलाकार कठपुतली नचाता है जब तक कठपुतली
टूट न जाए, ख़त्म होते वह दूसरी कठपुतली खरीद लेता है। कलाकार इसी कला के दम पर कई पीढ़ी
से जी रहा है और कठपुतली अपनी सजीवता से
अलग होकर दर-दर नाचती है,निर्जीव अपने
अस्तित्व को क्या समझे? वह केवल नाचना जानती है;उसे ऊंच-नीच का कोई ज्ञान ही नहीं
है। जिसके
स्वभाव में बारम्बार गिरना ही लिखा है उसको एक बार चढ़ने का सिर्फ ख्वाब दिखा दो वह
आसमान का तारा तोड़ सकने में समर्थवान बन जाता है। मुहावरा के अनुसार ही एक दिन
सरेआम कलाकार ने कठपुतली को हिमालय चढाने की बात कर देता है,कठपुतली भी कलाकार के कला पर सिर
हिलाकर सहमत हो गई। कठपुतली;ख्वाब लेकर जैसे ही हिमालय की सफर शुरू करती है कि दुनिया में त्राहि-त्राहि मच गई, रास्ते के सारे मुर्दे हंसकर खड़े
हो गए और कठपुतली को अपना दर्द बयान किये। जब व्यक्ति दूसरे का दुःख-दर्द
देखता है तो अपना दुःख याद करके रोने लगता है। ठीक इसी प्रकार कठपुतली की हालत
देखकर मुर्दे रोकर समझाते हैं-
हम भी चढ़े थे हिमालय, मन में कुछ अभिमान थे।
एक तरफ थी खाइयां, एक तरफ श्मशान थे ।
ये कठपुतली ज़रा संभल के चलना, हम भी कभी इंसान थे।
हम लोगो ने भी यही गलती की थी जिसकी सजा भोग रहे है। काटों को घिसकर माथे पर
लगाने से विद्वान् नहीं बन जाते हैं, विखंडन होना महानता नहीं है, अपनी पीढ़ी का ख्याल रख। तुम्हारे सौभाग्य जीवन की हमें
आशा-विश्वास सताएगा फिर भी पतली सुखी लकड़ी के सहारे चढ़ना चाहते हो तो
कर्तव्यपूर्वक चढ़ो परन्तु उतरने का भी ख्याल रखना नहीं हमारे जैसे राह में मिलोगी
या हिमालय में ही गला दिए जाओगे ।कठपुतली के मन में हिमालय चढ़ने की प्रवलता बढ़ते
ही जा रही थी ,पौराणिक
कथाओं का भी जिक्र करते हुए मुर्दे ने कहा विभीषण अपने स्वार्थ के कारण कुलद्रोही
कहलाया । अपने वंश
का नाश करके थोड़े ही समय तक पृथ्वी में सुख भोगने के कारण विभीषण की पीढ़ी समाप्त
हो गया । युगों-युगों
से हिमालय में चढ़कर गल जाने की परम्परा को स्वीकार करते हुए कठपुतलीअपने को
सौभाग्यशाली समझकर हिमालय चढ़ने की हठधर्मिता से विमुख नहीं हुई । इधर दुनिया में कोहराम मच गया की
कठपुतली अब फतह की परचम लहराने वाली है । कुछ मदारी भी डमरू की रागअलाप रहे
थे,की हमारा
खेल ख़त्म हुआ ।ईश्वर की क्या माया है;आधा धूप आधी छाया है, कहावत को लेकर कठपुतली हिमालय के
निकट पहुँच गई । रास्ते में
रो-रो कहा उसके पाँव के छालों ने,हिमालय जाने नहीं देते राह के दलालो ने । रवि अस्त होते आसमान में चित्ते
पड़ते हुए दिखाई देने लगा;मानो आकाश
अपनी वेदना को प्रकट कर रहा है, वस्तुतः प्रकृति ने अपनी प्रवृत्ति को सदा की तरह संयमित रखने
की उम्मीद पर कुछ कलाये प्रस्तुत की है । कठपुतली कलुष कालिमा को देखकर
खामोश रह जाती है,ह्रदय का
जख्म आँखों में उतर आयी,अरमानो की
अर्थी उठने लगी,भावनाएं
जमकर इस्पात हो गई और उम्मीद पर वेडिया लग गई । रास्ता कंटकमय हो गया, हवाएं विपरीत चलने लगी,विपत्तियों के बादल मडराता जा रहा
था पर कठपुतली हिम्मत नही हार रही थी । कठपुतली को नाचने का अभ्यास रही
है इसलिए वह कहीं भी पाँव रख लेती थी,गिरती नहीं थी । कहते हैं की जो कई बार किसी राह
से गुजर जाए तो वह अँधेरे में भी चलेगा तो उसके पाँव सही जगह पर ही मढ़ता है । कठपुतली को चलते रात हो गई फिर भी
उसके पाँव जमते ही जाते थे और अंततः शिखर तक पहुंच ही गई ।
डी.ए.प्रकाश खाण्डे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर
पुष्पराजगढ़,जिला
-अनूपपुर म.प्र .
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