हम कल जैसे थे आज भी वैसे हैं


जीता रहा मैं अपनी धुन में,
दुनिया का कायदा नहीं देखा।
रिश्ता निभाया तो दिल से,
कभी अपना फायदा नहीं देखा।।

एक किताब की तरह हूँ  मैं,
कितनी भी पुरानी हो जाए।
पर उसके अक्षर नहीं बदलेंगे,
कभी याद आए तो पन्ने पलट कर देखना।
हम कल जैसे थे आज भी वैसे हैं,
कल भी वैसे ही मिलेंगे.............

जब मुझे चलना नहीं आता था,
तब कोई गिरने नहीं देता था।
और जब चलना सीख लिया तो,
हर कोई गिराने में लगा है।।

प्रस्तुति -धर्मेन्द कुमार पटेल

[इस ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया यहाँ क्लिक करें]

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बचपन की बहार : रिश्तेदारों का प्यार :जनार्दन

वाह रे! चिड़िया तेरा ज्ञान:अखिलेश कुमार की कविता

लौह पुरुष की ऐसी छवि:अनिल पटेल