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वर्तमान का महत्व:संदीप सिंह का आलेख

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वर्तमान का महत्व प्रायः समय के महत्व की चर्चा की जाती है. हमारे महापुरुषों ने भी अपने विचारों में समय के महत्व को शामिल किया है. महात्मा गाँधी कमर में घडी लटकाया करते थे जो समय का प्रतीक थी. परन्तु क्या हम जानते हैं कि समय  भूत और भविष्य में नहीं होता। समय केवल वर्तमान में ही होता है। जीवन का अस्तित्व समय से बाहर और समय से भिन्न नहीं होता है। जीवन वर्तमान में ही जिया जा सकता है। जीवन के सुख-दुख वर्तमान में ही होते हैं। जीवन की सफलता-असफलता वर्तमान में ही होती है। वर्तमान क्या है? आज और अभी! यही तो वर्तमान है। यदि हमारा आज अच्छा है तो आने वाला कल भी अच्छा होगा। यदि हमारा आज अच्छा नहीं है तो आने वाला कल भी अच्छा नहीं होगा। भूतकाल की भूलों को सुधारने तथा भविष्य का निर्माण करने के लिए भी हमें वर्तमान पर ध्यान देना होगा। उसका समुचित उपयोग करना होगा। वर्तमान का उपयोग करने के लिए सबसे पहले वर्तमान  के महत्व को समझना होगा। मन को एक ही ठीक-ठीक समझा देना होगा कि आज और अभी के अतिरिक्त जीव निर्माण का, सुख-शांति एवं सफलता का और कोई अवसर हमें नहीं मिलेगा, नहीं मिल सकता। हम जीवन...

गगन के आजाद परिंदे

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12 नवम्बर (1896) डॉ. सालिम अली का जन्म दिवस है, जो कि विश्वविख्यात पक्षी विशेषज्ञ थे। इन्हें भारत में "पक्षी मानव" के नाम से भी जाना जाता था। पक्षी विशेषक्ष सालिम अली के जन्म दिवस को 'भारत सरकार' ने राष्ट्रीय पक्षी दिवस घोषित किया है। प्रस्तुत है राष्ट्रीय पक्षी दिवस के अवसर पर  कुलदीप पटेल (के•डी•)  की  यह रचना । गगन के आजाद परिंदे सुबह-शाम निशदिन एक मनोरम दृश्य देखा करते थे, आसमान में कलरव का एक वर्चस्व देखा करते थे। चाहे खेल का मैदान हो या हो खेत-खलिहान, गुनगुनाते गीतों का झुंड तब अवश्य देखा करते थे। माँ देख इन्हें गौरैया, कोयल, कौवा बताया करती थी, रात को सोते हुए लोरिया इन्हीं की सुनाया करती थी। रूठ जाने पर तरह-तरह की आवाजें निकाला करती, और हाथ फेर बालो में खूब प्यार जताया करती थी। छोटे-छोटे पंखों से आँगन में फुदक-फुदक कर चलते थे, या फिर होकर आजाद कभी नभ तक विचरण करते थे। कभी तिनका-तिनका जोड़ रहने का बन्दोबस्त हैं  करते, तो कभी हमारे घर की चौखट के छप्पर पर ही पलते थे। दूर कहीं स...

रौनक बगिया का:सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविता

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●रौनक बगिया का घर से होकर गुस्सा वह, मुँह फुलाये बाहर आया। नीले आसमान के नीचे एक बगीचे में जा सोया। तभी चमेली ने देखा उसको चिढ़कर, कुछ तुनक कर बोली। और तभी चम्पा उसकी बांहों में लगी खेलने हमजोली। देख पथिक तू देख हमें, एक बाग में हम रहते ऐसे। अनेक रंगों के फूल हैं खिलते स्नेहभाव से रहें सब हँस-हँसके। लेकिन हो तुम पढ़े-लिखे, भूत-भविष्य का है भान तुम्हें। हम बेजुबान विटपजन, लेकिन कहते हैं इंसान तुम्हें। एक आसमान है, सूरज एक जड़ एक धरा में लिपटे हैं सबके। एक धरा से पोषित होते जीते नहीं पृथक भाव रखके। हममें भी है विविधता, कुछ झाड़ी हैं, कुछ बेले हैं। हम भूलते नहीं कि हम सब, एक बाग में ही खेले हैं। नहीं सुगंध एक-सा है, नहीं हमारी एक-सी आकृति है। कोई मँहकता रातों को, दिन में भी जिसकी स्वीकृति है। हमने रखे नहीं कोई रिश्ते, रिश्तों का कोई नाम नहीं। सदय-हृदय है सबके प्रति यहां रिश्ते हैं बदनाम नहीं। रख भाईचारा का भाव, चारा भाई का खा जाते। कपटभाव का कर व्यापार, कुटिल भाव से मुस्काते। बंटे-बंटे से रहते हो जीते हो बंट-बंटकर। खुश्बू भी आती है तो जं...

*विचारों का दर्पण* ●अंजली सिंह

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*विचारों का दर्पण* ●अंजली सिंह रहीम की सजदा है तेरी, राम का जयकार  मेरा ! इस जमी की छांह तेरी, उस जहां का धूप मेरा! रजनी की परछाई तेरी, प्रभात का आलोक मेरा! तोड रहे क्यो धरा की , ममत्व का स्वरूप सारा! क्यों सता रही है सबको? स्वार्थ की घनघोर घेरा! मानता तू क्यों नही मन? कण-कण में साहिब है तेरा! कोलाहल का विष लिए तू, जल गया है जिस्म  सारा! घाव में मरहम  लगा तू , तोड़कर अवसाद कारा! खाक में मिल जाएगा तन , मिल न पाएगा  दुबारा ! जंग को मत दे बुलावा , शांति की तू बहा धारा! खुशियो से तू भर ले दामन , एक दूजे का बन सहारा! भाव सुन्दर जो हुए तो. देश होगा सबसे न्यारा। रचनाकार: श्रीमती अंजली सिंह   (राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त, 2018)      उच्च माध्यमिक शिक्षक  शास. उ. मा. विद्यालय भाद    जिला-अनुपपुर (मध्यप्रदेश) [इस ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया  यहाँ क्लिक  करें।  अपनी   रचनाएं हमें whatsa...

हे छात्रों आलस त्यागो:सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविता

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हे छात्रों, आलस त्यागो हे छात्रों आलस त्यागो, गहरी निद्रा से तुम जागो। देखो,कर्तव्य तुम्हें बुलाएं सपने देख तुम्हें मुस्काएं। सहस्त्र सूर्य का तेज लिए, क्यों तुम मन निस्तेज किए। तुम धरा के उत्साही धावक हो, करने जीवन कुंदन, तुम पावक हो। सागर-सा गहरा जिसका हृदय, उसमें होता प्रेम-भाव  उदय। निर्मित कर चलो निज पथ, तुम्हीं पूर्ति कर सकते संकल्प, शपथ। प्रात उठो और सरपट दौड़ो, श्रम साधना से विमुख न हो। ध्यान लगाओ अध्ययन में, निद्रा बसाओ न नयन में। समय नित्य क्रिया का तय हो, शाला जाने का न भय हो। गृह कार्य कभी अपूर्ण रहे न, अक्षम, अज्ञानी कोई कहे न। विनीत भाव से आदर हो शिक्षक का, अचूक ज्ञान-ग्रहण हो अक्षर-अक्षर का। जो कुछ समझ न आये, पूछने में मन क्यों घबराए। खुश होते शिक्षक जिज्ञासु से, करते प्रेम सदा ज्ञान पिपासु से। शाला में मित्र भले अनेक हों, ध्यान रहे वे सब नेक हों। शिक्षा का अनुगामी होना ध्येय रहे, शिष्टजनों का ऋण न अदेय रहे। घर में भी कुछ हाथ बटाना सीखो, अपने प्रियजनों की तकलीफ मिटाना सीखो। कर्तव्...

दो सैनिक और एक डाकू

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दो सैनिक और एक डाकू दो सैनिक एक साथ ही यात्रा पर निकले थे। मार्ग में उनकी एक डाकू से मुठभेड़ हो गई।उनमें से एक सैनिक सिर पर पांव रख कर भाग गया परंतु दूसरे ने मैदान नहीं छोड़ा और अपने बाहुबल से डाकू का सामना करता रहा। कुछ समय तक मुठभेड़ चलने के बाद डाकू के मर जाने पर भगोड़ा साथी लौट आया और उसने अपना लबादा उतारकर एक किनारे फेंका और हाथ में बंदूक लिए कहने लगा,"मैं उसे सबक सिखा दूंगा अब उसे पता चल जाएगा कि उसने किस पर हमला करने की हिम्मत की है।" इस पर डाकू से लड़ने वाला सैनिक बोला,"काश तुमने कुछ समय पहले मेरी सहायता की होती, भले ही इन शब्दों के द्वारा ही। क्योंकि तब मैं उन्हें सत्य मानकर उनसे उत्साह ग्रहण करता परंतु अब अच्छा यही होगा कि तुम अपनी बंदूक अपने पास रखो और अपनी बेकार बकवास बंद करो। ऐसी बातों से तुम उन्हीं को धोखा दे सकते हो जो तुम्हें नहीं जानते। मैंने तो देख लिया कि तुम कितने तीव्र वेग से भाग सकते हो। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि तुम्हारी बहादुरी पर तनिक भी भरोसा नहीं किया जा सकता।" बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है, परंतु सच्ची महानता का प्रदर्श...

सत्य एक निर्मल धारा:धर्मेन्द्र कुमार का आलेख

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सत्य एक निर्मल धारा आप सभी ने बचपन में क‌ई कहानियां सुनी होगी, और उनमें से क‌ई ऐसी कहानियां भी सुनी होगी जिनमें सत्य की विजय का वर्णन किया गया होगा। आखिर में इस सत्य को जानने की उत्सुकता मन में आ ग‌ई होगी तो आप अपने माता-पिता और शिक्षकों से सत्य के बारे में पूछा भी होगा, तो उन्होंने विभिन्न मान्यताओं और प्रेरक प्रसंगों  के  माध्यम से सत्य के सम्बन्ध  में विस्तार से जानकारी दी होगी। और जो भी, जैसा भी आपको बता दिया गया होगा आप उसे मान गये होंगे। ठीक आपकी  ही तरह मेरे साथ भी ऐसा ही  हुआ ।  मैंने सत्य जानने की इच्छा गुरु जी से जताई और मेरे गुरु ने हरिश्चंद्र की कथा सुना दी, पुनः जिज्ञासा हुई तो यही प्रश्न अपने माता से किया तो उन्होंने  श्रीराम और रावण के बीच हुए सत्य की विजय का कथा सुना दी, अपने पिता से सत्य के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कौरवों पर पाण्डवों की जीत को सत्य की जीत के रुप में बताया। एक दिन अपने चाचा जी से पूछ बैठा कि आप बताइए सत्य के बारे में तो उन्होंने गौतम बुद्ध के द्वारा किए गए जनकल्याण कार्यों को ही सत्य की खोज बताया। ...