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रविवार, जुलाई 18, 2021

कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी



कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी
             किसी ने ठीक ही लिखा है कि जिंदगी कर्कश अनुभवों का पहाड़ होती है।अलग बात है कि इस पहाड़ पर कहीं कहीं सुख के कुछ सुकोमल डूब भी उग जाते हैं। सुख की इन्हीं चंद दूबों की चाहत में उम्र बीत जाती है।ऐसा ही है वर्तमान समय जब हम महामारी से जूझते हुए,अपनों को खोते हुए भी साहस और धैर्य जीवन के प्रति रखते हुए आशा की किरण खोजने में लगे हुए हैं। कोविड का पहला मरीज जनवरी 2020 में केरल में पहचान में आया,फिर तो मार्च,20 से लॉक डाउन की स्थिति और संक्रमितों की संख्या बढ़ने का सिलसिला,उसी दौरान महानगरों से कामगारों का अपने गांव घर जल्दी से पहुंचने की जो आपाधापी हुई वह महामारी से भी ज्यादा भयावह।ऐसी भागदौड़ देश के विभाजन के समय रही होगी।उसके बाद का यह मंजर तो बहुत खौफनाक था।समय बीता, महामारी की रफ्तार सुस्त पड़ते ही लोगों की जिंदगी अपने पुराने ढर्रे की ओर अग्रसर ही हो रही थी,कामगार पुनः अपने काम की तलाश में शहरों की ओर वापस जा ही रहे थे,कुछ पहुंच भी गए थे कि तब तक दूसरी लहर का प्रचंड रूप से प्रकट हो जाना,प्रलय के समान ही हो गया। लोक और तंत्र दोनों मस्त थे और आत्ममुग्ध होकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि मित्रों दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा सबसे कम हानि भारत में हुई। लेकिन दूसरी लहर ने बहुत ही भयावह स्थिति पैदा कर दी, सरकारी प्रबंध की कलई खोलकर रख दिया।ऑक्सीजन के लिए लोग पागलों की तरह घूम रहे थे। मरीज बेड की तलाश में अस्पताल में और परिजन दवाओं और ऑक्सीजन की तलाश में बाजार में। लाशों का अंबार लग गया, मनमाने दाम पर लोग परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए मुंहमांगी कीमत चुकाने को तैयार ही नहीं हुए बल्कि अंतिम संस्कार किए।कुछ को तो,सरकारी अधिकारियों ने जेसीबी की सहायता से गंगा में उतराये शवों को गंगा किनारे दबा दिया,जिसका वीडियो सभी ने देखा।मरने के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं हो सका।मुखाग्नि क्या दो मन लकड़ी की चिता भी नहीं मुअस्सर हुई। इतनी पीड़ा और बेबसी कभी नहीं दिखी।हमारी पूरी मशीनरी उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में व्यस्त थी,जनता भी उसी में मस्त थी,मरीज और परिजन बेहाल थे,लेकिन मजबूर और बेबस थे।पांच राज्यों के विधान सभाओं ने भी आग में घी का काम किया।मद्रास उच्च न्यायालय की टिप्पणी कि इन मौतों के पीछे "चुनाव आयोग अकेले जिम्मेदार है",उसके ऊपर हत्या का मुकदमा चलाया जा सकता है, काबिले गौर है।ठीक उसी राह पर योगी जी का हठ योग कि कावंड यात्रा आयोजित की जाएगी और बार बार उत्तराखंड के नव नियुक्त मुख्यमंत्री जी को भी कावड़ के लिए तैयार करने का प्रयास किसी तुगलकी फरमान से कमतर नहीं दिखता।ऐसे समय में जब अभी काशी दौरे पर आए मा प्रधानमंत्री जी ने तीसरी लहर के आगमन से लोगों को सचेत और ढिलाई न बरतने का साफ साफ संदेश उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री जी के समक्ष दिया।उन्होंने कहा कि देश आज ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहां तीसरी लहर की आशंका लगातार जताई जा रही है।लेकिन कावड़ यात्रा में युवाओं का बहुत बड़ा समूह आता है,भगवा परिधान ही नहीं बल्कि कावड़ व लोटा जिसमें गंगाजल भरते हैं,वह भी बहंगी समेत उसी रंग में रहता है।उससे एक परिवेश निर्मित होगा,जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रदेश में आसन्न चुनाव में एक बड़ा वोट बैंक साबित होगा।कुल मिलाकर लोक की चिंता कम,तंत्र की ज्यादा।यह स्थिति बहुत भयावह होगी।भला हो मा उच्चतम न्यायालय का जिसने स्वत:संज्ञान लेकर कावड़ यात्रा के संबंध में सरकार से अपनी स्थिति को 19 जुलाई तक स्पष्ट करने के साथ ही यह भी पीठ ने कह दिया कि यदि सरकार फैसला लेती है तो ठीक है नहीं तो हम आदेश देंगे।ऐसी कड़ी टिप्पणी मा न्यायालयों को क्यों करनी पड़ रही है,क्या यह कहीं न कहीं से सरकारों का जनता के हित व उनके कल्याण से अनदेखी तो नहीं है?आम जनमानस के स्वास्थ्य और जान माल का ख्याल नही है?इस पर हमें विचार करना चाहिए।भारतीय संस्कृति की सम्यक विकास की अवधारणा रही है वह स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए मानव के सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित करे।किसी समाज को सभ्य तभी कहा जा सकता है या कोई देश तभी प्रतिष्ठित कहलाता है,जब उसका सर्वांगीण विकास हो।हमें तो ऐसा लगता है कि अपनी अपनी आस्था को कायम रखते हुए घर पर अपना कार्य करते हुए, सुरक्षित रहते हुए अपने आराध्य का ध्यान पूजन करें।अपना कार्य करना भी इबादत ही है।शास्त्रों में कहा गया है कि कर्म ही पूजा है।सरकार को भी पूरा ध्यान टीकाकरण और स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ बनाने पर अपना ध्यान पूरी मुस्तैदी से केंद्रित करते हुए,शिक्षा संस्थाओं के संचालन को सुगम और सफल बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगानी चाहिए।
(आलेख  में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं.ब्लॉगर टीम का सहमत होना आवश्यक नहीं)
      डा ओ पी चौधरी
समन्वयक,अवध परिषद उत्तर प्रदेश;
संरक्षक, अवधी खबर,सम्प्रति एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग, श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
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बुधवार, जुलाई 07, 2021

सरकारी वन महोत्सव एवम् सामाजिक उत्तरदायित्व–डा ओ पी चौधरी का पर्यावरण के संबंध में आलेख



सरकारी वन महोत्सव एवम् सामाजिक उत्तरदायित्व–डा ओ पी चौधरी
           वन को हम फॉरेस्ट से समझें तो लैटिन शब्द के फोरिस से निर्मित,जिसका अर्थ है गांव के सीमा या चारदीवारी से बाहर की समस्त भूमि,जिस पर खेती न की गई हो तथा जो निर्जन हो।अब वन से तात्पर्य है कि जिसका उपयोग वानिकी के उद्देश्य से किया गया हो।वन किसी भी राष्ट्र की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा है और प्रकृति की मनोरम विशिष्टता है।वनों के महत्व को दर्शाते हुए कहा जाता है ," वन से जल,जल से अन्न, अन्न से जीवन"इसी तर्ज पर अब हम कहने लग गए हैं कि जल ही जीवन है।वन को लोगबाग हरा सोना भी कहते हैं।यह हमारे जीवन को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।हमें एक और इनसे फल,इमारती लकड़ी,पशुओं का चारा,पक्षियों का भोजन आदिअनेक चीजें प्राप्त होती हैं,वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को स्वच्छ,समृद्ध,मिट्टी के कटाव को रोकने व उसमें नमी बनाए रखने का कार्य करते हैं।ऑक्सीजन को बहुततायत मात्रा में प्रदान करने वाले ये वन हमारे जीवन के अविभाज्य अंग सरीखे हैं। कोरोना महामारी में ऑक्सीजन के लिए जो आपाधापी मची थी,उससे हमे सबक लेकर अधिक से अधिक वृक्षारोपण और उनका संरक्षण करना चाहिए।यह हमारा सामाजिक और नैतिक दायित्व है।




           सरकारी वन महोत्सव जो प्रदेश सरकारें आयोजित करती हैं,उसकी एक बानगी देखी जाए।उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वृक्षारोपण जन आंदोलन-2021 के तहत बृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम 04 जुलाई,2021 को महामहिम श्री राज्यपाल जी ने पहूज नदी,सिमरधा डैम,झांसी तथा मा मुख्यमंत्री जी ने पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बड़ाडांड,बल्दीराय,सुल्तानपुर से वृक्षारोपण कर वन महोत्सव का आगाज किया गया।सम्प्रति यह भी निर्देश/आग्रह किया गया है कि "मेरा पेड़ –मेरा साथी" से संबंधित फोटो व वीडियो अपलोड करें।साथ ही प्रदेश में इस सीजन में 30 करोड़ वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा गया है।04 जुलाई को 12 घंटे में 25 करोड़ पौधे लगाए गए।इसी तर्ज पर 2017 18 में 5.71 करोड़,2018 19 में 11.77 करोड़,वर्ष 2019 20 में 22.60 करोड़,2020 21 में 25.87 करोड़ पौधे तथा इस वर्ष 2021 22 में 30 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य है।इस तरह पांच वर्षों में सरकार ने कुल 95.95 करोड़ पौधे लगाए गए, उत्तर प्रदेश सरकार के वन मंत्री श्री दारा सिंह चौहान ने वन विभाग के मुख्यालय में पत्रकार वार्ता में बताया है कि मा मुख्यमंत्री जी ने 100 करोड़वा हरिशंकरी का पौधा रोपित किया है।इससे स्पष्ट है कि इस सरकार में 100 करोड़ पौधे केवल सरकारी महकमों ने लगाए हम जैसे लाखों लोगों की जो अपने से लगा रहे हैं,उनकी गिनती नहीं है,और पूर्ववर्ती सरकारों ने भी ऐसे ही योजना बद्ध तरीके से वृक्षारोपण अभियान चलाया था।लेकिन सरकार द्वारा रोपित इसमें से कितने पौधे बचे हैं,इसका अभी तक विवरण प्राप्त नहीं हुआ है,इस ओर ध्यान देकर हम कम खर्च में अधिक पौधो को सुरक्षित रख सकते हैं।मुझे भी वृक्षारोपण का शौक बचपन से ही है( 1971 में बांग्ला देश बनने की खुशी में अपने अग्रज स्मृतिशेष डा घनश्याम चौधरी की प्रेरणा से पहला पेड़ आम का लगाया था),तबसे अभी तक विराम नहीं लिया है,अब यह मेरे जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा हो गया है।लेकिन एक पेड़ को लगाकर उसे बड़ा करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है,बहुत सारा वक्त लगता है,फिर वह पौधा पेड़ बनकर समस्त प्राणियों को शुद्ध ऑक्सीजन, पुष्प व फल प्रदान करता है। एक पेड़ अपने जीवनकाल में लाखों लीटर ऑक्सीजन के साथ आजीविका के दर्जनों साधन,जहर सोखने की क्षमता,ठंडक,छाया,औषधि,फल-फूल,ईंधन, इमरती लकड़ी,और जीवन भर सकून देने के साथ ही हमारे मन को प्रफुल्लित करता है,उमंग और जोश से भर देता है।ऐसी ही अभिव्यक्ति,हमारे मित्र और प्रधान न्यायाधीश,पारिवारिक न्यायालय हरदोई श्री एम पी चौधरी,जो स्वयं वृक्षारोपण का शौक रखते हैं,कहते हैं कि अपने द्वारा रोपे गए पेड़ में जब पहला फल लगता है तो उसे देखकर उतनी ही खुशी होती है, जितनी पहली बार तनख्वाह मिलने पर होती है,व्यक्त करते हैं।पेड़ लगाना अच्छा कार्य है,उससे भी महत्वपूर्ण उसे बचाना है,उसकी परवरिश है। अन्यथा एक पौधे की हत्या उसके बाल्यकाल में ही कर देना है,यदि हमने उसे लगाकर केवल छोड़ दिया।हमने अपने आस- पास जो देखा है वह पौधों की बाल हत्या ही ज्यादा हो रही है।किसान या कोई भी व्यक्ति प्रति वर्ष 2 –4 पौधों को ही लगाने और उसे सुरक्षित रखने में पसीना छोड़ देता है,छुट्टा जानवरों व घड़रोज की बाढ़ सी आ गई है,देखते ही देखते वे इन पौधों को नष्ट कर देते हैं।फिर जिसे लोग लगाकर फोटो/वीडियो बनाकर चले जाते हैं,फिर उनका क्या हश्र होता होगा? कभी सोचा या देखा? एकइसलिए जितने बड़े पैमाने पर सरकार वृक्षारोपण करती है,उतने पौधों को जिंदा और सुरक्षित रख पाना एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है।बावजूद इसके वन महोत्सव कार्य एक बहुत ही सराहनीय कदम है,पर्यावरण को स्वस्थ व स्वच्छ बनाने का,इसे जनमानस से जोड़कर एक जन आंदोलन का रूप देना होगा।लोगों को उनके सामाजिक दायित्व का एहसास कराना होगा।तभी सही मायने में वन महोत्सव की सरकार की योजना परवान चढ़ेगी।सरकार के कुछ अधिकारी गण पर्यावरण को लेकर बहुत संवेदनशील हैं।ऐसे ही संवेदनशील व्यक्तित्व हैं श्री सिया राम वर्मा जी,एआर टी ओ,प्रयागराज,
जिन्होंने न केवल अपने कार्यालय को ही हरा भरा कर दिया अपितु अपने गृह जनपद में भी अभियान चलाकर वृक्षारोपण के पुनीत कार्य को अंजाम देकर,प्रकृति की गोंद को सजोने का कार्य करते आ रहे हैं।
          विश्व के कुछ देश ऐसे हैं जहां बिना पौधारोपण किए विद्यार्थियों को उपाधि नहीं प्रदान की जाती है।हमारे पूरे प्रदेश में स्नातक द्वितीय वर्ष में पर्यावरण एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है,लेकिन प्रत्येक विद्यार्थी को छोड़ दीजिए 100 में ही एकाध मिलेंगे जो सचेत होंगे पर्यावरण के प्रति,लगभग कमोवेश यही हाल हम शिक्षकों का भी है। हमें वनों के प्रति ज्यादा सजग व संवेदनशील होने की जरूरत है,क्योंकि वन ऑक्सीजन के संचित कोष स्थल हैं जो कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित कर हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं तथा पर्यावरण में विविध गैसों का संतुलन बनाए रखते हैं।आजकल मियावकी तकनीक से हम कम क्षेत्रफल में अधिक पेड़ लगा सकते हैं।इस पद्धति में पौधों को एक दूसरे से बहुत कम दूरी पर लगाया जाता है,जिससे पौधे अगल बगल की अपेक्षा केवल ऊपर की ओर सूर्य की रोशनी प्राप्त कर बढ़ते हैं।प्रयागराज नगर निगम द्वारा इस विधि से पौध लगाने की घोषणा की गई है।केरल सरकार द्वारा इस विधि को अपनाया गया है।इस पद्धति से एक हेक्टेयर में दस हजार तक पौधे लगाए जा सकते हैं।वन अनेक जीव जंतुओं व पशु पक्षियों के आश्रय स्थल हैं जो पारस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में हमारी मदद करते हैं।जल के प्रवाह को कम करके मृदा अपरदन को रोकते हैं।वायु प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण,जल प्रदूषण को नियंत्रित करने में वनों की महत्व पूर्ण भूमिका होती है।हमारी अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ करते हैं।मानव के लिए वन संपदा अमृत के समान है।इसका संरक्षण व संवर्द्धन हम सभी का सामाजिक और नैतिक दायित्व है।
     डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
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रविवार, जुलाई 04, 2021

कोविड-19:महामारी के दौर में हमारे गांव- देहात–डॉ. ओ पी चौधरी



कोविड-19:महामारी के दौर में हमारे गांव- देहात–डॉ. ओ पी चौधरी
Kovid-19: Our village Countryside-Dr. O PChowdhary
           कोविड-19 ने एक महामारी के रूप में बहुत तबाही मचाई,पूरे विश्व में त्राहि- त्राहि मच गई।एक साल से भी अधिक का समय बीतने के बाद भी अभी दहशत गर्दी और आशंका  का माहौल है।भला हो उन वैज्ञानिकों का जिन्होंने बहुत ही कम समय में वैक्सीन का ईजाद कर लिया और बड़ी आबादी का टीका करण भी हो चुका है।लगातार टीके लगवाने को प्रोत्साहित भी किया जा रहा है।क्योंकि कोरोना से बचने के लिए सावधानी बरतने के साथ ही टीका आवश्यक है।
           कोरोना महामारी का प्रभाव अपने देश में मार्च, 2020 में बढने लगा तो भारत सरकार को लॉकडाउन की घोषणा करनी पड़ी।बहुत बड़ी संख्या में गांवों से रोजी - रोटी के लिए शहर गए कामगारों को अपने उसी गांव में शरण मिली जहां से वे चले गए थे,कितनों ने तो भुला ही दिया था की हम कहां से यहां तक की यात्रा किए हैं।शहर की चकाचौंध में अतीत की स्मृतियां विलुप्त हो गई थी।किंतु इस महामारी ने एक ही झटके में सब कुछ याद दिला दिया, गांव की पगडंडी, सरपत से भरी खाईं वाली खोर जो अब चकरोड़ और सड़क में परिवर्तित हो चुकी हैं,कुंए का स्थान आधुनिक पंप ले चले हैं।घर में ढिबरी और लालटेन का स्थान एलईडी ने ले लिया है।खाना बनाने के लिए लकड़ी के स्थान पर गैस या इंडक्शन आ गया है।आधुनिकता का लिबास पहनकर गांव भी इतरा रहा है।बावजूद इसके भी अभी कुछ हद तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अपने में समेटे है,रीति रिवाजों,परंपराओं को सहेजे हुए है।गांव- देहात में मानवीय संवेदना का पुट अभी शेष है।
          कोरोना वायरस ने अधिकांश घरों में अपनी दूसरी लहर में  पाँव पसारना शुरू कर दिया तो जो कभी गाँव छोड़कर शहर की ओर रोजी-रोटी के लिए केवल रुख ही नहीं कर लिए थे बल्कि घरबारी हो गए थे।कुछ ने अपना आशियाना बना लिया  तो कुछ किरायेदारी पर ही चैन से रह रहे थे।कुछ लोग झोपड़- पट्टियों में गुजर बसर कर रहे थे। कोरोना महामारी में सभी लोग अपने गाँव की ओर रुख कर लिये। लाकडाऊन की घोषणा हुई, निर्माण कार्य,मिलें,कार्यालय, कल-कारखाने सभी बंद होना शुरू हो गये।लोगों के रोजी- रोटी का ठिकाना न रहा तो लोग बहुत बड़ी संख्या में अपने-अपने परिवार के साथ गठरी-मोटरी लेकर पैदल ही चल दिए,अपने उस गांव देश जहां से वे निकलकर शहर गए थे।उस समय बड़ा ही भयावह दृश्य था,चारों ओर सड़क पर आदमी ही दिख रहे थे।कुछ लोगों ने रास्ते में ही दम तोड दिया।कितने लोग घर पहुँचे तो लोगों ने उन्हें बहुत आत्मीयता से स्वीकार नहीं किया।इतना ही नहीं जिन राज्यों से ऐसे लोग पुनः अपने-अपने घरों की ओर रुख किए,ऐसे लोगों को वहाँ की सरकारों ने उन्हें, उनके ही हाल पर छोड़ दिया।पूरा परिवार बच्चों के साथ उस मार्च-अप्रैल की तीखी धूप में बगैर भोजन-पानी के बेहाल हो गया।चारों ओर अफरा-तफरी का आलम था। 
            जब मामला 2020 का अंत आते-आते कुछ कमी की ओर चला और लोग फिर गांवों से शहर जाते,कुछ चले भी गए,तब तक कोविड-19 की दूसरी लहर मार्च, 2021 से समुद्र की लहरों से भी अधिक उफान मारते हुए आगे बढने लगी।पूरा विश्व एक बार फिर से इसके चपेट में भयंकर रूप से आ गया ।इस बार बहुत ही अधिक संख्या में युवा एवं मध्य आयु वर्ग के लोग अपनी जान गवां बैठे।अबकी ज्यादा तांडव अपने ही देश में महामारी ने मचाया।केन्द्र सरकार और कुछ राज्यों में जहाँ चुनाव चल रहा था उन राज्यों की सरकारों ने इसके बढते हुए खतरे को या तो भांप नहीं पाये या अनदेखी किया ।अन्य राज्यों की सरकारों ने भी शुरुआती दौर में कोविड-19 की दूसरी लहर को गंभीरता से नहीं लिया। उत्तर प्रदेश में पंचायतों के चुनाव का दौर अपने पूरे सबाब पर था।जब मामला हाथ से निकलने लगा और भारी संख्या में लोग इसकी चपेट में आने लगे ।सरकारी अस्पतालों में इससे निपटने के लिए संसाधन नहीं थे,सुविधाएं नहीं थी।न तो बेड और न ही दवाएं ।इतना ही नहीं आक्सीजन के अभाव में बहुतों ने दम तोड़ दिया । एक तरफ चिकित्सकों एवं पैरा मेडिकल स्टाफ की कमी ।ऐसे में सरकारों को  निर्णय लेना पड़ा कि  लोग गैर सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज करायें ।वहाँ भयंकर रूप से एक तो पहले से ही जीवन रक्षक दवाइयों की कालाबाजारी तो दूसरी तरफ नकली दवाओं का कालाजाल था ही ।वेन्टीलेटर की कमी दिखा कर तो कभी-कभी जाँच रिपोर्ट देरी से आने का बहाना बनाकर अधिकांश गैर सरकारी अस्पतालों में खूब लूटपाट हुई ।महीनों तक वेन्टीलेटर पर मरीजों को रखा गया ।घर वालों को देखने तक नहीं दिया गया ।एक-एक मरीज  से 5 से 6लाख या उससे भी अधिक वसूला गया और फिर अंत में कह गया कि आपका मरीज नहीं हम बचा पाए सारी! इन सब स्थितियों में लोग अब गाँव की ओर रुख कर रहे हैं। कहते हैं कि-आओ फिर गाँव लौट चलें । गाँव में शहर से लौटे कुछ लोगों ने परिवार का खर्च चलाने के लिए कोई न कोई कार्य करना भी शुरू कर दिया है,नहीं तो अपने परंपरागत व्यवसाय में ही हाथ बंटा रहे हैं।।सरकारों को भी  चाहिए कि ऐसे लोगों का सर्वेक्षण कराकर उन्हें गाँव और आसपास के स्थानीय बाजारों में स्वरोजगार के साधन और उन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए सड़क,बिजली, पानी,शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाएं उपलब्ध कराये ही साथ ही उन्हें सस्ते दर पर भूमि और धन उपलब्ध करायें जिससे लोग  गांव की ओर रुख कर पुनः अपने-अपने घरों की ओर लौट आएं और वहीं अपनी रोजी रोटी का बेहतर प्रबंध कर सकें।सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों(एम एस एम ई),कृषि,पशुपालन एवम् संबद्ध क्षेत्रों और सामाजिक क्षेत्र को सहायता प्रदान करने की जरूरत है,ताकि स्थानीय स्तर पर प्रवासी कामगारों को रोजगार मुहैया कराया जा सके। इससे शहरों का जनसंख्या घनत्व भी कम होगा,उनका प्रबंधन भी आसान होगा। वर्तमान परिवेश में भी अभी गाँव की आबो-हवा बहुत ही उपयोगी है,पर्यावरण में शुद्धता है।कृषि कार्य एवं संबंधित कार्यों में भी लोग जुड़ेगे,उनका जीवन स्तर सुधरेगा।देश की अर्थ व्यवस्था भी पटरी पर आएगी।कृषि ही एक ऐसा क्षेत्र रहा है जिसने इस महामारी के दौर में भी हमारी अर्थ व्यवस्था को मजबूत बनाने का कार्य किया।स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण जैविक खेती की तरफ भी लोगों की रुझान बढ़ी है,इससे पर्यावरण तो स्वच्छ होगा ही लोगों को शुद्ध अन्न मिल सकेगा।दुग्ध,कुक्कुट और मत्स्य पालन को भी बढावा मिलेगा ।जो गाँव लोगों के परदेश चले जाने से सूने से लग रहे थे,वहां चहल पहल शुरू हो गई, वे पुनः गुलजार होने लगे।गांव की चौपाल सजने लगेगी।आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न साकार होगा। प्रवजन पर भी अंकुश लगेगा।लोग अपने गांव, हाट और कस्बों में ही रहकर अपना काम धंधा करने लगेंगे।इसमें सरकार की "एक जनपद,एक उत्पाद" की कार्ययोजना प्रवासी कामगारों के लिए मुफीद साबित होगी। गांवों के विकास से ही देश के विकास का पथ प्रशस्त होगा।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं.जिससे  ब्लॉगर टीम का सहमत होना आवश्यक नहीं)
      डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
मो:9415694678
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गाँव की ओर (कविता): मनोज कुमार चंद्रवंशी

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गुरुवार, जुलाई 01, 2021

शिक्षा का उद्देश्य- शिक्षा विषय पर बहुत ही सुन्दर आलेख : राम सहोदर पटेल



शिक्षा का उद्देश्य 

शिक्षा उस कल्पवृक्ष  की भांति है जो जीवान्त तक मनवांछित फल प्रदान करता रहता है। शिक्षा से जीवन की सारी मनोकामनाएं सम्पूर्णता का प्राप्त करती है। शिक्षा नहीं तो कुछ नहीं, इसके बिना जीवन का अस्तित्व नहीं, मानवीयता का एहसास नहीं, समाज और देश का उत्कर्ष नही, राजनैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आभास नहीं, इतिहास का ज्ञान नहीं यानी शिक्षा के बिना मानवीय जीवन निस्सार तथा मूल्यहीन है।
आहार, आवास और वस्त्र के बाद शिक्षा ही मानव की आवश्यक आवश्यकता है जिसके बिना वह पग भर भी सफलतापूर्वक नहीं चल सकता। धन तो अनपढ़ भी कमा सकता है, अमीर बन सकता है, ऊॅंचा महल खड़ा कर सकता है किन्तु इस धन में स्थायित्व नहीं है। उस धन के कम जाने, गुम हो जाने और चोरी हो जाने का खतरा प्रायः बना रहता है। धन से इंसान शक्तिशाली नहीं बन सकता वह पावरफुल बनता है शिक्षा से। शस्त्र जब तक चलेगा तब तक सुरक्षा देगा लेकिन शास्त्र हमेशा तक सुरक्षित रखेगा। धन को यदि ज्ञान में बदल दिया जाय तो इंसान की शक्ति कभी कम नहीं हो सकती। ज्ञान इंसान का वह कवच है जो जीवन की हर कठिनाई में हमेशा उसका संरक्षण करता है।
शिक्षा जीवन के लिये होना चाहिए। जीवनयापन के लिये नहीं। क्या यह सही है कि आधुनिक शिक्षा हमें जीवित रहने के लिये सहायक है? अरे! जीवन  तो पशु-पक्षी, चींटी-मटा, मक्खी-मच्छर सारे प्राणी जीवन जीते हैं। जीवन जीने के लिये शिक्षा नहीं होनी चाहिये। हमारी शिक्षा जीवन के लिये होनी चाहिए, यही शिक्षा का सार है। इसके लिये शिक्षा के मूलतत्व को पहचानना होगा। मन की एकाग्रता शिक्षा का सार है, तथ्यों को एकत्र करना नहीं।
एक धोबी अनेक रइसों के घर का कपड़ा धेाता हैं धोबी को कपड़ा देते समय लोग कापी में नोट करते हैं कि कितने नग कपड़े आज धोबी को दिया और जब धोबी कपड़ा वापस करने आता है तब काॅपी से मिलान करके सारे कपड़े वापस लेते हैं। किन्तु धोबी अनेक लोगों के कपड़े लेकर जाता है और किसी के कपड़ों को वह नोट नहीं करता। फिर भी वह सही सलामत कपड़ें धोकर इस्त्री  करके सभी के कपड़ें पूरे-पूरे वापस करता है। यह धोबी का सामान्य ज्ञान है जो जन्म से ही तुम्हारे पास भी है। इसके लिये शिक्षा अनिवार्य नहीं है। हम शिक्षित होकर भी धोबी के उस ज्ञान को नहीं पा रहे हैं।
शिक्षा का अंतिम उद्देश्य चरित्र है। चरित्र के बिना शिक्षा व्यर्थ है। चरित्र भी वह है जो सीमारहित हो। चरित्र हमारे व्यवहार में, हमारी वाणी में, हमारे कार्यों में, खेल में और हमारे शब्दों में होना चाहिए। अब बात आती है कि हम चरित्र का चुनाव कैसे करें? साधारण सी बात है हम एक किलो चावल पकाने के लिये उपयुक्त बर्तन का चुनाव करते हैं। बर्तन न तो छोटा हो, न ही बड़ा। यहाॅं विवेक लगाना पड़ता है अनुकूल पात्र, अग्नि और पानी चाहिए होता है। इसी प्रकार चरित्र का चुनाव भी समय परिस्थिति के अनुसार अनुकूल ही होगा। हमारे क्रियाकलाप आचार-विचार चाल-चलन और वार्तालाप से किसी प्रकार का किसी को रंचमात्र भी दुख न पहुंचे। ऐसा ही हमारा चरित्र होना वांछित है।
प्राचीनकाल में ऋषिमुनि गुरुकुल में शिक्षा प्रदान करते थे। तब शिक्षार्थी को गुरुकुल (आश्रम)  में ही रहना पड़ता था और गुरु के साथ में रखकर आवश्यकतानुसार दिन-रात कुछ न कुछ ज्ञान देते ही रहते थे। तब असीमित ज्ञान था, पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ् आचार-विचार और संस्कारों की शिक्षा दी जाती थी। जब शिक्षार्थी को बहुमुखी शिक्षा, संस्कार तथा व्यवहार की शिक्षा प्राप्त होती थी। इस प्रकार विद्यार्थी को उच्चतम शिक्षा प्राप्त होती थी।
आधुनिक शिक्षा शिक्षित होने तक ही सीमित है जिसमें व्यवहारिकता नहीं हैं वर्तमान शिक्षा केवल किताबी ज्ञान है अर्थात केवल सतही ज्ञान है जो हर क्षण परिवर्तित होता रहता है। हमें चाहिए कि हम एजूकेयर ज्ञान को विकसित करें जो हमारे अंदर से उत्पन्न होने वाली जागरूकता या चेतना है। एजूकेयर हमें व्यवहारिक ज्ञान देता है। हमें सामान्य ज्ञान तक पहुँचाना चाहिए। जहाॅं हम  सत्य और असत्य के भेद को समझ पाते हैं और सदाचरण को समझ पाते हैं तथा व्यवहारिक ज्ञान को भी समझ पाते हैं।
व्यवहारिक ज्ञान जीवन के साथ मजबूती से सबद्ध होता है। वो हृदय जो करुणापूर्ण हो हमें शांति, पवित्रता और व्यापक तथा उदार सोच रखने की स्थिति तक ले जाता है। ज्ञानी लोगों में बुरी आदतें नहीं होनी चाहिए। किसी को भी बुरे कार्यों  में प्रवृत्त नहीं होना चाहिए। अन्यथा वे शिक्षित कहलाने योग्य नहीं है। 
अक्सर मनुष्य बिगड़ जाते हैं क्योंकि वे पूर्णतः किताबी ज्ञान पर निर्भर होते हैं। यह किताबी ज्ञान तभी तक मदद करता है जब तक स्मरण शक्ति रहती है। किताबी ज्ञान परीक्षा हाल तक का साथी है। परीक्षा उपरान्त सिर खाली। क्योंकि किताबी ज्ञान को विवेकपूर्ण ज्ञान में विकसित करने का हमें अवसर ही नहीं दिया जाता। और हम जीवन पर्यन्त अधूरे रह जाते हैं।
किताबी ज्ञान को विवेक की इस स्थिति तक पहुंचाने के लिये सामान्य ज्ञान आवश्यक है। सामान्य ज्ञान में सरल बुद्धिमता होती है। सामान्य ज्ञान और सामान्य समझ को एक साथ उपयोग में लिया जाता है तब सम्पूर्ण लाभ प्राप्त किया जा सकता है । जिससे लोकहित, समाजहित तथा देशहित होता है। स्वार्थपरता तिरस्कृत होती  है।
keywords: शिक्षा का उद्देश्य, शिक्षा का महत्व, मानव जीवन में शिक्षा की आवश्यकता, शिक्षा के महत्व पर आलेख, राम सहोदर पटेल का आलेख
रचना
राम सहोदर पटेल, शिक्षक
ग्राम-सनौसी, तहसील-जयसिंहनगर थाना ब्योहारी जिला-शहडोल मध्यप्रदेश
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शनिवार, जून 19, 2021

जाने कहां गए, वो बचपन के दिन....

जाने कहां गए, वो बचपन के दिन......... 



     समाज में परिवर्तन होता आया है और होता ही रहेगा। शहर में बदलाव आया भौतिक भी और सामाजिक भी।यह परिवर्तन गांवों में भी बहुत तेजी के साथ हुआ।वैश्वीकरण के युग में सब कुछ बाजार आधारित हो गया।विकास ने न केवल हमारे भौतिक परिवेश को ही प्रभावित किया बल्कि सामाजिक ताने बाने को,मानसिक फलक को भी अछूता नहीं रहने दिया।कहावत है कि अजब तेरी महिमा,गजब तेरी लीला।वह भी क्या जमाना था जब दरवाजे पर बैल,भैंस, गाय,बकरी, घोड़ा,मुर्गी,कुत्ता आदि अपनी उपस्थिति से कोलाहल पूर्ण परिवेश का सृजन करते थे,और जीवंतता का एहसास कराते थे।सुबह सूर्य की स्वर्ण रश्मियां ओस की बूंद को सुनहली बना देती थी,चिड़ियों का चहचहाना,भौरों का गुंजन वातावरण को संगीतमय बना देते थे।कुएं पर चरखी की आवाज क्या सिहरन पैदा कर देती थी नहाने से पूर्व ही,जाड़े में रोएं खड़े हो जाते थे। दरवाजे पर इन जानवरों की अधिकता उस व्यक्ति की संपन्नता और शौक के द्योतक थे, उस गाँव में उसे बड़ मनई कहा जाता था ।दरवाजे पर नीम का दरख्त और दाएँ या बाएँ पक्का कुंआ,उस पर चरखी बरहा और कूंड। एक बड़ी बोरसी में आग हमेशा रहती थी,माचिस का जमाना था नहीं,लोग बाग शाम को आग ले भी जाया करते थे।उस बोरसी के पास बीड़ी ,सुर्ती और कहीं-कहीं हुक्का भी रखा रहता था,एक सरौता, सोपाडी,पक्की सुरती,कत्था, चूना भी कुछ शौकीन लोग रखते थे। दरवाजे के बगल में एक बैठका होता था,जिसमें चौकी,चरपाई(पलंग) पड़ी रहती। जो भी थोड़ा संपन्न रहता उसके यहाँ कमोबेश ये सारी व्यवस्थाएं रहती थीं ।जानवर तो निश्चित रूप से रहते ही थे ।अब आज यह सब कुछ गायब हो चुका है।दूध अब डेरी से आता है,बच्चो के पीने के लिए और चाय बनाने के लिए।पहले दूध,दूधनहर में गरमाया जाता था।दही जमाने पर लाल सी मोटी साढ़ी(मिट्टी के दूधनहर में उपले के अहरे पर छेद वाली हौदी से ढककर),गजब का स्वाद,फिर मट्ठा बने,मक्खन निकले,सभी लोग चाव से खाते थे।अब गाँव में भी गैस आ गई, गोहरी का जमाना लद गया। हर गाँव में एक छोटी सी परचून और चाय की दुकान हो गई है।सुबह-शाम चाय पीने वहाँ ही लोगबाग चले जाते हैं।लगभग प्रत्येक 5 किलोमीटर के अंदर देसी दारू का ठेका खुल गया है वहां चखना की दुकान भी मिल जाती हैं,अंडे की दुकान तो रहती ही है।उधर से ही एक पाउच/शीशी चढाकर साइकिल/मोटर साइकिल से कभी -कभी पैदल भी झूमते-झामते,बेवजह बोलते हुए,गाली गलौज करते हुए गाँव (घर)की ओर चल देते हैं,कई लोग जब सामने पड़ जाते हैं तो कन्नी काट कर चल देते हैं।खुदा ना खास्ता कुछ ज्यादा चढ गयी तो रास्ते में ही सड़क पर या पटरी पर ही लुढ़क भी जाते हैं। कभी कभी कुछ ज्यादा हो जाती है या देशी और अंग्रेजी का मेल हो जाता है,या मिलावटी मिल जाती है जैसा कि अभी अंबेडकरनगर,आजमगढ़,अलीगढ़ में हुआ।सैकड़ों लोग स्वर्ग सिधार गए,बीबी बच्चे अनाथ हो गए, सुहाग मिट गए, मां की कोख सूनी हो गई, पिता के अरमान दारू की भेंट चढ़ गए।ऐसे हादसे लगभग हर वर्ष हो जाया करते हैं,लेकिन सरकार क्या करे,इससे उसे बहुत टैक्स मिलता है जो,लोग मरे तो वह क्या करे,2 से 4 लोगों का निलंबन करके सरकारी फाइल का पेट भर जाता है और कार्यों की इतिश्री हो जाती है।जबकि जब दूध लेने जाते हैं या दूधिया सायकिल पर बाल्टे में दूध लेकर लोगों के घर -घर जाकर दूध देता है त उससे कुछ दिन बाद बड़े प्रेम से पूछते हैं कि भैया/दादा दूध में पानी तो नही मिलाए हैं।दूध का पैसा प्रायः महीने भर बाद दिया जाता है।जबकि दारू लोग ठेके पर नगद लेते हैं,लेकिन उससे एक बार भी नहीं पूछते हैं कि इसमें कोई मिलावट तो नहीं है,यह एक बहुत बड़ी विडंबना है।

    पहले गाँव में किसी भी कार्य- प्रयोजन में घर और गाँव की गृहलक्ष्मियां और मनसेधू मिलकर पूरा खाना बनाने से लेकर भोजन परोसने तक का काम कर लेते थे। दोना पत्तल,पुरवा एवं पानी परोसने का काम छोटे-छोटे बच्चे ही कर डालते थे, हम लोगों का प्रशिक्षण भी रामजियावान भैया,बृजेन्द्र चाचा(बलुआ) के साथ ऐसे ही हुआ था।खाना खाने के बाद पत्तल-पुरवा उठाकर उसे उचित स्थान पर रख आया जाता था।किसी भी शादी विवाह, बरही, तेरही,भोज भात में दूध-दही ,बरतन आदि खरीदना नहीं पड़ता था,सब कुछ पास पड़ोस से मिल जाया करता था।रिश्तेदारों के यहां से सामान आदि दौरी(साड़ी,राशन,सब्जी आदि) आती थी,उत्सव का माहौल होता था।अब सब कुछ परिवर्तित हो गया है।पहले नाच वाले बाहर से आते थे,खाना घर की महिलाएं व पुरुष मिलकर बनाते थे।अब पूरा घर परिवार के लोग नाचते हैं, बाबर्ची खाना पकाते हैं। पहले लोग सायकिल से जाकर नाते- रिश्तेदारी तथा काम भी कर आते थे ।इसी बहाने उनकी मेहनत भी हो जाती थी,श्रम उत्पादक था।आज कार या मोटरसाइकिल से जिम में हजारों रूपये खर्च करके एक ही स्थान पर खड़ी  आधुनिक सायकिल पर घंटों पसीना बहाते हैं।पहले क्या था कि एक गमछा लेकर नदी या पोखरे की ओर चले जाते थे ।इसी बहाने टहलान भी हो जाती थी वहां ही नीम या बबूल की दातून किया,नहाया-धोया और सिर पर धोती या गमछा रखा,घर चले आए।आज कल इज्जत घर स्नानघर दोनों घर में ही है।कई लोग तो वही स्लीपर पूरे घर में पहनकर चलते हैं,क्योंकि इज्जतघर से आए हैं, नहा धोकर,भोजन की थाली पर पालथी मार बैठ गए।पहले बिना हाथ-पैर धोये आप मझेरियां(रसोई)पर नहीं जा सकते थे।जूता चप्पल पहनकर कोई घर के अंदर नहीं जा सकता था।बाहर धुलकर खड़ाऊं रखा रहता था,वही पहनकर खाना खाने जाते थे।आधुनिकता मे बहुत सी चीजें गायब होती जा रही हैं।पहले आजा - आजी,बाबा- बूढ़ी का का घर में बहुत ही कद्र व फिक्र होती थी,अब---------।समय के साथ बदलाव जरूरी है लेकिन हमें अपनी संस्कृति व संस्कार को सहेजने की भी जरूरत है।किसी ने क्या खूब कहा है कि हम चांद पर तो पहुंच गए लेकिन धरती पर रहना नहीं सीख पाए। कोविड ने जरूर जिंदगी का कुछ फलसफा हमें पढ़ाया है, दुःख और पीड़ा की गहन  अनुभूति के साथ संवेदनशीलता,सहकारिता,मेल- जोल बढ़ाने और प्रकृति की ओर रुख करने की नई सीख मिली है।

जोहार धरती मां!जोहार प्रकृति!

डा ओ पी चौधरी

समन्वयक, अवध परिषद, उत्तर प्रदेश;

सम्प्रति, एसोसिएट प्रोफेसर,मनोविज्ञान विभाग,श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।

मो 9415694678

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बुधवार, जून 16, 2021

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)

आलेख : हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श

-रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)



 

        स्त्री मायने ’’माँ’’। माँ से ही इस सृष्टि का सृजन हुआ है। माँ ही इस भूमण्डल को स्पंदित करती है। माँ के ममतामयी रूप को साहित्य प्रतिबिंबित करता है; साथ ही स्त्री की हृदय विदारक पीड़ा का प्रतिबिंबन भी साहित्य में मिलता है।

सृष्टि विधायक, भूमण्डल का हे जननि! हृदय तुझे है समर्पित।

 ममता की धागों से बुनती हमको, जीवन का कण-कण है अर्पित।।

साहित्य और समाज दोनों एक-दूसरें के संपूरक हैं। साहित्य समाज को चित्रित करता है और समाज साहित्य को चित्रण करने की शक्ति प्रदान करता है।

साहित्य विभिन्न भाव-चित्रों का संकलन है जिसे साहित्य समाज से ही सोखता है। हिन्दी साहित्य में स्त्री की शक्ति और उसका गुणगान भली-भाँति की गई है। साहित्य स्त्री विमर्श के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन करती है; उसके सामाजिक पहलुओं, आर्थिक पक्षों,धार्मिक आचार-विचारों,गृहस्थी पक्षों आदि का प्रकटीकरण करता है। जब तक साहित्य स्त्री पक्षों का स्पंदन नहीं करता तब तक साहित्य का संचित कोष अधूरा ही होता है।

            साहित्य में स्त्री कहीं दुखः से रोती नजर आती है, कहीं शक्ति से भरी मिसाल तो कहीं बेबस और लाचार; यह सब समाज का ही प्रतिफल है जिसे साहित्य में बखूबी उकेरा गया है। 

रोती है बिलखती है, पीड़ा उसकी कसकती है।

कलयुगी समाज अब भी न समझा, स्त्री से घर-द्वार महकती है।।

साहित्य में स्त्री के सम्मान, शक्ति और उसके गौरव का गुणगान बड़ा ही मनोरम स्वरूप में चित्रित किया गया है। जब-जब समाज रोया है तब-तब साहित्य समाज के आँसू अपने भाव-कोष से सींचता आया है। जब-जब समाज पथभ्रमित हुआ है तब-तब साहित्य धु्रवतारा बन जीवन-मार्ग प्रशस्त करता है।

साहित्य में समाज के करूणामयी पुकार और उसके संवृद्धि का चित्रण मिलता है। साहित्य बस समाज का दामन पकड़े अपने को पोषित करता आया है।

साहित्य स्त्री के लिए ‘‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी’’, कहीं ‘‘खूब लड़ी मर्दानी झाँसी वाली रानी’’ तो कहीं ‘‘ अँसुवन जल सींचि-सींचि प्रेमबेलि बोइ’’ के रूप में याद दिलाता है और समस्त नारीमण्डल को जगाता है। साहित्य स्त्री के लिए शक्ति और सम्मान जुटाता है और इससे स्त्री ऊर्जा सोखती है।

      आज नारी शक्तिहीन नहीं, वह समाज के संग आगे बढ़ता साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराया है। हिन्दी साहित्य में स्त्री को ‘‘ जगमग दीप’’ की संज्ञा अनायास नहीं दी गई है; उसके सृजन-शक्ति और समर्पण-सद्भाव के बूते ही उसे उत्कृष्ट माना गया है। साहित्य समाज में नारी के प्रति मधुभरी गीत भी व्यंजित किये हैं-

नारी तू षक्ति विधायक, ममता की फुलवारी है।

तू मंगलकरणी पुष्पलता, तू जगमण्डल विस्तारी है।।

साहित्य ग्रामीण समाज की नारी और शहरी समाज की नारी का भी विभेदन करता है। वह समाज में समानता का पाठ का प्रसारण करता है। गाँवों में नारियाँ अशिक्षा से ग्रसित अपने को कुंठित पाते हैं तब साहित्य उन्हें जगाता हुआ शिक्षा का प्रसाद बाँटता है और नित आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

साहित्य ग्रामीण परिवेश में जीवन जीती नारियों का उद्घाटन बड़े ही अनोखे ढ़ग से करता है। वह नारी के मानसिक संकीर्णता, घूँघट में छुपे रहना, डर से जुड़े रहना आदि कमियों को उजागर करता है।

साहित्य-सर्जक अपनी रचनाशीलता में नारी पक्ष का उद्घाटन निश्चित तौर पर करते हैं। उसे अपनी कृतियों में ‘‘पात्र’’ धारण अवश्य कराते हैं; सद्गति और गबन जैसी अमर कृतिया इसके द्योतक हैं।

         साहित्य में स्त्रियों के गीत-गुंजन जैसे- कजलियाँ, सोहर, बधावा, मंगलाचरण आदि का हृदयस्पर्शी सम्मोहन मिलता है तो कहीं प्रातःकाल जात चलाने की मधुरस धुन मिलता है। स्त्रियाँ बरसाती गीत गाते हुए धान की कलमी से खेत में मक्खन समान मिट्टी से बनी किताबों में अपने मन के गीत लिखने में माहिर होते हैं। साहित्य में fस्त्रयों के मथानी चलाने का हृदयस्पर्शी धुन भी स्थापित है। यूँ कहें कि स्त्रियों के अनेक कलाकृतियों से साहित्य भरपूरित है-

आओ जी गाएँ मंगल बधाई....।

बधावा लेके आये मोर ....।

सो जा लल्ला लोरी.......।

तुझे सूरज कहूँ या चंदा.....।

आदि स्त्री काव्य-गुंजन से साहित्य फलता-फूलता आया है। साहित्य स्त्री के शक्ति रूप का बखान इस प्रकार करता है-

तू शक्ति, अमरता का प्रखण्ड प्रवेग

तू सृष्टि विस्तारी।

कला रंग से रँगी हुई तू

प्रेरक और व्यवहारी।।

साहित्य में समाज का प्रकटन भली-भँति मिलता है। कभी स्त्री पक्ष का उद्घाटन तो कभी प्रकृति प़क्ष का। आज की बढ़ती आधुनिकता में भी नारियाँ अशिक्षित हैं,मन में रूढ़वादिता के कपट अब भी नहीं खुले; तब साहित्य शिक्षा और सद्भाव का मसाल लिए आगे आता है ऐसी स्थितियों से निबटने में मदद करता है। स्त्रियों को नई राह दिखाने में मदद करता है साथ ही नई गीतों का चित्रांकन भी करता है।

                आज ग्रामीण परिवेश में नारी गृहस्थी में व्यस्त केवल चौका-चूल्हा तक ही जैसे सीमित है; वह रूढ़वादिता का चादर ओढ़े अपने को संकीर्ण बनाकर जीने में लगी हुई है; तब ऐसे में ही साहिय उन्हें शिक्षा की नई धुन देकर आगे उठाने का प्रयास करता है।

साहित्य में नारी का टोकरी में फल बेंचने, फूलों की माला बेंचने, बाँस के बर्तन बनाने, सूत कातने,कपड़ों में कढ़ाई-बुनाई करने का भाव चत्र अंकित है। साहित्य स्त्रियों के ऐसे ही कर्म-निपुणता का बयान करते हुए धन्य हुआ है।

साहित्य नारी को विजयमाला और पुष्पगुच्छ भेंट करता है तो उनके लिए कहीं नवगीत बुनता है। नारी के अटूट साहस, कर्म-तल्लीनता और उसके निर्भयता को दिखाता आया है। इस तरह हिन्दी साहित्य में स्त्री सदैव स्मरणीय, पूजनीय, जीवन-प्रेरक और नवगीत बुनाने वाली मानी जाती है।

हे माँ माटी रजकण तेरे हो मेरे मस्तक,

हे जननि! मेरे तू जीवन का सुन्दरतम् हर्षक

हृदय समर्पण जीवन अर्पण तू सृष्टि विधायक अवतारी

तेरे से जग आलोकित होता तू जीवन सबका विस्तारी

नित रोली-चंदन भेंट है तुझको तू जीवन-निर्मात्री है

पग तेरे मैं देख चलूँ, तू जीवन सबको दात्री है

तू रोती, जग रोता, ये कैसी जीवनशाला है?

जनकर सबको बड़ा किया, भेंट तुझे विजयमाला है

ना पाकर तुझको साहित्य-समाज है रोता, धरती भी व्याकुल हो जाती है

माँ यह सब देख तब अपने पुत्रों को, अँचरा तर ढाँक दूध पिलाती है।।

इस तरह साहित्य और समाज के मध्य स्त्री अनेक भावांशों को प्रतिबिंबति करती हुई अविस्मरणीय है। विभिन्न कलाकृतियों की उपज स्त्री को ही मानी गई है। साहित्य में समाज, समाज में कलाएँ, कलाओं में रंग,रंगों में प्रकृति आदि का समुच्चय सदैव से बनी है।

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साहित्य के पन्नों से

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...