मंगलवार, जनवरी 31, 2023
अंक- जनवरी 2023
रविवार, जुलाई 18, 2021
कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी
बुधवार, जुलाई 07, 2021
सरकारी वन महोत्सव एवम् सामाजिक उत्तरदायित्व–डा ओ पी चौधरी का पर्यावरण के संबंध में आलेख
रविवार, जुलाई 04, 2021
कोविड-19:महामारी के दौर में हमारे गांव- देहात–डॉ. ओ पी चौधरी
गाँव की ओर (कविता): मनोज कुमार चंद्रवंशी
गुरुवार, जुलाई 01, 2021
शिक्षा का उद्देश्य- शिक्षा विषय पर बहुत ही सुन्दर आलेख : राम सहोदर पटेल
मुक्ति का मार्ग शिक्षा:कोमल चंद
शिक्षा सफलता के दरवाज़े खोलती है-अविनाश सिंह
शिक्षा का व्यवसायीकरण नहीं,राष्ट्रीयकरण हो: सुरेश यादव
शिक्षा के साथ ये क्या हो गया-सुरेन्द्र कुमार पटेल
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के 10 वर्ष: सुरेश यादव
मंगलू का होशियार सिंह(कहानी):डी ए प्रकाश खांडे
अप्प दीपो भव को चरितार्थ करें :सुरेन्द्र कुमार पटेल
शनिवार, जून 19, 2021
जाने कहां गए, वो बचपन के दिन....
जाने कहां गए, वो बचपन के
समाज में परिवर्तन होता आया है और होता ही रहेगा। शहर में बदलाव आया भौतिक भी और सामाजिक भी।यह परिवर्तन गांवों में भी बहुत तेजी के साथ हुआ।वैश्वीकरण के युग में सब कुछ बाजार आधारित हो गया।विकास ने न केवल हमारे भौतिक परिवेश को ही प्रभावित किया बल्कि सामाजिक ताने बाने को,मानसिक फलक को भी अछूता नहीं रहने दिया।कहावत है कि अजब तेरी महिमा,गजब तेरी लीला।वह भी क्या जमाना था जब दरवाजे पर बैल,भैंस, गाय,बकरी, घोड़ा,मुर्गी,कुत्ता आदि अपनी उपस्थिति से कोलाहल पूर्ण परिवेश का सृजन करते थे,और जीवंतता का एहसास कराते थे।सुबह सूर्य की स्वर्ण रश्मियां ओस की बूंद को सुनहली बना देती थी,चिड़ियों का चहचहाना,भौरों का गुंजन वातावरण को संगीतमय बना देते थे।कुएं पर चरखी की आवाज क्या सिहरन पैदा कर देती थी नहाने से पूर्व ही,जाड़े में रोएं खड़े हो जाते थे। दरवाजे पर इन जानवरों की अधिकता उस व्यक्ति की संपन्नता और शौक के द्योतक थे, उस गाँव में उसे बड़ मनई कहा जाता था ।दरवाजे पर नीम का दरख्त और दाएँ या बाएँ पक्का कुंआ,उस पर चरखी बरहा और कूंड। एक बड़ी बोरसी में आग हमेशा रहती थी,माचिस का जमाना था नहीं,लोग बाग शाम को आग ले भी जाया करते थे।उस बोरसी के पास बीड़ी ,सुर्ती और कहीं-कहीं हुक्का भी रखा रहता था,एक सरौता, सोपाडी,पक्की सुरती,कत्था, चूना भी कुछ शौकीन लोग रखते थे। दरवाजे के बगल में एक बैठका होता था,जिसमें चौकी,चरपाई(पलंग) पड़ी रहती। जो भी थोड़ा संपन्न रहता उसके यहाँ कमोबेश ये सारी व्यवस्थाएं रहती थीं ।जानवर तो निश्चित रूप से रहते ही थे ।अब आज यह सब कुछ गायब हो चुका है।दूध अब डेरी से आता है,बच्चो के पीने के लिए और चाय बनाने के लिए।पहले दूध,दूधनहर में गरमाया जाता था।दही जमाने पर लाल सी मोटी साढ़ी(मिट्टी के दूधनहर में उपले के अहरे पर छेद वाली हौदी से ढककर),गजब का स्वाद,फिर मट्ठा बने,मक्खन निकले,सभी लोग चाव से खाते थे।अब गाँव में भी गैस आ गई, गोहरी का जमाना लद गया। हर गाँव में एक छोटी सी परचून और चाय की दुकान हो गई है।सुबह-शाम चाय पीने वहाँ ही लोगबाग चले जाते हैं।लगभग प्रत्येक 5 किलोमीटर के अंदर देसी दारू का ठेका खुल गया है वहां चखना की दुकान भी मिल जाती हैं,अंडे की दुकान तो रहती ही है।उधर से ही एक पाउच/शीशी चढाकर साइकिल/मोटर साइकिल से कभी -कभी पैदल भी झूमते-झामते,बेवजह बोलते हुए,गाली गलौज करते हुए गाँव (घर)की ओर चल देते हैं,कई लोग जब सामने पड़ जाते हैं तो कन्नी काट कर चल देते हैं।खुदा ना खास्ता कुछ ज्यादा चढ गयी तो रास्ते में ही सड़क पर या पटरी पर ही लुढ़क भी जाते हैं। कभी कभी कुछ ज्यादा हो जाती है या देशी और अंग्रेजी का मेल हो जाता है,या मिलावटी मिल जाती है जैसा कि अभी अंबेडकरनगर,आजमगढ़,अलीगढ़ में हुआ।सैकड़ों लोग स्वर्ग सिधार गए,बीबी बच्चे अनाथ हो गए, सुहाग मिट गए, मां की कोख सूनी हो गई, पिता के अरमान दारू की भेंट चढ़ गए।ऐसे हादसे लगभग हर वर्ष हो जाया करते हैं,लेकिन सरकार क्या करे,इससे उसे बहुत टैक्स मिलता है जो,लोग मरे तो वह क्या करे,2 से 4 लोगों का निलंबन करके सरकारी फाइल का पेट भर जाता है और कार्यों की इतिश्री हो जाती है।जबकि जब दूध लेने जाते हैं या दूधिया सायकिल पर बाल्टे में दूध लेकर लोगों के घर -घर जाकर दूध देता है त उससे कुछ दिन बाद बड़े प्रेम से पूछते हैं कि भैया/दादा दूध में पानी तो नही मिलाए हैं।दूध का पैसा प्रायः महीने भर बाद दिया जाता है।जबकि दारू लोग ठेके पर नगद लेते हैं,लेकिन उससे एक बार भी नहीं पूछते हैं कि इसमें कोई मिलावट तो नहीं है,यह एक बहुत बड़ी विडंबना है।
पहले गाँव में किसी भी कार्य- प्रयोजन में घर और गाँव की गृहलक्ष्मियां और मनसेधू मिलकर पूरा खाना बनाने से लेकर भोजन परोसने तक का काम कर लेते थे। दोना पत्तल,पुरवा एवं पानी परोसने का काम छोटे-छोटे बच्चे ही कर डालते थे, हम लोगों का प्रशिक्षण भी रामजियावान भैया,बृजेन्द्र चाचा(बलुआ) के साथ ऐसे ही हुआ था।खाना खाने के बाद पत्तल-पुरवा उठाकर उसे उचित स्थान पर रख आया जाता था।किसी भी शादी विवाह, बरही, तेरही,भोज भात में दूध-दही ,बरतन आदि खरीदना नहीं पड़ता था,सब कुछ पास –पड़ोस से मिल जाया करता था।रिश्तेदारों के यहां से सामान आदि दौरी(साड़ी,राशन,सब्जी आदि) आती थी,उत्सव का माहौल होता था।अब सब कुछ परिवर्तित हो गया है।पहले नाच वाले बाहर से आते थे,खाना घर की महिलाएं व पुरुष मिलकर बनाते थे।अब पूरा घर परिवार के लोग नाचते हैं, बाबर्ची खाना पकाते हैं। पहले लोग सायकिल से जाकर नाते- रिश्तेदारी तथा काम भी कर आते थे ।इसी बहाने उनकी मेहनत भी हो जाती थी,श्रम उत्पादक था।आज कार या मोटरसाइकिल से जिम में हजारों रूपये खर्च करके एक ही स्थान पर खड़ी आधुनिक सायकिल पर घंटों पसीना बहाते हैं।पहले क्या था कि एक गमछा लेकर नदी या पोखरे की ओर चले जाते थे ।इसी बहाने टहलान भी हो जाती थी वहां ही नीम या बबूल की दातून किया,नहाया-धोया और सिर पर धोती या गमछा रखा,घर चले आए।आज कल इज्जत घर स्नानघर दोनों घर में ही है।कई लोग तो वही स्लीपर पूरे घर में पहनकर चलते हैं,क्योंकि इज्जतघर से आए हैं, नहा धोकर,भोजन की थाली पर पालथी मार बैठ गए।पहले बिना हाथ-पैर धोये आप मझेरियां(रसोई)पर नहीं जा सकते थे।जूता चप्पल पहनकर कोई घर के अंदर नहीं जा सकता था।बाहर धुलकर खड़ाऊं रखा रहता था,वही पहनकर खाना खाने जाते थे।आधुनिकता मे बहुत सी चीजें गायब होती जा रही हैं।पहले आजा - आजी,बाबा- बूढ़ी का का घर में बहुत ही कद्र व फिक्र होती थी,अब---------।समय के साथ बदलाव जरूरी है लेकिन हमें अपनी संस्कृति व संस्कार को सहेजने की भी जरूरत है।किसी ने क्या खूब कहा है कि हम चांद पर तो पहुंच गए लेकिन धरती पर रहना नहीं सीख पाए। कोविड ने जरूर जिंदगी का कुछ फलसफा हमें पढ़ाया है, दुःख और पीड़ा की गहन अनुभूति के साथ संवेदनशीलता,सहकारिता,मेल- जोल बढ़ाने और प्रकृति की ओर रुख करने की नई सीख मिली है।
जोहार धरती मां!जोहार प्रकृति!
डा ओ पी चौधरी
समन्वयक, अवध परिषद, उत्तर प्रदेश;
सम्प्रति, एसोसिएट प्रोफेसर,मनोविज्ञान विभाग,श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
मो 9415694678
बुधवार, जून 16, 2021
हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)
आलेख
: हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श
-रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)
स्त्री मायने ’’माँ’’। माँ से ही इस सृष्टि का सृजन हुआ है। माँ ही
इस भूमण्डल को स्पंदित करती है। माँ के ममतामयी रूप को साहित्य प्रतिबिंबित करता
है; साथ ही स्त्री की हृदय विदारक पीड़ा का
प्रतिबिंबन भी साहित्य में मिलता है।
सृष्टि विधायक, भूमण्डल का हे जननि! हृदय तुझे है समर्पित।
ममता की धागों से बुनती हमको, जीवन का कण-कण है अर्पित।।
साहित्य और समाज दोनों एक-दूसरें के संपूरक
हैं। साहित्य समाज को चित्रित करता है और समाज साहित्य को चित्रण करने की शक्ति
प्रदान करता है।
साहित्य विभिन्न भाव-चित्रों का संकलन है जिसे
साहित्य समाज से ही सोखता है। हिन्दी साहित्य में स्त्री की शक्ति और उसका गुणगान
भली-भाँति की गई है। साहित्य स्त्री विमर्श के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन करती है; उसके
सामाजिक पहलुओं, आर्थिक पक्षों,धार्मिक आचार-विचारों,गृहस्थी
पक्षों आदि का प्रकटीकरण करता है। जब तक साहित्य स्त्री पक्षों का स्पंदन नहीं
करता तब तक साहित्य का संचित कोष अधूरा ही होता है।
साहित्य में स्त्री कहीं दुखः से रोती नजर आती है, कहीं
शक्ति से भरी मिसाल तो कहीं बेबस और लाचार;
यह सब समाज का ही प्रतिफल है जिसे
साहित्य में बखूबी उकेरा गया है।
रोती है बिलखती है, पीड़ा
उसकी कसकती है।
कलयुगी समाज अब भी न समझा, स्त्री
से घर-द्वार महकती है।।
साहित्य में स्त्री के सम्मान, शक्ति
और उसके गौरव का गुणगान बड़ा ही मनोरम स्वरूप में चित्रित किया गया है। जब-जब समाज
रोया है तब-तब साहित्य समाज के आँसू अपने भाव-कोष से सींचता आया है। जब-जब समाज
पथभ्रमित हुआ है तब-तब साहित्य धु्रवतारा बन जीवन-मार्ग प्रशस्त करता है।
साहित्य में समाज के करूणामयी पुकार और उसके
संवृद्धि का चित्रण मिलता है। साहित्य बस समाज का दामन पकड़े अपने को पोषित करता
आया है।
साहित्य स्त्री के लिए ‘‘अबला
जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी’’, कहीं ‘‘खूब लड़ी मर्दानी झाँसी वाली रानी’’ तो
कहीं ‘‘ अँसुवन जल सींचि-सींचि प्रेमबेलि बोइ’’ के
रूप में याद दिलाता है और समस्त नारीमण्डल को जगाता है। साहित्य स्त्री के लिए
शक्ति और सम्मान जुटाता है और इससे स्त्री ऊर्जा सोखती है।
आज नारी शक्तिहीन नहीं, वह समाज के संग आगे बढ़ता साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराया है। हिन्दी साहित्य में स्त्री को ‘‘ जगमग दीप’’ की संज्ञा अनायास नहीं दी गई है; उसके सृजन-शक्ति और समर्पण-सद्भाव के बूते ही उसे उत्कृष्ट माना गया है। साहित्य समाज में नारी के प्रति मधुभरी गीत भी व्यंजित किये हैं-
नारी तू षक्ति विधायक, ममता की फुलवारी है।
तू
मंगलकरणी पुष्पलता, तू जगमण्डल विस्तारी है।।
साहित्य ग्रामीण समाज की नारी और शहरी समाज की
नारी का भी विभेदन करता है। वह समाज में समानता का पाठ का प्रसारण करता है। गाँवों
में नारियाँ अशिक्षा से ग्रसित अपने को कुंठित पाते हैं तब साहित्य उन्हें जगाता
हुआ शिक्षा का प्रसाद बाँटता है और नित आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।
साहित्य ग्रामीण परिवेश में जीवन जीती नारियों
का उद्घाटन बड़े ही अनोखे ढ़ग से करता है। वह नारी के मानसिक संकीर्णता, घूँघट
में छुपे रहना, डर से जुड़े रहना आदि कमियों को उजागर करता है।
साहित्य-सर्जक अपनी रचनाशीलता में नारी पक्ष का
उद्घाटन निश्चित तौर पर करते हैं। उसे अपनी कृतियों में ‘‘पात्र’’ धारण
अवश्य कराते हैं; सद्गति और गबन जैसी अमर कृतिया इसके द्योतक
हैं।
साहित्य में स्त्रियों के गीत-गुंजन जैसे- कजलियाँ, सोहर, बधावा, मंगलाचरण आदि का हृदयस्पर्शी सम्मोहन मिलता है तो कहीं प्रातःकाल जात चलाने की मधुरस धुन मिलता है। स्त्रियाँ बरसाती गीत गाते हुए धान की कलमी से खेत में मक्खन समान मिट्टी से बनी किताबों में अपने मन के गीत लिखने में माहिर होते हैं। साहित्य में fस्त्रयों के मथानी चलाने का हृदयस्पर्शी धुन भी स्थापित है। यूँ कहें कि स्त्रियों के अनेक कलाकृतियों से साहित्य भरपूरित है-
आओ जी गाएँ मंगल बधाई....।
बधावा लेके आये मोर ....।
सो जा लल्ला
लोरी.......।
तुझे सूरज कहूँ या
चंदा.....।
आदि स्त्री काव्य-गुंजन से साहित्य फलता-फूलता
आया है। साहित्य स्त्री के शक्ति रूप का बखान इस प्रकार करता है-
तू शक्ति, अमरता
का प्रखण्ड प्रवेग
तू सृष्टि विस्तारी।
कला रंग से रँगी हुई तू
प्रेरक और
व्यवहारी।।
साहित्य में समाज का प्रकटन भली-भँति मिलता है।
कभी स्त्री पक्ष का उद्घाटन तो कभी प्रकृति प़क्ष का। आज की बढ़ती आधुनिकता में भी
नारियाँ अशिक्षित हैं,मन में रूढ़वादिता के कपट अब भी नहीं खुले; तब
साहित्य शिक्षा और सद्भाव का मसाल लिए आगे आता है ऐसी स्थितियों से निबटने में मदद
करता है। स्त्रियों को नई राह दिखाने में मदद करता है साथ ही नई गीतों का
चित्रांकन भी करता है।
आज ग्रामीण परिवेश में नारी
गृहस्थी में व्यस्त केवल चौका-चूल्हा तक ही जैसे सीमित है; वह
रूढ़वादिता का चादर ओढ़े अपने को संकीर्ण बनाकर जीने में लगी हुई है; तब
ऐसे में ही साहिय उन्हें शिक्षा की नई धुन देकर आगे उठाने का प्रयास करता है।
साहित्य में नारी का टोकरी में फल बेंचने, फूलों
की माला बेंचने, बाँस के बर्तन बनाने, सूत
कातने,कपड़ों में कढ़ाई-बुनाई करने का भाव चत्र अंकित
है। साहित्य स्त्रियों के ऐसे ही कर्म-निपुणता का बयान करते हुए धन्य हुआ है।
साहित्य नारी को विजयमाला और पुष्पगुच्छ भेंट
करता है तो उनके लिए कहीं नवगीत बुनता है। नारी के अटूट साहस, कर्म-तल्लीनता
और उसके निर्भयता को दिखाता आया है। इस तरह हिन्दी साहित्य में स्त्री सदैव
स्मरणीय, पूजनीय,
जीवन-प्रेरक और नवगीत बुनाने वाली मानी
जाती है।
हे माँ माटी रजकण तेरे हो मेरे मस्तक,
हे जननि! मेरे तू जीवन का सुन्दरतम् हर्षक
हृदय समर्पण जीवन अर्पण तू सृष्टि विधायक अवतारी
तेरे से जग आलोकित होता तू जीवन सबका विस्तारी
नित रोली-चंदन भेंट है
तुझको तू जीवन-निर्मात्री है
पग तेरे मैं देख चलूँ, तू
जीवन सबको दात्री है
तू रोती, जग
रोता, ये कैसी जीवनशाला है?
जनकर सबको बड़ा किया, भेंट तुझे विजयमाला है
ना पाकर तुझको साहित्य-समाज है रोता, धरती भी व्याकुल हो जाती है
माँ यह सब देख तब अपने
पुत्रों को, अँचरा तर ढाँक दूध पिलाती है।।
इस तरह साहित्य और समाज के मध्य स्त्री अनेक
भावांशों को प्रतिबिंबति करती हुई अविस्मरणीय है। विभिन्न कलाकृतियों की उपज
स्त्री को ही मानी गई है। साहित्य में समाज,
समाज में कलाएँ, कलाओं
में रंग,रंगों में प्रकृति आदि का समुच्चय सदैव से बनी
है।
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साहित्य के पन्नों से
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