राजेन्द्र प्रसाद पटेल "रंजन" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजेन्द्र प्रसाद पटेल "रंजन" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, अप्रैल 22, 2020

मेरे अन्तर्भाव: राजेन्द्र प्रसाद पटेल "रंजन"


मेरे अन्तर्भाव
कुण्डल छंद
दिनांक--२१/०४/२०
प्रेम रंग फूल फूल , सूल बीच साया।
उड़ रहा पराग धूल,भौंर धूरि माया॥
माली है सींच सींच,तोड़ फूल डाले।
कुदरत का खेल यही,प्रेम रहें पाले॥

दौड़ रहा लोभ मोंह,चाह रहा आस्मां।
छोंड़ छोंड़ सांच कर्म,ढ़ोंग ढ़ले सम्मां॥
रास करे राह राह , पांव बिन चलाते।
देख अरे लूट मचा,छांव नहिं छवाये॥

चारु चंद चित्त भरा,अंध राह छाये।
फूल बिछे पांव तले,सूल गंध आये॥
विश्वास कर आ अरे,पास में मिले जो।
फूल हो सुजान राह,सूल भी जिले जो॥

देख चलें नेह भरे,ख्याल ले खुदा का।
खुद के है खेत चले,ध्यान नहिं जुदा का॥
खास बात याद करें,साथ हो सभी का।
सत्यमेव सेय आज , छोंड़ पल कभी का॥
                  राजेन्द्र प्रसाद पटेल "रंजन"

शुक्रवार, अप्रैल 10, 2020

स्वार्थ से परे हों सामाजिक मूल्य:राजेंद्र प्रसाद पटेल का आलेख


एक बार कोई आदमी आम की टोकरी लिए घर की ओर जा रहा था। आप पके थे इसलिए उसकी खुशुबू राहगीरों को मिल रही थी। सभी आगे बढ़ते रहे। थोड़ी ही दूर पर एक आदमी उसी  ओर गांव तरफ से आ रहा था। वह आम वाले आदमी के पास पहुंच आम की मंहक पा रास्ते में टांग फैला खड़ा हो गया और बोला मुझे आम दो ।आम वाले ने उस आदमी को आम खिला उसके  हाथ में पानी का बोतल देख बोला -भाई मुझे बहुत प्यास लगी है जरा पिला दो । उस आदमी ने पानी देने से मना कर दिया । तब आम वाला बोला भाई तुम कौन हो ?

वह बोला-"मैं स्वार्थी हूँ।"

      दोस्तो समाज मानव समूह का एक संगठन है। उस संगठन में सभी एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। एक दूसरे के सहयोग और पूर्णता से संगठन शक्तिशाली हो बड़े से बड़े कठिनाइयों का सामना करने में सक्षम होता है।सुडौल होता है जो केवड़े की तरह सुगंध और गुलाब की तरह सुंदर हो उस समाज के सभी विभूतियों में सौन्दर्य और औरों के लिए आदर्श बनता है। अमीरी गरीबी से परे सामर्थ्य सर्जन कर सभी को एक सूत्र में पिरोने  का आत्मानुभूति देता है। सभी में समझ का विकास होता है और अनुशासन आत्मसंज्ञान में आता है। हर किसी  में सभी के प्रति प्रेम और आस्था का दीप उज्ज्वलित हो, सामाजिकता का प्रेरणा सूत्र बन सहज ही आनंद की अनुभूति देता है ।
        साथियों यहां तो बस ऊपर अंकित लघुकहानी  के गंदे कुंड में वे  जो समाज के अग्रणी बने हैं, डुबकी लगा रहे हैं और गरीबों के मीठे आम को झपट रहे हैं। यहां तो समाज अपराध निरापराध में नहीं अमीरी और गरीबी में बंटा हुआ है। यद्यपि यहां कोई अमीर नहीं हैं और हां यदि है भी तो वो है अपराध का अमीर। इनके तह में तो जाइये।इनमें से बहुतों ने  क्या-क्या नहीं किया। समाज के बंधनों को तोड़ सामाजिक धाराओं को बिचलित कर डाला। विवाह के बाद पत्नियों को छोड़ना, बहुओं को छोड़ना, और ऐसे लोगों को साथ देना जो विदुरों का खुल्लामखुल्ला पुनर्विवाह करते हैं और विधवाओं को सहारा देने वाले को दंड देते हैं। और यहां भी मेरा मतलब जब तक है तभी तक। मेरा मतलब निकला मैं अलग हो गया। मेरी दासता जो भी स्वीकार करेगा वह भी हमारी तरह कुछ भी करता रहे उसे पूरी छूट है। नहीं तो निरापराध समाज से अलग रहना पड़ेगा। मैं इतना स्वार्थी हूँ कि मेरा पार पाना तुम जैसे परमार्थियों के वश  की बात नहीं है। मैं महान हूँ।
      सोंचो दोस्तो जब हम अपनों के बीच ही स्वार्थ के जाल में फंसकर अपनों को ही बेवकूफ बनाते रहेंगे तो उस जंग में हमारी हार सुनिश्चित है जिसके लिए हम ही नहीं हमारे महान विभूतियों ने बलिदान दे दिया और कुछ भी नहीं कर सके। आज हम धर्म बदल लें या जाति। पर हम जहां रह रहे हैं वहीं हमें और हमारे समाज को स्वार्थवश  अंधकार में डालने वाले हम जैसे बने रहेंगे तो हमारा भी वही हाल होगा जो हमारे पूर्वजों से अभी तक हो रहा है। और हमारी औलाद घिसटती रहेगी ।
       आओ हम उस  स्वार्थ को जो हमारे दिल में बैठा है को मार भगायें और अपने समाज को सामर्थ्य कर दासता से मुक्त करनें में मूलभूत सहयोग दें । साथ ही नारी सम्मान और न्याय को नि:स्वार्थ भाव देने की कोशिश करें । हम किसी भी जाति और धर्म में हों, हमारे मानवीय मूल्य वही हैं। इसलिए किसी भी समाज का पुनुर्त्थान तब तक संभव नहीं है जब तक समाज का प्रत्येक सदस्य मानवीय गरिमा और मूल्यों के साथ खड़ा होने का संकल्प न कर ले।
आलेख: राजेन्द्र प्रसाद पटेल "रंजन"
[इस ब्लॉग में प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया यहाँ क्लिक करें। कृपया  अपनी  रचनाएं हमें whatsapp नंबर 8982161035 या ईमेल आई डी akbs980@gmail.com पर भेजें,देखें नियमावली ]

बुधवार, अप्रैल 08, 2020

मैं भूल हूँ-राजेन्द्र प्रसाद 'रंजन' का आलेख

मेरे साथियो, एक बार‌ रास्ते में कोई पैर जमाए खड़ा था। जिसे हमारे लोगों ने पूछा, "भाई तुम कौन हो? तुम रास्ता छोड़ो, हमें आगे जाना है।" प्रत्युत्तर में वह बोला-"नहीं भाई, नहीं। तुम आगे नहीं जा सकते।" हमने कहा-"तुम हमें रोंकने वाले आखिर में हो कौन ?"

उसने कहा-"मैं भूल हूँ।"

दोस्तो, किसी ने हमें हराया या दास्तां दिया। यह बिल्कुल गलत है। यह कल भी भूल थी और आज भी हमारी भूल है। जिसे हम सुधारना ही नहीं चाहते। बस उपदेश देना चाहते हैं। जरा स्वयं से स्वयं को ईमान से झांको। मिल जाएगा हमें आगे जाने से रोकने वाला, जो हमारे अन्दर ही है।

हम किसी और को नहीं स्वयं को भूल गये। और जब हम स्वयं को ही भूल गये तो गैरों की चाकरी तो करनी पड़ेगी। जो आज सामने है। जब मानव एक बार मानसिक दास्तां से घिर जाता है तो उससे निकलने में सदियों लग जाते हैं। कुर्बानियां देनी पड़ती है। उस भूल को हराने के लिए जिसने हमें मानसिक दास्तां दिया, के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। बस अपने भूल को समझने की जरूरत है।जिसके कारण हमारी सामाजिक दशा बिखर सी गई है। हम टूट चुके हैं अपने ही भाई को तोड़ने में। सारा समय बीत रहा है भाई को हराने में। अपराध की गुत्थियों में सिमट हम औरों को आवाज देते हैं सुधरो ।माया के लोभी हम न माया पाए न राम ।

यहां लेख में राम शब्द आ गया जो यहां भी मेरे प्रति आपको बिचलित करने से पीछे नहीं छोड़ेगा। और यह भी भूल है ।समझना है राम, बुद्ध, भीम, साईं, कृष्ण, विष्णु को। जिनके नाम से हम खेमें में बटने लगते हैं। हम वहां क्यों नहीं जाते जहां हमारा होने वाला है। क्या किसी ने हमें कहा कि तुम नासमझ बने रहो। सभी ने स्वयं से लेकर परिवार, समाज के सभी औचित्य क्रियाओं की ओर ले जाने की भरसक कोशिश की है। हम जाना ही नहीं चाहते और दूसरे को दोष देने में तुले हुए हैं । भाई-भाई से नफ़रत करने वाले तुझे धिक्कार है। तुझे चुल्लू भर पानी में डूब मरने चाहिए। हम नहीं लेना चाहते तो हमें न राम दे सकता, न कृष्ण और न ही बुद्ध।कुछ मिलने की प्राथमिक नींव हम हैं। हम अपने आप को समझ लें और वाष्र्तेय धारा में जाने की कोशिश करें निश्चित रूप से हमें हमारा मिल जाएगा ।किसी को गाली देने से हमारे मनोविचार में सरसता नहीं आती है और जब तक मन में, विचारों में सरसता नहीं तो कोई भी हमारे साथ नहीं होगा।

बहुत देर हो चुकी है। सरस परिणाम नामुमकिन तो नहीं कठिन अवश्य है ।जिसके लिए हमें किसी को सुधारने की आवश्यकता नहीं, स्वयं में सुधरने की आवश्यकता है। पर यह हो नहीं सकता क्योंकि अपनी त्रुटि हम देख ही नहीं सकते । पेड़ के पात-पात में छेंद हो चुका है। और दूसरों को सुधारने वाले पात तो बिल्कुल फटे और कुछ चिथड़े हैं। ये अपने धन-बल से अपने आपको छिद्रहीन बताकर उपदेश दे समाज को घर का न घाट का किए दे रहे हैं ।अपनी महानता को शीर्ष पर बनाए रखने के लिए वही अपनी पुरानी नीति साम, दाम, दंड भेद और अंग्रेजों की फूट डालो शासन करो की नीति।
दोस्तो, स्वयं को देखो, परखो, सुधरो और आगे बढ़ो। हम आपके साथ हैं।

आलेख: राजेन्द्र प्रसाद पटेल "रंजन"
[इस ब्लॉग में प्रकाशित रचनाएँ नियमित रूप से अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करने तथा ब्लॉग के संबंध में अपनी राय व्यक्त करने हेतु कृपया यहाँ क्लिक करें। कृपया  अपनी  रचनाएं हमें whatsapp नंबर 8982161035 या ईमेल आई डी akbs980@gmail.com पर भेजें,देखें नियमावली ]

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...