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शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

मुक्तक

मुक्तक 

शोषण के ज़हर से
कुंडलनी और ग्रंथियाँ
सूख चुकी हैं
उनमें न रंध्रों के रिसाव हैं
और न ही जीवन के लिए झुकाव।
एक आदमी धोखा देता है
एक आदमी धोखा खाता है
एक आदमी और है
जो धोखे को चाव से उपजाता है
यही उसका परम साध्य है।
कहाँ गए घिसपिटू?
जो अत्याचार निरोधक गोलियाँ और चूर्ण
बड़े मज़े से बेचते हैं
देश की गरीबी उन्हें नहीं दिखती?
शिक्षा में लगा दीमक उन्हें दिखाई नहीं देता
इन्हें चाहिए केवल हिंसा-हिंसा-हिंसा।
रे मलधारी!
विषधारी!
क्यों उचारता है अहंकार की पोथी
नहीं पढ़ी क्या मानवता के पाठ
क्या घुन लग गया तेरी बुद्धि को?
तेरे शोषण की कोख में क्यों पलती हैं गालियाँ।
शोषण की तिजोरी में
खून और हिंसा की लपट ही पूँजी है
जीवन कटी पतंग की तरह
तिलमिला रहा है।
गरीबी के पेट में
शोषण के चाबुक की चोट है
गोल-गुम्बद की तरह
हम सत्ताधारियों के ही वोट हैं
गिने जाते हैं केवल पॉपुलेशन-रजिस्टर में
थमा दी जाती है हवा से बनी चूर्ण।
शोषण की चोट को
एक आदमी झेलता है
एक आदमी रेलता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो केवल अपनी फटी विवशता को सीता है
ये तीनों आदमी कौन हैं
मेरी भाषा मौन है
अरे! ये तो किसान, साहूकार और मज़दूर हैं।
मैं पूछता हूँ कि
क्यों नहीं जुगाड़ है
रोटी का मेरे देश में
क्यों बिलबिलाते हैं लोग
क्यों रोकर नसें सुखा रहे हैं
अपने अस्थिपंजर की।
इस प्रजातंत्र की पट्टी में
धोखे की लिट्टी है
बाँचते हैं अंधभक्त
बिना चोखे के ही
जो फिरंगियों के ही
वंशज हैं।
मैं पूछता हूँ
क्यों चुप है जनता
क्यों नहीं फूँकती
शोषणधारी कुर्सियों को।
क्यों निर्धनता की कोख में
भूख तीखी होती है
सूझती क्यों नहीं
जीवन की बारहखड़ी
ए.बी.सी. की टूटी पगडंडी में
ज़ेड बड़ी दूर है।
जनाब! पेट रोटी माँगता है
पेट के छेद में भूख रोती है
चाहे घुन शोषण की हो
या टोपीधारियों की
जोंक की तरह ये बम्बूधारी हो गए हैं।
मैं नहीं उगाता
अपनी कला के खेत में
शृंगार के दानों से अंकुरित
वासना की गंध।
शोषण के इस भूगोल में
गरीबी की जलवायु
उष्ण-सी हो गई है
क्यों कोई विवशता के मरुस्थल में
समानता के छायादार पेड़ नहीं लगाता।
भूख उपजाती है विद्रोह
और लाचारी
अब आशा की किरणें
धूमिल-सी पड़ गई हैं।
सत्ताधारी क्यों खेलते हैं
'बूझो तो जानें'
क्यों हाथ को पाँव
और पाँव को हाथ कहते हैं
क्यों निर्लज्जता की रेखाओं से
शोषण के भद्दे चित्र खींचते हैं।
मुर्दों की मशीन में
चिपके प्राण बोल रहे हैं
वे आज थोथे प्रजातंत्र की
पोल खोल रहे हैं
खोज रहे हैं सलीके की पगडंडी में
बुदबुदाते पानी के छींटे।
लोथ के चीथड़ों...
और मुर्दास्थलों की चिकचिकाती चिंगारियाँ
किसी रक्त-मानव ने दिए हैं
ये घाव...
हे संपोषक! शोषण को पहनाएगा सूती कफ़न क्या?
पानी की परतों में
निर्लज्जता के पेट फूल गए हैं
मन में चढ़ाया जाने वाला
आधुनिकता का घोल
बिल्कुल लाल लिटमस की तरह
पीला हो गया है।
पढ़ता हूँ मौन की भाषा
गरीबी के उखड़े शब्द
शोषण के पीड़ादायी संयुक्ताक्षर।
हाँ, तिलमिलाती अभिव्यक्ति के कोटर में
रक्तरंजित घाव फूट पड़े हैं
और नव-मानव के प्रतिस्थापन में
जैसे अक्षर से बने शब्द और शब्द से बने वाक्य चकमक हो गए हैं।
कुछ शेर हाथी हैं
और कुछ हाथी शेर नहीं हैं वाली
कहावतें छोड़िए
अ से आम नहीं
अधिकार माँगिए।
न जाने क्यों गरीबी की छुअन
इतनी तीखी है
कि भूख तिलमिल है;
मन के छेद से
नाभि की दूरी कितनी है।
क से कबूतर...
और ख से खरगोश...
पढ़ने पर ठीक है**
यदि ग से गाली पढ़ें
तो प्रलय की संभावना तीव्र होती है***
जो पेट पर लात मारते हैं
उन्हें गाली की भाषा ज़्यादा पोषण देती है।
चोट पत्थर की हो... या...**
जिह्वा की...**
दोनों दुधारी होते हैं...
इनकी धार से रक्त के लाल रंग नहीं
चित्तीदार डर बहते हैं
शोषण की पट्टिकाओं में किसी ने
पसीने की ओस को रौंदा है...
और दी हैं गंदी गालियाँ...
छीनी हैं साड़ियाँ...
लूटी है आबरू...
और फुलाया है दुर्गंधित मन को।

रचनाकार:
रजनीश कुमार जायसवाल
ग्राम+ पोस्ट : झारा, तहसील : सरई
जिला : सिंगरौली (म०प्र०)
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बुधवार, फ़रवरी 08, 2023

मजदूर : रजनीश की कविता

👏मजदूर👏
मैं मजदूर हूँ
पसीने से ही मन महकाता हूँ
कुछ पैसों से ही, अपना चूल्हा सुलगाता हूँ
कुछ पैसे अपनी संगी के हाथों थमाता हूँ।
बच्चों वास्ते कुछ मिठगोलियाँ ले जाता हूँ
तो कुछ पैसे अपने औलादों के लिए जमा करता हूँ
सच, ऐसा है मेरा परमानंद।

महलों के फूलों से
मेरे कुटियों के बेल
ज्यादा लदे हैं
उनमें मानवता की शीतल महक है
और न खत्म होने वाली हरियाली भी

मैं मजदूर हूँ
दिनभर कर्मरत होकर धूलों के संग
खेलना मेरी आदत-सी हो गई है

दूसरों के कामों को ओढ़ना मेरी साधना है
मुझे कभी ठेला चलाना होता है
तो कभी सड़कों में झाड़ू भी लगानी होती है
हाँ,हाँ, मैं मजदूर हूँ
दो जून की रोटी संतोष और आनंद के साथ खाने वाला "दिलेर" मजदूर हूँ।
नवगीत गाने वाला मजदूर हूँ
संगीत बुनाने वाला मजदूर हूँ। 
हाँ, मैं मजदूर हूँ।
🖊️रजनीश

शनिवार, जुलाई 17, 2021

मन के पतंग -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)


            

मन के पतंग

                              -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)

गीत हैं, गुलाल हैं बच्चे

धरा के नूतन पैगाम हैं बच्चे

              जब ये गीत मधुर पिरोते हैं

              ऐसा लगता है सुर के ताल हैं बच्चे

कुमकुम, चंदन सरीखे सुगंधित हैं

“मिट्टी और श्रम” के पहचान हैं बच्चे

              अपनी मस्ती की पाठशाला में

              अपने मन के मुस्कान हैं बच्चे

जब कभी ये पतंगें उड़ाते हैं

लगता है ऊँचाइयों के सलाम हैं बच्चे

          जिनको “नीति” से पगे संदेश मिले हैं, वे

          हर जगह सम्मान हैं बच्चे

क्या फूलों को बोलते किसी ने देखे हैं?

मधुर, सुहावने, हृदय के वरदान हैं बच्चे।।

💐 सम्पूर्ण बाल-मंडली को सादर समर्पित💐


शुक्रवार, जुलाई 02, 2021

उमड़ घुमड़ जब आए बादल(बाल कविता)-रजनीश की बारिश पर बहुत सुन्दर कविता

 keywords : School children who have written some poems or stories

उमड़ घुमड़
जब आए बादल(बाल कविता)

        -रजनीश

उमड़-घुमड़ जब आए बादल

मन को रस दे जाए बादल

बादल की गर्जन को देखो  

मन को भी कड़काये बादल।

 

नभमंडल में छाए बादल

घुप्प अंधेरी लाए बादल

अमृत-सा जल मोती से

धरती को मन भर नहलाए बादल।

 

चमक-दमक की छवि को देखो

श्वेत रेख की मणि को देखो

यहाँ-वहाँ बस छाये बादल

मन को मनभर लुभाये बादल।

 

बरस-बरस ललचाए बादल

हम सबको हर्षाये बादल

धरती की आभा को देखो

नित-प्रतिदिन चमकाए बादल।

 

कदंब फूल गए डाली-डाली

मदमस्ती बस फूलों वाली

अपनी बीन बजाए बादल

मन को मन भर तरसाए बादल।

 

दादुर, मोर, पपीहा को

अपनी तान से बुलाए बादल

देख-देख सब नाच रंग को

मन से भी शर्माए बादल।

 

अकड़ू-बकड़ू जिया को पकड़ू

देख-देख हहराता बादल

पानी की जलबूँदों से

सबका मन सहलाता बादल।

 

तपन खींचता ठंडक देता

धरती पर यह प्यारा बादल

मनभर मन में दीप जलाता

और मन को सुलगाता बादल।

 

हे बादल! तुम जलवाहक हो

बरसो कि हम भर जाएँ

जल से तू आपूरित करना

कि सारी सृष्टि तर जाये।

●●●◆◆◆●●●◆◆◆●●●

कृपया इन्हें भी देखें:-

बरसात पर मनोज कुमार चंद्रवंशी की एक अच्छी कविता

प्रकृति : एक अनमोल उपहार (कविता) : शोभा तिवारी

बढ़ती भौतिकता विलुप्त होती संवेदनाएंडा ओ पी चौधरी

तू ही है मेरा अभिमान:अर्पिता शिवहरे की कविता

प्रकृति और मानव :राम सहोदर

वसुधा:बी एस कुशराम

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बुधवार, जून 16, 2021

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)

आलेख : हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श

-रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)



 

        स्त्री मायने ’’माँ’’। माँ से ही इस सृष्टि का सृजन हुआ है। माँ ही इस भूमण्डल को स्पंदित करती है। माँ के ममतामयी रूप को साहित्य प्रतिबिंबित करता है; साथ ही स्त्री की हृदय विदारक पीड़ा का प्रतिबिंबन भी साहित्य में मिलता है।

सृष्टि विधायक, भूमण्डल का हे जननि! हृदय तुझे है समर्पित।

 ममता की धागों से बुनती हमको, जीवन का कण-कण है अर्पित।।

साहित्य और समाज दोनों एक-दूसरें के संपूरक हैं। साहित्य समाज को चित्रित करता है और समाज साहित्य को चित्रण करने की शक्ति प्रदान करता है।

साहित्य विभिन्न भाव-चित्रों का संकलन है जिसे साहित्य समाज से ही सोखता है। हिन्दी साहित्य में स्त्री की शक्ति और उसका गुणगान भली-भाँति की गई है। साहित्य स्त्री विमर्श के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन करती है; उसके सामाजिक पहलुओं, आर्थिक पक्षों,धार्मिक आचार-विचारों,गृहस्थी पक्षों आदि का प्रकटीकरण करता है। जब तक साहित्य स्त्री पक्षों का स्पंदन नहीं करता तब तक साहित्य का संचित कोष अधूरा ही होता है।

            साहित्य में स्त्री कहीं दुखः से रोती नजर आती है, कहीं शक्ति से भरी मिसाल तो कहीं बेबस और लाचार; यह सब समाज का ही प्रतिफल है जिसे साहित्य में बखूबी उकेरा गया है। 

रोती है बिलखती है, पीड़ा उसकी कसकती है।

कलयुगी समाज अब भी न समझा, स्त्री से घर-द्वार महकती है।।

साहित्य में स्त्री के सम्मान, शक्ति और उसके गौरव का गुणगान बड़ा ही मनोरम स्वरूप में चित्रित किया गया है। जब-जब समाज रोया है तब-तब साहित्य समाज के आँसू अपने भाव-कोष से सींचता आया है। जब-जब समाज पथभ्रमित हुआ है तब-तब साहित्य धु्रवतारा बन जीवन-मार्ग प्रशस्त करता है।

साहित्य में समाज के करूणामयी पुकार और उसके संवृद्धि का चित्रण मिलता है। साहित्य बस समाज का दामन पकड़े अपने को पोषित करता आया है।

साहित्य स्त्री के लिए ‘‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी’’, कहीं ‘‘खूब लड़ी मर्दानी झाँसी वाली रानी’’ तो कहीं ‘‘ अँसुवन जल सींचि-सींचि प्रेमबेलि बोइ’’ के रूप में याद दिलाता है और समस्त नारीमण्डल को जगाता है। साहित्य स्त्री के लिए शक्ति और सम्मान जुटाता है और इससे स्त्री ऊर्जा सोखती है।

      आज नारी शक्तिहीन नहीं, वह समाज के संग आगे बढ़ता साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराया है। हिन्दी साहित्य में स्त्री को ‘‘ जगमग दीप’’ की संज्ञा अनायास नहीं दी गई है; उसके सृजन-शक्ति और समर्पण-सद्भाव के बूते ही उसे उत्कृष्ट माना गया है। साहित्य समाज में नारी के प्रति मधुभरी गीत भी व्यंजित किये हैं-

नारी तू षक्ति विधायक, ममता की फुलवारी है।

तू मंगलकरणी पुष्पलता, तू जगमण्डल विस्तारी है।।

साहित्य ग्रामीण समाज की नारी और शहरी समाज की नारी का भी विभेदन करता है। वह समाज में समानता का पाठ का प्रसारण करता है। गाँवों में नारियाँ अशिक्षा से ग्रसित अपने को कुंठित पाते हैं तब साहित्य उन्हें जगाता हुआ शिक्षा का प्रसाद बाँटता है और नित आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

साहित्य ग्रामीण परिवेश में जीवन जीती नारियों का उद्घाटन बड़े ही अनोखे ढ़ग से करता है। वह नारी के मानसिक संकीर्णता, घूँघट में छुपे रहना, डर से जुड़े रहना आदि कमियों को उजागर करता है।

साहित्य-सर्जक अपनी रचनाशीलता में नारी पक्ष का उद्घाटन निश्चित तौर पर करते हैं। उसे अपनी कृतियों में ‘‘पात्र’’ धारण अवश्य कराते हैं; सद्गति और गबन जैसी अमर कृतिया इसके द्योतक हैं।

         साहित्य में स्त्रियों के गीत-गुंजन जैसे- कजलियाँ, सोहर, बधावा, मंगलाचरण आदि का हृदयस्पर्शी सम्मोहन मिलता है तो कहीं प्रातःकाल जात चलाने की मधुरस धुन मिलता है। स्त्रियाँ बरसाती गीत गाते हुए धान की कलमी से खेत में मक्खन समान मिट्टी से बनी किताबों में अपने मन के गीत लिखने में माहिर होते हैं। साहित्य में fस्त्रयों के मथानी चलाने का हृदयस्पर्शी धुन भी स्थापित है। यूँ कहें कि स्त्रियों के अनेक कलाकृतियों से साहित्य भरपूरित है-

आओ जी गाएँ मंगल बधाई....।

बधावा लेके आये मोर ....।

सो जा लल्ला लोरी.......।

तुझे सूरज कहूँ या चंदा.....।

आदि स्त्री काव्य-गुंजन से साहित्य फलता-फूलता आया है। साहित्य स्त्री के शक्ति रूप का बखान इस प्रकार करता है-

तू शक्ति, अमरता का प्रखण्ड प्रवेग

तू सृष्टि विस्तारी।

कला रंग से रँगी हुई तू

प्रेरक और व्यवहारी।।

साहित्य में समाज का प्रकटन भली-भँति मिलता है। कभी स्त्री पक्ष का उद्घाटन तो कभी प्रकृति प़क्ष का। आज की बढ़ती आधुनिकता में भी नारियाँ अशिक्षित हैं,मन में रूढ़वादिता के कपट अब भी नहीं खुले; तब साहित्य शिक्षा और सद्भाव का मसाल लिए आगे आता है ऐसी स्थितियों से निबटने में मदद करता है। स्त्रियों को नई राह दिखाने में मदद करता है साथ ही नई गीतों का चित्रांकन भी करता है।

                आज ग्रामीण परिवेश में नारी गृहस्थी में व्यस्त केवल चौका-चूल्हा तक ही जैसे सीमित है; वह रूढ़वादिता का चादर ओढ़े अपने को संकीर्ण बनाकर जीने में लगी हुई है; तब ऐसे में ही साहिय उन्हें शिक्षा की नई धुन देकर आगे उठाने का प्रयास करता है।

साहित्य में नारी का टोकरी में फल बेंचने, फूलों की माला बेंचने, बाँस के बर्तन बनाने, सूत कातने,कपड़ों में कढ़ाई-बुनाई करने का भाव चत्र अंकित है। साहित्य स्त्रियों के ऐसे ही कर्म-निपुणता का बयान करते हुए धन्य हुआ है।

साहित्य नारी को विजयमाला और पुष्पगुच्छ भेंट करता है तो उनके लिए कहीं नवगीत बुनता है। नारी के अटूट साहस, कर्म-तल्लीनता और उसके निर्भयता को दिखाता आया है। इस तरह हिन्दी साहित्य में स्त्री सदैव स्मरणीय, पूजनीय, जीवन-प्रेरक और नवगीत बुनाने वाली मानी जाती है।

हे माँ माटी रजकण तेरे हो मेरे मस्तक,

हे जननि! मेरे तू जीवन का सुन्दरतम् हर्षक

हृदय समर्पण जीवन अर्पण तू सृष्टि विधायक अवतारी

तेरे से जग आलोकित होता तू जीवन सबका विस्तारी

नित रोली-चंदन भेंट है तुझको तू जीवन-निर्मात्री है

पग तेरे मैं देख चलूँ, तू जीवन सबको दात्री है

तू रोती, जग रोता, ये कैसी जीवनशाला है?

जनकर सबको बड़ा किया, भेंट तुझे विजयमाला है

ना पाकर तुझको साहित्य-समाज है रोता, धरती भी व्याकुल हो जाती है

माँ यह सब देख तब अपने पुत्रों को, अँचरा तर ढाँक दूध पिलाती है।।

इस तरह साहित्य और समाज के मध्य स्त्री अनेक भावांशों को प्रतिबिंबति करती हुई अविस्मरणीय है। विभिन्न कलाकृतियों की उपज स्त्री को ही मानी गई है। साहित्य में समाज, समाज में कलाएँ, कलाओं में रंग,रंगों में प्रकृति आदि का समुच्चय सदैव से बनी है।

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साहित्य के पन्नों से

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शनिवार, अप्रैल 03, 2021

मृत्युभोज (व्यंग्य आलेख) :रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)

               

             मृत्युभोज : व्यंग्य आलेख   
              (-रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)

     जैसे ही सैकड़ों-हजारों की भीड़ को मृत्युभोज का हरा सिग्नल मिला वैसे ही सब अपनी-अपनी दो-दो फिट की जगह अपने नाम रजिस्ट्री कर खाने की तैयारी में जुट गए। खाना परोसा गया। घी-छोले-पनीर आदि सब बाँटे गए। लग ही नहीं रहा था कि हम मृत्युभोज में आये हैं या कोई शाही दावत या फिर देसी मैरिज पार्टी। 
        हाँ सबों ने दबा के गर्दन तक भरा। सब खाने में व्यस्त; किसी को कोई पहचान ही नहीं रहा।ऐसा लग रहा था मानों बहुत दिनों से भूखे हैं। सब अपने-अपने पत्तलों से कबड्डी और कुस्तियाँ लड़ रहे हैं पर किसी ने उस तड़पते-बिलखते परिवार को पुनः जीवन जीने का ढाढ़स नहीं दिलाया। खाए और तुरंत गोल हो लिए।
       भीखू यह सब देखकर मन ही मन रो पड़ा और स्वयं उस टूटे परिवार को अपने निश्छल भावों से धोया और कहा-“सदैव आपके साथ ही हैं, अपने को अकेला मत समझिए।“ लोग इस मृत्युभोज में ऐसे ठहाके मार रहे थे कि जैसे किसी बेहतरीन शादी के उत्सव में आये हों।
       भीखू अपने घर रवानगी के लिए उस व्यथित परिवार से आज्ञा ली और घर की ओर चल दिया। कइयों ने बिना बताए घर जाने के बहाने दारुओं के अड्डों तक जा पहुँचे और पीकर खूब लड़ाई की-“कि हमने पी है।“ भीखू अपने मित्र चीखू से एक दिन बैठक लगाई और मृत्युभोज पर बातें छेड़ दी। चीखू तू ही बता क्या मृत्युभोज समाज के लिए आवश्यक है? इससे वास्तव में क्या-क्या फायदे होते हैं? मुझे तो कुछ ठीक नजर नहीं आता। तब चीखू ने कहा कि सुन भाई एक गरीब अपनी कमाई का कुछ हिस्सा इसमें तो लगा ही देता है। कुछ तो कर्ज माँगकर इस दिखावे को पूरा करते हैं। अगर यह सब नहीं करेंगे तो अपने को छोटा महसूस करेंगे-आई समझ में बात।
      हाँ, आ तो रही है किन्तु क्या इस बारह-तेरह और चौदह दिन के मृत्युभोज  को एक दिन में नहीं समेटा जा सकता? अरे! भाई समेटा जा सकता है लेकिन आज के सामाजिक-गुरिल्ला मानव बमगोला है; तैयार ही नहीं होता। थोड़ी-थोड़ी बातों में तुनुक जाते हैं। यहाँ कोई-कोई तो शराब आदि पीकर भी मृत्युभोज का आनंद लेने आ जाते हैं। जिससे पता चल जाता है कि यह अनपढ़ की ट्राफी लेने में माहिर हैं। भीखू भाई मुझे लगता है कि इस मृत्युभोज को बंद कर देनी चाहिए। चौदह-पंद्रह दिनों के इस दिखावे में क्या आनंद?-कुछ भी नहीं। तड़प तो उनको है जिन्होंने अपनों को खोया है।
          क्या वह परलोकवासी इन पंद्रह दिनों के ढकोसलों से वापस आ सकता है? क्या मतलब इतना सब खर्च करने से। इसके वजाय हम उन मृतक परिवार के साथ तीन-चार दिनों तक स्नान-शुद्धि में जाएँ। लौटकर उस मृतक के फोटो में फूल-रोली-चन्दन चढ़ाकर चुपचाप अपने घर लौट आएँ, यही उचित है।
   उस मृतक परिवार को क्या एक ही बार सहभोज कराना है? इस मृत्युभोज में सहभोज नहीं कराया तो क्या हो गया?- कुछ भी नहीं। अरे उसे तो आगे कथा-भागवत-अन्नप्रासन भी तो करनी है। उन भूख के बीमारों को इसमे खा लेनी चाहिए। हम टूटे हुए परिवार को और क्यों तोड़ें? कुछ दिन-महीने-साल बाद आँखों की हरियाली आ जाने पर खा-पी लेते। हाँ ये तो तूने सौ प्रतिशत बात सही की। समाज में यही होना चाहिए। समाज पुराने ढर्रों को छोड़े और नई नीतियों जैसे शार्टकट नीति अपनाकर निपट ले। कुछ कामों के लिए शार्टकट ठीक नहीं होता पर इस मृत्युभोज के लिए उचित है। हम सब खा-पीकर अपने-अपने घर को आ जाते हैं और वहाँ वह शक्तिहीन परिवार अपनी व्यथा से व्यथित होकर अपने को जैसे पाता ही नहीं है। घर के अन्दर से रोने की चीत्कार और बाहर खाने वालों की असीमित भीड़- ये कैसा मामला है? मेरे तो कुछ समझ नहीं आता कि किन लोगों ने समाज को पंगु बना दिया और दिखावे का ना छूटने वाला प्लास्टर चढ़ा दिया।
        चीखू भाई हमें लगे कि हम मृत्युभोज में आये हैं। ऐसी वहाँ की व्यस्था होनी चाहिए। न जाने इस मृत्युभोज में ढकोसले और बिना घास-फूस के घोसले क्यों शामिल है। सबों ने अपने-अपने पत्तलों में अपने दो-चार ग्रास छोड़ दिए उन कौवों और चीलों के नाम पर। कभी-कभी उन कौवों-चीलों को भोजन के ये दाने नहीं मिल पाते। उस मृतक के नाम से ये उड़ने वाले जीव फलीभूत तो होते ही हैं साथ ही घर के थानेदार-कुत्ते भी चाव से इस मृत्युभोज का लुत्फ जरूर उठाते हैं।
          अरे, चीखू न जाने कब तक इस प्रथा को लोग अपने गले से चिपकाये रहेंगे। मुझे तो लगता है कि लोगों को यही करने में आनंद मिलता है। जीवित हाल में उस मृतक को हमने कुछ अच्छा पौष्टिक वाला फल-दूध-दही-मक्खन-घी नहीं खिलाये किन्तु आज उसी के नाम पर यह सब भूख के बीमारों को खिलाया जाता है। उस मृतक के मुँह में नहीं पड़ा होगा यह सब। यह तो केवल नाम का खेल है, वास्तविकता का तो ज़माना ही नहीं रहा। इस मृत्युभोज में केवल भोजन का रेलम-रेल ही प्रमुख है।
       आज समाज को यथार्थ का साबुन लगाकर मल-मलकर नहलाने की जरूरत है। तब समाज में कुछ सकारात्मक परिवर्तन के शुभ दर्शन होंगे।
  “धन्य है समाज और धन्य हैं समाज के लोग”।
 हाँ, मित्र बहुत बातें हो गयी, चल अब घर चलें। 
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('आधुनिकता का शिलालेख' से)
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शनिवार, अगस्त 15, 2020

आजादी के रंग -रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)



 आजादी के रंग
               -रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)
मातृभूमि नमन तुझको
जीवन का सर्वस्व समर्पण
पुष्पित रोली चंदन
 हृदय तुझे है अर्पण।

दिन माँ आज स्वतंत्रता का
नवगीत बुनाने आया
आजाद विश्व धरा में 
जैसे खग दल को चहकाने आया।

है यह आजादी उन परवानों का
है उनकी दिव्यता का पुण्य प्रताप
भारतवर्ष में हर्षोहर्ष
छायी मधुरस और हृदय प्रसाद।

उन वीरों का तिलक क्रांति
और उनका जीवन संघर्ष 
है परिणाम हमारे समक्ष
दे रहा है मान जैसे भारतवर्ष।

खून से लथपथ उनकी काया
आँखों में चित्र बनी है छाया
कितनी माओं ने बेटों से बिछड़े
और संगिनी के सुहाग हैं उजड़े।

जीवन त्याग समर्पण कर
उन वीरों ने दी आजादी के राग
अपनी माँ के हृत-पल्लव में
पलने वाले एक थे ही चिराग।

उनकी स्मृति सदा हमें
हम करते गौरव गुणगान
हृदय पटल पर अविस्मरणीय हैं वो
और हैं वो कितने दिव्य महान।

नतमस्तक विश्व उनके दिव्यता के समक्ष
उठ भाग खड़ा हो जाता भीरु, विपक्ष
उनकी प्रचण्डता के सम्मुख कोई टिक ना पाता
मौत को उन्हें जैसे गले मिलाने आता।

आज चतुर्दिक भारतवर्ष में
जयगूँज है आजादी के पर्व का
राष्ट्र पूजा में शरीक हम
विषय है गर्व का।

शहीदों के शहादत को नमन
भारत की दिव्यता और चमन
उन वीरों के प्रसाद हैं
नतमस्तक उन विभूतियों को आज हम आजाद हैं।।
            ।। जय हिन्दुस्तां
             वीरों का जहां ।।
।। जय हिंद
            जय भारत ।।


रजनीश(हिंदी प्रतिष्ठा)
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रविवार, अगस्त 02, 2020

मन की गोद में (कविता)

मन की गोद में 

- रजनीश हिंदी(प्रतिष्ठा)



आशाएँ टिकाए, मन गड़ाए वह बूढ़ी

  अपने चुटपुट सामानों पर

कुछ मिठाईयाँ,कुछ रसद

  कुछ पूजन सामग्रियाँ.........

एक ही बोरी में बिछी थीं

  ये मनमोहक आकृतियाँ.........

ले लो कुछ सँभाले, तरासे मीठी नाजुक

  स्वादमूल अशर्फियाँ.........

धनिकों सुनते हो ये

  सब सिसकियाँ..........

आदि प्रातः से ग्रीव व्यस्त किये

  आशाएँ टँगाए हूँ

कलयुगी मानव सुनते हो

 मूल वस्तुएँ, रंजित वस्तुएँ

  चाहो तो लेलो, ले लो।

 आधुनिक रंगों से रँगी वस्तुएँ

  नहीं बेचती हूँ

 सुन ले हृत अर्जियाँ.........

  न रसायन का लेप,

 और ना ही कच्ची सामग्रियाँ

  मैं बेचती हूँ हृत व्यंजित राशियाँ.........

सत्यता और शुद्धता की माप से

  स्वयं बुनाती हूँ, मन चलाती हूँ

बेचती हूँ मैं, मन-मोतियाँ

   हाँ-हाँ बेचती हूँ मन-मोतियाँ..........

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