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रविवार, जनवरी 18, 2026

नीतिपरक दोहे

नीतिपरक दोहे – राम सहोदर पटेल
*नीतिपरक दोहे*
++++++++++
बातन से बातें बने, बातन बात नशाय।
बातन से गौरव मिले, बातन लात दिलाय।।
फरिका करत बयान है, भीतर की सब हाल।
ताल नीर मैलो दिखा, प्यास भगे तत्काल।।
मन मैंला जब होत है, बाहर से दिख जात।
कूड़ा दरवाजा पड़ी, भीतर की क्या बात।।
दरवाजे कचरा पड़ा, भीतर कचरा होय।
भीतर वाहर एक सम, जान परत सब कोय।।
अनपढ़ की संगोष्ठी, अरु दुर्जन का साथ।
जबरा केरी मित्रता, निश्चित करें विहाथ।।
अहं प्रेम दोनों अरी, दोनों रहें न संग।
एक रहे दूजा भगे, या होबेगा जंग।।
एक बेर तरु के लगे, बेर-बेर फल होय।
फल चाखे नर तोष से, सिद्ध जनम फल होय।।
विनय सहोदर करत है, जाय सहोदर पास।
मोहि सहोदर मान कर, राख सहोदर खास।।
चंचल मन चंचल सदा, रहे न स्थिर जान।
चंचल जल की भांति है, संयम से रख ध्यान।।
मानुष पानी के गये, बैठन को नहीं ठौर।
पानी जतन बचाबहू, गर चाहो निज मौर।।
अंबर घन बरसे बरुण, गिरि पीतांबर धार।
अंबर भी भीगा नहीं, इंद्रदेव गे हार।।
चिकनी चुपड़ी बात में, छिपी कपट जंजाल।
सुंदर फूल गुलाब के, कांटे खींचें खाल।।
जान हथेली पर लिए, सीमा पर जो ज्वान।
धन्य मात वह जन्म दे, किया बड़ा एहसान।।
कड़वी बोलन की सजा, खीरा जैसा होय।
अलग किया सिर काटकर, निंदत हैं सब कोय।।
अहंकार दुश्मन बड़ा, करे समूल विनाश।
धरा रह गया राजपद, दुर्योधन के पास।।
नारी के अपमान से, बच नहीं पाया कोय।
चीर हरण के कारणे, दुर्योधन गया खोय।।
रेती की दीवार हो, हवा लगे ढह जाय।
ओछे की ज्यों दोस्ती, स्थाई न रह पाय।।
कर्म करो औकात भर, कार्य सफल निति होय।
गर सीमा बाहर हुए, हंसी करें सब कोय।।
मदिरा सेवन के किये, मान जाए तब टूट।
धन-बल यश का नाश हो, प्रेम सबों से छूट।।
समय अपव्यय मत करो, यह जीवन का सार।
समय गये मिलता नहीं, फिर जीवन निस्सार।।
हीरो बनना सीख तू, जीरो को कर दूर।
जीरो यदि खोया नहीं, हीरो चकनाचूर।।
देखो अच्छा सब जगह, अच्छा बनना सोच।
अच्छा करना कर्म सब, बुरा न रखना सोच।।
लूट किया सब बेशरम, छिपा बेशर्म ओंट।
बना बेशरम लाज ताज, गया बेशर्म सोंट।।
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✍️ राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)
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शनिवार, जनवरी 17, 2026

जब बेजुबान बोलेंगे

जब बेजुबान बोलेंगे

कभी-कभी तंत्र को देखकर विस्मय होता है, यह कैसा तंत्र है — जो ख्याली बातें करता है, डींगे हांकता है, पर जिम्मेदारियों से भागता है। कुछ हद तक उन लोगों में मैं भी शामिल हूं, क्योंकि अगर उनकी तरह न रहूं — तो उनके बीच सांस लेना भी कठिन हो जाए। वे चटकारे लेकर बातें करते हैं, हंसी उड़ाते हैं उन पर, जो जिम्मेदारी की कुर्सियों पर बैठे हैं, और खुद कुछ करना नहीं चाहते। जब बात आती है अपनी जिम्मेदारी की, तो वे चुप कराने लगते हैं उन्हें — जो सवाल उठाते हैं। वे एक घेरा बुनते हैं अपने चारों ओर, जहां सवाल उठाने वाले ही कटघरे में हों, बोलने न दें उन्हें, सवाल करने न दें उन्हें।
ऐसे हाल में भला परिवर्तन आए कैसे? पर यह स्वाभाविक है — क्योंकि यह लड़ाई है बेजुबानों की, उन मेहनतकश लोगों की जो खेतों में पसीना बहाना जानते हैं, कारखानों में काम करना जानते हैं, पर बोलना नहीं जानते। उन्होंने माना ही नहीं कि बोलने से कुछ होता है, वे जानते हैं — करने से होता है। और इसलिए जो उनके लिए बोलता है, उसे चुप कराना ज़रूरी समझा जाता है। क्योंकि जिस दिन ये बेजुबान बोलेंगे, उस दिन आज के बोलने वालों की लंका लग जाएगी। इसलिए बोलने वालों को पटाया जाता है, और जो पट नहीं सकते — उन्हें मिलता है अपमान का इनाम, और दुत्कार का सम्मान।

रचनाकार

सुरेन्द्र कुमार पटेल

ब्यौहारी, जिला शहडोल

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शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

मुक्तक

मुक्तक 

शोषण के ज़हर से
कुंडलनी और ग्रंथियाँ
सूख चुकी हैं
उनमें न रंध्रों के रिसाव हैं
और न ही जीवन के लिए झुकाव।
एक आदमी धोखा देता है
एक आदमी धोखा खाता है
एक आदमी और है
जो धोखे को चाव से उपजाता है
यही उसका परम साध्य है।
कहाँ गए घिसपिटू?
जो अत्याचार निरोधक गोलियाँ और चूर्ण
बड़े मज़े से बेचते हैं
देश की गरीबी उन्हें नहीं दिखती?
शिक्षा में लगा दीमक उन्हें दिखाई नहीं देता
इन्हें चाहिए केवल हिंसा-हिंसा-हिंसा।
रे मलधारी!
विषधारी!
क्यों उचारता है अहंकार की पोथी
नहीं पढ़ी क्या मानवता के पाठ
क्या घुन लग गया तेरी बुद्धि को?
तेरे शोषण की कोख में क्यों पलती हैं गालियाँ।
शोषण की तिजोरी में
खून और हिंसा की लपट ही पूँजी है
जीवन कटी पतंग की तरह
तिलमिला रहा है।
गरीबी के पेट में
शोषण के चाबुक की चोट है
गोल-गुम्बद की तरह
हम सत्ताधारियों के ही वोट हैं
गिने जाते हैं केवल पॉपुलेशन-रजिस्टर में
थमा दी जाती है हवा से बनी चूर्ण।
शोषण की चोट को
एक आदमी झेलता है
एक आदमी रेलता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो केवल अपनी फटी विवशता को सीता है
ये तीनों आदमी कौन हैं
मेरी भाषा मौन है
अरे! ये तो किसान, साहूकार और मज़दूर हैं।
मैं पूछता हूँ कि
क्यों नहीं जुगाड़ है
रोटी का मेरे देश में
क्यों बिलबिलाते हैं लोग
क्यों रोकर नसें सुखा रहे हैं
अपने अस्थिपंजर की।
इस प्रजातंत्र की पट्टी में
धोखे की लिट्टी है
बाँचते हैं अंधभक्त
बिना चोखे के ही
जो फिरंगियों के ही
वंशज हैं।
मैं पूछता हूँ
क्यों चुप है जनता
क्यों नहीं फूँकती
शोषणधारी कुर्सियों को।
क्यों निर्धनता की कोख में
भूख तीखी होती है
सूझती क्यों नहीं
जीवन की बारहखड़ी
ए.बी.सी. की टूटी पगडंडी में
ज़ेड बड़ी दूर है।
जनाब! पेट रोटी माँगता है
पेट के छेद में भूख रोती है
चाहे घुन शोषण की हो
या टोपीधारियों की
जोंक की तरह ये बम्बूधारी हो गए हैं।
मैं नहीं उगाता
अपनी कला के खेत में
शृंगार के दानों से अंकुरित
वासना की गंध।
शोषण के इस भूगोल में
गरीबी की जलवायु
उष्ण-सी हो गई है
क्यों कोई विवशता के मरुस्थल में
समानता के छायादार पेड़ नहीं लगाता।
भूख उपजाती है विद्रोह
और लाचारी
अब आशा की किरणें
धूमिल-सी पड़ गई हैं।
सत्ताधारी क्यों खेलते हैं
'बूझो तो जानें'
क्यों हाथ को पाँव
और पाँव को हाथ कहते हैं
क्यों निर्लज्जता की रेखाओं से
शोषण के भद्दे चित्र खींचते हैं।
मुर्दों की मशीन में
चिपके प्राण बोल रहे हैं
वे आज थोथे प्रजातंत्र की
पोल खोल रहे हैं
खोज रहे हैं सलीके की पगडंडी में
बुदबुदाते पानी के छींटे।
लोथ के चीथड़ों...
और मुर्दास्थलों की चिकचिकाती चिंगारियाँ
किसी रक्त-मानव ने दिए हैं
ये घाव...
हे संपोषक! शोषण को पहनाएगा सूती कफ़न क्या?
पानी की परतों में
निर्लज्जता के पेट फूल गए हैं
मन में चढ़ाया जाने वाला
आधुनिकता का घोल
बिल्कुल लाल लिटमस की तरह
पीला हो गया है।
पढ़ता हूँ मौन की भाषा
गरीबी के उखड़े शब्द
शोषण के पीड़ादायी संयुक्ताक्षर।
हाँ, तिलमिलाती अभिव्यक्ति के कोटर में
रक्तरंजित घाव फूट पड़े हैं
और नव-मानव के प्रतिस्थापन में
जैसे अक्षर से बने शब्द और शब्द से बने वाक्य चकमक हो गए हैं।
कुछ शेर हाथी हैं
और कुछ हाथी शेर नहीं हैं वाली
कहावतें छोड़िए
अ से आम नहीं
अधिकार माँगिए।
न जाने क्यों गरीबी की छुअन
इतनी तीखी है
कि भूख तिलमिल है;
मन के छेद से
नाभि की दूरी कितनी है।
क से कबूतर...
और ख से खरगोश...
पढ़ने पर ठीक है**
यदि ग से गाली पढ़ें
तो प्रलय की संभावना तीव्र होती है***
जो पेट पर लात मारते हैं
उन्हें गाली की भाषा ज़्यादा पोषण देती है।
चोट पत्थर की हो... या...**
जिह्वा की...**
दोनों दुधारी होते हैं...
इनकी धार से रक्त के लाल रंग नहीं
चित्तीदार डर बहते हैं
शोषण की पट्टिकाओं में किसी ने
पसीने की ओस को रौंदा है...
और दी हैं गंदी गालियाँ...
छीनी हैं साड़ियाँ...
लूटी है आबरू...
और फुलाया है दुर्गंधित मन को।

रचनाकार:
रजनीश कुमार जायसवाल
ग्राम+ पोस्ट : झारा, तहसील : सरई
जिला : सिंगरौली (म०प्र०)
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जब मनुष्यता भूल जाती है: कविता

जब मनुष्यता भूल जाती है



एक मनुष्य है —
जिसे बार-बार बताना पड़ता है,
क्या अर्थ होता है
मनुष्य होने का।

शिक्षक समझाते हैं,
संत पुकारते हैं,
माता-पिता दोहराते हैं —
कि हम सिर्फ़ शरीर नहीं,
हम संवेदना हैं।

पर कुछ लोग —
कभी नहीं सीखते।
वे नियम तोड़ते हैं,
सेतु जलाते हैं,
और दिखा देते हैं —
कि पशु अभी भी
हमारे भीतर जीवित है।

प्रकृति मुस्कराती है —
वह जानती है अपने बच्चों को।
वह डोर खींचती है,
और हम नाच उठते हैं
उसी पुराने पागलपन में।

हम दीवारें बनाते हैं,
वह उन्हें गिरा देती है —
हमारे ही हाथों से।

अब वह पशु
जंगलों में नहीं,
कुर्सियों पर बैठा है,
सूट पहनकर, आदेश देता है।

वे संस्थाएँ —
जो बनी थीं रक्षा के लिए,
अब बन गई हैं नियंत्रण के औज़ार।
जो क़ानून बराबरी के थे,
अब कुछ की सुरक्षा के हैं।

बाकी सब —
परिश्रम की चक्की में
हर दिन पिसते रहते हैं।

और मैं सोचता हूँ —
क्या प्रकृति जीत गई?
क्या उसने बस
हमारे भीतर छिपकर
अपना राज चलाया?

क्योंकि आज भी,
सभ्यता के आवरण में ढँका,
मनुष्य वही है —
जो कभी जंगलों में था।

सभ्य दिखते हैं,
पर जंगली हैं भीतर।
हम आज भी वही हैं —
बस रूप बदल गया है।

✍️ रचनाकार — सुरेन्द्र कुमार पटेल ब्यौहारी, जिला शहडोल
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सोमवार, जनवरी 12, 2026

कर उनकी जय -जयकार कलम तूं

लेखक की फोटो

कर उनकी जय-जयकार कलम तूं

कर उनकी जय-जयकार कलम तू,

सरहद पर जान गमाते जो।

जो मात्र भूमि के सच्चे सपूत हैं,

निज भाल से थाल सजाते जो।

अचल अथक कर्तव्य मार्ग पर,

हमरे सुख के खातिर जो।

अदम्य सुरमा भटमानी है,

रहते निडर मुखातिर जो।

बीवी बच्चों का मोह त्याग कर,

मातृधरणि से मोहे जो।

भारत माता का कर्ज चुकाने,

अनिमेष दृष्टि खल जोहे जो।

हे कलम, दुहाई उनको दे तू,

अग्रिम कतार में रहते जो।

आन, मान, सम्मान बचाने,

है क्षुधा-पिपासा सहते जो।

बलिदान हुए सीमा रक्षण में,

खल दल है मार गिराए जो।

माता के अखंड सुरक्षा हित,

दुश्मन की नींद उड़ाते जो।

कर उनकी जय-जयकार कलम तू,

पर स्वार्थ में स्वाहुति देते जो।

निज प्राण हथेली पर रखकर,

हमको हैं रक्षित करते जो।

विकट विपत्ति, काल, कलह पर,

निर्भय सेवा देते जो।

कहे सहोदर, वे कर्मवीर बन,

जन्मभूमि हित जीते जो।

कर उनकी जय-जयकार कलम तू,

देश भक्ति हित जीते जो।

रचनाकार — राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल: आमडीह, जिला शहडोल, मध्यप्रदेश

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रविवार, जनवरी 11, 2026

अक्षर क्या है?

अक्षर क्या है?

अक्षर क्या है?

अक्षर ही सृष्टि का रहस्य है।

अक्षर से ही,
प्रकटा समाज का दृश्य है।

अक्षर से विहीन,
हिलता नहीं कोई पत्ता।

अक्षर ही तो है,
जो जग पर,
कायम कर रखी सत्ता।

वह परम सत्य है,
अविनाशी है,
आदि है और अंत भी।

अक्षर ही तो है,
जिसने मां मुख से गुरु मुख तक,
ज्ञान ज्योति जलाई।

सृष्टि की विविध रूप दिखाई।
चरम के परम को पाने में,
जीवन क्रीडा में धूम मचाई।

अक्षर ही तो है,
जब जन्मा था जग में,
ढोल-नगाड़े झंकार उठे।

जब अर्थी उठी, तब
"राम नाम सत्य है" के स्वर गूंजार उठे।

वह अक्षर ही तो है,
जिसने हम सबको,
संबंधों में बांधा है।

माता-पिता, भाई-बंधु सभी को,
देता अपनी कंधा है।

अक्षर ही तो है,
जो अजय है,
परम सहोदर है,
परम सत्य है।

कलमकार
राम सहोदर पटेल, "शिक्षक", हाई स्कूल नगनौड़ी 
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल, म.प्र.

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कविता: गणतंत्र दिवस

★ गणतंत्र दिवस ★


गणतंत्र दिवस की शुभ वेला में,
मैं तुम्हें बधाई देता हूं ।
यह अमूल्य समय जो दिया आपने,
धन्यवाद इसी पर देता हूं ।।

प्रेम मिलन का है यह दिन,
खुशियां बांटो सब मिलकर के ।
गणराज्य स्वराज को प्राप्त हुआ,
इस दिन को पूजो मन धोकर के ।।

स्वाधीन हुए हम पन्द्रह अगस्त को,
लेकिन अधिकार मिला इस दिन ।
संविधान बना कर भीमराव ने,
जनता के दूर किये दुर्दिन ।।

हमको यह खुशियां देने को,
कितने जाने बर्बाद हुए ।
पता नहीं यह हमको है,
कि कैसे हम आबाद हुए ।।

नि:स्वार्थ भाव थे उन पुरखों के,
प्रण अपना उनने पूर्ण किया ।
हमरे ही खुशियों के खातिर,
अपना सब कुछ होम दिया ।।

कर्तव्य हमारा अब क्या है,
कि उनका बोझ संभाले हम।
गणतंत्र कभी परतंत्र ना हो,
सौगंध आज ही खालें हम ।।

निज स्वारथ से ऊपर उठकर,
उपकार भाव दिखलाएं हम ।
सहयोग भाव को जागृत कर,
सभ्य समाज बनाए हम ।।

परनिंदा से दूर रहे,
अपने को छोटा ही समझे ।
बड़ाई अपना जो खुद करता,
उसको नीचा ही समझे ।।

बड़ा वही माना जाता,
उपकार पराया जो करता ।
दूसरों की प्रशंसा प्राप्त करें,
व्यवहार नम्रता का करता ।।

पर चिंता की बात है यह,
गणतंत्र का अर्थ न माने कोई ।
मौका समझते भाषण बाजी का,
योग्यता बखाने हर कोई ।।

करें पराया पर्दाफाश,
अवसर अच्छा पावे इस दिन ।
बाकपटुता की होड़ लगाने का,
इच्छा जगती है इस दिन ।।

प्रभाव जमाये जनता पर,
जनसेवा का है ख्याल नहीं ।
रखो सहोदर रिश्ता सबसे,
क्या राष्ट्र भाव का ध्यान नहीं ।।
क्या राष्ट्र भाव का ध्यान नहीं ।।


✍️ कलमकार
राम सहोदर पटेल, शिक्षक
हाई स्कूल नगनौडी, संकुल - आमडीह
जिला शहडोल, मध्यप्रदेश

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शनिवार, जनवरी 10, 2026

दो कविताएं

🇮🇳 देश भक्ति गीत 🇮🇳

बर्बादी हम अपने देश की, नहीं देख सकते तनिकाय।
जो भी इस पर आंख उठाये, उसकी आंख निकालूं जाय।।
जिसका दाना हम हैं खाते, उस जन्म भूमि से प्रेम लगाय।
करेंगे रक्षा तन-मन-धन से, चाहे जान रहे या जाय।।
महाकाल से भी लड़ने को, हम नहीं कभी पिछाड़ी जाय।
हम उन पुरखों के बेटे हैं, बलिदान दिए जो मन हर्षाय।।
छोटा हमको मत समझे कोई, मेरी बात सुनो चितलाय।
अग्निपुंज के हम अंगारे, क्षण में दुश्मन दउं जलाय।।
भारत मां ने पालन करके, हमको ऐसा दिओ बनाय।
युद्ध भूमि में हम अड़ जाएं, तो शत्रु का लगे ठिकाना नाय।।
प्राण से बढ़कर है यह भारत, जननी बात कही समझाय।
कहे सहोदर भारत माता, पाला हमको ध्यान लगाय।।

🌿 दुर्जन इंसान 🌿

साधु असाधु कहावत हैं,
जब चले कुमारग आन बिसारिके।
शान बनावन चाहत रे नर,
पर कैसे बने सत्संग बिगारिके।।
बुद्धि विवेक ना काम करें,
नहिं मान बचे भय जन बल धन के।
संत समाज ना नीक लगे,

जब राह चले असमाजिकता के।।
मैत्री भाव बुरो लागत है,
मन भावत है अभिमानन के।
नभ देख चलैं न नवैं कतहू,
अकड़ाय जपत अभिमानन के।।
बात करत न बनै इनसे,
जिन दुर्जन वृत्ति विकाय मना के।
दूरहि ते टकरावन चाहत,
चलन पड़त निज मान बचाय के।।
हित बात लगे विपरीत इन्हें,
उल्टा करैं बात बड़ाय बड़ा के।
ज्यों पाहन पतित बान नहिं लागत,
उल्टे सर नोकहिं देत नशाय के।।
इनकी यदि स्वारथ सिद्धि हुई नहिं,
तो अभियान करत बड़ कोप दिखाय के।
विषधर अनुरूप स्वभाव सदा,
रहियो इनसे निज जान बचाय के।।
बचकर रहिए इनसे हरदम,
संगत इनकी नहिं जाहु जनाय के।
भाव सहोदर सम रखियो,
चलियो निज राह बनाय बनाय के।।

✍️ राम सहोदर पटेल, "शिक्षक"
हाई स्कूल नगनौडी संकुल
आमडीह, जिला शहडोल।

शुक्रवार, जनवरी 09, 2026

कविता: मेरा भारत महान



जिसकी मनमोहक सुबह, और सुहावनी शाम है।
विश्वगुरु, यशवान, सूरज-सा — भारत मेरा महान है।
विश्व-प्रसिद्ध नाम इसका, पौरुष बनी पहचान है।
सांस्कृतिक हो या प्राकृतिक, प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान है।
आर्यावर्त है नाम पुरातन, विश्व-विदित सम्मान है।
दुष्यंतपुत्र भरत से भारत, नामकरण सरनाम है।
रहा अग्रणी युग-युगों से यह, सभी करें गुणगान है।
ऊँचा गौरव, इतिहास अग्रणी — किया जगत कल्याण है।
अवतार विधाता लेकर इसको, दिया विजय वरदान है।
शत्रु न टिकता इसके आगे, दुर्जेय पराक्रमी महान है।
महान उद्यमी, उन्नत विचारक — कृषि में यह प्रधान है।
नव-तकनीकी हरित क्रांति से, सजा खेत-खलिहान है।
विभिन्न संस्कृतियाँ होने पर भी, एक ही नियम-विधान है।
किए कुशासन मुगल-फिरंगी, फिर भी दिया सम्मान है।
स्वागत में हम आगे हरदम, कभी न किया अपमान है।
कला, शिल्प, संगीत, नृत्य में — सदा शिखर पर नाम है।
समान नियम-कानून है अपना, बना एक संविधान है।
सबको है अधिकार बराबर, कर्तव्य में सभी समान हैं।
धर्म है ऐच्छिक — जो भी माने, जिसका जिस पर ध्यान है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भी, भारत का स्थान है।
कंप्यूटर उपलब्धियों में आगे, मिला इसे पहचान है।
तीव्र अग्रणी काम हो रहे, डिजिटल अब अरमान है।
शिर पर मुकुट हिमालय बनकर, होता शोभामान है।
बहे शुद्ध निर्मल जल नदियाँ, फैले खेत-खलिहान हैं।
अदम्य साहसी नेता सुभाष ने, दिया अभय वरदान है।
किया स्वतंत्र, अखंड बनाया — सरदार पटेल महान हैं।
राष्ट्रभाषा हिंदी है इसकी, माने कोटि संतान हैं।
‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत और ‘जन-गण-मन’ ही गान है।
जानो, पक्षी मयूर राष्ट्र का, पशु बाघ बलवान है।
राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चक्र, तिरंगा ध्वज सम्मान है।
जितना लिखूँ उतना ही कम है, है मुश्किल गौरव-गान है।
मेहनत, लगन, वफादारी से, यह पाया गौरवमान है।
धरती इसकी सोना उगले, करें पेड़ फलदान हैं।
सहोदर सिंधु चरण पखारे, पसरे सौख्य-निधान है।।
                     *रचनाकार*
राम सहोदर पटेल, "शिक्षक", हाई स्कूल नगनौडी।
संकुल -आमडीह, जिला शहडोल मध्यप्रदेश।

मंगलवार, जनवरी 06, 2026

दो कविताएं


 दो कविताएं

1. पाखण्ड
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
देवी-देवताओं की गणना हज़ार है,
बारी-बारी से ये पा रहे सत्कार हैं।
​जीवित देवों को कोई पूजे ना,
घर में बूढ़ों को कोई पूछे ना।
तड़पें दादा-दादी एक घूँट पानी को,
पति भी न रोक सके पत्नी की मनमानी को।
​पत्थर की मूरत कर रही शृंगार है,
मात-पिता का होवे ना सत्कार है।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
​सबका अपना-अपना यह उद्योग है,
मंदिर की मूर्ति करे सुख-भोग है।
पाखंडों का दरबार सजाएँ फूलों से,
माखन-मिश्री, दाख चखाएँ झूलों से।
​इन पर न शिक्षा का असर है,
आडंबर में भूल गए संसार हैं।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
​मुर्गे व पशुओं को काट रहे कुर्बानी में,
मुर्दे को भी दान देते नादानी में।
अंधविश्वास पनपता इनकी दीवानगी में,
बने रहें पिछलग्गू आना-जानी में।
​पाखंड ने मिटाया संस्कार है,
सहोदर भाव जगाए शुभ आचार है।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।

 2. शिक्षा का सार

​पढ़ाई न हो तो यह जीवन बेकार,
ज्यों उजाले बिना ऊँचा महल बेकार।
शिक्षा बिना न हो प्रगति का आधार,
ज्यों सलिला (जल) बिन ताल-सरिता निस्सार।
​अक्लमंदी बिना सकल जीवन दुश्वार,
साक्षरता बिन जीवन जाए मच्छर सा मार।
पशु तुल्य जीवन बने बिना शिक्षा के यार,
अक्षर-दीपक से महके यह सकल संसार।
​ज्यों भानु-उदय से अंधेरा हो फरार,
निरक्षरता का यदि छाया रहे अंधकार।
ना हो जीवन सुखी, पड़े आपद की मार,
ज्ञान-दीप की लौ जले जब मन में अपार।
महके तब जीवन में खुशियाँ साकार,
चौतरफा विकास ही शिक्षा का है सार।
सुख चाहो अगर, करो शिक्षा से प्यार,
सूर, तुलसी, कबीरा हुए अमर संसार।
​शिक्षा ही खोलती सफलता का द्वार,
शिक्षा बिना न हो प्रगति का आधार।
अशिक्षा के कारण आई फिरंगी सरकार,
जैसे ही शिक्षा जगी, देश हुआ वापस हमार।
​शिक्षा का पाया न कोई भी पार,
अगर शिक्षा सधी, तो सधा सारा संसार।
शिक्षा बिना न मिले मान, गौरव और प्यार,
सहोदर कहे—पढ़ना ही है जीवन का सार।


कलमकार 
     ========
राम सहोदर पटेल, "शिक्षक" 
हाई स्कूल नगनौडी संकुल -आमडीह, जिला - शहडोल, मध्यप्रदेश।


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बुधवार, फ़रवरी 08, 2023

मजदूर : रजनीश की कविता

👏मजदूर👏
मैं मजदूर हूँ
पसीने से ही मन महकाता हूँ
कुछ पैसों से ही, अपना चूल्हा सुलगाता हूँ
कुछ पैसे अपनी संगी के हाथों थमाता हूँ।
बच्चों वास्ते कुछ मिठगोलियाँ ले जाता हूँ
तो कुछ पैसे अपने औलादों के लिए जमा करता हूँ
सच, ऐसा है मेरा परमानंद।

महलों के फूलों से
मेरे कुटियों के बेल
ज्यादा लदे हैं
उनमें मानवता की शीतल महक है
और न खत्म होने वाली हरियाली भी

मैं मजदूर हूँ
दिनभर कर्मरत होकर धूलों के संग
खेलना मेरी आदत-सी हो गई है

दूसरों के कामों को ओढ़ना मेरी साधना है
मुझे कभी ठेला चलाना होता है
तो कभी सड़कों में झाड़ू भी लगानी होती है
हाँ,हाँ, मैं मजदूर हूँ
दो जून की रोटी संतोष और आनंद के साथ खाने वाला "दिलेर" मजदूर हूँ।
नवगीत गाने वाला मजदूर हूँ
संगीत बुनाने वाला मजदूर हूँ। 
हाँ, मैं मजदूर हूँ।
🖊️रजनीश

संत शिरोमणि रविदास जी की पुण्य जयंती पर ....मनोज कुमार चंद्रवंशी की कविता

संत शिरोमणि रविदास जी के पुण्य जयंती पर ....
                            (१)
जाति  पांति  छुआछूत    उद्धारक अग्रदूत,
क्रांतिकारी    रविदास     जगत   महान हैं।

रवि संत  शिरोमणि  करें   चिंता  हर  घड़ी,
समाज   के  सुधार  में    बहु   योगदान है।

कर्म योगी ज्ञान वान उर  तल  स्वाभिमान,
ब्रम्हा  लीन  रविदास  पुण्य  शीलवान  है।

निर्मल  भाव  उनके  समदर्शी  थे  मन के,
अंध  भक्ति  नष्ट कर   दिए  सद्  ज्ञान है।

                          (२)
पाखंडवाद था व्याप गुरुजी किए समाप्त,
सामाजिक  अग्रदूत   अलख   जगाएं  हैं।

भेदभाव  ऊॅंच नीच धरा में मचा था कीच,
लिए   अवतार   गुरु   तिमिर   मिटाएं हैं।

कर्मनिष्ट  रविदास,  कहता  है  इतिहास,
उदार वान  व्यक्तित्व सुकीर्ति कमाएं हैं।

वो ज्ञान तर्क भंडार मानवता के आधार,
ईश्वरीय  भक्ति भाव जग  में  फैलाएं हैं।

                      रचना
            मनोज कुमार चंद्रवंशी

बुधवार, जनवरी 26, 2022

आजादी के बाद का संघर्ष : प्रदीप

ऐसा नही है कि आज़ादी जीत ली
और संघर्ष करने को कुछ नही है

भारत एक लोकतंत्र बन गया
और बनाने को कुछ नही है

संविधान मिल गया 
और पाने को कुछ नही है

जो जीता गया है
उसे बचाये रखने का संघर्ष अभी भी है

जो बन गया है
उसे बनाये रखने की जिम्मेदारी अभी भी है

जो अथक प्रयासों से मिला है
उसे संजोये रखने की संकल्पना अभी भी है

क्योंकि सभी के प्रतिनिधित्व पर 
एकाधिकारवाद का षणयंत्र अभी भी है

लोकतंत्र को भीड़तंत्र से खतरा अभी भी है
संविधान पर रूढ़िवादियों की टेढ़ी नजर अभी भी है

ऐसा नही है कि आजादी जीत ली 
और संघर्ष करने को कुछ नही है

क्योंकि जीवन स्वयं में एक युद्ध सा है
इसलिए संघर्ष करने को बहुत कुछ अभी भी है।

-ई. प्रदीप 
उकसा, ब्योहारी
निवर्तमान- नागपुर, महाराष्ट्र

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शनिवार, जुलाई 17, 2021

अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर गीतिका छंद में कविता


(अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर कविता)
Ashok Tripathi "Madhav" ki Barish par Kavita)
आधार छंद-गीतिका

नहीं बरसना था तो बादल 
क्यूँ निकले थे घर से।
कृषि कर्षक सब जीव जगत के
बूँद-बूँद को तरसे।।

जेठ मास में कीच मचाया,
आर्द्रा में नहिं बूँद गिराया।
उमस कड़ी गर्मी दम तोड़े 
बरसो तो मन हरषे।।

घर के अन्न खेत में पहुँचे,
खाली हुए भँडारे।
अब तो रहम करो हे बादल,
मिटे गरीबी सर से।।

देर हुई सब नाश करो मत,
इतना मत तड़पाओ।
उबरे नहीं अभी कोविड से,
तुम उधेड़ते चरसे।।

बिन पानी के जग है सूना,
मुश्किल जीवन जीना।
पुनर्वसु ने बहुत रुलाया,
पुख्ख सुख्ख से बरसे।।

लाज रखो निज जलद नाम का,
माधव विनती करता।
टूट चुका मानव मानो तुम,
अब भीतर बाहर से।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
शहडोल मध्यप्रदेश
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बरसि जई घनस्याम: अशोक त्रिपाठी "माधव"

(अशोक त्रिपाठी 'माधव' की बारिश पर बघेली कविता)
(Ashok Tripathi 'Madhav' ki baarish par bagheli kavita)

बरसि जई घनस्याम

जेठ मास मा चहला कीन्हेन,किहेन असाढ़े घाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

दिहेन खेत मा खादा करसी,
तबहूँ घाम उधेरिसि चरसी।
फेकेन खेते अन्न घरे कय,
सोचे रहेन जो थोरौ बरसी।
लटे लम्मरे कइसौ-मइसौ
जइहीं बिजहा जाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अरहर उरदा तिली बोबायन।
सोयाबीन मूँग छिटबायन।।
खादि खितिर चउगिरदा बागेन।
तबहूँ भरे मा निन्चय पायन।।
कोटेदार सेल्समैनन से,
कीन्हेन ताम-झड़ाम।।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

जब ते जनबुध भये रहेन ते।
जेतना जोरे धये रहेन ते।
कुछ लड़िकन के खाता माहीं,
फिक्स-डिपाजिट कये रहेन ते।
सगला खरच दिहेन बिजहा मा,
बचा न एकौ दाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अद्रा मा नहिं बूँद गिराया।
पुनरबसू मा खूब तिपाया।
थरहे रहेन धान बंधी मा,
ओहू का खुब नगदि जराया।
त्राहि मची है चारिउ कइती,
रोट लेबाला सबै चढ़ायन,
तबौ किहा नहिं काम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अब ता चिरई लीलय काँकर।
परा हबय किसमत मा पाथर।
माधव मरै बिपति के मारे,
मरे जात हें गोरुअउ राकर।।
सगले लड़िका खटिआ पकड़े,
दीदिउ हबय बेराम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

बिनती सुनी रहम कइ देई।
धरती का शीतल कइ देई।
बरसि के सबके जान बचाई,
पुनि के चकाचक्क कइ देई।।
जब तक जिअब करब नित पूजा।
हे सीता पति राम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
 शहडोल मध्यप्रदेश
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मन के पतंग -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)


            

मन के पतंग

                              -रजनीश (हिंदी प्रतिष्ठा)

गीत हैं, गुलाल हैं बच्चे

धरा के नूतन पैगाम हैं बच्चे

              जब ये गीत मधुर पिरोते हैं

              ऐसा लगता है सुर के ताल हैं बच्चे

कुमकुम, चंदन सरीखे सुगंधित हैं

“मिट्टी और श्रम” के पहचान हैं बच्चे

              अपनी मस्ती की पाठशाला में

              अपने मन के मुस्कान हैं बच्चे

जब कभी ये पतंगें उड़ाते हैं

लगता है ऊँचाइयों के सलाम हैं बच्चे

          जिनको “नीति” से पगे संदेश मिले हैं, वे

          हर जगह सम्मान हैं बच्चे

क्या फूलों को बोलते किसी ने देखे हैं?

मधुर, सुहावने, हृदय के वरदान हैं बच्चे।।

💐 सम्पूर्ण बाल-मंडली को सादर समर्पित💐


सोमवार, जुलाई 05, 2021

वो है मेरी प्यारी कविता: सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविता Kavita Par kavita in hindi


कविता जो हमारे सुख-दुःख की साथी है, कविता जो हमारे हर्ष और विषाद की वाहिका है, कविता जो हमारी  मनःस्थिति और हृदयतल को स्पर्श करती है, कविता जो प्रेम और आक्रोश को अभिव्यक्त करती है, ऐसी कविता पर कोई कविता न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. एक छोटी सी कोशिश की है कविता पर कविता करने की. कविता पर कविता लिखने की. आशा है कविता पर यह कविता आपको जरूर पसंद आएगी. यदि यह आपके हृदयतल को अंश मात्र भी स्पर्श करने में सक्षम हो तो आपसे प्रार्थना है कि इसे अपने मित्रों एवं परिचितों तक अवश्य पहुंचाएं.
प्रस्तुत है सुरेन्द्र कुमार पटेल  के ब्लॉग से ली गयी यह कविता. 

Kavita Par  kavita in hindi - कविता पर एक कविता -

....वो है मेरी प्यारी कविता
जिसमें अन्तस को छूने की ललक है,
जिसमें जीवन की चतुर्दिक झलक है,
जिससे  जुड़ा कल-आज और कल है,
जिसमें जीवन का निनाद कलकल है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें प्रिय-मिलन की मधुर स्मृति है,
जिसमें समाहित प्रिय की सुन्दर कृति है,
जिसमें सबके मन का सुन्दर स्वरूप है,
जिसमें जीवन भर की छांव और धूप है
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें बादल और धरती की छुअन है,
जिसमें प्रिय के विरह का मौन रुदन है,
जिसमें रूठे मन को मनाने की मनौती है,
जिसमें जन-मन को जगाने की चुनौती है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें प्रिय के संबोधन की ताजगी है,
जिसमें विविध प्रेम प्रकाट्य की बानगी है,
जिसमें ह्दय-वेदनाओं का अगम अंगार है,
जिसमें मन की पहेलियों का सुगम द्वार है,
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें ममताविकल आंसुओं की झड़ी है,
जिसमें मानव मनयोग की मजबूत कड़ी है,
जिसके बिना सितारों के तार भी मौन हैं,
जिसके बिना हम-आप आधा या पौन हैं,
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें अध्यात्म का रचा गया सुपथ है,
जिसमें व्यक्त भक्तिभाव आज अकथ है,
जिसमें वीरों के शौर्य का समृद्ध गान है,
जिसमें रणबांकुरों का उत्साही सम्मान है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें बारिश से उठती मिट्टी की सुगंध है,
जिसमें अमानवीय चीत्कारों की दुर्गंध है,
जिसमें जीवन का गहरा अंधेरा कुआँ है,
जिसमें प्रथम सुहाग सेज से उठता धुआँ है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें सिंहासनों को हिलाने की हुंकार है,
जिसमें गिद्ध-पंजों से छुड़ाने की पुकार है,
जिसमें श्रमिक-मौत के सौदों का दृश्य है,
जिसमें नित्य ढलते सच का दुःखद हश्र है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें उतरा हृदय भाव गहरा डुबोते हैं,
जिसमें मन की पीड़ा शब्दों से पिरोते हैं,
जिसमें इंद्रधनुष में समाहित रंग सभी हैं,
जिसमें गोता लगाते सभी कभी न कभी हैं।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


वह कविता आजकल छूकर चली जाती है।
होना था आगोश में, अनछुआ रह जाती है।
मानव हृदय के तार यूँ सख्त होते जा रहे हैं,
स्वयं पर हँसती है, जब हँसाने से रह जाती है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥
(मौलिक एवं स्वरचित)
© सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला-शहडोल
मध्यप्रदेश

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रविवार, जुलाई 04, 2021

पौधारोपण से प्रेम: राम सहोदर पटेल



पौधारोपण से  प्रेम

क्या नेह बढ़ाना उचित नहीं, जो गले लगता है तुझको।

निज स्वारथ की परवाह न कर जो, पोषण करता है तुझको

धूप ताप सहकरके जो, छाँव मधुर देता तुझको।

कष्ट अनेकों सहकर जो, प्यार अगम देता है तुझको॥

ज्यों सहती माता है विपदा, निज लालन के परिपालन पर।

त्यों पौधा विपदा सहकरके, आराम सकल देता तुझको॥

आरी, टांगी का वार सहे पर, संताप नहीं देता तुझको।

पत्थर तुझसे खाकर भी, फल मीठा देता है तुझको॥

उसको तुझसे कुछ चाह नहीं, सब वह ही देता है तुझको।

तेरे जीवन का कण-कण, संचारित  करता है तुझको॥

निज जीवन का क्षण-क्षण, बलिहारी करता है तुझको।

तू निर्मम आचार करे, वह सदाचार देता है तुझको॥

तू काट हवन करता इसको, निज स्वारथ की बलि वेदी पर।

तेरे छज्जे की बल्ली बन, विश्राम मधुर देता है तुझको॥

पौधारोपण से रहे दूर क्यों न पौधा काटे गिन-गिन के।

वह मेघ बुला वर्षा करता, दे उल्लास भरे जीवन तुझको॥

नन्हीं सी आवश्यकता के हित, दरख्त पेंड मिटाता तू।

वह प्राण वायु आरक्षण दे, निष्कंटक जीवन दे तुझको॥

भीषण ग्रीष्म से तपकर जब, हो जलाभाव जल आलय पर।

निज सीने में संचित जल से,  जलापूर्ति करता तुझको॥

पर्यावरण सुरक्षा हित तत्पर रहता है निशदिन।

रोपित कर इससे प्रेम बढ़ा, ईंधन दे, पोषण दे तुझको॥

साज श्रृंगार रखे धरणी, करता कुसुमित निज कुसुमों से।

औषधि, फल-फूल अनेकन दे, भरपूर समर्पण दे तुझको॥

 फर्नीचर से दरवाजों तक, यह सदन सफल श्रृंगार करे।

जीवन तक आश्रय देता नित, मरने पर गोदी दे तुझको॥

भाव सहोदर रख इससे, मैत्री भाव बना ले तू।

यह है तेरा जीवन साथी, हर मंगल हर क्षण दे तुझको॥

यह है तेरा जीवन साथी, हर मंगल हर क्षण दे तुझको॥

रचना:

राम सहोदर पटेल,

ग्राम-सनौसी, तह.-जयसिंहनगर, थाना-ब्योहारी, जिला-शहडोल

कृपया इन्हें भी पढ़ें: 

प्रकृति और मानव :राम सहोदर

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...