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शनिवार, जुलाई 17, 2021

बरसि जई घनस्याम: अशोक त्रिपाठी "माधव"

(अशोक त्रिपाठी 'माधव' की बारिश पर बघेली कविता)
(Ashok Tripathi 'Madhav' ki baarish par bagheli kavita)

बरसि जई घनस्याम

जेठ मास मा चहला कीन्हेन,किहेन असाढ़े घाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

दिहेन खेत मा खादा करसी,
तबहूँ घाम उधेरिसि चरसी।
फेकेन खेते अन्न घरे कय,
सोचे रहेन जो थोरौ बरसी।
लटे लम्मरे कइसौ-मइसौ
जइहीं बिजहा जाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अरहर उरदा तिली बोबायन।
सोयाबीन मूँग छिटबायन।।
खादि खितिर चउगिरदा बागेन।
तबहूँ भरे मा निन्चय पायन।।
कोटेदार सेल्समैनन से,
कीन्हेन ताम-झड़ाम।।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

जब ते जनबुध भये रहेन ते।
जेतना जोरे धये रहेन ते।
कुछ लड़िकन के खाता माहीं,
फिक्स-डिपाजिट कये रहेन ते।
सगला खरच दिहेन बिजहा मा,
बचा न एकौ दाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अद्रा मा नहिं बूँद गिराया।
पुनरबसू मा खूब तिपाया।
थरहे रहेन धान बंधी मा,
ओहू का खुब नगदि जराया।
त्राहि मची है चारिउ कइती,
रोट लेबाला सबै चढ़ायन,
तबौ किहा नहिं काम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अब ता चिरई लीलय काँकर।
परा हबय किसमत मा पाथर।
माधव मरै बिपति के मारे,
मरे जात हें गोरुअउ राकर।।
सगले लड़िका खटिआ पकड़े,
दीदिउ हबय बेराम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

बिनती सुनी रहम कइ देई।
धरती का शीतल कइ देई।
बरसि के सबके जान बचाई,
पुनि के चकाचक्क कइ देई।।
जब तक जिअब करब नित पूजा।
हे सीता पति राम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
 शहडोल मध्यप्रदेश
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शनिवार, जुलाई 03, 2021

अशोक त्रिपाठी 'माधव' के बघेली गजल Ashok Tripathi Ke Bagheli Gazal


बघेली गजल
अशोक त्रिपाठी 'माधव' के बघेली गजल Ashok Tripathi Ke Bagheli Gazal
आपन फरज निबाहा आगे बढ़े रहा।
खासा परगति के सीढ़ी मा चढ़े रहा।।

पुरिखन हर सीख गांठ मा बांधि के राख्या।
आय जई मंजिल खुद रसता गढ़े रहा।।

थकि के बइठि न जया तूं कहौं छहांरे मा।
धीरेन-धीरे चला गमय-गम कढ़े रहा।।

निंगही से सीखा कुछ अकिल लगाबा थोरौ।
मकड़ी कस जाला रातौ-दिन गढ़े रहा।।

देखा सोच न मान्या कउनिउ बातन के।
दोस न एक दुसरे के मूड़े मढ़े रहा।।

हांथ मा हांथ धये बइठे से कुछू न होई।
कमर कसे करतब्ब मा अपने ठढ़े रहा।।

देई दइउ सहारा केबल करतब्बी का।
पाठ करम योगी बाला सब पढ़ें रहा।।

फल के इच्छा कबौ न कीन्ह्या जान लिहा।
पढ़य के साथय-साथ अउरु कुछ लढ़े रहा।।

आजु-काल बिन लढ़े पढ़ाई फीकी है सब।
माधव के या सीख के मंतर पढ़े रहा।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
  शहडोल मध्यप्रदेश
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गुरुवार, जुलाई 01, 2021

बघेली पर्यावरण गीत: अशोक त्रिपाठी 'माधव' BAGHELI PARYAWARAN GEET



बघेली पर्यावरण गीत
हेरे मिलै नहिं पीपर बहेरा

मनई के जीबन मा होइगा अँधेरा
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा

न आमा बगैचा न तेंदू न महुआ
नहीं अब खरहरी न हर्रा न कहुआ।
न चिरई चनूँगुन के खोंथइला बसेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

न सालैं न गुँइजा न छुइला न सगमन।
जामुन खम्हार नहीं न बीही न सहिजन।
करौंदा बरारी अउ न बइरि मिलै हेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

सीसम न नीलगिर सेमर न खैरा।
कैथा न इमली बेल सेहेरुआ सजैरा।
न चंदन चचेंड़ा न चिरुल चार चेरा। 
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

सताबर पसारन न गुरिज अस्सगंधा।
पेंड़ काट मनई बनाय लिहिस धंधा।
बेंचि-बेंचि पेंड़न का बनाये है डेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

एहिन के कारण आजु बगरा प्रदूषन।
हेरत फिरैं सब आजु शुद्ध आक्सीजन।
मरा रोइ-रोइ चाहे मूड़ का कचेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

अबहूँ भरे भरे मा चेता बिरछा लगाबा।
नाहक मा देखा खुद के नास ना कराबा।
पइहा न हेरे कहौं जंगल-पतेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

प्रकृति के कहर का माधव समझा न रोग हो।
मनई के तन पा के रचा न कुजोग हो।
अबहूँ भरे मा जागा करा न अबेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
   शहडोल मध्यप्रदेश
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मंगलवार, जून 29, 2021

फगुनाहटी बघेली कविता : अशोक त्रिपाठी 'माधव'



फगुनाहटी बघेली कविता 

सनन्-सनन् सुर्रा चलय, बिरबा झारैं पात।
लगत झकोरा हिय कंपै,फगुनाहटी कय बात।।

कबौ निचंदर कबौ बदरिया,कबौ बरसि चंहदर्रा।
कबौ धुंध पुनि कबौ बड़ेबर,कबौ बहै खरभर्रा।।

महुआ पत्ता झारि रहा है,बौर आम मा आई।
गय पियराय उन्हारी सगली,बहै लाग पुरबाई।।

गेहूं है गदरान चना अउ अरहर मसुरी साथय।
गा झुराय सरसबा लगे हां माहू झोंथय-झोंथय।।

सोंध महक भुंइया से आबय मादक बहै बयारी।
बूढ़ सयान सबय एंह रित मा मारि परैं हुलकारी।।

गा सिहिलाय मौसमउ खासा सबके मन उमहान।
लूमरि-डांगरि सब कुलकारैं हां खासा बउरान।।

सूर मकरगत तिल-तिल बाढ़ैं घट का बहुंकय लमहरि।
सांझ सकारे नगदि जड़ाबय कसमसाय दिन दुपहरि।।

पाकत देख उन्हारी खेतिहर देउता -पितर मनाबय।
पाथर अउर दौंगरा के भय जगि के रात बिताबय।

कोइली कुहुक करेजा सालय बिरहिन के मन माहीं।
जेकर प्रियतम छांड़ि बसे हां जाय बिदेसे माहीं।।

सिहरै देहिंया लगतय सुर्रा करै करेजा घायल।
मांग सिन्दुरबा अंगरा लागय बैरी करधन पायल।।

फाग-ददरिया परै जो काने बजुर बान अस लागय।
बसे जाय बालम परदेसय सुधि कय राति मा जागय।

मादक महिना फागुन आबा रितु बंसंत रितुराजा।
माधव मगन निरखि के सोभा हरसित सबय समाजा।।

सब जिउ-जंत खुसी से नाचैं मिलै पेट भर दाना।
फगुनहटी परकित कय सोभा को कइ सकै बखाना।

रचना:
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ओरहन :बघेली कविता-अशोक त्रिपाठी माधव



ओरहन :बघेली कविता

आपन लिहा सम्हार जमाना।
बात-बात पर दिहा ना ताना।
पहिले खुद के टेंटर निरखा,
फेर कहा दुसरे का काना।।

चोर आजु कोटबार का डांटय।
सूध के मुंह का कूकुर चाटय।
आजु हियन अंधेर मचा हय,
इहां लुटइया बायन बांटय।।

करकस कउआ गाबय गाना।
कोइली के अब नहीं ठिकाना।
उहौ उतान फिरै अब माधव,
रुपिया किलो खाय जे दाना।।

अंधे पोमैं कूकुर खांय।
दुर-दुर कहैं ता मारे जांय।
राज करैं अब जबरा-लबरा,
सत्तमान के दइउ सहांय।।

जे घोड़े के पायेंन धाबय।
ओके कइत अढ़इया आबय।
धक्का खाय सेमाली काकू,
रामपदारथ मजा उड़ाबय।।

एकर लाई उहां लगामैं।
एक-दुसरे के घर फोरबामैं।
गली-गली मा भेदी बगरे,
घर-घर, मेहरी-मनुस लड़ामै।।

अइसन बिगड़ा हबै समाज।
आबा लड़िकोहरिन के राज।
खानपान पहिनाउ बदलि गा,
संसकार मा परि गय गाज।।

केखा कही अउ केसे रोई।
हमहूं आपन दीदा खोई।
अब ता केबल एक सहारा,
करिहैं राम उहै अब होई।।

पीठ देय जस बहय बयार।
इहय आय करतब्ब हमार।
जे बइहर के उलटा भागय,
ओखर हंसी करय संसार।।

अबहूं भरे मा चेतय चाही।
परे रही ना घुरबा साही।
अइसन कउनौ जुगुत बनाई,
आबय बाली रुकय तबाही।।

रचना :
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बघेली गजल : अशोक त्रिपाठी माधव



बघेली गजल 

केखा खोटहा कही केखा हीरा कही।
है निठुर जब जमाना केसे पीरा कही।।

केसे रोई बताई हम आपनि बिपति।
केहू पिरबेदना दुनिया मा अइसन नही।।

जेखा मानेन हम आपन ऊ दीन्हिसि दगा।
करी केखर भरोसा साथ केखे रही।।

अब उचटि गा हय बिसुआस संसार से।
हर घड़ी अब जुलुम बोला कइसे सही।।

टोरि दीन्ह्या तुहूं सगली उम्मीद का।
एक भरोसा रहा तोंहसे आशा रही।।

सुधि रही या मरत तक जउनु दीन्ह्या सजा।
नाउ से तोंहरे आंसू या बहतय रही।।

ठीक भा तू किहा जउनु जानिन गयन।
पय पारुख तोहांरय उमिर भर रही।।

तूं मिला ना मिला दुःख न होई कबौ।
ना बिसरि पउबय सुधि आय अउतय रही।।

तूं जहां जा खुशहाल जीबन जिया।
रात-दिन माधव मांगन या मगतय रही।।

खेल किसमत के जाने न पाबय कोऊ।
दूध बिगड़े के बादय बनत है दही।।

रचना:
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शनिवार, जून 26, 2021

आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय #बघेली_कविता: जोगेश्वर सिंह 'जख्मी'




आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय (#मोबाइल_पर_बघेली_कविता) 

ओह जमाने का का कही दादू
मास्टरजी पढावे खातिर
एहर ओहर लईका पकड़त रहेन

महतारी के अचरा मे
हमन,लुकाय जात रहेन

 हाथ पकड़ के बाऊ फेर
मास्टरजी के ईहाँँ
 पहुंचाई देत रहेन

अब बतावा कुल काम घर बैठे होई जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले (मोबाइल) मे होई जात हय

लड़िका सबे कुदत् फांदत
 बहिरे भीतरे करिके 
चहल पहल कर देत रहेन
बोबा और दाई के मनवा
धरी लेत रहेन, 
जलेबी लाये हेन ! 
ई त बहाना रहा 
एही मे अपनौ के लइका समझ लेत रहेन

अब बतावा समसवो स्विगी से मिल जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय

माई हमार कहत ही की
ई लईका 
का जानी, केतना 
दिनभर पिक्चर देखत हय
थोड़ीके पढ़ी लिखि लेत त 
का होई जा भला
हमरे ही भाग मे आवा ई कोरौना
स्कूल बंद कराई दिहिस
हमरे लड़िका के 
जिंदगी बरबाद कर दिहिस
हम ओके कैसे समझाई अम्मी
मैडम जी के स्कूल, गूगल मीट से होई जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय

थोड़ीके बइबे निकला करा दादु
खेला ख़ुदा, 
शरीर पे ध्यान देत जा
हवा सवा ला,
कसरत ओसरत करि लेजा
नही त जइबा सुखाय, 
बैठे बैठे खाई के
पेट कहो न तोहरो निकल जाए

एकरो तोड़ निकला, 
एहि मा गेम, और मीटिंग से योगा होई जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय

बहुत देर चूपियाय के फेर फलनवा बोलिन
ई बतावा दादू, 
कुल मोबाइले से होत है
ई त हमहुँ जान गएन
तोहार कुल कहा हम मान गएन
पए हमार एखे सवाल रहा
खाना खाये के
और लिखे पढ़े के खातिर

 मोबाईले मे हाथ कौन मेर के होत हय
एतना छोट फोन से मनई कौन मेर से हसत और कौन मेर से रोवत हय। 
(#मोबाइल_पर_बघेली_कविता_) 
और पढ़ें:-


~जागेश्वर सिंह
सिंगरौली, मध्यप्रदेश
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मंगलवार, सितंबर 01, 2020

गो बलि महापाप:राम सहोदर

   

गो बलि महापाप

उपकार करे गाय हमारी है शान से।

संवृद्धि में सहयोगी हो मिल जुल किसान से॥

बैला जने हैं ताकती हल खीचे मान से।

मेहनत अथक है करता खेती में ध्यान से॥

हर इच्छा  करे पूरी,  है धेनू नाम से।

कहलाती कामधेनु रहे देवधाम से॥

दूध, दही, तक्रम घी, दें ईमान से।

पाले हैं जग को सारा, बछड़ा जनान से॥

हर अंग बेसकीमती धेनु के नाम से।

अस्थि, चर्म, मूत्र, मल होते हैं काम से॥

गोबर भी पूजा जाता गौरा के नाम से।

वांछित है फल को देती पूजे जो ध्यान से॥

हर इच्छा पुरी करती धेनु ईमान से।

गोधन है कृष्ण प्यारी गोपाल नाम से॥

गोधन से गोपी गोरस ग्वाले गुमान से।

गोकुल में गोधन पूजें  मुरली की तान से॥

हिन्द पूजता है माता के नाम से।

बधकार  पूजता है पूजे है प्राण से॥

कैसी बिडम्बना है द्विविधा के प्लान से।

उपकार का बकसीस चुकाती है जान से॥

गो बलि का पाप  त्यागो जीवन समान से।

रहम करो पशु पर मत खेलो प्राण से॥

रूढ़ीवादी तर्क को निकालो है ध्यान से।

शिक्षा की राह मान निकल अंधज्ञान से॥

कहता सहोदर जग में रहना ईमान  से।

पूज्यनीय धेनु पूजो स्वाभिमान से॥ 

रचनाकार: राम सहोदर पटेल 

शिक्षक, शासकीय हाईस्कूल नगनौड़ी, गृह निवास-सनौसी,जिला-शहडोल(म.प्र.)

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सोमवार, अगस्त 31, 2020

देशभक्ति गीत (आल्हा-लय): राम सहोदर



देशभक्ति गीत  (आल्हा-लय)
भारत माता के दुश्मन को देंगे नाकों चना चबाय।
सरहद में की छेड़ा-छाड़ी तो हस्ती चीन की दऊ मिटाय  ॥ 
शांति पुजारी हम तब तक हैं, जब तक रहिबो हाथ मिलाय। 
दुश्मन बन यदि आँख दिखाया, तुरत ही आँख निकालू  आय॥
हमको निर्बल मत समझे तू, हमरी हस्ती समझ न पाय। 
आग्नि पुंज के हम अंगारे हैं, क्षण में तुझको देय जलाय ॥
राम कृष्ण की यह धरती है, अत्याचारी न टिक पाय।
दगाबाज तू तुच्छ दोगला, तेरा अंत निकट गया आय ॥
सुलझाने का झांसा देकर तू बार-बार देता उलझाय ।
सामत आया तेरा अब है, तेरी अकल ठिकाने नाय ॥
गुरु-चेला तुम दोनों सुन लो, पाक-चीन है कान लगाय ।
विस्तारबाद की नीति छोड़ो, गर चाहो अपना कुशलाय ॥
लैंड माफिया बनना चाहें, तेरी करम  फूट गयी हाय। 
अहंकार काफूर तुम्हारा, क्षण में ही हम देय कराय ॥
सीधी बात करें हैं जब तक, तेरे समझ में आवे नाय ।
औकात पे अपने यदि हम आ जाये, क्षण में तुझको देंय मिटाय  ॥
तुझसा टेढा यदि हम हो गए, देंगे नानी याद दिलाय ।
दगाबाज दुर्नीति दुराग्रह, इससे बाज तू आता नाय ॥
सरहद नीति उल्लंघन करता, हम पर दोष लगाता आय ।
संबंध सहोदर यदि बिगड़ा तो, चक्र-सुदर्शन देंय चलाय॥

काव्यरचना:-

राम सहोदर पटेलशिक्षक,शासकीय हाईस्कूल नगनौड़ी,गृह निवास- सनौसीथाना-ब्योहारी जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)

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रविवार, जुलाई 05, 2020

कहिया बीतही रे भैया कोरोना के डरवा-2


कहिया बीतही रे भैया कोरोना के डरवा-2
ओये होये
रोज रोज पुलिस के सायरन बाजे
बाजे हे एम्बुलेशवा
एको दीना के चेन नही
भैया फँसल मोर बिदेसवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

बाजार में जाए के मनवा करे
करे रे घुमे फिरय के मनवा
घेरा में खड़ा करके
देथे रे सहुआ समनवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

बेर बेर हाथ धोवा
धोवा रे अोना धोतिया
एता दीना घरे रहनं मन भरी गए
सगरो त्यौहार में लागी गए रोकवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

बड़े बड़े लइका होइ गइन
कथंय रोज कराइ दे मोर कजवा
सगरो घोडा-गाड़ी बंद हे
कैसे के आहीं महिमनवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

गाई गोरु घरे बैठिन
कैसे लोरीे खेतवा से भूसा-चरवा
ओहु में काटेक हवय गोहु
कैसे आही अगने मोर ठेसरवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

मोदी जी कहिनय
घरे से झिन निकलिहा
शिवराज मामा के आसरा से
फ्री में मिलिथे कोटा में गेहु गलवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

दाइ बाबा आथंय रोज
रात के देखे रामायणवा
दिने चढ़ी जाथंय महवा
मम्मी पापा कथंय कहिया आही बहुरिया

कहिया बीतही रे भैया ,कोरोना के डरवा - 3
..... ओये होये

©®जागेश्वर सिंह 'ज़ख़्मी ' 

गुरुवार, जून 04, 2020

पर्यावरण पर करमा गीत: राम सहोदर


पर्यावरण पर करमा गीत
फूट गया तकदीर, तेरे करमन से रे। हाय-2
तेरे करमन से रे , फूट गया तकदीर, तेरे........।
1)
तेरे हित का काम करत हैं ये तरुवर है सारे।
हाय-हाय ये तरुवर हैं सारे।
फिर भी तेरे समझ न आवै, इनहिं चलावे आरे।।
तेरे करमन से रे फूट गया..................।
2)
पेड़ को कितना मारे-काटे तऊ न मानै बैर । हाय-हाय तऊ न मानै बैर।
मार का बदला फल है देता अउर मनाबै खैर। तेरे करमन से रे ।
फूट गया तकदीर....................।।
3)
आॅक्सीजन दे के साॅंस बचावै, पानी देके जान। हाय-हाय पानी देके जान।
धूप को सह छाया देवे, पर्यावरण महान। तेरे करमन से रे। फूट गया तकदीर.............।।
4)
वन महोत्सव लक्ष्य को देखो, पहली गलती सुधार।
हाय-हाय पहली गलती सुधार।
रखो सहोदर नाता इनसे ये मुक्ति के द्वार। तेरे करमन से रे। फूट गया तकदीर तेरे करमन से रे ............।।
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मंगलवार, मई 19, 2020

डिजीलैप शिक्षण राई गीत: बी एस कुशराम

डिजीलैप शिक्षण राई गीत
डिजीलैप शिक्षा है न्यारी, रे सब पढ़ो संघवारी
हाॅं-हाॅं रे सब पढ़ो संघवारी,
नौ अप्रैल से डिजीलैप आया।
सारे एम.पी. में है छाया॥
शिक्षा निरंतर जारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
ग्रुप बने हैं हर कक्षा के ।
एक से बारह तक कक्षा के॥
व्हाट्स एप नम्बर जारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
आपकी पढ़ाई आपके घर अब।
डिजीलैप शिक्षा का है मतलब।
पद्धति है चमत्कारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
लाॅकडाउन मां बहुत भै छुट्टी।
घर मां रह गये बांधे मुट्ठी॥
रुक गयो शिक्षा हमारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
शिक्षण सामग्री ग्रुप में आवै।
ये पद्धति सबके मन भावै॥
इनसे करो तैयारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
रोजै अपने व्हाट्सअप खोलो।
लिंक अपने कक्षा के चुन लो॥
सामग्री मिले मनोहारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
व्हाट्सअप फोन नहीं किसी कारण।
रेडियो, टीवी में होत प्रसारण॥
ये जनहित में जारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
जो सामग्री समझ न आवै।
विषय के शिक्षक सब समझावैं॥
सबक न लगी अब भारी रे, सब पढ़ो संघवारी-हा-हाॅं रे...
कुशरामसबको ये समझावै।
घर-घर जा संवाद बढ़ावै॥
सुनो बाप महतारी रे, अब पढ़ाई रखो जारी- हा-हाॅं रे...
डिजीलैप शिक्षा है न्यारी रे, सब पढ़ो संघवारी- हा-हाॅं रे...
 बी एस कुशराम
प्रभारी प्राचार्य, हाई स्कूल बड़ी तुम्मी
विकासखंड-पुष्पराजगढ़जिला-अनूपपुर
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बुधवार, मई 13, 2020

स्वच्छता गीत (राई): बी एस कुशराम



स्वच्छता गीत (राई)
स्वच्छ भारत करो, स्वस्थ भारत करो-2
तन-मन को उजला बना लो.... ओ दी दी ओ 
घर मा शौचालय बना लो 
नदी और नाला जाना  छोड़ो 
शौचालय से नाता जोड़ो-2
लोटा न धरो, खुले शौच न करो-2 
तन-मन को उजला बना लो.... ओ भईया रे 
घर मा शौचालय बना लो 
शौच के बाद औ खाने से पहले 
साबुन से हाथों को धो ले-2
मन ही मन ये ठान, ये कहना तु मान-2 
तन मन को उजला बना लो... ओ भइया रे ...
घर मा शौचालय बना लो 
जल श्रोतों की करो सफाई 
गली मोहल्ला साफ हो माई-2 
साफ़ – सुथरा रहो, यही सबसे कहो-2 
तन-मन को उजला बना लो.... ओ दी दी ओ 
घर मा शौचालय बना लो 
तन हो उजला मन हो उजला 
पीने का पानी होवे उबला-2 
साफ़ पानी पियो, सब निरोगी जियो-2 
तन-मन को उजला बना लो.... ओ दी दी ओ 
घर मा शौचालय बना लो 
स्वच्छ हो परिसर स्वच्छ हो शाला 
सुन लो गुन लो बालक- बाला-2 
‘कुशराम’ ये कहें, स्वच्छ सब कोई रहें-2 
तनमन को उजला बना लो .. ओ भईया रे 
घर मा शौचालय बना लो

बी एस कुशराम
प्रधानाध्यापकमाध्यमिक विद्यालय बड़ी तुम्मी
विकासखंड-पुष्पराजगढ़जिला-अनूपपुर
[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर इमेल करें अथवा ✆ 8982161035 नंबर पर व्हाट्सप करें, कृपया देखें-नियमावली]

मंगलवार, मई 12, 2020

जागरूक महिला किसान: बी एस कुशराम

जागरूक महिला किसान
परदेश ना जा सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2
किसानी कर ले सइयां मैं परौ तोर...

वहाँ के मुसीबत का मैं न जान पइहौं।
यहाँ के घटना का मैं कइसे  बतइहौं॥
कइसे  बतइहौं सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2

सास ससुर अब हो गए सयाने।
ताकत नहीं इनमें काम धंधा के लाने॥
धंधा के लाने सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2

जमीन है खूब दुई नागर के बरदा।
खेती करइया नहीं घर मां कोऊ मरदा॥
कोऊ मरदा नहीं सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2

तै नागर फंदिहे औ मैं करिहौं निदाई।
मिलजुल के दोनों हम करबै कमाई॥
कमाई करबै सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2

खेती मां अपनाउब हम उन्नत तरीका।
कमाई मां कबहूँ ना परही फीका॥
न परही फीका सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2

‘कुशराम’ कहे खेती है लाभ का धंधा।
काम करब मिला के कंधे से कन्धा॥
कंधे से कन्धा सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2
परदेश ना जा सइयां मैं परौ तोर पइयां, किसानी कर ले-2
Ⓒबी एस कुशराम
प्रधानाध्यापकमाध्यमिक विद्यालय बड़ी तुम्मी
विकासखंड-पुष्पराजगढ़जिला-अनूपपुर
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शुक्रवार, मई 08, 2020

राई साक्षरता गीत:राम सहोदर पटेल

    राई साक्षरता गीत 
    लड़िकन का पढ़ैं का पठावा

    कहना माना मोर, कहना माना मोर।
    लड़िकन का पढ़ैं का पठावा।। अरा. ररा रे लड़िकन.....।

    गामन-गामन खुला मदरसा।
    लड़की-लडकन का मन हरषा।
    विद्यालय मा नियमित जाकर।
    जीवन सुधारा शिक्षा पाकर।।
    पढ़ लो देके ध्यान, पढ़ ला देके ध्यान।
    लड़िकन का पढ़ैं का पठावा। हाँ, हाँ  रे लड़कन .....।

    लड़की पढ़ावा लड़कों जैसा। दोनौं बराबर भेद ये कैसा।।
    प्रथम गुरू लड़की ही बनती। माता बन ससुराल में रहती।।
    बेटी होवे महान, बेटी होवे महान, शिक्षा मा आगे बढ़ावा।।
    कहना मानो मोर-2, लड़िकन का .......।

    विद्यालय मा भोजन पइहैं। गणवेश पहन सब निर्मल रइहैं।।
    बिन लागत ही होय पढ़ाई। छात्रवृत्ति भी है मिल जाई।।
    जाग कर ले बिहान, जाग कर ले बिहान।। अवसर न नाहक गमाबा।।
    कहना माना मोरः2।।  लड़िकन का...................।

    मात पिता की जिम्मेदारी। संतान की शिक्षा हो संस्कारी।
    काम का बोझ न उन पर डारी। औलाद का जीवन होवे न्यारी।
    अच्छे सांचें में ढाल-2।। फर्ज अपना तुम इनसे निभावा।।
    कहना माना मोर, कहना माना मोर। लड़िकन का .....।।

    बच्चे हैं भगवान की मूरत। नहीं बिगाड़ो इनकी सूरत।।
    कहैं सहोदर माना कहना। शिक्षित होकर सुख में रहना।।
    रखियो इनका ध्यान-2।। सुन्दर भविष्य बनावा।।
    कहना माना मोर-2।। लड़िकन का पढ़ैं का पठावा।।
    अरा-ररा-रे लड़िकन का ..............
  1. आपसे अनुरोध है कि कोरोना से बचने के सभी आवश्यक उपाय किये जाएँ।
  2. बहुत आवश्यक होने पर ही घर से बाहर जाएँमास्क का उपयोग करें और शारीरिक दूरी बनाये रखें।
  3. कम से कम 20 सेकंड तक साबुन से अच्छी तरह अपने हाथों को धोएं। ऐसा कई बार करें।
  4. आपकी रचनाएँ हमें हमारे ईमेल पता akbs980@gmail.com पर अथवा व्हाट्सप नंबर 8982161035 पर भेजें। कृपया अपने आसपास के लोगों को तथा विद्यार्थियों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करने का कष्ट करें। कृपया देखें, नियमावली

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...