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शनिवार, जून 26, 2021

आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय #बघेली_कविता: जोगेश्वर सिंह 'जख्मी'




आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय (#मोबाइल_पर_बघेली_कविता) 

ओह जमाने का का कही दादू
मास्टरजी पढावे खातिर
एहर ओहर लईका पकड़त रहेन

महतारी के अचरा मे
हमन,लुकाय जात रहेन

 हाथ पकड़ के बाऊ फेर
मास्टरजी के ईहाँँ
 पहुंचाई देत रहेन

अब बतावा कुल काम घर बैठे होई जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले (मोबाइल) मे होई जात हय

लड़िका सबे कुदत् फांदत
 बहिरे भीतरे करिके 
चहल पहल कर देत रहेन
बोबा और दाई के मनवा
धरी लेत रहेन, 
जलेबी लाये हेन ! 
ई त बहाना रहा 
एही मे अपनौ के लइका समझ लेत रहेन

अब बतावा समसवो स्विगी से मिल जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय

माई हमार कहत ही की
ई लईका 
का जानी, केतना 
दिनभर पिक्चर देखत हय
थोड़ीके पढ़ी लिखि लेत त 
का होई जा भला
हमरे ही भाग मे आवा ई कोरौना
स्कूल बंद कराई दिहिस
हमरे लड़िका के 
जिंदगी बरबाद कर दिहिस
हम ओके कैसे समझाई अम्मी
मैडम जी के स्कूल, गूगल मीट से होई जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय

थोड़ीके बइबे निकला करा दादु
खेला ख़ुदा, 
शरीर पे ध्यान देत जा
हवा सवा ला,
कसरत ओसरत करि लेजा
नही त जइबा सुखाय, 
बैठे बैठे खाई के
पेट कहो न तोहरो निकल जाए

एकरो तोड़ निकला, 
एहि मा गेम, और मीटिंग से योगा होई जात हय
आजकल के पढ़ाई लिखाई दादा मोबाईले मे होई जात हय

बहुत देर चूपियाय के फेर फलनवा बोलिन
ई बतावा दादू, 
कुल मोबाइले से होत है
ई त हमहुँ जान गएन
तोहार कुल कहा हम मान गएन
पए हमार एखे सवाल रहा
खाना खाये के
और लिखे पढ़े के खातिर

 मोबाईले मे हाथ कौन मेर के होत हय
एतना छोट फोन से मनई कौन मेर से हसत और कौन मेर से रोवत हय। 
(#मोबाइल_पर_बघेली_कविता_) 
और पढ़ें:-


~जागेश्वर सिंह
सिंगरौली, मध्यप्रदेश
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रविवार, जुलाई 05, 2020

कहिया बीतही रे भैया कोरोना के डरवा-2


कहिया बीतही रे भैया कोरोना के डरवा-2
ओये होये
रोज रोज पुलिस के सायरन बाजे
बाजे हे एम्बुलेशवा
एको दीना के चेन नही
भैया फँसल मोर बिदेसवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

बाजार में जाए के मनवा करे
करे रे घुमे फिरय के मनवा
घेरा में खड़ा करके
देथे रे सहुआ समनवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

बेर बेर हाथ धोवा
धोवा रे अोना धोतिया
एता दीना घरे रहनं मन भरी गए
सगरो त्यौहार में लागी गए रोकवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

बड़े बड़े लइका होइ गइन
कथंय रोज कराइ दे मोर कजवा
सगरो घोडा-गाड़ी बंद हे
कैसे के आहीं महिमनवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

गाई गोरु घरे बैठिन
कैसे लोरीे खेतवा से भूसा-चरवा
ओहु में काटेक हवय गोहु
कैसे आही अगने मोर ठेसरवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

मोदी जी कहिनय
घरे से झिन निकलिहा
शिवराज मामा के आसरा से
फ्री में मिलिथे कोटा में गेहु गलवा

कहिया बीतही रे भैया ...
ओये होये

दाइ बाबा आथंय रोज
रात के देखे रामायणवा
दिने चढ़ी जाथंय महवा
मम्मी पापा कथंय कहिया आही बहुरिया

कहिया बीतही रे भैया ,कोरोना के डरवा - 3
..... ओये होये

©®जागेश्वर सिंह 'ज़ख़्मी ' 

शुक्रवार, जुलाई 03, 2020

मेरे खेत मेरी फसल : जागेश्वर सिंह 'जख्मी'

मेरे खेत मेरी फसल 

मेरे खेत मेरी फसल
मेरे जीवन के सहचर
 मुझसे बाते करते हो सस्वर
जब सीचता हूँ तुमको
रोज लगाते हो गले मुझको

मेरे आने से हो जाते हो हर्षित
चले जाने से क्या होता हैं मन कर्षित
तभी तो आते ही हँसने से लग जाते
जाते ही तुम झुक से जाते
तुम्हारा मेरी ओर निहुरना जैसे
बिछुड़न में प्रेमिका को जाता देख
हाथ बढ़कर प्रेमी जाता है झुक

कभी जो तुम उदास हो जाते हो
 रुखे रुखे से नजर आते हो
सच कहता हूँ
तुम्हारी इस दशा से व्याकुल होकर
 ऊपर दृष्टि जमाकर
माँगता हूँ
आकाश के सूर्य से तुम्हारे लिए थोड़ा रहम

कभी की ,जब हवा की मंद गति
हो जाती है अचानक तीव्र
आँधी देख हो जाते हो भयभीत
 मगर मेरी तरह तुम भी भीतर से हर्षाते हो ना

बारिश की पहली बूँद जब तुम पर गिरती है
मस्ती में मेरे पैर डोलते; तुम्हारे हाथ डोलते
मैं करता हूँ तुम्हारा पोषण
तुम करते मेरा रक्षण

कीट पतंगो से होते हो जब तुम आहत
मैं घबराता तुम्हें देते हुए कीटनाशक
पर सच में  इससे तुम्हारे घाव भर जाते हैं
फिर तुम भी तो मेरी सब से हंस हंस के बतियाते हो ना

 और कैसा कहूँ तुम तो मेरे इस बात के भी हो साक्षी
की जबकि आती है छत पर पड़ोसन
उसे निहारता हूँ तुम्हारी ओट से छुपकर

हो तुम इस साक्षी  इस बात के भी
की घास निकालते हुए
हम दोनों ही सुनते हैं
उसकी आवाज हो जाती है
 और भी तेज और स्पष्ट

तुम्हारे साथ गूजर रहा
मेरा क्षण-क्षण
क्या शाम क्या सुबह
दिन दुपहरी; फिर अंजोरी और अन्धियारी रात
कभी हिलाती है तुम्हें पछुआ; कभी पूरबी बहार
पर शायद तुम्हें भी चिढ़ हैं मेरी तरह उत्तरी बयार से

पर हे ! किसान के संरक्षक
मैं यहाँ रहूँ या ना रहूँ
मेरे बाद भी तुम यूँ ही
मेरे भावी का तुम पोषण करना

मैं तुम्हारे खिलखिलानेपन को
इस हर्षित धरती-तन को
और तुम्हारे हरियालेपन को
मैं हमेशा अपने स्मृति पटल पर बसाए रखना चाहता हूँ

चाहें फिर किसी रोज प्रलय क्युँ ना आये
मेरा तुमसे साथ क्यूँ ना छूट जाये
तुम मुझमें मेरी उम्मीद सी बन
 आशा का दीपक जलाए रखना
                           ~जागेश्वर सिंह 
                           # ज़ख़्मी
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शुक्रवार, जून 26, 2020

आती है न याद :जागेश्वर सिंह


आती है न याद 

जब नींद नही आती
और बीत जाता है ,
रात का तीसरा भी पहर
लोरी गाकर सुलाने वाली
मेरी माँ ,मुझे याद आती है

जब साथ खाना खाते
रोटी कम पड़  जाता है न ,
बचपने मे अपने हिस्से की रोटी देकर
भुखे रह जाने वाली
मेरी माँ, मुझे याद आती है।

जब चलते चलते लड़खड़ा जाता हूँ न ,
हाथ पकड़ कर चलना सिखाने वाली
मेरी माँ ,मुझे याद आती है।

भयानकता का डर और
अकेलेपन का साया जब सताती है न ,
वो अपने आँचल में छुपा लेने वाली
मेरी माँ ,मुझे याद आती है।

जब बाजार का भाव  बढ़ जाता है
जरुरत ही भर का  समान खरीदने में
 पैसा कम पड़ जाता है न ,
हर शौक पुरा करने वाले
मेरे पापा ,मुझे  याद आते हैं

कम नंबर आने पर
मन जब उदास हो जाता है न
मेरी हर नाकामयाबियों  में
  "फिर कोशिश करो"कहकर
सांत्वना देने वाले
मेरे पापा ,मुझे याद आते हैं।

जब कोई चीज नही दिखता
और बहुत ढुँढने पर भी नही मिलता है न
मेरी हर गलती पर दांट  देने वाले
मेरे बड़े भैया ,मुझे याद आते हैं।

जब किसी से तंग आकर
चिढ जाता हूँ
बातों में बहक सा जाता हूँ न ,
तब मेरी हर बात को
मजाक समझ कर भुल जाने वाले
मेरे मंझले भैया, मुझे याद आते हैं।

जब बात बात पर दोस्तों से झड़प हो जाती है।
हर बात पर लड़ने वाली
और फिर मान जाने वाली
मेरी बहन ,मुझे याद आती है।

जब कभी घुम-घामकर आने पर
कुछ खाने का मन करता है न ,
बाजार के हर मेले से मेरे लिए जलेबियाँ लाने वाली
मेरी दादी, मुझे याद आती है ।

जब कभी धुंधलके में
गली में ठेले वाला 'आम लेलो'
गुहारता है न
मेरे लिए हर शाम कुछ न कुछ ले आने वाले
मेरे बाबा ,मुझे याद आते हैं।

जब साथ चलते-चलते
थक जाता हूँ और बैठ जाता हूँ मन मारकर
बचपने में कंधे में
बिठाकर ले जाने वाले
मेरे बाबा ,मुझे याद आते हैं

जब कभी भुख से तर मैं
रसोडे में कुछ खोजता हूँ न ,
मेरे लिए खाना बचा देने वाली
मेरी चाची ,मुझे याद आती हैं।

जब कभी क्रिकेट देखते हुए लाईट गोल हो जाती है
स्कोर न जान पाने पर बेचैन हो जाता हूँ न
वो स्कोर  के साथ क्रिकेट की चर्चा  करने वाले
मेरे चाचा मुझे याद आते हैं।

कहीं जाते हुए ,दोस्तों के कंधो पर हाथ रखते हुए
पड़ोस में रहने वाला
मेरा दोस्त , मुझे याद आता है।

बनते ,बिगड़ते सपनों में
गिरते ,सँभलते ,जुझते ,भागते
थक हार कर जब घर लौटता हूँ
सिलसिलों और यादों  के कारवाँ  में
पल-पल का सारा दर्द  बाँट लेने वाली
मेरी याद ,मुझे याद आती है।

जागेश्वर सिंह
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रविवार, जून 21, 2020

मेरा गांव-अभी शहर नहीं हुआ : जागेश्वर सिंह ज़ख्मी

मेरा गांव-अभी शहर नहीं हुआ

घुसते हुए हर किसी ने घर की चौखट को छुआ।
मेरा गाँव, अभी भी गाँव ही है शहर नही हुआ।।

हर खुलती दुकान बताती है गाँव शहर हो रहा है।
जाने क्यूँ इसी बात से डर भी बहुत लग रहा है।।

छुड़ाए जाते हैं आम के छालों से अब भी बुखार।
नीम अब भी बन जाती है मुखारी हर दिन हर बार।।

पीपर के नीचे अब भी बिताई जाती है दोपहर।
अब भी हर मुडेर पर उगलता है कौआ जहर।।

दौरी हांकते हुए अब भी कोई थकता नही।
बड़ों की पंगत में अब भी छोटा बैठता नही ।।

खटिया पे बैठने का मजा अभी खत्म नही हुआ।
मेरा गाँव, अभी भी गाँव ही है शहर नही हुआ।।

©जागेश्वर सिंह ज़ख़्मी
रचना दिनांक:-09/03/2020

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...