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बुधवार, जनवरी 26, 2022

आजादी के बाद का संघर्ष : प्रदीप

ऐसा नही है कि आज़ादी जीत ली
और संघर्ष करने को कुछ नही है

भारत एक लोकतंत्र बन गया
और बनाने को कुछ नही है

संविधान मिल गया 
और पाने को कुछ नही है

जो जीता गया है
उसे बचाये रखने का संघर्ष अभी भी है

जो बन गया है
उसे बनाये रखने की जिम्मेदारी अभी भी है

जो अथक प्रयासों से मिला है
उसे संजोये रखने की संकल्पना अभी भी है

क्योंकि सभी के प्रतिनिधित्व पर 
एकाधिकारवाद का षणयंत्र अभी भी है

लोकतंत्र को भीड़तंत्र से खतरा अभी भी है
संविधान पर रूढ़िवादियों की टेढ़ी नजर अभी भी है

ऐसा नही है कि आजादी जीत ली 
और संघर्ष करने को कुछ नही है

क्योंकि जीवन स्वयं में एक युद्ध सा है
इसलिए संघर्ष करने को बहुत कुछ अभी भी है।

-ई. प्रदीप 
उकसा, ब्योहारी
निवर्तमान- नागपुर, महाराष्ट्र

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रविवार, अक्टूबर 11, 2020

जीवन और अन्तःकरण: इंजीनियर प्रदीप



जीवन और अन्तःकरण

जीवन एक जैविक घटना है, एक बायोलॉजिकल प्रोसेस है, अगर सिर्फ जीवन का मिलना ही जीना है तो मनुष्य और जानवर में कोई फर्क नहीं है क्योंकि जीवन तो उसे भी मिलता है, पर अन्तःकरण निर्मित होता है उसे बनाया जाता है अन्तःकरण उस पटल की तरह है जिस पर लिखना संभव है; जिस पर पहले से कुछ लिखा हुआ नहीं है। जीवन की शुरुआत में  अन्तःकरण शून्य होता है। लालच, घृणा, प्रेम, नफरत, काम  और क्रोध  भी अन्तःकरण नहीं हैं क्योंकि यह भाव है, एक परिणाम है, आवेग है अन्तःकरण की सतह पर बनती बिगड़ती हुई प्रतिक्रिया है ।

फिर अन्तःकरण क्या है? अन्तःकरण एक समझ है हर उस वस्तु को लेकर जो हमारे से होकर गुजरती है और जिसे देखकर हम उसका छाया चित्र कैद कर लेते हैं । यह सतत होने वाली प्रक्रिया है। हर समझ की नई परत हर बार हमारे मानस पर जमती चली जाती है और हमारा अन्तःकरण बनता चला जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का अन्तःकरण अलग निर्मित हुआ है क्योंकि वस्तुओं को परखने का उसका परसेप्शन अलग था। उसे देखने का उसका नजरिया अलग था, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति एक समान दिखने पर भी भिन्न अन्तःकरण की वजह से भिन्न होते हैं । इसलिए अलग- अलग भू-भाग, और कई बार तो एक ही भू-भाग के अलग- अलग समूह, समाज में रहने वाले व्यक्तियों के आचरण, स्वभाव और नज़रिए में फर्क होता है। हमारा अंतःकरण कई स्तर पर भिन्न है और कई स्तर पर समान।

शुरुवात में बच्चे अंधेरे से नहीं डरते फिर जब वो रात में नहीं सोते हैं तो हम ही काल्पनिक डर उनके मन में भरते हैं। भले ही हमने  उन्हें नियंत्रित करने के दृष्टिगत यह सब किया हो पर यह सब उनके अन्तःकरण को निर्मित करता है और अंधेरा डर का पर्याय बन जाता है जबकि अंधेरा जिज्ञासा का विषय है । चूंकि उनका अन्तःकरण नए ब्लैक बोर्ड की तरह एकदम साफ सुथरा होता है उस समय का उकेरा हुआ वो डर जीवन पर्यन्त नहीं मिटता । अंधेरा डर का पर्याय है यह बालक के अन्तःकरण में अमरता के साथ लिखने में अभिभावक, कोई रिश्तेदार जैसे कि नाना-नानी,मौसा-मौसी या दादा-दादी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जबकि अंधेरा का अर्थ  प्रकाश का न होना है। जब सूर्य पृथ्वी के एक हिस्से में चमक रहा होता है तो पृथ्वी के दूसरे हिस्से में अंधेरा होता है।  चूंकि बच्चे में विवेक नहीं होता तो उसे जियोग्राफी समझाना और विवेक के आधार पर उसे सोने के लिए तैयार करना आसान नहीं होता तो हम उसे डर का खुराक देते हैं। पर हम इस तरह उसका अन्तःकरण भी निर्मित कर रहे होते हैं। ईश्वर का डर भी एक ऐसा ही डर है जो हमारे अन्तःकरण में निर्मित किया जाता है। राजनीति, धर्म और व्यवसाय इसके लाभार्थी भी हैं और पोषक भी ।

बड़े होते-होते एक इंसान का अन्तःकरण परिपक्व होते चला जाता है। यह परिपक्वता आकृति या विकृति के संदर्भ में नहीं है बल्कि  रिजिडनेस और फ्लेक्सिबिलिटी के संदर्भ में है । व्यक्ति का अन्तःकरण अंततः उसका ईगो और व्यक्तित्व बनता चला जाता है, भले ही उसका अन्तःकरण अचेतन में निर्मित हुआ है। अबतक निर्मित हो चुका अन्तःकरण नए विचारों को, विविधता को रिजेक्ट करता है  ऐसे विचार जो अन्तःकरण के हिसाब से न हों, हम उसे पहली बार में स्वीकार नहीं करते चाहे कितने भी तथ्य रखें जाएं। पर ऐसा नहीं है कि अन्तःकरण निर्माण की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है यह एक सतत प्रक्रिया है पर जैसे पहले से लिखे हुए बोर्ड में नया कुछ लिखा हुआ स्पष्ट रूप से चिन्हित नहीं होता वैसे ही नई विविध जानकारी अन्तःकरण परिवर्तन में बहुत ही स्थिलिता से काम करती है।


इसलिए नए समाज और देश का निर्माण बच्चों के अन्तःकरण निर्माण से प्रारंभ होता है । हमारे बच्चों का अन्तःकरण निर्माण राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में स्वतः हो रहा है या फिर हमारे सतत नियंत्रण और देखरेख में  इस पर बहुत कुछ  निर्भर करता है । इसलिए अन्तःकरण  निर्माण को राजनैतिक परिपेक्ष्य में भी  समझना आवश्यक है। जब राजनीति से प्रेरित कोई समूह  बैनर, होर्डिंग, पुस्तक, ऑडियो ,वीडियो लेख , कविता और कैंपेन के माध्यम से झूंठ और प्रोपगंडा को लगातार, बार-बार परोसता है , छद्म आदर्श और काल्पनिकता के प्रति प्रेम की आड़ बनाकर पॉलिटिकल कैंपेन करता है तब भी जन और समूह खासकर बाल मन  का  अतः करण निर्मित किया जा रहा होता है। इस अन्तःकरण निर्माण के पीछे जन समूह में स्वीकारता को विकसित करने का उद्देश्य होता है। पोलिटिकल लाभ के लिए हम  पब्लिक सेंटीमेंट में बदलाव करते हैं। पब्लिक सेंटीमेंट बदलते ही हर चीज बदलने लगती है। हर व्यवस्था, समूह और न्यायिक प्रणाली पब्लिक सेंटीमेंट के हिसाब से  अलाइन  होने लगता है। टेलीविज़न पर डिबेट के विषय बदल जाते हैं, नेताओं के भाषण में नारे और मुद्दे बदल जाते हैं  न्यायाधीशों के न्यायिक तर्क बदल जाते हैं , गली-मोहल्ले के बच्चों के व्हाट्सप्प और फेसबुक के  पोस्ट बदल जाते हैं ।
यह निचले स्तर पर अबोध और स्वतः आकार लेता  हुआ समाज की तरह प्रतीत होता है  पर ऊपरी स्तर एक सुव्यवस्थित संचालित किया हुआ प्रोग्राम है  जो फेसबुक,व्हाट्सप्प के पोस्ट फॉरवर्ड करने एवं  टेलीविज़न व समाचार पत्रों पर यकीन करने वाले समूह को हांकते- हांकते उनके बुनियादी विचार तंत्र से विस्थापित कर देता है,  और इस तरह वर्तमान पीढ़ी  के  राजनीतिक एवं सामाजिक अंतःकरण  का नवीनीकरण हो जाता है। पर अंतःकरण की  इस  सतह पर खड़े व्यक्ति को यही लगता है कि वह  कोई मौलिक कार्य कर रहा है जबकि सामूहिक और भीड़ वाली इस अन्तःकरण का वह भी एक प्रतिबिम्ब मात्र है।

आलेख: 
ई. प्रदीप पटेल नागपुर, महाराष्ट्र

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रविवार, जून 21, 2020

मानव की इच्छाशक्ति: इंजी. प्रदीप



मानव की इच्छाशक्ति

वो जो बीज बनके अंकुरित हुआ
पुष्प की तरह पल्लवित हुआ
था कभी ज़मीन पर
फिर शिखर को उसने छुआ।

अनभिज्ञ था, अज्ञान था
उसको ना कोई भान था
घनघोर अमावस की रात का
प्रतिकार कर, वो प्रकाश हुआ।

न चैन था, न आराम था
उसको कहां विश्राम था
नाप कर धरती का कोना
आ गया चांद पर, आसमां को लांघता हुआ।

कोई कभी, उसको कहीं
रोकता पर्वत भी यदि
काट कर वो बह गया
कभी नदी का प्रारम्भ वो, अंततः सागर हुआ।

लोरियाँ सुनकर सोता था जो कभी
छोटी सी एक बात पर आंखभर रोता था जो कभी
देश की सीमा का वही पहरेदार अब
वीरता की मिशाल बनता, शत्रु का सीना चीरता हुआ।


पालता है वो स्वप्न को जागते हुए रात को
अपनी हृदय में, इच्छा, प्रबल जज्बात को
क्षीण भी वही और महान भी वही हुआ
जिसने है जीता स्वयं को, अंत का वही विजेता हुआ।

©इंजी. प्रदीप
नागपुर, महाराष्ट्र।
21 जून 2020

सोमवार, जून 15, 2020

कवि का चिंतन:इंजी. प्रदीप


कवि का चिंतन
सोचता हूं,
क्या गुफ्तगू करता होगा
बड़े इत्मीनान से
कोई कवि जब लिखता होगा

रुदन के बीज, हंसी  की बात,
खीज से मन को भर लेता,
सहज ही बात पर,
आश्चर्य चकित हुआ होगा

व्यथा मन की, बात तन की
समेट कर जहां भर की बातें
जाने किस कशमकश में
रात को सोया होगा

इन्द्रधनुष सा मन उसका
रंगों का वो सौदागर
कितने रंगों में डुबोकर
कागज पर कलम रखता होगा।

किलकारी, खामोशी, सहर का शोर
क्रोध का गूंज भी, औरतों की खुसफुसाहट तक
संवेदनाएं अपने  हृदय में, गहरी जगाया होगा।

मुक्कमल तो कुछ था ही नहीं
परवाह उसे कहां इस बात की थी
शहर दर शहर, कितने रास्तों का
सफर उसने किया होगा।

क्या पता कभी किया भी है प्रेम उसने ?
बखूबी लिखता है मगर
विरह का दर्द, श्रृंगार का रस
किसी प्रेयसी का हृदय भी रखता होगा

सोचता हूं,
क्या गुफ्तगू करता होगा
बड़े इत्मीनान से
कोई कवि जब लिखता होगा।
रचनाकार:
ⓒइंजी. प्रदीप
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शनिवार, मई 23, 2020

हमारे युवा और औद्योगिक क्रांति 2.0 :इंजी. प्रदीप पटेल


हमारे युवा और औद्योगिक क्रांति 2.0

परिस्थियाँ बदलती रहती हैं एक व्यक्ति, समूह अथवा भूगोल में खोजी गयी चीजें शेष मानव जीवन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। पहिये के अविष्कार के पूर्व भी जीवन था लेकिन एक समूह के द्वारा खोजा गया पहिया और उसके अविष्कार ने शेष मानव जीवन को उसके उपयोग के लिए विवश कर दिया। जिन्होंने उस खोज को नकारा वो प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाए और समाप्त हो गए। तकनीक न केवल काम को आसान बनाती है बल्कि उसे कई गुना ज्यादा बृहत रूप में आकार देने का भी कार्य करती है। कंक्रीट के घर न केवल मिटटी के घर के मुकाबले ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होते हैं बल्कि कंक्रीट और इस्पात के इतेमाल ने हमें सैकड़ों मंजिला ऊँचा भवन बनाने में सक्षम बनाया। भाप इंजन की खोज ने पूरी दुनिया को अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया।
इसलिए जो समय के साथ चल सकता है वही टिका रहा सकता है, जो आधुनिकता को अपनाएगा वही उन्नति करेगा। औदोगिक अविष्कार का प्रथम दौर ख़त्म हो चुका है। यह औद्योगिक  युग का दूसरा दौर है जिसे सूचना क्रांति, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स का दौर भी कह सकते हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है सूचना क्रांति का दौर मतलब जितनी ज्यादा सूचनाओं को हम प्रोसेस करेंगे और जितनी ज्यादा सूचना को हम संप्रेषित करेंगे उतने ही शीर्ष पर रहेंगे। यही करण है की आजकल आपको हजारों टी वी चैनलों पर लाखों कंटेंट मिलते हैं। इसके अलावा डिजिटल प्लेटफार्म , यू टूब, सोशल प्लेटफार्म के कंटेंट जोड़ दिए जाएँ तो अनगिनत कंटेंट हैं।
बहरहाल जो मै कहना चाहता हूँ वह यह कि आप सभी औद्योगिक क्रांति भाग 2 के मैकेनिज्म को समझें यहाँ पर आपको दो स्तर पर कार्य करना है:-
पहला#
अपने समय को बेकार के प्रायोजित कंटेंट से बचाएं। किसी को बेवजह अपना कीमती समय न दें और न ही प्रायोजित कंटेंट को ग्रहण करें। यह आपके सोचने समझने की शक्ति को बायस्ड या पक्षपात से ग्रसित करता है, खासकर राष्ट्रवादअध्यात्म और रिलिजन के पैकेजिंग में पोलिटिकल कंटेंट ऑफर करने वालों से बचें, ऐसे बहुत से व्हात्सप्प/फेसबुक ग्रुप हैं जो केवल पोलिटिकल गॉसिप के लिए बनें हैं और आपके जीवन में कोई वैल्यू ऐड नहीं करते; सिवाय समय बर्बाद करने के आज के युवा खासकर विद्यार्थी वर्ग अपने समय के महत्व को ध्यान में रखे क्योंकि समय पुल के नीचे से निकले हुए पानी की तरह है जो एक बार बह गया तो वापस नहीं आने वाला।
दूसरा#
जितना ज्यादा ज्ञान, हुनर, नए स्किल आप इस दौर में सीख सकते हैं उतना सीखना पहले कभी संभव नहीं था इसलिए ज्यादा से ज्यादा सिखाने वाले कंटेंट को देखिये, सुनिए , पढ़िए और अपनी क्षमता और स्किल को बढ़ाइए, यह सोचिये की हम इन्टरनेट और अपने मोबाइल पर क्या देखें जिससे हमारे योग्यता में वृद्धि हो और हम अपनी कमाई में चार पैसे जोड़ सकें, हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो और हमारे घर के सदस्य ज्यादा योग्य बन सकें
अगर किसी ग्रुप या फोरम से जुड़ना भी हो तो उससे जुडें जो आपके जीवन में कोई वैल्यू ऐड करते हों और आपकी योग्यता व आर्थिक क्षमता को मजबूत बनाते हों।
सभी युवाओ से मेरा निवेदन है की प्रतिस्पर्धा के इस युग में अपने समय के साथ न्याय करें और डिजिटल मीडिया के दुष्परिणामों से स्वयं को बचाते हुए इसका उपयोग ज्यादा से ज्यादा अपने हित में करें
आपका साथी/ दोस्त
इंजी. प्रदीप पटेल,

नागपुर, महाराष्ट्र
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रविवार, मई 17, 2020

इस दौर की बातें:इंजी. प्रदीप पटेल

इस दौर और उस दौर की बातें,
भरे  हुए  पेट  में  झूठ की बातें।

तरीका सीख लिया है हमने,
लोगों को उलझाए रखने का।
भारत-पाकिस्तान, हिन्दू और मुसलमान की बातें।

धूप और बारिश में जो ढोता ईंट और पत्थर।
फुरसत भी नहीं जो कर लें, कभी उस मजदूर की बातें।

स्वार्थ ऐसा है और शोर इतना है,
जो मर गए लाचारी में वो भी बन गए,
हमारी टी आर पी की बातें।

दुनिया में लहराएगा अपना,
एक दिन परचम बहुत ऊंचा।
नंबर वन और विश्व गुरु बन जाने की काल्पनिक बातें।

पर न खत्म होगा कभी उनके आँख का आंसू,
भूख से बिलखते बच्चे,
दिन-रात काम करते हुए मजदूर की बातें।

हमेशा होंगी राजनीति की बातें,
न होंगी कभी तो बस वास्तविक बातें,
बुनियाद की बातें, इंसान की बातें।

इस दौर और उस दौर की बातें,
भरे हुए पेट में झूठ की बातें।
रचनाकार:इंजी. प्रदीप पटेल
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शनिवार, सितंबर 28, 2019

जीत का संघर्ष जीवन है:इंजी.प्रदीप पटेल

जीत का संघर्ष जीवन है

इंजी. प्रदीप पटेल 
अंधेरा है, अंधेरा है चिल्लाना जीवन नहीं है,
खुद बाती बनकर जलना जीवन है।

दूसरों को आदर्श बताना जीवन नहीं है,
जिन्हें हम दूसरों को बताते हैं उन आदर्शों को स्वयं जीना जीवन है ।

हार जीवन नही है,जीत जीवन नहीं है
जीत का संघर्ष जीवन है।

उंगली उठाकर मार्ग बताना जीवन नहीं है,
स्वयं मार्ग पर चलना और नए मार्ग बनाना जीवन है।

दुनिया को बदल देना, संसार को बदल देना

औरों में बदलाव लाना जीवन नहीं है।
स्वयं में बदलाव लाना जीवन है।

अपने विचारों को लेकर,
अपने कर्म और पुरुषार्थ  पर
अकेले रह जाओ तब भी,
संघर्ष करना, खड़े रहना, डटे रहना जीवन है।

रचनाकार:इंजी. प्रदीप पटेल

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...