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बुधवार, जनवरी 27, 2021

जाके पांव न फटे बिवाई, का जाने ते पीर पराई- ओम प्रकाश चौधरी

जाके पांव न फटे बिवाई, का जाने ते पीर पराई(कहानी)- ओम प्रकाश चौधरी   

 आज कुछ मित्र हमारे विभाग में आ गए बोले चौधरी साहब ठंड बहुत है,हीटर या ब्लोअर नहीं रखे हैं। कैसे इतनी ठंडक में कार्य कर रहे हैं? मैंने कहा कि मैं ठेठ गांव वाला जो ठहरा, मूलत: किसान हूं,कैसे भी रहने का अभ्यस्त हूं।असली ठंड देखनी हो तो हमारे गाँव में चलें, मैं इस कड़कड़ाती ठंढ की एक झलक दिखाता हूं।विगत कई दिनों से हाड़ कॅपा देने वाली कड़ाके की ठंढ पड़ रही है ।शहर और बड़े-बड़े महानगरों में,क्या कस्बों में भी रहने वाले लोग हीटर,गर्म हवा देने वाला ब्लोअर चलाकर रजाई और कंबल में दुबककर आराम से रात में सो रहे हैं और 26 - 27 नवंबर,2020 की रात से 60 से भी अधिक दिनों से लगातार दिल्ली सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन से लेकर ट्रंप - बाइडेन व देश-विदेश की चर्चा करने में मशगूल हैं।दिन में ऑफिस में भी हीटर आदि लगाए हुए हैं।दूसरी ओर भारत की एक बहुत बड़ी आबादी जो गावों में रहती है और उनका जीवन यापन खेती - किसानी पर ही आश्रित है।आज भी उनमें से एक तबका ऐसा है जो कि फटे-पुराने चद्दर/कंबल को ओढकर इस कड़ाके की ठंढ में भी रात भर जागकर भोर तक खेतों में गेहूं की सिंचाई कर रहा है,मिट्टी में पाहा मुठियाने के वक्त वर्फ़ जैसा ठंडा पानी हाथ की अंगुलियों को सुन्न कर देता है,संज्ञा शून्य हो जाती हैं, फिर आग जलाकर सेंकने के बाद ही उंगुलिया सीधी होती हैं, फिर गीली होकर वैसी ही हो जाती हैं,यह क्रम रात में कई बार दुहराना पड़ता है।उसकी मजबूरी है,क्योंकि रात में ही अक्सर बिजली आती है।इतने के बाद भी जब फसल थोड़ी तैयार होने लगती है तो छुट्टा पशु और नील गाय(सियार, साही,जंगली सुअर भी कभी कभार आ ही जाते हैं) पूरी फसल बर्बाद कर देते हैं।किसान दिन भर व रात में जागकर इन छुट्टा जानवरों से अपनी फसल की रक्षा के लिए तत्पर रहता है, फिर भी फसल चर ही जाते हैं।इसका अनुभव मुझे भी है घर (गांव)जाने पर रतजगा करना ही पड़ता है,अभी 23 जनवरी की रात 9.30 बजे बिस्तर में घुसकर अपने मित्र डॉ अनिल जी से बात कर ही रहा था कि सामने जौ के खेत में छुट्टा जानवरों का झुंड टूट पड़ा, मैंने मित्र से कहा कि फोन रखा जाय अब साड़ भागने जायेगे, बोले इतने ठंड में, मैंने कहा जी सर , और लाठी उठाकर भतीजे शिशिर को लेकर चल पड़ा, यह रोज की बात है, में तो केवल एक रात की बात कर रहा हूं।मेरे तो घर के बिल्कुल सामने ही खेत है,परन्तु विगत तीन वर्षों से मटर और अरहर की एक फली भी मिलनी मुश्किल हो जाती है।यही हाल मेरे ही नहीं लगभग सभी गांवों का है, कहीं - कहीं पर तो रखवाली के लिए युवाओं की टीम बनी हुई है।कौन कहता है कि बेरोजगारी है, दिन में खेत में काम, रात में जानवरों को भगाने का काम।इन सब कष्टों और मुसीबतों को झेलते हुए जब किसी तरह बची - खुची फसल तैयार होती है और कटाई के पश्चात खेत - खलिहान से घर आ जाती है,तो शुरू होता है उसे बेचने के लिए जद्दो- जेहाद।सरकारी क्रय केंद्रों पर अनाज बेचना कितना बड़ा काम है,इसका उल्लेख भुक्तभोगी ही कर सकता है।हमारे पड़ोस के गांव के एक किसान 3 रात और 4 दिन धान क्रय केंद्र पर रहे, तब कहीं जाकर धान बेच पाए। इसी में उनकी गेहूं की बुवाई में भी विलंब हुआ,और गन्ने की पर्ची भी घायल हो गई। मैं तो इस बार लगातार धान बेचने हेतु 5 नवंबर,2020 से लगा हुआ था, कि क्रय केंद्र कहीं नजदीक में स्थापित हो जाय, क्योंकि अभी जो सरकारी क्रय केंद्र है वह 12 किमी की दूरी पर है।फिर धान बेचने के फिर में पड़ा,जिला प्रशासन से सरकार तक पत्र लिखकर निवेदन किया,लेकिन सफलता नहीं मिली।अंत में थक - हारकर बिचौलियों को ही औने - पौने भाव पर खतौनी, पासबुक, आधार की प्रति देकर बेचना ही पड़ा।रुपया खाते में आएगा, आंकड़ा प्रस्तुत कर सरकार और सरकारी अधिकारी खुश होंगे कि इतने किसानों के खाते में ,इतनी धनराशि आई, लेकिन यह हम किसान ही समझ पाते हैं कि वास्तव में हमें मिला कितना,यह दर्द वही महसूस कर सकता है ,जिसने भुक्ता हो।किसानों को तो ऐसा ही जीवन व्यतीत करते हुए पूरा जीवन बीत जाता है।बच्चों की पढाई - लिखाई,इलाज,कपड़ा - लत्ता के लिए, उसके पास कुछ रहता ही नहीं है।ऐसे ही नहीं लोग किसानी छोड़ शहरों के तरफ भाग रहे हैं, गांव उजड़ रहे हैं,उसके पीछे सरकार की नीतियां भी हैं।बिहार प्रदेश में केंद्र सरकार की सहयोगी पार्टी जनता दल यूनाइटेड की सरकार है, उस दल के प्रधान महासचिव के सी त्यागी जी ने अभी 24 जनवरी को लखनऊ में माननीय मुख्यमंत्री योगी जी से मिलकर "किसान आंदोलन को जायज ठहराया और कहा कि केवल 18 से 20 प्रतिशत की खरीद ही एम एस पी से होती है।इसके बाद की सारी खरीद बाज़ार के हवाले है।वहां की लूट से किसानों को कैसे बचाया जाए, यह भी ध्यान देने की बात है"(हिन्दुस्तान, 25 जनवरी,2021)। ऊपर से यह किसान बिल जिसे किसान लागू ही नहीं होने देना चाहता है, और सरकार है कि उस पर जबरदस्ती थोप रही है, जो हम किसान लेना नहीं चाहते वह जबरदस्ती दे रही है। कड़ाके की ठंड में भी किसान सड़क पर डटे हैं, 78 किसानों की बलि इस आंदोलन को चढ़ चुकी है,अभी आगे क्या होगा अनिश्चितता के गर्भ में छिपा हुआ है,बड़ा दर्द है,मंजर खौफनाक है, अन्नदाता बेहाल है। शशि शेखर जी लिखते हैं कि हर रोज दो से ढाई हजार धरती - पुत्र अपनी मिट्टी छोड़कर दूर - दराज के शहरों में मजदूरी के लिए बाध्य हो रहे हैं।अगर मौजूदा व्यवस्था इतनी ही कारगर है, तो फिर हमारे गांव उजड़ते क्यों चले गए?(हिन्दुस्तान,17 जनवरी,2021)।लेकिन धरती पुत्रों का धैर्य काबिले तारीफ है,दर्जनों बार की वार्ता का दौर विफल रहा, आगे अभी फिर होगी।बड़े - बड़े भवनों,ऊँची-ऊँची इमारतों में रहने वाले लोग क्या जाने कि गाँव में रहने वाले लोग कैसे अपना गुजर-बसर करते हैं,जिनका एक मात्र पेशा कृषि ही है।यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है - "जाके पाँव न फटे बिवाई का जाने ते पीर पराई"।जोहार किसान!जोहार प्रकृति!
//रचना//
ओम प्रकाश चौधरी 
ग्राम - मैनुद्दीनपुर,जलालपुर, अम्बेडकरनगर
मो : 9415694678
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रविवार, जून 28, 2020

गुरु दक्षिणा(कहानी): राम सहोदर


    मथुरा निकट के ही शहर के एक कंपनी में मैनेजर था वह प्रतिदिन घर से अप डाउन किया करता था और दोपहर के भोजन के लिए साथ  टिफिन लेकर जाया करता था सुबह 9:00 बजे घर से निकल जाता और शाम 5:00 बजे तक ड्यूटी करने के बाद छः  7:00 बजे तक घर आ जाता और घर आते ही मां के सामने बडबडाने लगता क्या किया पिताजी ने? शिक्षक की नौकरी करते जीवन बिता दिया लेकिन न तो कोई ठिकाने का घर बनवाया और न ही अच्छा खासा जागीर ही बनाया जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके बस वही पुरानी झोपड़ी का घर और प्रत्येक माह खरीद कर खाना जवाब में मां कहती- बेटा क्या यही कम है कि तुम्हारा और तुम्हारे दोनों बहनों का लालन-पालन किया; पढ़ाया लिखाया फिर तुम यह भी जानते हो कि तुम्हारे दादा अधेड़ अवस्था में ही तुम्हारी दोनों बुआ की शादी का भार छोड़कर स्वर्ग सिधार गए तुम्हारे पिता ने अपने वेतन के भरोसे पर ही अपनी दोनों बहनों का विवाह किया साथ ही भाई की भी तीन लड़कियों के विवाह में भी पूरा सहयोग दिया फिर तुम्हारी सोचो कि वेतन भी तो कम ही मिलता है मथुरा मां के जवाब से खुश नहीं हुआ और वह गर्म होकर कहने लगा यही तो मैं भी कह रहा हूं कि यही पूरे परिवार का ठेका लिए हैं सारा वेतन परिवार वालों के योगदान में बिता दिया और उसका परिणाम यह मिला कि आज हम जहां भी जाते हैं वहां शर्मिंदा होना पड़ता है आने-जाने के लिए न कोई गाड़ी है न रहने के लिए ठिकाने का घर जिसमें किसी को बुला कर बैठा सकें मां बेटा की उलाहना चुपचाप सुनती रहती और सेवकराम के घर आते ही दोनों का संवाद भी रुक जाता मां बेटे का संवाद प्रतिदिन इसी विषय को लेकर चलता रहता मां बेटे को समझाने की कोशिश करती किंतु बेटे का गुस्सा अपने पिता पर बना ही रहता पिता की ईमानदारी और उपकारी कार्यकलाप से मथुरा हमेशा खिन्न रहता
   एक दिन मथुरा की मां ने सेवकराम से कहा- आज बेटा टिफिन लेकर नहीं गया उसके समय में भोजन तैयार नहीं हो पाया था इसलिए भोजन भी नहीं किया है आप उसी रास्ते से ड्यूटी पर जाते हैं तो टिफिन लेते जाइए बेटे को टिफिन देकर आप अपने स्कूल चले जाइए सेवकराम टिफिन लेकर कंपनी पहुंचे तब कंपनी के मेन गेट पर ही वाचमैन ने रोक दिया और बोला- आप यहीं रुक जाइये। अभी आप अंदर नहीं जा सकते सेवक राम ने कहा- देखो मैं जल्दी में हूं, टिफिन का डिब्बा अपने बेटे को देकर तुरंत आ जाऊंगा मुझे जाने दो वॉचमैन बोला - नहीं, आज कंपनी के संचालक महोदय आए हुए हैं जब तक वे नहीं चले जाते तब तक कोई भी अंदर नहीं जा सकता आपको इंतजार करना पड़ेगा तब तक आप यहीं बैठिये। सेवकराम चुपचाप वहीं पर बैठ गए बिना टिफिन दिए जा भी तो नहीं सकते थे
    कुछ समय बाद वाचमैन ने सेवकराम से कहा- अब आप यहां से भी हट कर वहां दूर बैठ जाइए क्योंकि संचालक महोदय जी आ रहे हैं आपको यहां पर देखेंगे तो मुझे डांट पड़ेगी सेवकराम और दूर जाकर बैठ गए कुछ ही क्षण में कंपनी के अंदर से एक कार आई और गेट पर आकर रुक गई बात यह थी कि कंपनी का मैनेजर (मथुरा) संचालक महोदय को गेट तक छोड़ने आया था। अब मथुरा (मैनेजर) कार से नीचे उतरा और संचालक महोदय को विदा करते हुए सलामी दे रहा था। तभी सेवकराम मथुरा को देख पास आ गया। पिता को सीधे-सादे पोशाक में देख मथुरा शर्मिंदगी महसूस कर मुंह फेर लिया और मन ही मन गुस्सा किया कि कहीं पिताजी संचालक के सामने न आ जाएं।  
     हुआ कुछ ऐसा ही सेवकराम तो संचालक के पास नहीं गए किंतु संचालक की दृष्टि उन पर पड़ गई और वे कार से नीचे उतर आए और सेवकराम की ओर बढ़े यह देख मैनेजर (मथुरा) निकट आ गया संचालक ने सेवकराम के पास पहुंचकर आदर पूर्वक चरण छुए और दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे-सर! आपने मुझे पहचाना मैं वही मनोज सिंह हूं जिसे आपने 10वीं, 11वीं और 12वीं में पढ़ाया था सर आप के आशीर्वाद से ही मैं आज इस मुकाम तक पहुंच पाया वैसे मैं बहुत ही बिगड़ा हुआ शैतान था उदंड नंबर वन था मेरे पिताजी मुझसे बहुत परेशान थे उन्होंने आपके पास आकर बहुत निवेदन किया था फिर भी आप मुझे ट्यूशन पढ़ाने को तैयार नहीं थे किंतु मेरे पिताजी के बार-बार निवेदन करने पर आपने मुझे पढ़ाना मंजूर किया था पिताश्री आपको ट्यूशन का फीस दे रहे थे लेकिन आपने बिना फीस लिए ही पढ़ाया था आपने साफ शब्दों में जवाब दिया था कि मैं ज्ञान बेचता   मुझ पर आपका भारी एहसान है
      फिर कंपनी के कार्यालय में ले गए और आराम से बैठकर काफी देर तक संचालक अपने गुरु का हाल समाचार पूछते रहे और बोले- गुरु जी, क्या आप अभी उसी घर में रह रहे हैं या घर बदल गया गुरुजी बोले-बेटा वही है मेरा आवास। उसे छोड़कर कहां जाऊंगा संचालक कहने लगे- आपने उस वक्त मेरे पिताजी से बिना शुल्क के लिए ही मुझे ज्ञान दिया था लेकिन अब मैं गुरु दक्षिणा देकर आप से उऋण होना चाहता हूं कृपा कर मुझे ऋण से मुक्त कर दीजिए सेवकराम कहने लगे-बेटा कोई ऋण नहीं है तुम पर मैंने तो अपना फर्ज निभाया था जो मेरा कार्य था वही किया था इतनी बातचीत होने के बाद संचालक चले गए और सेवकराम भी  देकर अपने गंतव्य को चले गए
       -गुरु जी यह छोटी सी भेंट स्वीकार कीजिए सेवक राम ने पेपर पढ़ा जिसमें मनोज सिंह ने शहर में बना हुआ सुंदर सुसज्जित बंगला गुरु जी के नाम कर दिया था और विधिवत स्टांप पेपर पर लिख दिया था गुरुजी कुछ कहते इसके पहले ही मनोज सिंह ने गुरु जी के पैर पकड़कर विनम्र निवेदन किया कि गुरु जी अब इसे आप इंकार ना कीजिए मैं आपका एहसान नहीं चुका सकता आपके ऋण  से कभी मुक्त नहीं हो सकता कृपा कर यह तुच्छ भेंट स्वीकार कर लीजिए अंततः  सेवकराम को स्वीकारना ही पड़ा
     यह देख बेटा मथुरा पिता के चरणों में गिर पड़ा और भावुक होकर पिताजी से माफी मांगने लगा और बोला-पिताश्री आज मुझे मालूम हो गया कि आपने क्या कमाया है मैं आपका बेटा बनकर धन्य हो गया आपके कारण मेरा कंपनी में वेतन भी बढ़ गया और सम्मान भी अब मैं सब कुछ पा गया 

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मंगलवार, जून 23, 2020

कठपुतली चढ़ी हिमालय (व्यंग्य) - डी.ए.प्रकाश खाण्डे



संसार में ऐशो आराम करने के लिए बहुत सारा सामान घर में ठूँस-ठूंसकर भर लेते हैं  और दिनों दिन भरते जाते हैं। मानव अपने जीविका के लिए तरह-तरह की योजना बनाता है, कुछ में उसकी पूंजी ही डूब जाती है, बस प्रयत्न ही करता रहता है। छोटी-सी दु कान को गली-गली, बाजार, मेले आदि में ले जाकर बैठे रहना आदत हो जाती है। यह उस व्यक्ति की मजबूरी है, जो जहाँ भी मेला लगता है; वहाँ की जनता बेसब्री से इन्तजार करती  रहती  है कि  मेला आये और हम आंनद उठायें, कुछ सामान खरीदें।

मेला ऐसा माहौल है जहां लोग पैसो में नहीं भावनाओ में जल्दी बंध जाते हैं। मेले में हर तरह के व्यक्ति जाते हैं। जिनकी मनोवृत्ति दास प्रवृत्ति की होती है फिर उनका क्या कहना? मेले का सारा सुख भोगने का अवसर उन्ही को मिलता है। मेले में अधिकतर कलाकार जाते हैं जिनको अपनी कलाओं  के प्रदर्शन करने का अवसर प्राप्त होता है तथा वे अपने कला को पुष्ट करने हेतु आवश्यक चीजें भी खरीदते हैं। मेले का दृश्य अतिसुन्दर था, विविध क्षेत्रों की वेश-भूषा, कलायें  और मनमोहक प्रस्तुतियां जिसे देखकर मन प्रसन्नता का  गोता  लगाता रहता है। मेले में कलाकार भी अपने मित्र मंडली के साथ घूम रहे थे, हर दुकान पर जाकर सामान देखते थे।

मेले के अंतिम छोर में एक सजी-धजी दुकान देखकर कलाकारों की आँखे रुक गई। छाँटने लगे सस्ती-महंगी  वस्तुएं। कोई हल्की  है पर मोल ज्यादा है, कोई वजनी है पर कोई काम का नहीं है। सारा दिन एक ही दुकान में खपा दिए। बेचारा दुकानकार भी परेशान था कि  इन वस्तुओं को बहुत दिनों से रखा हूँ कोई पसंद नहीं करता है। दुकानदार अपनी वस्तुओं  पर भी खिसियाता रहा कि इनको कैसे करके बेचूं । वस्तुएं भी एक दूसरे से टकराकर टूट रही थीं जैसे कि दुकानदार इन पर कोई ध्यान नहीं देता हो। कलाकारों ने पहले से तय किया था। सभी लोग ऐसी चीजें खरीदेंगे जो हमारे बस में रहे। जिसको हम नचा सकें। और एक ही दुकान से खरीदेगें। सभी ने वस्तुएं पसंद की और मोल-भाव तय करना शुरू कर दिया। यहाँ दुकानदार भी अपनी जवाबदारी से हटना चाहता था, उसका ध्यान इधर-उधर होता रहता था। दुकान की  प्रत्येक वस्तुओं पर निगाहें दौड़ाये, प्रत्येक वस्तुओ को उल्टा-पलटाकर देखे। परन्तु पट नहीं पा रहा था, दुकानदार भी परेशान हो गया। कलाकार संसार में ऐशो आराम करने के लिए बहुत सारा सामान घर में ठूँस-ठूंसकर भर लेते हैं और दिनोंदिन भरते जाते हैं। मानव अपनी  जीविका के लिए तरह-तरह की योजना बनाता है, कुछ में उसकी पूंजी ही डूब जाती है, बस प्रयत्न ही करता रहता है। छोटी सी दुकान को गली-गली, बाजार मेले आदि में ले जाकर बैठे रहना आदत हो जाती है, यह उस व्यक्ति की मजबूरी है। जंहा भी मेला लगता है; वहाँ की जनता बेसब्री से इन्तजार करती  रहती  है कि  मेला आये और हम आंनद उठायें, कुछ सामान खरीदें। कलाकारों ने ऐसी वस्तु ख़रीदी कि दुकान ही खाली पड़ गया, सबने कठपुतली ही ख़रीदी। कठपुतली इसलिए ख़रीदी थी कि  हम कम आंनद लेंगे  हमारा परिवार ज्यादा मजा उड़ायेगा।

कलाकारों ने कठपुतली को इस तरह से पकड़कर अपने मजबूत बैग में रखा  कि  मजाल किसी का कि देख सके। कठपुतली इतनी सुन्दर थीं कि हर किसी का ध्यानक चला  ही  जाता था। जब मेले  से घर आ रहे थे; रास्ते में एक नदी है; उसमें  सभी कठपुतलियों को श्रृद्धापूर्वक स्नान कराया ;चरण वंदना की; इसके बाद उनका मोह बढ़ता ही गया,घर लाकर सभी साथियों ने कठपुतलियों की सेवा खुशामद की, उनको तरह-तरह से सजाया  और आरती भी उतारी   पूरे र गाँव में तमाम हल्ला हो गया कि " मेले  से भगवान लाये हैं, लोगों  को दिखा भी नहीं रहे थे कि कहीं नजर न लग जाए ।

कठपुतली खरीदना और नचाना भी एक कला है जो हर किसी के पास नही होती है। कलाएं भी मनुष्य को महान बना देती है, जैसे-जैसे कला का विकास होता जाता है, वह चतुर और चालाक होकर कहता है - हम जादूगर हैं किसी को भी वश में कर सकते हैं । खेल ख़त्म होते ही अपना बयान बदल देता है और कहता यह कोई जादू नही हैं, ये तो हाथों की सफाई है। अब एक कलाकार धंधे में निकलता है और अपनी कला से कठपुतली का  सौभाग्य बदलता है। कलाकार पहले दुनिया की लम्बी-चौड़ी बातें करता है, दर्शकों की मानसिक स्थिति का अध्ययन करता है फिर अपना खेल शुरू करता है। खेल ख़त्म होते ही कलाकार पैसे पाकर खुश और दर्शक क्षणिक आंनद एवं पैसे लुटाकर खुश। कठपुतली नाच-नाचकर खुश होते जा रही है, कितने सौभाग्य की बात है, मानो उसमे श्रृद्धापूर्वक प्राण प्रतिष्ठा के मन्त्र फूंक दिया गये हैं जिससे वह इस तरह से समर्पित  होकर अपने और अपनो का मोह ही ख़त्म कर दी है। कलाकार भी अजीब है; कठपुतली से स्नेहपूर्वक व्यवहार करता है जबकि जानता है कि  यह  निर्जीव है; अपनी सजीवता को खो चूका है। इसके मूल में जो प्राण था; विकास था वह नष्ट हो गया है, फिर भी चंचल है,थोड़ी सी फूंक मारो उड़ने लगती है। कठपुतली हलकी लकड़ी से बनती है तभी तो शिल्पकार किसी भी भाग में तरासकर उसे रूप देता है। कलाकार और कठपुतली दोनों की एक ही राशि है, दोनों के मधुर सम्बन्ध हैं। कहते हैं कि जो जिसकी संगति करता है उसके गुण आ जाते हैं, यहां पर कठपुतली ना तो कलाकार बन जाती है; ना कलाकार कठपुतली हो जाता है। कलाकार कठपुतली नचाता है जब तक कठपुतली टूट न जाए, ख़त्म होते वह दूसरी कठपुतली खरीद लेता है। कलाकार इसी कला के दम पर कई पीढ़ी से जी रहा है और कठपुतली अपनी  सजीवता से अलग होकर दर-दर नाचती है,निर्जीव अपने  अस्तित्व को क्या समझेवह केवल नाचना जानती है;उसे ऊंच-नीच का कोई ज्ञान ही नहीं है। जिसके स्वभाव में बारम्बार गिरना ही लिखा है उसको एक बार चढ़ने का सिर्फ ख्वाब दिखा दो वह आसमान का तारा तोड़ सकने में समर्थवान बन जाता है। मुहावरा के अनुसार ही एक दिन सरेआम कलाकार  ने कठपुतली को हिमालय चढाने की बात कर देता है,कठपुतली भी कलाकार के कला पर सिर हिलाकर सहमत हो गई। कठपुतली;ख्वाब लेकर जैसे ही हिमालय की सफर शुरू करती है कि  दुनिया में त्राहि-त्राहि मच गई, रास्ते के सारे मुर्दे हंसकर खड़े हो गए और कठपुतली को अपना दर्द बयान किये। जब व्यक्ति दूसरे का दुःख-दर्द देखता है तो अपना दुःख याद करके रोने लगता है। ठीक इसी प्रकार कठपुतली की हालत देखकर मुर्दे रोकर समझाते हैं-
हम भी चढ़े थे हिमालय, मन में कुछ अभिमान थे।
एक तरफ थी खाइयां, एक तरफ श्मशान थे ।
ये कठपुतली ज़रा संभल के चलना, हम भी कभी इंसान थे।
हम लोगो ने भी यही गलती की  थी  जिसकी सजा भोग रहे है। काटों को घिसकर माथे पर लगाने से विद्वान् नहीं बन जाते हैं, विखंडन होना महानता नहीं है, अपनी  पीढ़ी का ख्याल रख। तुम्हारे सौभाग्य जीवन की हमें आशा-विश्वास सताएगा फिर भी पतली सुखी लकड़ी के सहारे चढ़ना चाहते हो तो कर्तव्यपूर्वक चढ़ो परन्तु उतरने का भी ख्याल रखना नहीं हमारे जैसे राह में मिलोगी या हिमालय में ही गला दिए जाओगे ।कठपुतली के मन में हिमालय चढ़ने की प्रवलता बढ़ते ही जा रही थी ,पौराणिक कथाओं का भी जिक्र करते हुए मुर्दे ने कहा विभीषण अपने स्वार्थ के कारण कुलद्रोही कहलाया । अपने वंश का नाश करके थोड़े ही समय तक पृथ्वी में सुख भोगने के कारण विभीषण की पीढ़ी समाप्त हो गया । युगों-युगों से हिमालय में चढ़कर गल जाने की परम्परा को स्वीकार करते हुए कठपुतलीअपने को सौभाग्यशाली समझकर हिमालय चढ़ने की हठधर्मिता से विमुख नहीं हुई । इधर दुनिया में कोहराम मच गया की कठपुतली अब फतह की परचम लहराने वाली है । कुछ मदारी भी डमरू की रागअलाप रहे थे,की हमारा खेल ख़त्म हुआ ।ईश्वर की क्या माया है;आधा धूप आधी छाया है, कहावत को लेकर कठपुतली हिमालय के निकट पहुँच गई । रास्ते में रो-रो कहा उसके पाँव के छालों ने,हिमालय जाने नहीं देते राह के दलालो ने । रवि अस्त होते आसमान में चित्ते पड़ते हुए दिखाई देने लगा;मानो आकाश अपनी वेदना को प्रकट कर रहा है, वस्तुतः प्रकृति ने अपनी प्रवृत्ति को सदा की तरह संयमित रखने की उम्मीद पर कुछ कलाये प्रस्तुत की है । कठपुतली कलुष कालिमा को देखकर खामोश रह जाती है,ह्रदय का जख्म आँखों में उतर आयी,अरमानो की अर्थी उठने लगी,भावनाएं जमकर इस्पात हो गई और उम्मीद पर वेडिया लग गई । रास्ता कंटकमय  हो गया, हवाएं विपरीत चलने लगी,विपत्तियों के बादल मडराता जा रहा था पर कठपुतली हिम्मत नही हार रही थी । कठपुतली को नाचने का अभ्यास रही है इसलिए वह कहीं भी पाँव रख लेती थी,गिरती नहीं थी । कहते हैं की जो कई बार किसी राह से गुजर जाए तो वह अँधेरे में भी चलेगा तो उसके पाँव सही जगह पर ही मढ़ता है । कठपुतली को चलते रात हो गई फिर भी उसके पाँव जमते ही जाते थे और अंततः शिखर तक पहुंच ही गई ।
डी.ए.प्रकाश खाण्डे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,जिला -अनूपपुर म.प्र .


शनिवार, जून 20, 2020

जीवन है अनमोल: अजीत पटेल "सोनू"

जीवन है अनमोल 
मैं एक प्राइवेट फाइनेंस कम्पनी में काम करता हूँ। मेरा काम है लोगों को जरूरत के समय ऋण देना और समय पर वसूली करना। यही आज से 10 वर्ष से कर रहा हूँ।। सुबह 7 बजे आफिस, फिर लोन अप्रेजल, लोन डिसवर्ष, ऋण वसूली। शुरू- शुरू में मुझे बहुत अच्छा लगता था, और लगे भी क्यो न मुझे दिन भर बाहर घूमना, तरह-तरह से लोगों से मिलना, उनसे बातें करना कालेज टाइम से ही पसंद था, लेकिन समय के साथ-साथ यह सब बोरिंग लगने लगा। कहीं लगता यह जॉब छोड़ दूँ, कहीं लगता कुछ नया शुरू करूं। यही सब सोचते-सोचते अब बहुत वक्त हो गया। अब ऐसे हालात में था कि कुछ नया करने का साहस ही नहीं बचा। अब इस उम्र में नया रिस्क नहीं ले सकता था। सब ऐसे ही चल रहा था घर से आफिस, फिर फील्ड, ऋण वसूली।

एक दिन हेड आफिस से फोन आया कि आप अपना टारगेट पूरा करिए या तो घर जाइए। हम ऐसे कामचोर ऑफिसर को नहीं रख सकते। मेरे मन में बहुत ज्यादा खीझ हुई। मुझे ऐसे कैसे बोल सकते हैं? मैंने इस कम्पनी के लिए क्या-क्या नहीं किया? सुबह के 07 बजे से रात के 11 बजे तक लगा रहा। जब से यहाँ नौकरी की, तब से कभी भी 10.30 से पहले घर नहीं गया, डेली कलेक्शन, सेम डे रजिस्टर, बैंक रजिस्टर, लोन एप्रूवल, कैश मैच और आने वाले दिन का प्लान इन सब के बिना तो कभी छुट्टी हुई ही नहीं। साथ में हप्ते के पूरे सात दिन, कभी तिथि- त्यौहार में घर नहीं गया, एडवांस कलेक्शन के बाद ही जाना है नहीं तो नहीं जाना है। और ऐसा भी नहीं है कि मेरा टारगेट हर बार छूटा है, लेकिन इस महीने तबियत कुछ ज्यादा ख़राब रही तो नहीं कर पाया तो क्या कोई ऐसे बात करेगा? आज तक जो किया क्या वो कुछ नहीं ? ऐसे ही सवाल दिमाग में घूम रहा था। मैंने अपना काम ख़त्म किया और घर की ओर चल दिया पर अचानक आज मेरी गाड़ी अहाता की ओर चल पड़ी। जबकि मैं आज तक कभी नहीं गया। ऐसा नहीं था कि इसके पहले मैं कभी पिया नहीं लेकिन सिर्फ कभी-कभी, जब दोस्तों ने जबरदस्ती की। पर आज दिमाग में बहुत उथल पुथल चल रहा था। मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। मुझे मर जाना ही ज्यादा आसान लग रहा था। उसी अहाता के कोने में बैठे हुए मुझे 2 घण्टे हो गये। मुझे खुद पता नहीं चला कब 12 बज गये। जैसे-तैसे मैं रात के 01 बजे घर पहुंचा। दिमाग में बार-बार मरने का ख्याल आ रहा था। एक बार तो मैंने गले में फंदा भी लगाया, लेकिन नहीं कर पाया। दिल बहुत जोर से धड़कने लगा। सामने टीवी में कोई मूवी चल रही थी। मैं वहीं बैठ गया और देखते देखते सो गया। सुबह जब नींद खुली तो 10 बज चुके थे। आज पहली बार मुझे इतना लेट हुआ। मोबाइल देखा तो 50 मिस काल। मैंने अपने सुपरवाइजर को बताया आज नहीं आ पाऊंगा। मेरी तबियत ठीक नहीं है, फिर मैं उठा और कुछ नास्ता और चाय बनाया फिर मेरा ख्याल कल के बारे में सोचने लगा। तभी उस मूवी के कुछ सीन याद आये जो मुझे दिलचस्प लगे। मैंने बाजार से उस सीडी कैसेट को लाया। उस मूवी का नाम था छिछोरे। मैंने एक बार बैठ कर वह मूवी खत्म की, उसके बाद यह सोचा मैं कितना बेबकूफ हूं जो यह ज़िन्दगी खत्म कर रहा था। वहीं से मुझे ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली और फिर मैं अगले दिन सुबह 7 बजे तैयार होकर आफिस गया। वहां सभी से मिला सबसे बातें की उसके बाद मैंने अपने सुपरवाइजर को अपना इस्तीफा दे दिया। उसके बाद घर आया और अपना खुद का कूरियर कम्पनी शुरू किया। शुरू में बहूत ज्यादा परेशानी हुई लेकिन आज के समय मेरे 5 फ्रंचाईजी हैं और अब मैं बहुत खुश हूं। एक पोइंट  मैं  मरना चाहता था लेकिन अब मैं कम से कम 20 लोगों को रोजगार देता हूँ।

मोरल - जब भी हम कभी बहुत ज्यादा है हताश हो जाते हैं। उस वक्त कोई भी गलत क़दम न उठाए। वो भी वक्त है, निकल जाएगा। लेकिन ज़िन्दगी बहुत अनमोल है। हमारी एक ज़िन्दगी से न जाने कितनी जिन्दगियां जुड़ी हुई है, इसलिए जब भी आपको लगता है कि अब सब कुछ खत्म है, उस वक्त आप मूवी देखें, पुस्तकें पढ़ें, करीबी लोगों से बात करें लेकिन कोई भी गलत कार्य न करें।
(स्वरचित)
अजीत पटेल" सोनू"
सचिव- जन कल्याण युवक मंडल झांपर

गुरुवार, जून 18, 2020

उधारी (लघुकथा) --डी.ए.प्रकाश खाण्डे

उधारी (लघुकथा)

    
आज सुबह से ही बारिस हो रही थी .....। मंहगू जैसे ही बिस्तर से उठता है; वह अपने खाली खेतों के बारे मे सोचने लगता है। तब तक उसकी पत्नी बरामदे में झाड़ू लगा चुकी थी और रसोई घर की ओर बढ़ती है।  मंहगू को देखकर जोर से आवाज लगाती है-"सोये रहोगे! आषाढ़ आ गया है।"  मंहगू झट से तैयार हुआ और रात का बचा हुआ भोजन खाकर मन ही मन सोंचता है-''अब आषाढ़ लग ही गया है, खेत में धान का थरहा रख देना चाहिए।"  यह विचार करते हुए; अपनी गरीबी को छिपाते हुए दुकानदार के पास जाता है, चारों तरफ किसानो की  भीड़ लगी  हई  थी । आज के समय में देशी धान बोने  के वजाय हाइब्रिड धान का प्रचलन तेजी से हुआ है, मंहगू का मन भी हुआ कि  इस वर्ष हाइब्रिड धान की रोपाई करना है पर लाकडाउन की  वजह से कहीं मजदूरी नहीं कर पाया था जिसके कारण उसके पास धान बीज खरीदने के लिए पर्याप्त रूपए नही थे। मन में अपने मेहनत पर भरोसा करके इस वर्ष अच्छी पैदावार करने की सोंच को सकारात्मक करते हुए, दुकानदार से २० किलो हाइब्रिड धान मांगा, दुकानदार मंहगू के हाव-भाव को देख कर प्रसन्न हो रहा था। दुकान पर बीज खरीदने वाले किसानों की  भीड़ लगी  हई  थी, सब नकद धान बीज ले रहे थे और दुकानदार दे भी नही रहा था।  मंहगू के 20 किलो धान की कीमत 250 रुपये किलो की दर से 5000  रुपये हुआ।  मंहगू अपने जाकिट के खीसा से 2000 रुपये निकाल कर दुकानदार को देता है और विनम्रता से कहा-शेष फसल काटने के बाद।  दुकानदार मुस्कुरा कर कहता है-आप धन्य हैं। दुकान पर सभी किसान उधारी देखकर दंग रह गए। दुकानदार मंहगू से कहता है-"उधारी का मतलब ये नही कि आपके पास रुपये नही है, मतलब ये नही की आप मजबूर हैं, मतलब ये नही की मैं सिर्फ नकद बेचता हूँ । उधारी का मतलब है कि -आप कितना सक्षम हैं, आप में विश्वास, ईमानदारी, वचन की कीमत और प्रतिष्ठा कितनी है।  मंहगू धान बीज पाकर; दुकानदार के लिए प्रकृति से प्रार्थना करता है। हे! परमात्मा, इस दुकानदार का व्यापार अच्छा फले-फूले।
दुकानदार, मंहगू को अंत में कहता है- "हे! अन्नदाता; आप जैसे वचनधारियों के कारण ही मेरा व्यापार चलता है।

डी.ए.प्रकाश खांडेकर, शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़ अनूपपुर म.प्र .

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...