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बुधवार, मई 13, 2020

ग़ज़ल: बलजीत सिंह बेनाम


ग़ज़ल
कभी इन्सां है क्या समझा नहीं था
ख़ुदा  को  इसलिए   पाया नहीं  था

हमारा  प्यार रूहों  का  मिलन  था
फ़क़त जिस्मों तलक़ फैला नहीं था

बिताई उम्र सारी मुफ़लिसी में
मगर ईमाँ कभी बेचा  नहीं था

अता की बज़्म को जिसने बुलन्दी
उसी  का   बज़्म  में चर्चा नहीं था

परखने पर  निराशा हाथ आती
ज़रूरत पर तभी परखा नहीं था


रचना:
बलजीत सिंह बेनाम
जन्म तिथि:23/5/1983
शिक्षा:स्नातक
सम्प्रति:संगीत अध्यापक
उपलब्धियां:विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित सम्पर्क सूत्र: 103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी, हाँसी 
मोबाईल नंबर:9996266210
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मंगलवार, अप्रैल 21, 2020

इश्क़ की बात करते हैं:अमलेश कुमार

●इश्क़ की बात करते हैं●

घरों में क़ैद होकर भी इश्क़ की बात करते हैं
वो हमें याद करते हैं, हम उन्हें याद करते हैं।

अँधेरा हटेगा सुबह होगी फिर दीदार होगा
एक दूसरे की सलामती की फरियाद करते हैं।

ख़ौफ़ मर्ज़ का है पर ख़्वाबों में ज़ोर नहीं इसका
हम नींद की गहराइयों में ही मुलाक़ात करते हैं।

क़यामत की धुंध में खोना मुमकिन नहीं हमारा
हम मोहब्बत वाले हैं, ख़ुद को चराग़ करते हैं।

-अमलेश कुमार
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मंगलवार, नवंबर 05, 2019

सुरेन्द्र कुमार पटेल की ग़ज़ल


1. 

बात करना अदब से सीखा नहीं है,
झुक जाए नजर वो बेअदब सीखा नहीं है।

खड़ी होती बंगले में गाड़ियां लूट की,
लूट से वो बंगला अभी खरीदा नहीं है।

कुर्सियों का मोह किसे होता नहीं,
कुर्सियों का खरीदना अभी सीखा नहीं है।

मंजिलों के करीब होती मंजिलें मेरी भी,
लोगों के मन का मंदिर गिराना अभी सीखा नहीं है।

फक्र होता है बहुत अपनी मुफलिसी पर, 
चाल-ढाल असामियों-सा अभी सीखा नहीं है।

देखता हूँ लोगों की थाली से रोटी छीनते लोगों को,
कुत्तों की तरह हिस्सा बांट करना अभी सीखा नहीं है।


पाप की पूंजी जमा करने का हुनर आ तो गया,
माँ-बाप के पुण्य का घड़ा अभी रीता नहीं है।


2.


हर काम मुकम्मल हो, यह जरूरी तो नहीं.
कोशिशों की हार हो, यह जरूरी तो नहीं.

अपना तो काम है सफ़र पर सिर्फ चलना, 
हर बार मंजिलें मिलें, यह जरूरी तो नहीं।

किसान ने बोया है बीज, न जाने किसके भरोसे।
दे ही देगी मुआवजा सरकार, यह जरूरी तो नहीं।

निशाना लगाने का हक़ फ़क़त है शिकारी
खाली नहीं जाएगा वार, यह जरूरी तो नहीं।

माटी को देता है थाप चाक पर कुम्हार,
कुछ जाएगा नहीं बेकार, यह जरूरी तो नहीं।

अनजानी राहों पर चलने का मज़ा ही अलग है
सिर्फ मंजिलों के लिए चलें, यह जरूरी तो नहीं।

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...