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शनिवार, जनवरी 17, 2026

जब बेजुबान बोलेंगे

जब बेजुबान बोलेंगे

कभी-कभी तंत्र को देखकर विस्मय होता है, यह कैसा तंत्र है — जो ख्याली बातें करता है, डींगे हांकता है, पर जिम्मेदारियों से भागता है। कुछ हद तक उन लोगों में मैं भी शामिल हूं, क्योंकि अगर उनकी तरह न रहूं — तो उनके बीच सांस लेना भी कठिन हो जाए। वे चटकारे लेकर बातें करते हैं, हंसी उड़ाते हैं उन पर, जो जिम्मेदारी की कुर्सियों पर बैठे हैं, और खुद कुछ करना नहीं चाहते। जब बात आती है अपनी जिम्मेदारी की, तो वे चुप कराने लगते हैं उन्हें — जो सवाल उठाते हैं। वे एक घेरा बुनते हैं अपने चारों ओर, जहां सवाल उठाने वाले ही कटघरे में हों, बोलने न दें उन्हें, सवाल करने न दें उन्हें।
ऐसे हाल में भला परिवर्तन आए कैसे? पर यह स्वाभाविक है — क्योंकि यह लड़ाई है बेजुबानों की, उन मेहनतकश लोगों की जो खेतों में पसीना बहाना जानते हैं, कारखानों में काम करना जानते हैं, पर बोलना नहीं जानते। उन्होंने माना ही नहीं कि बोलने से कुछ होता है, वे जानते हैं — करने से होता है। और इसलिए जो उनके लिए बोलता है, उसे चुप कराना ज़रूरी समझा जाता है। क्योंकि जिस दिन ये बेजुबान बोलेंगे, उस दिन आज के बोलने वालों की लंका लग जाएगी। इसलिए बोलने वालों को पटाया जाता है, और जो पट नहीं सकते — उन्हें मिलता है अपमान का इनाम, और दुत्कार का सम्मान।

रचनाकार

सुरेन्द्र कुमार पटेल

ब्यौहारी, जिला शहडोल

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शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

जब मनुष्यता भूल जाती है: कविता

जब मनुष्यता भूल जाती है



एक मनुष्य है —
जिसे बार-बार बताना पड़ता है,
क्या अर्थ होता है
मनुष्य होने का।

शिक्षक समझाते हैं,
संत पुकारते हैं,
माता-पिता दोहराते हैं —
कि हम सिर्फ़ शरीर नहीं,
हम संवेदना हैं।

पर कुछ लोग —
कभी नहीं सीखते।
वे नियम तोड़ते हैं,
सेतु जलाते हैं,
और दिखा देते हैं —
कि पशु अभी भी
हमारे भीतर जीवित है।

प्रकृति मुस्कराती है —
वह जानती है अपने बच्चों को।
वह डोर खींचती है,
और हम नाच उठते हैं
उसी पुराने पागलपन में।

हम दीवारें बनाते हैं,
वह उन्हें गिरा देती है —
हमारे ही हाथों से।

अब वह पशु
जंगलों में नहीं,
कुर्सियों पर बैठा है,
सूट पहनकर, आदेश देता है।

वे संस्थाएँ —
जो बनी थीं रक्षा के लिए,
अब बन गई हैं नियंत्रण के औज़ार।
जो क़ानून बराबरी के थे,
अब कुछ की सुरक्षा के हैं।

बाकी सब —
परिश्रम की चक्की में
हर दिन पिसते रहते हैं।

और मैं सोचता हूँ —
क्या प्रकृति जीत गई?
क्या उसने बस
हमारे भीतर छिपकर
अपना राज चलाया?

क्योंकि आज भी,
सभ्यता के आवरण में ढँका,
मनुष्य वही है —
जो कभी जंगलों में था।

सभ्य दिखते हैं,
पर जंगली हैं भीतर।
हम आज भी वही हैं —
बस रूप बदल गया है।

✍️ रचनाकार — सुरेन्द्र कुमार पटेल ब्यौहारी, जिला शहडोल
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शनिवार, फ़रवरी 18, 2023

तनावमुक्त जीवन कैसे जियें?

तनावमुक्त जीवन कैसेजियें?

तनावमुक्त जीवन आज हर किसी का सपना बनकर रह गया है. आज हर कोई अपने जीवन का ऐसा विकास चाहता है जिसमें उसे कम से कम तनाव का सामना करना पड़े. आज हर किसी के सामने यह प्रश्न है कि तनावमुक्त जीवन कैसे जियें?

तनावमुक्त जीवन जीने के लिए जरूरी है कि हम अपने जीवन का उचित प्रबंधन करें. सही समय पर सही निर्णय लें. अपने जीवन शैली को समयानुकूल बदलते रहें. अपने कर्तव्यों का उचित निर्वहन करें.  लोगों के साथ उचित भावनात्मक सम्बन्ध बनाकर रखें. जीवन निर्वाह के लिए उचित रोजगार चुनें और भविष्य के लिए कुछ योजनाएं सुरक्षित रखें.

तनावमुक्त जीवन की कल्पना अपने आप में कभी न सुलझने वाली पहेली है. क्योंकि किसी का भी जीवन पूर्णतः तनावमुक्त नहीं होता. जीवन में तनाव का होना केवल समस्याओं के होने अथवा न होने से जुडी हुयी बात नहीं है बल्कि जीवन का तनाव समस्या की प्रकृति और उसके प्रति हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर है. और यही तनावमुक्त जीवन की कुंजी भी है. हम समस्या की प्रकृति को पहचानकर और उसके प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव करके तनाव का उचित प्रबंधन कर सकते हैं. अतः मूल सवाल कि तनावमुक्त जीवन कैसे जिएं को एक दूसरे प्रश्न से प्रतिस्थापित कर सकते हैं और वह प्रश्न यह है कि हम अपने जीवन के तनाव का प्रबंधन कैसे करें?

क्या हम इस आलेख को इस प्रश्न से आगे बढ़ा सकते हैं कि हमें तनाव क्यों होता है? निश्चित रूप से  इस प्रश्न का उत्तर हर किसी के लिए एक-सा नहीं होगा. सबसे पहले यह पहचानने की जरूरत है कि हमें तनाव क्यों होता है? अथवा इस बात की भी खोज की जा सकती है कि किन परिस्थितियों में हमें अधिक तनाव होता है. एक बार तनाव के क्षेत्र की पहचान होने पर हम आसानी से तनाव का प्रबंधन कर सकते हैं.

जब भी हम तनाव के प्रबंधन की बात करेंगे तो एक बात बहुत सामान्य होगी और वह यह है कि उस काम का अथवा उस तरीके का जिससे तनाव पैदा होता है, उसका कोई दूसरा विकल्प मौजूद है या नहीं? और यह संसार इतना अद्भुत है कि दूसरा तरीका होता ही है. सबसे मजेदार बात यह भी है कि यदि हम स्वयं अन्य विकल्पों के बारे में विचार नहीं करें तो भी समय और परिस्थिति के बदलते ही अन्य विकल्प स्वतः ही उभर आते हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जिस समस्या का समाधान बहुत मुश्किल दिखाई पड़ता था, उसका बहुत आसान समाधान निकल आता है. किन्तु हमें हमारी जरूरत के मुताबिक समाधान चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि हम स्वतः ही अन्य विकल्पों की तलाश करें.

मुस्कुराने का नाटक करें. हाँ, यह बेहूदा लगता है कि हमें कोई नाटक करने के लिए कह रहा है. परन्तु यह सच है कि हमारा जीवन नाटकों से भरा है. नाटक क्या है? पर्दे के सामने लगातार घटनाओं का और घटना के अनुसार लोगों की भाव-भंगिमा का बदल जाना ही तो नाटक है. क्या हर रोज हम यही नहीं करते? हाँ, हमारा वह नाटक बाकी लोगों के साथ एकरूप हो गया है इसलिए अलग समझ नहीं आता और इसलिए हम उसे नाटक कहलवाना पसंद नहीं करते. मुस्कुराना जबकि हम बहुत तनाव में हों, तनाव से बाहर निकल आने का एक तात्कालिक उपाय है.

अपनी ड्यूटी निभाएं. सही समय पर काम का निष्पादन नहीं करने से जिन्दगी में परेशानियाँ बढ़ जाती हैं. हम मानव हैं. अन्य लोगों के प्रति हमारी कुछ जिम्मेदारियां हैं. उनका समय पर निर्वहन नहीं करने से हमारे अवचेतन में द्वंद्व पैदा होता है. हमारा मन बार-बार हमें हमारी जिम्मेदारियों का स्मरण कराता है और जिम्मेदारियों की तुलना में हमारे किए गए कार्य का मूल्यांकन करके मौजूद अंतर का हमें आभास कराता है. इसका आभास ही हमारे तनाव का कारण बन जाता है. अतः समय रहते अपनी जिम्मेदारियों को पहचानें और उसका निर्वहन करने में आरम्भ से ही तत्परता दिखाएँ. अक्सर कई लोगों से यह सुना जाता है कि हमने अपनी जिम्मेदारी निभा दी अब आगे उसकी मर्जी! या ऊपर वाले की मर्जी! इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि जिम्मेदारी के निर्वहन उपरांत एक प्रकार का मानसिक सांत्वना स्वयं को मिलता है और यद्यपि अपेक्षित सफलता न मिले फिर भी मन में कोई क्षोभ नहीं रहता.

हर अच्छी चीज का कुछ हिस्सा अपने पास बचाकर रखें. कहने का तात्पर्य यह है कि जब बहुत धन हो तो उसे बहुत समझकर उड़ा न दें. बहुत समय हो तो उसे व्यर्थ न गवां दें. धन का भी और समय का भी सदुपयोग करना चाहिए और आने वाले समय के लिए कुछ हिस्सा बचाकर रखना चाहिए. धन का उचित निवेश और समय के साथ कुछ न कुछ सीखते रहने की ललक विपरीत परिस्थितियों में बहुत काम आते हैं. इसी प्रकार हमारे शारीरिक स्वास्थ्य का भी मामला है. शरीर स्वस्थ हो तो जानबूझकर उसे खराब करने वाली गतिविधियों में लगाकर अथवा आलस्य में बर्बाद नहीं करना चाहिए. अन्य लोगों के साथ हमारे मेल जोल बढ़ जाएँ, बहुत सारे साथी बन जाएँ तो इस वजह से जान-बूझकर अपने लोगों के साथ रिश्तों को खराब नहीं करना चाहिए. बल्कि सबके साथ रिश्तों को सम्हालकर रखना चाहिए. यदि इन नियमों का पालन करें तो जीवन में अपेक्षाकृत कम तनाव का सामना करना पड़ेगा.

हमारा मस्तिष्क चित्रों में बहुत रूचि लेता है. उन्हें ठीक तरह से पहचानकर स्मरण रखता है. ऐसा कहा जाता है कि किसी पदार्थ के अन्य लक्षणों को हमारा मस्तिष्क चित्रों के साथ जोड़कर देखने की कोशिश करता है. जब भी हमारे मन में किसी विषय को लेकर कोई तनाव होता है तो तनाव से जुड़े लोगों या चीजों के चित्र मस्तिष्क में बार-बार उभरते  हैं. अतः तनाव की स्थिति में हमें स्वयं ही इन चित्रों को अन्य चित्रों से बदलने की कोशिश करनी चाहिए. ऐसा कैसे होगा? हमें एकांतवास से बाहर निकलकर ऐसी  भीड़ में शामिल होना चाहिए जहाँ हमें समझने वाले लोग हों. जिनके साथ हमारा मेल-जोल हो. हमारे आँखों के सामने दृश्य बदलते ही कुछ न कुछ पूर्व के चित्र बदलेंगे और तनाव को कम करने में मदद मिलेगी.

अपने शौक भुला न दें. हरेक के जीवन के कुछ शौक होते हैं. वास्तव में यही शौक इंसान को जिन्दादिल बनाये रखते हैं. अपने शौक को भुलाकर आप अपने जीवन को कैसे बेहतर बना सकते हैं? क्योंकि शौक इंसान की वह पहली पसंद है जो उसके ह्रदय और उसकी भावना के सर्वाधिक निकट होती है. यदि कोई आपके लिए अपने शौक को छोड़ने की बात कहे तो आप हरगिज उसे ऐसा न करने दें क्योंकि उसके शौक के मरते ही इंसान भी मर जायेगा. फिर ऐसा मरा हुआ इंसान आपके किस काम आयेगा? अपने शौक पर ध्यान दें और उसे पूरा करें.

पूरा संसार प्रबंधन पर टिका हुआ है. प्रकृति स्वसंचालित प्रबंधन के आधार पर काम करती है. एक घटक के बदलते ही दूसरे घटक बदल जाते हैं. हमारे शरीर की आकारिकी और कार्यिकी प्रकृति के प्रबंधन का ही हिस्सा हैं. हमारे मन की प्रतिक्रियाएं और हमारे विचार हमारे पूर्व के अनुभव से शोधित होकर आकार  लेते हैं. लेकिन वे सब स्वचालित अवस्था में आ गये हैं और हमारा मस्तिष्क उन पर ध्यान नहीं देता. तनाव का उचित प्रबंधन करने के लिए जरूरी है कि अपने मस्तिष्क में बन रहे विचारों पर ध्यान दें और यदि वे तनाव की स्थिति पैदा करते हैं तो उन्हें दूसरे तरीके से विचार करने के लिए प्रेरित करें, इसमें कुछ गलत नहीं है.

यदि कोशिश की जाए तो जीवन तनावमुक्त हो सकता है. यदि ऐसा संभव न भी हो पाए तो तनाव को कम से कम किया जा सकता है. बस इसके लिए स्वयं के पहल करने की जरूरत है. एक बार यह समझ आ जाये कि तानव का प्रबंधन किया जा सकता है तो आप इसके लिए पहल करना नहीं छोड़ेंगे. आशा है कुछ हद तक इस प्रश्न का हल मिल गया होगा कि हम तनावमुक्त जीवन कैसे जिएं!  

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सोमवार, जुलाई 05, 2021

वो है मेरी प्यारी कविता: सुरेन्द्र कुमार पटेल की कविता Kavita Par kavita in hindi


कविता जो हमारे सुख-दुःख की साथी है, कविता जो हमारे हर्ष और विषाद की वाहिका है, कविता जो हमारी  मनःस्थिति और हृदयतल को स्पर्श करती है, कविता जो प्रेम और आक्रोश को अभिव्यक्त करती है, ऐसी कविता पर कोई कविता न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. एक छोटी सी कोशिश की है कविता पर कविता करने की. कविता पर कविता लिखने की. आशा है कविता पर यह कविता आपको जरूर पसंद आएगी. यदि यह आपके हृदयतल को अंश मात्र भी स्पर्श करने में सक्षम हो तो आपसे प्रार्थना है कि इसे अपने मित्रों एवं परिचितों तक अवश्य पहुंचाएं.
प्रस्तुत है सुरेन्द्र कुमार पटेल  के ब्लॉग से ली गयी यह कविता. 

Kavita Par  kavita in hindi - कविता पर एक कविता -

....वो है मेरी प्यारी कविता
जिसमें अन्तस को छूने की ललक है,
जिसमें जीवन की चतुर्दिक झलक है,
जिससे  जुड़ा कल-आज और कल है,
जिसमें जीवन का निनाद कलकल है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें प्रिय-मिलन की मधुर स्मृति है,
जिसमें समाहित प्रिय की सुन्दर कृति है,
जिसमें सबके मन का सुन्दर स्वरूप है,
जिसमें जीवन भर की छांव और धूप है
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें बादल और धरती की छुअन है,
जिसमें प्रिय के विरह का मौन रुदन है,
जिसमें रूठे मन को मनाने की मनौती है,
जिसमें जन-मन को जगाने की चुनौती है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें प्रिय के संबोधन की ताजगी है,
जिसमें विविध प्रेम प्रकाट्य की बानगी है,
जिसमें ह्दय-वेदनाओं का अगम अंगार है,
जिसमें मन की पहेलियों का सुगम द्वार है,
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें ममताविकल आंसुओं की झड़ी है,
जिसमें मानव मनयोग की मजबूत कड़ी है,
जिसके बिना सितारों के तार भी मौन हैं,
जिसके बिना हम-आप आधा या पौन हैं,
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें अध्यात्म का रचा गया सुपथ है,
जिसमें व्यक्त भक्तिभाव आज अकथ है,
जिसमें वीरों के शौर्य का समृद्ध गान है,
जिसमें रणबांकुरों का उत्साही सम्मान है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें बारिश से उठती मिट्टी की सुगंध है,
जिसमें अमानवीय चीत्कारों की दुर्गंध है,
जिसमें जीवन का गहरा अंधेरा कुआँ है,
जिसमें प्रथम सुहाग सेज से उठता धुआँ है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें सिंहासनों को हिलाने की हुंकार है,
जिसमें गिद्ध-पंजों से छुड़ाने की पुकार है,
जिसमें श्रमिक-मौत के सौदों का दृश्य है,
जिसमें नित्य ढलते सच का दुःखद हश्र है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


जिसमें उतरा हृदय भाव गहरा डुबोते हैं,
जिसमें मन की पीड़ा शब्दों से पिरोते हैं,
जिसमें इंद्रधनुष में समाहित रंग सभी हैं,
जिसमें गोता लगाते सभी कभी न कभी हैं।
वो है मेरी प्यारी कविता॥


वह कविता आजकल छूकर चली जाती है।
होना था आगोश में, अनछुआ रह जाती है।
मानव हृदय के तार यूँ सख्त होते जा रहे हैं,
स्वयं पर हँसती है, जब हँसाने से रह जाती है।
वो है मेरी प्यारी कविता॥
(मौलिक एवं स्वरचित)
© सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला-शहडोल
मध्यप्रदेश

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मंगलवार, फ़रवरी 23, 2021

सपना (कविता) : सुरेन्द्र कुमार पटेल


            
  

 ● सपना●
सपने मन में अपने, कुछ तो बुना करें
चाहे विषय अपने मन का ही चुना करें।
जब चाहे बोयें, जितना चाहे बड़ा करें
सपनों की धुन में जैसा चाहे सुना करें। 

सपनों को सजाने जैसा चाहे रंग मिलाएं
स्वप्न  बाग में चाहे जैसा फूल  खिलाएं।
रहें विचारमग्न अकेला  या दुनिया घूमें
बैठ अकेला या किसी को मन में लाएं। 

सपनों में रहना व विचरना मनमर्जी है
है शिकायत  खुद की खुद से अर्जी है।
नहीं किसी भय या चिंता में सपना देखें
सपनों को सजाने में खुली खुदगर्जी है। 

सपनों की क्षमता है हवा में महल बनाएं।
पकड़ गगन को  चाहे मुट्ठी में भर लाएं।
जाना चाहें पार  अंतरिक्ष में  यानों से,
सपनों में कीच लपेटें या समंदर नहाएं।
 
सपना ही तो है, क्यों न उल्लास मनाएं,
दीप प्रज्ज्वलन की सर्वत्र प्रकाश समाए।
मुख मंडल पर स्वाभाविक आभा दमके,
सपनों की यह आभा नव आस जगाए। 

इस दुनिया  में जो भी छटा निराली हो,
सूखे होठों को तलाशती जो प्याली हो।
कम से कम सपनों में तो हक हो अपना
दृष्टि जाय जिधर वहाँ-वहाँ हरियाली हो।
                   ●रचना●
          #सुरेन्द्र_कुमार_पटेल
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शुक्रवार, जुलाई 31, 2020

व्यक्तित्व निर्माण में साहित्य की भूमिका:सुरेन्द्र कुमार पटेल



व्यक्तित्व निर्माण में साहित्य की भूमिका

वह एडीजे के पद पर पदस्थ था। न्याय करना उसका पेशा था। जाहिर है उसने संविधान पढ़ा होगा। अपराध की धाराएं पढ़ी होंगी। उसने संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्यों को भी पढ़ा होगा जिसमें वर्णित है कि भारत का प्रत्येक नागरिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद व ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।
उसकी और उसके बेटे की संदिग्ध विषाक्तता के कारण मौत हो जाती है। पुलिस संदेह के आधार पर कुछ लोगों को गिरफ्तार करती है। जांच से पता चलता है कि एडीजे को एक महिला ने तंत्र-मंत्र का सहारा लेने का सलाह दिया था ताकि पारिवारिक कलह दूर हो और स्वास्थ्य अच्छा हो। जिसके बाद महिला और एडीजे के बीच आटे का आदान-प्रदान हुआ था। एडीजे ने स्वयं अपने बयान में बताया कि उस रात उसने उसी मिश्रित आटे की बनी चपाती खाई थी, उसके दोनों बेटों ने भी चपाती खाई थी जबकि पत्नी ने चावल खाया था। छोटे बेटे को जल्दी ही उल्टी हो गई जिससे उसकी तबियत गंभीर रूप से उतनी खराब नहीं हो पाई जबकि एडीजे और उसके बड़े बेटे की तबियत बिगड़ी और अंन्ततः उन दोनों की मौत हो गई। आटा देने वाली महिला का पुराना परिचय था। शक है कि एडीजे द्वारा पैसों की मदद भी की जाती थी। हो सकता है पैसे वापस लेने का दबाव भी रहा हो। जाॅंच का विषय है कि वास्तविकता क्या है।
उक्त घटना मानवीय जीवन के पर्दे के पीछे छिपी धुंधली तस्वीर को साफ करती है। पढ़ा-लिखा, सभ्य, ओहदेदार, चमकते कोट और कमीज में लटकती टाई, चमचमाते जूते, जेब से झांकता कलात्मक कलम, करीने से छांटी गई मूॅंछें, क्लीन सेव या बारीकी से सजाई गई दाढ़ी, नक्काशी की गई हेयर कटिंग और उस पर मुख से ओस की मानिंद या फिर कश्मीरी बर्फ की तरह झड़ते शब्द व्यक्ति का एक ऐसा आभासी चित्र प्रस्तुत करते हैं जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। बल्कि सच यह होता है कि इन आवरणों के मध्य में एक ऐसा आदमी फंसा-पड़ा होता है जिसका निर्माण समाज की नितान्त गिरी हुई रूढ़ियों से हुआ होता है। उसका किताबें पढ़ना रोजगार प्राप्त करने से अधिक कुछ नहीं होता। वह एडीजे कौन है? कोई भी नाम दे लो, कोई फर्क नहीं पड़ता। अकेला एक एडीजे ही क्यों? आप किसी ओहदे को उठाकर देख लीजिए। मैं, आप या हमारे आसपास न जाने कितने ही ऐसे ओहदेदार हैं जिनकी सेवा लगी ही किसी टोने-टोटके के कारण है। कितनों को बाबाओं और ओझाओं का आशीर्वाद मिला हुआ है। अन्यथा वे इस सेवा में होते ही नहीं। और यदि इस सेवा में नहीं होते तो शायद मर जाते। इसीलिये उन्होंने सेवा को इतनी प्राथमिकता दी और उसके ऊपर तंत्र-मंत्र, बाबाओं और ओझााओं के आशीर्वाद को भी। ऐसे लोगों से आप न्याय और पारदर्शिता की उम्मीद करते हैं? ऐसे लोगों से आशा करते हैं कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करेंगे? असंभव है।

मेरे मित्र का एक मित्र है। वह पटवारी है। उसने सालाना लगने वाले मेले में एक बाबा से अंगूठी ली और साथ में आशीर्वाद भी। अगला मेला लगने के पूर्व उसकी नियुक्ति पटवारी पद पर हो गई। हालांकि वह पढ़ने में पहले से ही होशियार था और उसी क्षेत्र के उसी के जैसे और लड़कों की भी पटवारी में नियुक्ति हुई थी। अब वह उस बाबा का गुलाम है। श्रद्धा से उसके पांव में माथा टेकता है और पटवारी में हुई नियुक्ति का पूरा श्रेय उस बाबा को देता है। वैसी श्रद्धा न तो उसकी अपने माता-पिता के प्रति है और न उसके उन गुरुजनों के प्रति जिन्होंने उसे सतत ज्ञान, समझ और मार्गदर्शन दिया।

अखबारों के माध्यम से आए दिन बाबाओं के भ्रम जाल में अपना सबकुछ लुटते हुये देखा जा सकता है। यह इस बात के लिये चिन्तित करती है कि वास्तव में पढ़ना-लिखना क्या है? क्या यह सूचना का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण मात्र है? क्या हम अपने चारों तरफ घटती घटनाओं से कोई निष्कर्ष निकालने में अक्षम हैं?

उक्त घटना से कुछ बातें निकलकर सामने आती हैं। व्यक्ति का पढ़ना-लिखना अलग बात है और जीवन की वास्तविकताओं के प्रति समझ रखना अलग बात है। किसी परिवार का पढ़ा-लिखा होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसके परिवार में सब कुछ ठीक ही होगा। बल्कि उसके परिवार में सब कुछ ठीक होने के लिये उसके परिवार के सभी सदस्यों में प्रेम, सहयोग, समन्वय और एक-दूसरे के प्रति सही समझ होना आवश्यक है। पढ़ने-लिखने के बावजूद व्यक्ति अपने जीवन की समस्याओं को मानवीय व्यवहार में छिपी कठिनाइयों को समझने के स्थान पर बाबाओं, ओझाओं के शरण में जाना ज्यादा पसन्द करता है। यह प्रत्येक परिवार के लिये घातक है। यह इस बात का सूचक है कि हमारे भीतर वैज्ञानिक चिन्तन की बहुत अधिक कमी है। हमारे व्यक्तित्व का निर्माण जिन आधार स्तम्भों के माध्यम से हुआ है उनमें अंधविश्वास भी एक मजबूत आधार स्तम्भ है।
एक और बात है कि व्यक्ति अपने निजी रिश्तों में स्वयं सुधार लाने के बजाय बाहरी रिश्तों में टिक जाता है। फिर उस रिश्ते का खेल न जाने कहाॅं ठहरता है। पारिवारिक तनाव की एक मुख्य वजह यह भी होती है। व्यक्ति अपने परिवार से तृप्त नहीं है। व्यक्ति अपने काम और पेशों से मिली शान से भी तृप्त नहीं है। किन्तु बाहरी रिश्तों में वह तृप्त है। ऐसा इस कारण भी है कि लोगों के मस्तिष्क में उन्मुक्तता और वैयक्तिक स्वतंत्रता के संबंध में, सुख के संबंध में अधकचरी अवधारणा है।
संचार क्रान्ति के युग के आरम्भ में यह विश्वास किया गया होगा कि इससे समाज में फैली भ्रान्तियों, रूढ़ियों को दूर करने में मदद मिलेगी। यह भी आशा की गई होगी कि संचार क्रान्ति के फलस्वरूप साहित्य का प्रचार-प्रसार अधिक होगा और साहित्य अंधविश्वासों और रूढ़ियों को रोकने में मदद करेगा। अफसोस है कि साहित्य, फिल्म और धारावाहिक जगत ने समाज को वापस वही परोसा जो समाज में पूर्व से दीमक की तरह फैला था। लेखक हों या फिल्मकार ऐसी चीजों का सृजन करते हैं जिन्हें जनमानस सराहे। पाठक या दर्शक पैदा करे। वे भी समाज की उसी मुख्यधारा में बहना पसन्द करते हैं जिसमें वे लाश की तरह बहने का आनंद उठा सकें।
यदि एडीजे जैसे पदों पर आसीन व्यक्ति की मौत का कारण उसका टोने-टोटके में अंधश्रद्धा है तो यह सम्पूर्ण समाज के लिये चिन्ता का विषय होना चाहिए और साहित्य के लिये भी कि उसने अब तक अपनी कैसी भूमिका निभाई है और आगे उसे अपनी भूमिका का कैसे निर्वहन करना है। साहित्य का काम मात्र हृदय में स्पन्दन पैदा कर मनोरंजन करना नहीं है बल्कि समाज का सही दिग्दर्शन करना भी है।
आलेख:सुरेन्द्र कुमार पटेल
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मंगलवार, जून 30, 2020

पावस का आगमन: सुरेन्द्र कुमार पटेल

पावस का आगमन
धरा पर नाचने लगे  जब  तेज तपन
लौ-लपट का  पहनकर आभासी वसन
पवन बिछाने लगे जब पावक-सा शयन
धरा पर तब होता है पावस का आगमन।

सागर हिय मिलने धरा से जाये मचल
कहने भाव सागरजल जब जाये उछल
तापांतर का वेग  सह नहीं पाता गगन
धरा पर तब होता है पावस का आगमन।

कृषकों का देह गिरने लगे बनकर तरल
तपन बन जाये जब जीवों के लिए गरल
मुरझाने लगें जब धरा के श्रृंगार वन-सुमन
धरा पर तब होता है पावस का आगमन।

बीज नवांकुर बनने हो जाएँ जब विकल
पौध-प्रसूता लालायित हो जब धरा सकल
लौटाना हो जब प्रकृति को धरा का यौवन
धरा पर तब होता है पावस का आगमन।

करने भीषण ग्रीष्म का वीभत्स रूप हरण
हर जीर्णता धरा का पहनाने हरित वसन
रखना हो मोर, पपीहा और दादुर का मन
धरा पर तब होता है पावस का आगमन।

(सर्वाधिकार सुरक्षित,मौलिक एवं स्वरचित)

©सुरेन्द्र कुमार पटेल

ब्योहारी, जिला-शहडोल (मध्यप्रदेश)
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सोमवार, जून 29, 2020

यह जांच का विषय है


यह जांच का विषय है

यदि पृष्ठभूमि हो सरल और सहज
तो किसी आरोपी पर आरोप तय है।
पृष्ठभूमि हो जरा-सी गम्भीर उसकी
तो कहते यह जांच का विषय है।

एक इंच भी  सरकारी जमीन पर
गरीब का हो दखल तो हटना तय है।
बड़े-बड़े शहरों में बड़े आशियाने बने
है सरकारी यह जांच का विषय है।

मामूली धाराओं के आरोप में
सलाखों के पीछे पहुंचना तय है।
संगीन अपराध-आरोपी संसद पहुँचकर
कह जाते यह जांच का विषय है।

पूरे न हों कागजात गाड़ियों के तो
चालान कटना सरकारी निश्चय है।
ले-देकर निपटाने के मामले पर,
चुप रहना यह जांच का विषय है।

इतिहास के पन्नों से लिया है हिसाब,
उस पर हो रहा खूब अभिनय है।
वर्तमान के बिगड़ते भूगोल पर चुप,
बिगड़ा भूगोल यह जांच का विषय है।

छोटी-छोटी मछलियां जाल में फँसीं,
बड़ों का जाल से निकलना विस्मय है।
ऐसे अजूबे जाल को बनाया किसने
ज्ञानी कहते यह  जांच का विषय है।

मृतक  खोद जाते कागदों पर ताल,
वही पीते पानी हमें तो भूतों का भय है।
भूतों को दिया है राशन-पानी जो,
है उनका संसार यह जांच का विषय है।

क्यों नहीं रख पाते वे वोटरों का मान,
क्यों अब पार्टी से अलग उनका लय है।
कितने में  बिके हैं  उनके  लिखे गीत,
लिखेंगे गीत और यह जांच का विषय है।

जब भी सही दिशा में हो रही हो जाँच,
जाँच पर जाँच बिठाना बिल्कुल तय है।
हो जाता है रातों रात ट्रांसफर भला क्यों,
है ऐसी प्रथा क्यों यह जांच का विषय है।

कविता तो होती है कोमलांगी सदा ही,
प्रतिकार-प्रहार  तो  इस पर अनय है।
है यह समाज के बिंब का सूक्ष्म प्रतिबिम्ब ही
हमने देखा या नहीं यह जांच का विषय है।
              (मौलिक एवं स्वरचित)
©® सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला-शहडोल
(मध्यप्रदेश) 

गुरुवार, जून 25, 2020

वर्तमान का चलचित्र: सुरेन्द्र कुमार पटेल


वर्तमान का चलचित्र



एक के बाद एक जब कई सुखद या दुःखद घटनाएं,
हमारे मन-मस्तिष्क से होकर तीव्रगति से गुजर जाएं।
जैसे चलचित्र तेजी से आंखों को छूकर निकल जाए,
हमने क्या देखा, आसान नहीं है वह पकड़ में आये।

हमें याद रहता है हमारा भी दुःख अगले दुख तक,
कोई दुख, दुख देता है हमें मात्र वहीं तक रुककर।
यही मनोवैज्ञानिक प्रयोग जनमन पर किया जाता है,
गतदुख निवारण हेतु गत से बड़ा दुःख दिया जाता है।

नितनवीन समाचारों ने तत्क्षणता का स्वाद चखाया है,
कल के छोटे दुख को आज के बड़े दुख ने मिटाया है।
पुरा स्मरण शक्ति को आज की दुःखद खबर हड़प रही है,
वर्त हो रहा अतीत, अतीत को झांकने की तड़प नहीं है।

आप स्वयं देश के गत कुछ दिनों के गंभीर संकटों को लें,
फिर एक-एक घटना की परतों को मस्तिष्क में खंगालें।
आपके मनोमस्तिष्क में वही घटनायें स्थान बनाती हैं,
जो घटनाएं आपके समाचार पत्र के कोनों में समाती हैं।

इस प्रक्रिया से देख लें मस्तिष्क की संचित स्मृति को,
यहाँ देखा जाता है मानव-मस्तिष्क की इसी विकृति को।
सड़कों का चीत्कार, निर्भया पर अत्याचार भूल जाता है,
आत्महत्या पर होता विमर्श, कोई फांसी पर झूल जाता है।

देश की समस्याओं पर अनगिनत सवाल उभरते हैं सदा,
वे सवाल किसी और सवाल के बाद बचते हैं यदा कदा।
उन लोगों ने इसीलिए मानव मस्तिष्क को अस्त्र बनाया है, 
दुर्बलताओं का ले लाभ सदा गोल-गोल उन्होंने घुमाया है।

उत्तरदायित्व पर अनुत्तरदायी उत्तर वे देते ही रहते हैं,
जब तक आप एक की पूंछ पकड़ें वे दूसरा फेंक देते हैं।
बेरोजगारी पर उभरे सवालों का उत्तर बढ़ी हुई मंहगाई है, 
मंहगाई का उत्तर जातीय हिंसा या फिर धार्मिक लड़ाई है।

और, शेषांश कार्य सोशलमीडिया पूरा कर ही देता है,
इच्छित-अनिच्छित पल-पल के समाचार रख देता है।
समग्र विश्लेषण, निष्कर्ष तक पहुंचना जटिल हो गया,
वर्तमान के चलचित्र को रोकना अब मुश्किल हो गया।

मस्तिष्क-स्मृति कोष में संवेदनाओं के फोल्डर रखे जाएं,
वर्तमान के चलचित्र को अतीत से जोड़कर परखे जाएं।
वर्तमान के भुलावे में अतीत के फोल्डर यदि मिटा देंगे,
मृत्यु का दुःख भूलना, एक नयी मृत्यु देकर सिखा देंगे।

                           (मौलिक एवं स्वरचित)



©® सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला-शहडोल
(मध्यप्रदेश)
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गुरुवार, जून 18, 2020

राष्ट्र का नव स्वर: सुरेन्द्र कुमार पटेल


राष्ट्र का नव स्वर
राष्ट्र की सीमा पर देखकर विप्लव,
भरकर सभी के रगों में अब चेतना नव।
गूंजने लगा है राष्ट्र का नव नव स्वर,
नमन! शत-शत नमन! हे! बलिदानी अमर!

हमारे सैनिक सभी हैं सीमाओं पर डटे,
फिर हम क्यों नागरिक कर्तव्य से हटें।
देकर योग्य योगदान यदि सर्वस्व समर्पण,
विजयी होंगे हम, विजय ही है हमारा प्रण।

क्या हम तुच्छ वस्तुओं के मोह बंधन में?
क्यों न ठुकरा दें,वीरमाताओं के क्रंदन में।
ले संकल्प-शपथ,नवविचार का अभ्युदय,
जीत, जीत व केवल जीत का होगा निश्चय।

दूषित दृष्टि से हर बार अवलोकता व्याल!
साम्राज्य विस्तार का है उसका ख्याल।
मीततायी के रस्म में निकालता वह खंजर,
देखना है कलुषता, सीना उसका चीरकर।

राष्ट्रहित विरुद्ध व्यवसाय हम नहीं करेंगे,
पराजित करने का सर्वस्व उपाय करेंगे।
दिखला देंगे उसको हम सीना चौड़ाकर,
भागने पर विवश होगा वह रण छोड़कर।

किसान, श्रमिक सभी मिलजुल श्रम करें,
और सभी जन हँसते-हँसते परिश्रम करें।
इतिहास याद रखे यह अभिनव अनुभव,
वीरोचित उत्साह का हो अविरल उद्भव।

हमारी संस्कृति में पहले न हम उत्तर देते हैं,
युद्ध का किन्तु वीरोचित प्रत्युत्तर ही देते हैं।
बासठ के भारत को वह कर दे विस्मरण,
अबकी लिखेंगे हम एक कठिन संस्मरण।

भारत ने जिससे मित्रता का हाथ बढ़ाया,
व्यवसाय जगत में भी भागीदार बनाया।
उससे ही निभाया जाता नहीं है नेहबंधन,
उसके मुख से भी निकलेअब करुण क्रंदन।

विश्वासघात ही है हथियार सदा से उसका,
अनुगामी बतलाता है वह खूनी पथ का।
और हमारे भीतर है जो शोणित अविरल,
हरेक बूँद बनेगा उसकी मौत का गरल।

उकसा क्रोध वह युद्ध का आगाज करता,
मैत्री भाव त्याग तैयार युद्ध साज करता।
तब हम भी उसे सीख दें उस पर प्रहार कर,
दुश्मन का  दुश्मन की भाषा में संहार कर।
(मौलिक एवं स्वरचित)
दिनांक:- 18/06/2020
©सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्योहारी, जिला-शहडोल
(मध्यप्रदेश)
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बुधवार, जून 17, 2020

आत्मप्रयास: सुरेन्द्र कुमार

                आत्मप्रयास
एक दुखद विमर्श जो छा जाता है,
कई  विद्रूपताओं को बाहर लाता है।
जीवन के रास्ते छोटे पड़ जाते हैं,
पड़ाव ही मगर बड़ा बन जाता है।

मरने को तो कई भूख से मरे होंगे,
हजारों बार भूखे भूख से लड़े होंगे
उन्हें नहीं पता कुछ शब्दों के अर्थ,
इसीलिए वे मृत्यु से इतना लड़े होंगे।

जरूरत जब रोटी से बड़ी हो जाती है,
वह समस्या बड़ी तगड़ी हो जाती है।
हम बनाते हैं खुद ही इस मूर्ति को,
पूजने से प्रत्यक्ष खड़ी हो जाती है।

हमारी जरूरतों से ही घिरते हैं हम,
जरुरतें मगर कम कहां करते हैं हम।
इच्छा-वृक्ष के शिखर में बैठ फिर
दाल-रोटी पर कहाँ उतरते हैं हम।

भावनाओं का समंदर भी बड़ा है,
पानी किन्तु खारा ही इसमें भरा है।
भावनाओं को मिलता नहीं मृदु नीर,
बेदम भावनाओं का शव तिरा पड़ा है।

चाहिए थी जिस श्वास को रोटी केवल,
चल रही अब शान और शौकत केबल
जीवन को दाव पर लगा चलते हैं चाल,
दुनिया बना देते हैं रसहीन, वे दलदल।

वह मान झूठा, वह सम्मान झूठा है,
जिनकी जड़ों से अवसाद फूटा है।
भव्यताओं का शव ढोने से हो विरत,
भव्य तेरे पूर्वजों का घर, जो टूटा है।

हम सागर में या नभ के पार जायें,
तय करें लौट कब अपने संसार आयें।
एक बारीक रेखा खींचनी तो होगी,
कितना जीतकर लायें, क्या हार आयें।

घटना, सिर्फ एक के साथ घटती नहीं,
उसका बीज हर मन में है कहीं न कहीं।
संवेदनाओं का द्वार खोल कर रखें हम,
हार गया जो इससे वह फिर उबरता नहीं।

आत्म को खोने के भंवर में जाने से बचाएं,
कुशल गोताखोर बन सप्रयास खींच लायें।
दूसरों के जीवन-बेलों को भी दें आयाम,
मुरझायी बगिया किसी की हम सींच जायें।

(मौलिक, स्वरचित)
©® सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला-शहडोल
(मध्यप्रदेश)

मंगलवार, जून 16, 2020

रिश्ते: सुरेन्द्र कुमार पटेल

            
 रिश्ते
सालों साल पहले की मुलाकात में किये वायदे,
निभाने   की   चाहत  है  आपको   आज  मुझसे।
बेशक इन कमीजों के धागों के रंग नही बदले,
इनके भीतर का शरीर बदल रहा है रोज तबसे॥

शरीर ही से तो बंधा है मन लगाकर सख्त  गाँठें
मन अनुगामी हुआ है शरीर की कुछ जरूरतों से।
आपको विस्मृत  किया तो नहीं हूँ जान बूझकर
खुद ही विस्मृत हुए होंगे बने नित नये रिश्तों से॥

वो हमारी  मुलाक़ात में आपका रिश्तों का रोपना,
सप्रयास था या वह  बन गया हो खुद खुद से।
कुछ  जरूरतें रही होंगी  जड़ों  को  खाद पानी की,
उन्होंने लिया हो  मनमर्जी से पूछा नहीं  है मुझसे॥

कुछ-कुछ याद है मगर  आपके तलाश की यादें,
फिर सोचा कौन याद रखता है इतने पुराने किस्से!
ऊँची-ऊँची हवाओं के रुख को जब बदलते देखा,
बिखरता गया फिर वो एहसास भी हिस्सेदर हिस्से॥

मगर आश्चर्य है आज आपका दरख्तों का सीचना,
आज आपको मतलब है  मिटने या सूखने से।
किसी के समक्ष गवाही देनी हो शायद आपको,
लो मिटता हूँ मैं बनता हो काम यदि मेरे मिटने से॥

वो दो पत्तों वाला पौध शाखों में बंट गया होगा,
बेउम्मीद है वैसा ही उसका हो जाना फिर से।
और मौसम भी तो नहीं रहा अब पहले जैसा,
यदि वह चाहे भी हो जाना पौध किसी तरु से॥

वो उस वक़्त की बातें थीं, थी तब दूसरी भाषा,
कोई फायदा नहीं है अब उस दौर में लौटने से।
ये जो  बचे हुए  पर हैं रिश्तों के  मत खोलो,
उड़ान भर नहीं सकते नुच जायेंगे मात्र खुलने से॥


सूरज भी नहीं रहता वही, धरती भी नहीं रहती,
न वही रहने की उम्मीद है हवा या गगन से।
पहाड़ों के भी पर उखड गए दिखने लगा धूसर,
रिश्ते भी आजकल रिसते हैं रंगों की रंगन से॥

यदि मन को खींचकर ले जाने की कोशिश करूँ,
तो मांगता है वही कोशिका, भरा पुरा स्मरण से।
जो विभाजित हो चुकी है न जाने कितनी बार,
आज हैं जो नये, पुरानी कोशिकाओं के मरण से॥

हाँ, उस रोज  की  तारीख में जाओ, ले जाओ
उस रोज का पूरा भूगोल और फिर स्मृति मन से।
केवल उस रोज पाओगे रिश्तों की वही ताजगी,
सींचा नहीं है फिर कभी आपने अपनी छुअन से॥
        (स्वरचित एवं मौलिक)
© सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्योहारी, जिला-शहडोल (मध्यप्रदेश)
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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...