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शनिवार, जुलाई 17, 2021

अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर गीतिका छंद में कविता


(अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर कविता)
Ashok Tripathi "Madhav" ki Barish par Kavita)
आधार छंद-गीतिका

नहीं बरसना था तो बादल 
क्यूँ निकले थे घर से।
कृषि कर्षक सब जीव जगत के
बूँद-बूँद को तरसे।।

जेठ मास में कीच मचाया,
आर्द्रा में नहिं बूँद गिराया।
उमस कड़ी गर्मी दम तोड़े 
बरसो तो मन हरषे।।

घर के अन्न खेत में पहुँचे,
खाली हुए भँडारे।
अब तो रहम करो हे बादल,
मिटे गरीबी सर से।।

देर हुई सब नाश करो मत,
इतना मत तड़पाओ।
उबरे नहीं अभी कोविड से,
तुम उधेड़ते चरसे।।

बिन पानी के जग है सूना,
मुश्किल जीवन जीना।
पुनर्वसु ने बहुत रुलाया,
पुख्ख सुख्ख से बरसे।।

लाज रखो निज जलद नाम का,
माधव विनती करता।
टूट चुका मानव मानो तुम,
अब भीतर बाहर से।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
शहडोल मध्यप्रदेश
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बरसि जई घनस्याम: अशोक त्रिपाठी "माधव"

(अशोक त्रिपाठी 'माधव' की बारिश पर बघेली कविता)
(Ashok Tripathi 'Madhav' ki baarish par bagheli kavita)

बरसि जई घनस्याम

जेठ मास मा चहला कीन्हेन,किहेन असाढ़े घाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

दिहेन खेत मा खादा करसी,
तबहूँ घाम उधेरिसि चरसी।
फेकेन खेते अन्न घरे कय,
सोचे रहेन जो थोरौ बरसी।
लटे लम्मरे कइसौ-मइसौ
जइहीं बिजहा जाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अरहर उरदा तिली बोबायन।
सोयाबीन मूँग छिटबायन।।
खादि खितिर चउगिरदा बागेन।
तबहूँ भरे मा निन्चय पायन।।
कोटेदार सेल्समैनन से,
कीन्हेन ताम-झड़ाम।।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

जब ते जनबुध भये रहेन ते।
जेतना जोरे धये रहेन ते।
कुछ लड़िकन के खाता माहीं,
फिक्स-डिपाजिट कये रहेन ते।
सगला खरच दिहेन बिजहा मा,
बचा न एकौ दाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अद्रा मा नहिं बूँद गिराया।
पुनरबसू मा खूब तिपाया।
थरहे रहेन धान बंधी मा,
ओहू का खुब नगदि जराया।
त्राहि मची है चारिउ कइती,
रोट लेबाला सबै चढ़ायन,
तबौ किहा नहिं काम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अब ता चिरई लीलय काँकर।
परा हबय किसमत मा पाथर।
माधव मरै बिपति के मारे,
मरे जात हें गोरुअउ राकर।।
सगले लड़िका खटिआ पकड़े,
दीदिउ हबय बेराम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

बिनती सुनी रहम कइ देई।
धरती का शीतल कइ देई।
बरसि के सबके जान बचाई,
पुनि के चकाचक्क कइ देई।।
जब तक जिअब करब नित पूजा।
हे सीता पति राम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
 शहडोल मध्यप्रदेश
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शनिवार, जुलाई 03, 2021

अशोक त्रिपाठी 'माधव' के बघेली गजल Ashok Tripathi Ke Bagheli Gazal


बघेली गजल
अशोक त्रिपाठी 'माधव' के बघेली गजल Ashok Tripathi Ke Bagheli Gazal
आपन फरज निबाहा आगे बढ़े रहा।
खासा परगति के सीढ़ी मा चढ़े रहा।।

पुरिखन हर सीख गांठ मा बांधि के राख्या।
आय जई मंजिल खुद रसता गढ़े रहा।।

थकि के बइठि न जया तूं कहौं छहांरे मा।
धीरेन-धीरे चला गमय-गम कढ़े रहा।।

निंगही से सीखा कुछ अकिल लगाबा थोरौ।
मकड़ी कस जाला रातौ-दिन गढ़े रहा।।

देखा सोच न मान्या कउनिउ बातन के।
दोस न एक दुसरे के मूड़े मढ़े रहा।।

हांथ मा हांथ धये बइठे से कुछू न होई।
कमर कसे करतब्ब मा अपने ठढ़े रहा।।

देई दइउ सहारा केबल करतब्बी का।
पाठ करम योगी बाला सब पढ़ें रहा।।

फल के इच्छा कबौ न कीन्ह्या जान लिहा।
पढ़य के साथय-साथ अउरु कुछ लढ़े रहा।।

आजु-काल बिन लढ़े पढ़ाई फीकी है सब।
माधव के या सीख के मंतर पढ़े रहा।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
  शहडोल मध्यप्रदेश
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गुरुवार, जुलाई 01, 2021

बघेली पर्यावरण गीत: अशोक त्रिपाठी 'माधव' BAGHELI PARYAWARAN GEET



बघेली पर्यावरण गीत
हेरे मिलै नहिं पीपर बहेरा

मनई के जीबन मा होइगा अँधेरा
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा

न आमा बगैचा न तेंदू न महुआ
नहीं अब खरहरी न हर्रा न कहुआ।
न चिरई चनूँगुन के खोंथइला बसेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

न सालैं न गुँइजा न छुइला न सगमन।
जामुन खम्हार नहीं न बीही न सहिजन।
करौंदा बरारी अउ न बइरि मिलै हेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

सीसम न नीलगिर सेमर न खैरा।
कैथा न इमली बेल सेहेरुआ सजैरा।
न चंदन चचेंड़ा न चिरुल चार चेरा। 
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

सताबर पसारन न गुरिज अस्सगंधा।
पेंड़ काट मनई बनाय लिहिस धंधा।
बेंचि-बेंचि पेंड़न का बनाये है डेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

एहिन के कारण आजु बगरा प्रदूषन।
हेरत फिरैं सब आजु शुद्ध आक्सीजन।
मरा रोइ-रोइ चाहे मूड़ का कचेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

अबहूँ भरे भरे मा चेता बिरछा लगाबा।
नाहक मा देखा खुद के नास ना कराबा।
पइहा न हेरे कहौं जंगल-पतेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

प्रकृति के कहर का माधव समझा न रोग हो।
मनई के तन पा के रचा न कुजोग हो।
अबहूँ भरे मा जागा करा न अबेरा।
हेरे मिलै नहिं अब पीपर बहेरा।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
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मंगलवार, जून 29, 2021

फगुनाहटी बघेली कविता : अशोक त्रिपाठी 'माधव'



फगुनाहटी बघेली कविता 

सनन्-सनन् सुर्रा चलय, बिरबा झारैं पात।
लगत झकोरा हिय कंपै,फगुनाहटी कय बात।।

कबौ निचंदर कबौ बदरिया,कबौ बरसि चंहदर्रा।
कबौ धुंध पुनि कबौ बड़ेबर,कबौ बहै खरभर्रा।।

महुआ पत्ता झारि रहा है,बौर आम मा आई।
गय पियराय उन्हारी सगली,बहै लाग पुरबाई।।

गेहूं है गदरान चना अउ अरहर मसुरी साथय।
गा झुराय सरसबा लगे हां माहू झोंथय-झोंथय।।

सोंध महक भुंइया से आबय मादक बहै बयारी।
बूढ़ सयान सबय एंह रित मा मारि परैं हुलकारी।।

गा सिहिलाय मौसमउ खासा सबके मन उमहान।
लूमरि-डांगरि सब कुलकारैं हां खासा बउरान।।

सूर मकरगत तिल-तिल बाढ़ैं घट का बहुंकय लमहरि।
सांझ सकारे नगदि जड़ाबय कसमसाय दिन दुपहरि।।

पाकत देख उन्हारी खेतिहर देउता -पितर मनाबय।
पाथर अउर दौंगरा के भय जगि के रात बिताबय।

कोइली कुहुक करेजा सालय बिरहिन के मन माहीं।
जेकर प्रियतम छांड़ि बसे हां जाय बिदेसे माहीं।।

सिहरै देहिंया लगतय सुर्रा करै करेजा घायल।
मांग सिन्दुरबा अंगरा लागय बैरी करधन पायल।।

फाग-ददरिया परै जो काने बजुर बान अस लागय।
बसे जाय बालम परदेसय सुधि कय राति मा जागय।

मादक महिना फागुन आबा रितु बंसंत रितुराजा।
माधव मगन निरखि के सोभा हरसित सबय समाजा।।

सब जिउ-जंत खुसी से नाचैं मिलै पेट भर दाना।
फगुनहटी परकित कय सोभा को कइ सकै बखाना।

रचना:
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ओरहन :बघेली कविता-अशोक त्रिपाठी माधव



ओरहन :बघेली कविता

आपन लिहा सम्हार जमाना।
बात-बात पर दिहा ना ताना।
पहिले खुद के टेंटर निरखा,
फेर कहा दुसरे का काना।।

चोर आजु कोटबार का डांटय।
सूध के मुंह का कूकुर चाटय।
आजु हियन अंधेर मचा हय,
इहां लुटइया बायन बांटय।।

करकस कउआ गाबय गाना।
कोइली के अब नहीं ठिकाना।
उहौ उतान फिरै अब माधव,
रुपिया किलो खाय जे दाना।।

अंधे पोमैं कूकुर खांय।
दुर-दुर कहैं ता मारे जांय।
राज करैं अब जबरा-लबरा,
सत्तमान के दइउ सहांय।।

जे घोड़े के पायेंन धाबय।
ओके कइत अढ़इया आबय।
धक्का खाय सेमाली काकू,
रामपदारथ मजा उड़ाबय।।

एकर लाई उहां लगामैं।
एक-दुसरे के घर फोरबामैं।
गली-गली मा भेदी बगरे,
घर-घर, मेहरी-मनुस लड़ामै।।

अइसन बिगड़ा हबै समाज।
आबा लड़िकोहरिन के राज।
खानपान पहिनाउ बदलि गा,
संसकार मा परि गय गाज।।

केखा कही अउ केसे रोई।
हमहूं आपन दीदा खोई।
अब ता केबल एक सहारा,
करिहैं राम उहै अब होई।।

पीठ देय जस बहय बयार।
इहय आय करतब्ब हमार।
जे बइहर के उलटा भागय,
ओखर हंसी करय संसार।।

अबहूं भरे मा चेतय चाही।
परे रही ना घुरबा साही।
अइसन कउनौ जुगुत बनाई,
आबय बाली रुकय तबाही।।

रचना :
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मान देश का (कविता) : अशोक त्रिपाठी 'माधव' की देशभक्ति पर कविता




मान देश का (कविता)  

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जय जय मां भारती

उदयांचल से अस्तांचल तक।
हेम शिखर से वारिधि तल तक।
हो अखंड वैभव मां तेरा
चहुं दिशि गूंजे आरती।
जय भारत जय भारती।।
जगमग ज्योति जले आंगन में।
ओम् उच्चरित हो कण-कण में।
देव बधूटी तेरा आंचल,
 हरदम रहें संबारती।
जय भारत जय भारती।।
देव तरसते हैं आने को।
तेरा पावन रज पाने को।
आदिशक्ति लक्ष्मी भी तुझपर।
धन-वैभव,यश बारतीं।
जय भारत जय भारती।।
पुन्य धरा है तू राघव की।
परम प्रेमिका है माधव की।
सीता तू ही तू राधा है।
दूनिया तुझे पुकारती।
जय भारत जय भारती।।
तुमने वेदों को उपजाया।
शान्ति-शौर्य दोनों सिखलाया।
तू उर्वरा शक्ति सम्पन्ना।
वीर सदा अवतारती।
जय भारत जय भारती।।
रत्नगर्भिणी तू जग माता।
हरिप्रिया जन मन सुखदाता।
रक्त श्वेत अरु हरित रंगत्रय।
चारु चुनरिया धारती।
जय भारत जय भारती।।
रवि नित प्रथमहिं करत सबेरा।
जग यशगान करे नित तेरा।
अवनि और अंबर में दश दिशि।
गूंजे तेरी आरती।
जय भारत जय भारती।। 
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बघेली गजल : अशोक त्रिपाठी माधव



बघेली गजल 

केखा खोटहा कही केखा हीरा कही।
है निठुर जब जमाना केसे पीरा कही।।

केसे रोई बताई हम आपनि बिपति।
केहू पिरबेदना दुनिया मा अइसन नही।।

जेखा मानेन हम आपन ऊ दीन्हिसि दगा।
करी केखर भरोसा साथ केखे रही।।

अब उचटि गा हय बिसुआस संसार से।
हर घड़ी अब जुलुम बोला कइसे सही।।

टोरि दीन्ह्या तुहूं सगली उम्मीद का।
एक भरोसा रहा तोंहसे आशा रही।।

सुधि रही या मरत तक जउनु दीन्ह्या सजा।
नाउ से तोंहरे आंसू या बहतय रही।।

ठीक भा तू किहा जउनु जानिन गयन।
पय पारुख तोहांरय उमिर भर रही।।

तूं मिला ना मिला दुःख न होई कबौ।
ना बिसरि पउबय सुधि आय अउतय रही।।

तूं जहां जा खुशहाल जीबन जिया।
रात-दिन माधव मांगन या मगतय रही।।

खेल किसमत के जाने न पाबय कोऊ।
दूध बिगड़े के बादय बनत है दही।।

रचना:
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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...