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सोमवार, सितंबर 14, 2020

राष्ट्रभाषा हिंदी -डी .ए.प्रकाश

🌷राष्ट्रभाषा हिंदी 🌷

राष्ट्र प्रगति की भाषा हिंदी,
जन-जन को है भाया |
राष्ट्रीय भाषा बनाने हिंदी,
जब संविधान सभा में आया ||

चौदह सितम्बर दिन था प्यारा,
सन उन्नीस सौ उनचास रहा |
गोपाल स्वामी ने दिया विचार,
हिंदी राजभाषा यह शंकर राव कहा ||

भाषाओं के कारण ही तो,
राज्यों का नव निर्माण हुआ |
राजभाषा आयोग बना तब,
हिंदी का गुणगान हुआ ||

काश्मीर से केरल तक,
जन प्रिय भाषा है हिंदी |
उषा से रजनी तक सब,
प्रिय जन बोलें हिंदी ||

पंत निराला और दिनकर का,
पावन हिंदी भाषा है |
कबीर तुलसी और सूर का,
हिंदी ज्ञान जिज्ञासा है ||

शिक्षा का स्तम्भ है हिंदी,
जन-मन को पावन करती है |
रस छंद अलंकार विभूषित,
हिंदी कविता रहती है ||

नौ राज्यों की मातृभाषा है,
हिंदी हृदय लगाते है |
अजर अमर हो हिंदी भाषा,
आज हिंदी दिवस मनाते हैं ||

✍🏼डी.ए.प्रकाश खाण्डे, अनूपपुर मध्यप्रदेश

सोमवार, अगस्त 31, 2020

जरा याद करो कुर्वानी (कविता)- डी.ए.प्रकाश खाण्डे



ज़रा याद करो कुर्वानी
          ===============
जो पाल पोषकर समृद्ध किया,
जीवन का सब दांव लगाकर |
दुःख--दर्दों को पीया है जिसने,
प्रेम- प्यार की नदी बहाकर |
सारी खुशियां अर्पित कर दी,
धरा धरोहर और जवानी |
उनकी गाथा क्यों भूल गए,
इनकी जरा याद करो कुर्वानी ||

वतन प्रेम पर हुए फ़िदा,
बचपन का सब खेल भूलकर |
देश प्रेम का कर्ज उतारे वीर,
फांसी फंदे में हँसते झूलकर |
राजगुरु- सुखदेव-भगत सिंह,
अब किसका लिखूं कहानी |
माँ का बेटा अजर अमर हो,
इनकी ज़रा याद करो कुर्वानी ||

जल जंगल के खातिर बिरसा,
अपनी जान गवाया था |
अपने जन और वतन के खातिर,
अंग्रेजों से युद्ध रचाया था |
गोरों को जो चना चबायी,
वो झांसी की मर्दानी |
झलकारी भी हुई शहीद,
इनकी जरा याद करो कुर्वानी ||

द्रासा और गलवान घाटी पर,
लात मारे रिपु के छाती पर |
जो मात्रभूमि पर हुए न्योछावर,
पुलवामा और सुकमा घाटी पर |
सरहद में जाकर सीना ताने हैं,
धन्य है उनकी जवानी |
सुहागिन की सुहाग अमर है,
उनकी ज़रा याद करो कुर्वानी ||

राणा की रणभूमि अमर है,
साहस शौर्य सुहावन होकर |
कवियों की काव्य अमर है,
वतन प्रेम में सुपावन होकर |
आजादी के शूर वीरों की गाथा,
उनके अंतिम साँसों की बानी |
भीमराव के उपकारित माथा,
उनकी ज़रा याद करो कुर्वानी ||

  -डी.ए.प्रकाश खाण्डे(शिक्षक)
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,जिला-अनूपपुर मध्यप्रदेश
ईमेल- d.a.prakashkhande@gmail.com
मोबाइल नंबर -9111819182,8839212828

सोमवार, अगस्त 17, 2020

संवेदना(लघुकथा) - डी.ए.प्रकाश खाण्डे

संवेदना (लघुकथा)- डी.ए.प्रकाश खाण्डे

होली की त्यौहार कुछ ही दिन बचा था सभी जनसामान्य त्यौहार के लिए बाजार से सामाग्रियां ले रहे थे |मेरे संस्था के सभी कर्मचारियाँ भी घर जाने की तैयारी में थे,मेरा गाँव विद्यलय से बारह किलोमीटर की दूरी पर है | सुबह जाए तो साम को लौट आते है इसलिए कोई ख़ास तैयारी नहीं किये थे | विद्यालय आवासीय होने के कारण सरकारी कमरा भी मिला है जिसके देखभाल करने की वजह से त्यौहार में घर जाने का विचार नहीं बनाया था | विद्यालय की छुट्टी के बाद बाजार गया था, वहां मेरे संस्था के वर्मा बाबू मिल गए ,उन्हें बताया की आज गाँव जाउगा सुबह आना होगा | वर्मा बाबू सुनकर प्रसन्न हुए और बोले रात में ही लौटना हो तो मैं भी चलूँगा | दोनों बातचीत करते गाँव पहुँच गए, वर्मा जी घर को चारो तरफ देखे और सभी से बात करने के बाद चाय पीकर हम दोनों गाँव के एक मंदिर गए | जहां पर मेरे बचपन के मित्र एवं सहपाठी से मुलाक़ात हुआ और वह मुलाक़ात एक याद बनकर ही रह गया | मित्र जब भी मिलता था बहुत खुस और प्रसन्नचित से बात करता था,देखते ही मुझे मंडल कहकर बात करने लगे,थोड़ी सी मुलाक़ात एक याद बनकर रह गया | बात कम हो हुआ और मैंने गाँव के प्रतिष्ठित और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्री महंत जी को पूंछा |

मित्र ने धीरे से बताये की "महंत जी इस समय मंदिर बहुत कम आते हैं, वे घर पर ही मिल जायेगे |"  हम श्री महंत जी के घर आगये और समाज के कुछ बाते किये | सुबह परीक्षा थी इसलिए रात में ही लौटकर आगये थे |
  होली त्यौहार के  दो - तीन दिन बाद  व्हाट्सएप पर खबर आया की किरर घाटी पर बस दुर्घटना पर तीन लोगो की मृत्यु हो गई है | जिसमे वही मित्र का नाम था जिससे मंदिर में मुलाक़ात हुआ था, विश्वास नहीं होरहा था तो मैंने खबर की पुष्टि के लिए छोटे भाई रहीस कुमार को फोन लगाया,उनका विद्यालय बाजार से लगा है इसलिए पूरी जानकारी लेकर मुझे बताये की घटना सही है |
    मेरे हृदय में पीड़ा और संताप बढ़ता ही गया ........अस्पताल पहुंचा, जहा सभी स्वजन मृत शरीर को गाडी में रख चुके थे, मेरी संवेदना की धार उमड़ कर आँखों में छलक पड़ी | आँखों में मित्र का जीवनवृत्त दिखाई देता देने लगा मेरे आँखे तिलमिला उठा की कमरा जाऊं की गाँव | विचार व्यथा को क्या व्यक्त करूँ; ये मित्र बहुत ही सरल और सच्चे स्वभाव के थे, दुःख दर्द की क्या कथा लिखूं | दसगात्र के दिन गया था - संवेदना गंभीर है,वेदना की धारा बहती जा रही है | कोरोना संक्रमण के कारण लाकडाउन चल रहा था,विकट परिस्थियों पर सामाजिक क्रियाकलाप सम्पन्न हुआ | पीड़ा पर पीड़ा बढ़ती जा रही है, बच्चे छोटे - छोटे है | मेरे निकट रिश्तेदार भी है जिससे संवेदना को ज्यादा व्यक्त कर पाने में असमर्थ हूँ | कहते है की" विपत्तियाँ आती है तो अपने सभी दरवाजे बंद करके आती है |"

रविवार, अगस्त 02, 2020

मुंशी प्रेम चंद - डी .ए.प्रकाश खाण्डे



उपन्यास एवं कहानी सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी - डी .ए.प्रकाश खाण्डे

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मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के प्रख्यात कहानीकार व उपन्यासकार हैं। बचपन से ही उनको साहित्य पढ़ने-लिखने में रुचि थी और अपनी रुचि के अनुसार वे छोटे उपन्यास भी पढ़ा करते थे। प्रेमचन्द जी अपने कार्यों को लेकर बचपन से ही सक्रिय थे।बहुत मुश्किलों और संघर्षों के बाद भी वे निरन्तर अपनी लेखनी चलाते रहे। मुंशीप्रेमचन्द जी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य की काया ही पलट दी। प्रेमचन्द जी का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी (विद्वान) संपादक थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में, जब हिन्दी में तकनीकी सुविधाओं का अभाव था,उनका योगदान अतुलनीय है। प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया,उनमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं। उनके पुत्र हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतराय हैं जिन्होंने इन्हें कलम का सिपाही नाम दिया था।

जीवन परिचय

  मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म वाराणसी के निकट लमही गाँव में  31 जुलाई 1j880 को हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम  अजायबराय था | इनके पिताजी लमही में डाकमुंशी थे। सात वर्ष की आयु में माता जी का देहांत हो गया एवं चौदह वर्ष की आयु में पिता का देहांत हो गया |

शिक्षा :-

प्रेमचंद जी के प्रारम्भिक शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी से हुआ और पढ़ने की रूचि उन्‍हें बचपन से ही था।तेरह साल की उम्र में ही उन्‍होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया था | 1898   में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।  1910  में उन्‍होंने अंग्रेजी, दmर्शन, फारसी और इतिहास लेकर इंटर पास किया और 1919  में बी.ए. पास करने के बाद शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए।

विवाह :-

प्रेमचंदजी का पहला विवाह परंपरा के अनुसार पंद्रह साल की उम्र में सन 1895 में हुआ था और 1906 में दूसरा विवाह बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। उनकी तीन संताने हुईं- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।

साहित्य एवं लेखन में रूचि :-

साहित्य के क्षेत्र में इनकी रूचि बचपन से ही था, 1910  में उनकी रचना 'सोज़े-वतन'प्रकाशित हुआ | ब्रिट्रिश काल में हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने प्रेमचंद को बुलाया और उन पर जनता को उकसाने  का आरोप लगाया। सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर नष्ट कर दी गईं। कलेक्टर ने नवाबराय को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। इस समय तक प्रेमचंद, धनपत राय नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे। उन्‍होंने आरंभिक लेखन ज़माना पत्रिका में ही किया।

मृत्यु :-

जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े। उनका उपन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका,उनके पुत्र अमृत राय ने इस उपन्यास को पूरा किया |  08  अक्टूबर सन 1936  को उनका निधन हो गया।

लेखन :-

प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में प्रवृत्त हुई। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। प्रमुखतया उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि से सम्मानित हुए। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू भाषा दोनों में समान रूप से दिखायी देती है।

उपन्‍यास:-

प्रेमचंद के उपन्‍यास न केवल हिन्‍दी उपन्‍यास साहित्‍य में बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्‍य में मील के पत्‍थर हैं। प्रेमचन्द कथा-साहित्य में उनके उपन्यासकार का आरम्भ पहले होता है। उनका पहला उर्दू उपन्यास (अपूर्ण) 'असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्य' उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खल्क़'' में 8 अक्टूबर, 1903 से 01 फरवरी, 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। उनका दूसरा उपन्‍यास 'हमखुर्मा व हमसवाब' जिसका हिंदी रूपांतरण 'प्रेमा' नाम से 1907 में प्रकाशित हुआ। चूंकि प्रेमचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे और उर्दू से हिंदी में आए थे, इसलिए उनके सभी आरंभिक उपन्‍यास मूल रूप से उर्दू में लिखे गए और बाद में उनका हिन्‍दी तर्जुमा किया गया। उन्‍होंने 'सेवासदन' (1918) उपन्‍यास से हिंदी उपन्‍यास की दुनिया में प्रवेश किया। यह मूल रूप से उन्‍होंने 'बाजारे-हुस्‍न' नाम से पहले उर्दू में लिखा लेकिन इसका हिंदी रूप 'सेवासदन' पहले प्रकाशित कराया। 'सेवासदन' एक नारी के वेश्‍या बनने की कहानी है। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार 'सेवासदन' में व्‍यक्‍त मुख्‍य समस्‍या भारतीय नारी की पराधीनता है। इसके बाद किसान जीवन पर उनका पहला उपन्‍यास 'प्रेमाश्रम' (1921) आया। इसका मसौदा भी पहले उर्दू में 'गोशाए-आफियत' नाम से तैयार हुआ था लेकिन 'सेवासदन' की भांति इसे पहले हिंदी में प्रकाशित कराया। 'प्रेमाश्रम' किसान जीवन पर लिखा हिंदी का संभवतः पहला उपन्‍यास है। यह अवध के किसान आंदोलनों के दौर में लिखा गया। इसके बाद 'रंगभूमि' (1925), 'कायाकल्‍प' (1926), 'निर्मला' (1927), 'गबन' (1931), 'कर्मभूमि' (1932) से होता हुआ यह सफर 'गोदान' (1936) तक पूर्णता को प्राप्‍त हुआ। रंगभूमि में प्रेमचंद एक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्‍य में क्रांतिकारी बदलाव का सूत्रपात कर चुके थे। गोदान का हिंदी साहित्‍य ही नहीं, विश्‍व साहित्‍य में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसमें प्रेमचंद की साहित्‍य संबंधी विचारधारा 'आदर्शोन्‍मुख यथार्थवाद' से 'आलोचनात्‍मक यथार्थवाद' तक की पूर्णता प्राप्‍त करती है। एक सामान्‍य किसान को पूरे उपन्‍यास का नायक बनाना भारतीय उपन्‍यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। सामंतवाद और पूंजीवाद के चक्र में फंसकर हुई कथानायक होरी की मृत्‍यु पाठकों के जहन को झकझोर कर रख जाती है। किसान जीवन पर अपने पिछले उपन्‍यासों 'प्रेमाश्रम' और 'कर्मभूमि' में प्रेमंचद यथार्थ की प्रस्‍तुति करते-करते उपन्‍यास के अंत तक आदर्श का दामन थाम लेते हैं। लेकिन गोदान का कारुणिक अंत इस बात का गवाह है कि तब तक प्रेमचंद का आदर्शवाद से मोहभंग हो चुका था। यह उनकी आखिरी दौर की कहानियों में भी देखा जा सकता है। 'मंगलसूत्र' प्रेमचंद का अधूरा उपन्‍यास है। प्रेमचंद के उपन्‍यासों का मूल कथ्‍य भारतीय ग्रामीण जीवन था। प्रेमचंद ने हिंदी उपन्‍यास को जो ऊँचाई प्रदान की, वह परवर्ती उपन्‍यासकारों के लिए एक चुनौती बनी रही। प्रेमचंद के उपन्‍यास भारत और दुनिया की कई भाषाओं में अनुदित हुए, खासकर उनका सर्वाधिक चर्चित उपन्‍यास गोदान। सेवासदन , प्रेमाश्रम, रंगभूमि , निर्मला , कायाकल्प , गबन , कर्मभूमि , गोदान, मंगलसूत्र (अपूर्ण), प्रतिज्ञा, प्रेमा, रंगभूमि, मनोरमा, वरदान

उनके जीवन काल में कुल नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए- सोज़े वतन, 'सप्‍त सरोज', 'नवनिधि', 'प्रेमपूर्णिमा', 'प्रेम-पचीसी', 'प्रेम-प्रतिमा', 'प्रेम-द्वादशी', 'समरयात्रा', 'मानसरोवर' : भाग एक व दो और 'कफन'। उनकी मृत्‍यु के बाद उनकी कहानियाँ 'मानसरोवर' शीर्षक से 8 भागों में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद साहित्‍य के मु्दराधिकार से मुक्‍त होते ही विभिन्न संपादकों और प्रकाशकों ने प्रेमचंद की कहानियों के संकलन तैयार कर प्रकाशित कराए। उन्होंने मनुष्य के सभी वर्गों से लेकर पशु-पक्षियों तक को अपनी कहानियों में मुख्य पात्र बनाया है। उनकी कहानियों में किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, आदि की समस्याएं गंभीरता से चित्रित हुई हैं। उन्होंने समाजसुधार, देशप्रेम, स्वाधीनता संग्राम आदि से संबंधित कहानियाँ लिखी हैं। उनकी ऐतिहासिक कहानियाँ तथा प्रेम संबंधी कहानियाँ भी काफी लोकप्रिय साबित हुईं। पूस की रात, ईदगाह आदि |

अन्य :-

बाल साहित्य : रामकथा, कुत्ते की कहानी, जंगल की कहानियाँ, दुर्गादास
विचार : प्रेमचंद : विविध प्रसंग, प्रेमचंद के विचार (तीन खंडों में)
संपादन : मर्यादा, माधुरी, हंस, जागरन | 

साहित्यिक मूल्यांकन :-
 
प्रेमचंद ने प्रगति शील मूल्यों को आगे बढा़ने का काम किया। इनके बाद जिन लोगों ने इन कामों को आगे बढ़ाने का काम किया उसमें सिर्फ यशपाल  से मुक्ति बोध तक का नाम लिया जा सकता है। ये बेहतरीन कहानी कार भी थे इनकी तीन कहानियों में नारी की व्यथा व दुर्दशा को भी दर्शाया गया है। वह बहुत ही नेक व आदर्शवादी इन्सान थे। उनका लेखन हिंदी  साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बगैर  हिंदी के विकास का अध्ययन अधूरा रह जाएगा।  हम उन्हें व साहित्य में उनके  योगदान को कभी नहीं भुला पाएँगे।।

   डी.ए.प्रकाश खाण्डे (शिक्षक)
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,अनूपपुर (म.प्र.)

मनभावन सावन (सवैया) -डी.ए.प्रकाश खाण्डे


मनभावन सावन 

सावन तो मनभावन पावन,
मास अवै सब तो सुख पायो
वारिस की सब बूंद सुहावन,
ताल सरोवर मान बढ़ायो
नागन दूध पिलावत हैं सब,
पेड़ लगे धरती हरियायो
साजन राह तकै विरही मन,
धान किसान खूब लगायो ||

शीतल वायु बहे चंहु ओरन,
मान बढ़ावत सावन भायो 
बादल घोर गुहार करे तब,
मोर धरा पर नाच दिखायो 
गाँव गली सब बालक खेलत,
कानन में खग धूम मचायो 
खेत किसान गयो तब पावत,
हालत डोलत धान सुहायो ||

घास अपार उगे धरनी पर,
खूब दिखे सब बादर पानी 
पादप नीर वयार बढे शुभ,
झूम उठे धरती पर प्राणी |
सूरज ऊगत बात करैं सब,
सावन खीर सबै घर जानी |
जीयत के सब सावन पावन,
खेलत खात कटे जिंदगानी ||

मोर मयागुर बात सुनो सब,
सावन के कजली मिल जाई |
रीति-रिवाज मनावत हैं सब,
राग रक्षाबंध बाँधत भाई |
जीवन में सुख आवत जावत,
प्रेम सबै जन पावत आई |
सावन पावन है मनभावन,
देख प्रकाश करेन लिखाई ||

काव्य रचना:-

डी.ए.प्रकाश खाण्डे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,अनूपपुर मध्यप्रदेश

बुधवार, जुलाई 08, 2020

तृष्णा : डी. ए. प्रकाश खांडे


🌹🌹तृष्णा 🌹🌹
जीवों में तृष्णा आती है,
तो आशाये बढ़ जाती है।
लोभ लाभ सब जीवन में,
पाने तृष्णा बढ़ जाती है।।
सुख पाने को मन भटका,
ज्ञान पाने को सब ज्ञानी ।
नई खोज में संलिप्त रहे,
देश-विदेश के बहु विज्ञान।।
जब अन्नत इच्छा होती है,
मानव में आशा जगती है।
हित अनहित फिर न दिखे,
रेत भी पानी लगती है।।
ज्ञान की तृष्णा में बुद्ध ने,
छोड़ा था घर-द्वार को।
हुआ अपमान ध्रुव का तो,
तृष्णा से पाया दरबार को।।
मृग तृष्णा में विहबल,
सिकता में खोजे वारि।
जन्म-जन्म की प्यास मिटे,
मानव कर्म सुधारि।।
पुत्र प्राप्ति की तृष्णा में,
माता भी विहबल रहती है।
प्रियतम के आशा में ज़िंदा,
प्रेयसी की अधर सिसकती है।।
कवि का तृष्णा कविता है,
मन की तृष्णा तो माया है।
मानव की तृष्णा मानवता,
संसार में सर्वस्व समाया है।।
नृप तृष्णा है प्रजा प्रेम,
मृग तृष्णा कस्तूरी है ।
दृग तृष्णा धन-दौलत,
मन की तृष्णा अधूरी है।।
नदिया सागर की चाह में,
नित बहती चली जाती है।
नारी तृष्णा नर में समाहित,
तृष्णा में नारी लजाती है।।
©डी.ए.प्रकाश खाण्डे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,जिला अनूपपुर म.प्र.

सोमवार, जून 29, 2020

आषाढ़ का पानी(कविता)

आषाढ़ का पानी
ये आषाढ़ का पानी है,
घनघोर बरसता है हरदम।
बादल रोज घुमड़ता है,
पुरजोर गरजता है हरदम।।
चिड़ियों का कलरव लगता है,
जैसे बजता हो सरगम।
बिजली भी तेज कड़कती,
तेज चमकती है हरदम।।
झूमे गायें तृण-लताएं,
पवन शोर मचाये हरदम।
आजादी उत्सव के दिन,
सब लहरायेंगे परचम।।
विपथ न हों पर्वत से,
बहती नदियाँ; ये झरना।
धरती रहे खुशहाल सदा,
पेड़ लगाते ही रहना।।
नभ मंडल में इंद्रधनुष,
विखराये अपना रंग।
नदियाँ भी उफनाती है,
बरखा रानी के संग।।
लेकर बादल; पानी को,
सूरज का लाज बचाये।
ये बारिस के मौसम में,
वन-उपवन ताज लगाये।।
खुशियां लाती वसुधा पर,
ये आषाढ़ का पानी।
बसुधा भी हरियाली लाती,
प्रेम प्रगाढ़ की बानी।।
धरती अपनी प्यास बुझाकर,
नदियों की सत्कार करे।
पानी बरसे आषाढ़ माह का,
जीवों पर उपकार करे।।
बीज अंकुरित हो जाते हैं,
पाकर आषाढ़ का पानी।
कृषक मगन हो जाते हैं,
पाकर आषाढ़ का पानी।।
©®डी.ए.प्रकाश खांडेकर
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर            
पुष्पराजगढ़,अनूपपुर (म.प्र.)

मंगलवार, जून 23, 2020

कठपुतली चढ़ी हिमालय (व्यंग्य) - डी.ए.प्रकाश खाण्डे



संसार में ऐशो आराम करने के लिए बहुत सारा सामान घर में ठूँस-ठूंसकर भर लेते हैं  और दिनों दिन भरते जाते हैं। मानव अपने जीविका के लिए तरह-तरह की योजना बनाता है, कुछ में उसकी पूंजी ही डूब जाती है, बस प्रयत्न ही करता रहता है। छोटी-सी दु कान को गली-गली, बाजार, मेले आदि में ले जाकर बैठे रहना आदत हो जाती है। यह उस व्यक्ति की मजबूरी है, जो जहाँ भी मेला लगता है; वहाँ की जनता बेसब्री से इन्तजार करती  रहती  है कि  मेला आये और हम आंनद उठायें, कुछ सामान खरीदें।

मेला ऐसा माहौल है जहां लोग पैसो में नहीं भावनाओ में जल्दी बंध जाते हैं। मेले में हर तरह के व्यक्ति जाते हैं। जिनकी मनोवृत्ति दास प्रवृत्ति की होती है फिर उनका क्या कहना? मेले का सारा सुख भोगने का अवसर उन्ही को मिलता है। मेले में अधिकतर कलाकार जाते हैं जिनको अपनी कलाओं  के प्रदर्शन करने का अवसर प्राप्त होता है तथा वे अपने कला को पुष्ट करने हेतु आवश्यक चीजें भी खरीदते हैं। मेले का दृश्य अतिसुन्दर था, विविध क्षेत्रों की वेश-भूषा, कलायें  और मनमोहक प्रस्तुतियां जिसे देखकर मन प्रसन्नता का  गोता  लगाता रहता है। मेले में कलाकार भी अपने मित्र मंडली के साथ घूम रहे थे, हर दुकान पर जाकर सामान देखते थे।

मेले के अंतिम छोर में एक सजी-धजी दुकान देखकर कलाकारों की आँखे रुक गई। छाँटने लगे सस्ती-महंगी  वस्तुएं। कोई हल्की  है पर मोल ज्यादा है, कोई वजनी है पर कोई काम का नहीं है। सारा दिन एक ही दुकान में खपा दिए। बेचारा दुकानकार भी परेशान था कि  इन वस्तुओं को बहुत दिनों से रखा हूँ कोई पसंद नहीं करता है। दुकानदार अपनी वस्तुओं  पर भी खिसियाता रहा कि इनको कैसे करके बेचूं । वस्तुएं भी एक दूसरे से टकराकर टूट रही थीं जैसे कि दुकानदार इन पर कोई ध्यान नहीं देता हो। कलाकारों ने पहले से तय किया था। सभी लोग ऐसी चीजें खरीदेंगे जो हमारे बस में रहे। जिसको हम नचा सकें। और एक ही दुकान से खरीदेगें। सभी ने वस्तुएं पसंद की और मोल-भाव तय करना शुरू कर दिया। यहाँ दुकानदार भी अपनी जवाबदारी से हटना चाहता था, उसका ध्यान इधर-उधर होता रहता था। दुकान की  प्रत्येक वस्तुओं पर निगाहें दौड़ाये, प्रत्येक वस्तुओ को उल्टा-पलटाकर देखे। परन्तु पट नहीं पा रहा था, दुकानदार भी परेशान हो गया। कलाकार संसार में ऐशो आराम करने के लिए बहुत सारा सामान घर में ठूँस-ठूंसकर भर लेते हैं और दिनोंदिन भरते जाते हैं। मानव अपनी  जीविका के लिए तरह-तरह की योजना बनाता है, कुछ में उसकी पूंजी ही डूब जाती है, बस प्रयत्न ही करता रहता है। छोटी सी दुकान को गली-गली, बाजार मेले आदि में ले जाकर बैठे रहना आदत हो जाती है, यह उस व्यक्ति की मजबूरी है। जंहा भी मेला लगता है; वहाँ की जनता बेसब्री से इन्तजार करती  रहती  है कि  मेला आये और हम आंनद उठायें, कुछ सामान खरीदें। कलाकारों ने ऐसी वस्तु ख़रीदी कि दुकान ही खाली पड़ गया, सबने कठपुतली ही ख़रीदी। कठपुतली इसलिए ख़रीदी थी कि  हम कम आंनद लेंगे  हमारा परिवार ज्यादा मजा उड़ायेगा।

कलाकारों ने कठपुतली को इस तरह से पकड़कर अपने मजबूत बैग में रखा  कि  मजाल किसी का कि देख सके। कठपुतली इतनी सुन्दर थीं कि हर किसी का ध्यानक चला  ही  जाता था। जब मेले  से घर आ रहे थे; रास्ते में एक नदी है; उसमें  सभी कठपुतलियों को श्रृद्धापूर्वक स्नान कराया ;चरण वंदना की; इसके बाद उनका मोह बढ़ता ही गया,घर लाकर सभी साथियों ने कठपुतलियों की सेवा खुशामद की, उनको तरह-तरह से सजाया  और आरती भी उतारी   पूरे र गाँव में तमाम हल्ला हो गया कि " मेले  से भगवान लाये हैं, लोगों  को दिखा भी नहीं रहे थे कि कहीं नजर न लग जाए ।

कठपुतली खरीदना और नचाना भी एक कला है जो हर किसी के पास नही होती है। कलाएं भी मनुष्य को महान बना देती है, जैसे-जैसे कला का विकास होता जाता है, वह चतुर और चालाक होकर कहता है - हम जादूगर हैं किसी को भी वश में कर सकते हैं । खेल ख़त्म होते ही अपना बयान बदल देता है और कहता यह कोई जादू नही हैं, ये तो हाथों की सफाई है। अब एक कलाकार धंधे में निकलता है और अपनी कला से कठपुतली का  सौभाग्य बदलता है। कलाकार पहले दुनिया की लम्बी-चौड़ी बातें करता है, दर्शकों की मानसिक स्थिति का अध्ययन करता है फिर अपना खेल शुरू करता है। खेल ख़त्म होते ही कलाकार पैसे पाकर खुश और दर्शक क्षणिक आंनद एवं पैसे लुटाकर खुश। कठपुतली नाच-नाचकर खुश होते जा रही है, कितने सौभाग्य की बात है, मानो उसमे श्रृद्धापूर्वक प्राण प्रतिष्ठा के मन्त्र फूंक दिया गये हैं जिससे वह इस तरह से समर्पित  होकर अपने और अपनो का मोह ही ख़त्म कर दी है। कलाकार भी अजीब है; कठपुतली से स्नेहपूर्वक व्यवहार करता है जबकि जानता है कि  यह  निर्जीव है; अपनी सजीवता को खो चूका है। इसके मूल में जो प्राण था; विकास था वह नष्ट हो गया है, फिर भी चंचल है,थोड़ी सी फूंक मारो उड़ने लगती है। कठपुतली हलकी लकड़ी से बनती है तभी तो शिल्पकार किसी भी भाग में तरासकर उसे रूप देता है। कलाकार और कठपुतली दोनों की एक ही राशि है, दोनों के मधुर सम्बन्ध हैं। कहते हैं कि जो जिसकी संगति करता है उसके गुण आ जाते हैं, यहां पर कठपुतली ना तो कलाकार बन जाती है; ना कलाकार कठपुतली हो जाता है। कलाकार कठपुतली नचाता है जब तक कठपुतली टूट न जाए, ख़त्म होते वह दूसरी कठपुतली खरीद लेता है। कलाकार इसी कला के दम पर कई पीढ़ी से जी रहा है और कठपुतली अपनी  सजीवता से अलग होकर दर-दर नाचती है,निर्जीव अपने  अस्तित्व को क्या समझेवह केवल नाचना जानती है;उसे ऊंच-नीच का कोई ज्ञान ही नहीं है। जिसके स्वभाव में बारम्बार गिरना ही लिखा है उसको एक बार चढ़ने का सिर्फ ख्वाब दिखा दो वह आसमान का तारा तोड़ सकने में समर्थवान बन जाता है। मुहावरा के अनुसार ही एक दिन सरेआम कलाकार  ने कठपुतली को हिमालय चढाने की बात कर देता है,कठपुतली भी कलाकार के कला पर सिर हिलाकर सहमत हो गई। कठपुतली;ख्वाब लेकर जैसे ही हिमालय की सफर शुरू करती है कि  दुनिया में त्राहि-त्राहि मच गई, रास्ते के सारे मुर्दे हंसकर खड़े हो गए और कठपुतली को अपना दर्द बयान किये। जब व्यक्ति दूसरे का दुःख-दर्द देखता है तो अपना दुःख याद करके रोने लगता है। ठीक इसी प्रकार कठपुतली की हालत देखकर मुर्दे रोकर समझाते हैं-
हम भी चढ़े थे हिमालय, मन में कुछ अभिमान थे।
एक तरफ थी खाइयां, एक तरफ श्मशान थे ।
ये कठपुतली ज़रा संभल के चलना, हम भी कभी इंसान थे।
हम लोगो ने भी यही गलती की  थी  जिसकी सजा भोग रहे है। काटों को घिसकर माथे पर लगाने से विद्वान् नहीं बन जाते हैं, विखंडन होना महानता नहीं है, अपनी  पीढ़ी का ख्याल रख। तुम्हारे सौभाग्य जीवन की हमें आशा-विश्वास सताएगा फिर भी पतली सुखी लकड़ी के सहारे चढ़ना चाहते हो तो कर्तव्यपूर्वक चढ़ो परन्तु उतरने का भी ख्याल रखना नहीं हमारे जैसे राह में मिलोगी या हिमालय में ही गला दिए जाओगे ।कठपुतली के मन में हिमालय चढ़ने की प्रवलता बढ़ते ही जा रही थी ,पौराणिक कथाओं का भी जिक्र करते हुए मुर्दे ने कहा विभीषण अपने स्वार्थ के कारण कुलद्रोही कहलाया । अपने वंश का नाश करके थोड़े ही समय तक पृथ्वी में सुख भोगने के कारण विभीषण की पीढ़ी समाप्त हो गया । युगों-युगों से हिमालय में चढ़कर गल जाने की परम्परा को स्वीकार करते हुए कठपुतलीअपने को सौभाग्यशाली समझकर हिमालय चढ़ने की हठधर्मिता से विमुख नहीं हुई । इधर दुनिया में कोहराम मच गया की कठपुतली अब फतह की परचम लहराने वाली है । कुछ मदारी भी डमरू की रागअलाप रहे थे,की हमारा खेल ख़त्म हुआ ।ईश्वर की क्या माया है;आधा धूप आधी छाया है, कहावत को लेकर कठपुतली हिमालय के निकट पहुँच गई । रास्ते में रो-रो कहा उसके पाँव के छालों ने,हिमालय जाने नहीं देते राह के दलालो ने । रवि अस्त होते आसमान में चित्ते पड़ते हुए दिखाई देने लगा;मानो आकाश अपनी वेदना को प्रकट कर रहा है, वस्तुतः प्रकृति ने अपनी प्रवृत्ति को सदा की तरह संयमित रखने की उम्मीद पर कुछ कलाये प्रस्तुत की है । कठपुतली कलुष कालिमा को देखकर खामोश रह जाती है,ह्रदय का जख्म आँखों में उतर आयी,अरमानो की अर्थी उठने लगी,भावनाएं जमकर इस्पात हो गई और उम्मीद पर वेडिया लग गई । रास्ता कंटकमय  हो गया, हवाएं विपरीत चलने लगी,विपत्तियों के बादल मडराता जा रहा था पर कठपुतली हिम्मत नही हार रही थी । कठपुतली को नाचने का अभ्यास रही है इसलिए वह कहीं भी पाँव रख लेती थी,गिरती नहीं थी । कहते हैं की जो कई बार किसी राह से गुजर जाए तो वह अँधेरे में भी चलेगा तो उसके पाँव सही जगह पर ही मढ़ता है । कठपुतली को चलते रात हो गई फिर भी उसके पाँव जमते ही जाते थे और अंततः शिखर तक पहुंच ही गई ।
डी.ए.प्रकाश खाण्डे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,जिला -अनूपपुर म.प्र .


सोमवार, जून 22, 2020

हे वीर पुरुष (कविता)--डी.ए.प्रकाश खाण्डे


हे वीर पुरुष
=======
हे !भारत के वीर पुरुष,
प्रगतिऔर उत्थान करो |
शत्रु विदारण करने को,
हे! राष्ट्र भक्त प्रस्थान करो ||
उत्तर और पश्चिम के शत्रु से,
हे ! संरक्षक सावधान रहो |
सरहद पर चीनी घोलने का,
हे ! वीर पुत्र संज्ञान करो ||
कसो सिकंजा दुष्ट चीन पर,
उदीची का अभिमान हरो |
राष्ट्रवाद और मानवता का,
जग में नव विहान करो ||
शत्रु सदा हुआ पराजय,
लेके तिरंगा अभियान करो |
विपदा तम को हरने वाले,
उत्तर पश्चिम दिनमान करो ||
सीमा पर क्यों सिर टकराता,
शौर्य पूर्ण निदान करो |
भारत के जन जन को,
हे ! वीर पुत्र आह्वान करो ||
इतिहास हमारा अमर रहे,
कुछ ऐसा विधान करो |
दुष्ट दमन करने को,
निश्चय अब उड़ान भरो ||
रिपु उदंड है;घोर घमंड है,
शत्रु का अवसान करो |
गलवान हमारा हो बलवान,
पावन भारत का गुणगान करो ||
बहुत किया परहेज चीनी से,
अब चीनी नुकसान करो |
शत्रु विदारण करने को,
हे !वीर पुत्र प्रस्थान करो ||
डी .ए.प्रकाश खाण्डे अनूपपुर म .प्र

गुरुवार, जून 18, 2020

भारत के वीर सपूत(कविता)- डी.ए.प्रकाश खांडेकर


भारत के वीर सपूत
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भारत के सब वीर जवान,
सीमा पर सीना ताने हैं।
वतन प्रेम पर हुए फ़िदा
अब हम दुश्मन पहचाने हैं।
साहस- धैर्य,कर्तव्य अडिग,
जो सेवा धर्म निभाते हैं।
देश प्रेम पर अमर सपूत,
अपना महक बिखराते हैं।
मात-पिता का सुआज्ञाकारी,
योद्धा-कर्मवीर कहलाते हैं।
पावन भारत भूमि के खातिर,
सरहद में परचम लहराते हैं।
हे !भारत के  वीर बहादुर,
निश्चय बैरी पर हुंकार भरो।
गिलगित से गारो पर्वत तक,
अब शत्रु सदा संहार करो।

©️डी.ए.प्रकाश खाण्डे,
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़, जिला-अनूपपुर म .प्र .
मो .९१११८१९१८२
ईमेल -d.a.prakashkhande@gmail.com

उधारी (लघुकथा) --डी.ए.प्रकाश खाण्डे

उधारी (लघुकथा)

    
आज सुबह से ही बारिस हो रही थी .....। मंहगू जैसे ही बिस्तर से उठता है; वह अपने खाली खेतों के बारे मे सोचने लगता है। तब तक उसकी पत्नी बरामदे में झाड़ू लगा चुकी थी और रसोई घर की ओर बढ़ती है।  मंहगू को देखकर जोर से आवाज लगाती है-"सोये रहोगे! आषाढ़ आ गया है।"  मंहगू झट से तैयार हुआ और रात का बचा हुआ भोजन खाकर मन ही मन सोंचता है-''अब आषाढ़ लग ही गया है, खेत में धान का थरहा रख देना चाहिए।"  यह विचार करते हुए; अपनी गरीबी को छिपाते हुए दुकानदार के पास जाता है, चारों तरफ किसानो की  भीड़ लगी  हई  थी । आज के समय में देशी धान बोने  के वजाय हाइब्रिड धान का प्रचलन तेजी से हुआ है, मंहगू का मन भी हुआ कि  इस वर्ष हाइब्रिड धान की रोपाई करना है पर लाकडाउन की  वजह से कहीं मजदूरी नहीं कर पाया था जिसके कारण उसके पास धान बीज खरीदने के लिए पर्याप्त रूपए नही थे। मन में अपने मेहनत पर भरोसा करके इस वर्ष अच्छी पैदावार करने की सोंच को सकारात्मक करते हुए, दुकानदार से २० किलो हाइब्रिड धान मांगा, दुकानदार मंहगू के हाव-भाव को देख कर प्रसन्न हो रहा था। दुकान पर बीज खरीदने वाले किसानों की  भीड़ लगी  हई  थी, सब नकद धान बीज ले रहे थे और दुकानदार दे भी नही रहा था।  मंहगू के 20 किलो धान की कीमत 250 रुपये किलो की दर से 5000  रुपये हुआ।  मंहगू अपने जाकिट के खीसा से 2000 रुपये निकाल कर दुकानदार को देता है और विनम्रता से कहा-शेष फसल काटने के बाद।  दुकानदार मुस्कुरा कर कहता है-आप धन्य हैं। दुकान पर सभी किसान उधारी देखकर दंग रह गए। दुकानदार मंहगू से कहता है-"उधारी का मतलब ये नही कि आपके पास रुपये नही है, मतलब ये नही की आप मजबूर हैं, मतलब ये नही की मैं सिर्फ नकद बेचता हूँ । उधारी का मतलब है कि -आप कितना सक्षम हैं, आप में विश्वास, ईमानदारी, वचन की कीमत और प्रतिष्ठा कितनी है।  मंहगू धान बीज पाकर; दुकानदार के लिए प्रकृति से प्रार्थना करता है। हे! परमात्मा, इस दुकानदार का व्यापार अच्छा फले-फूले।
दुकानदार, मंहगू को अंत में कहता है- "हे! अन्नदाता; आप जैसे वचनधारियों के कारण ही मेरा व्यापार चलता है।

डी.ए.प्रकाश खांडेकर, शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़ अनूपपुर म.प्र .

बुधवार, जून 17, 2020

सावन में आग लगी (सवैया): डी.ए.प्रकाशखांडेकर


सावन में आग लगी (सवैया)
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भोर भयो जब आँख खुली तब,
काग फिरे चंहु व्याकुल बोला  |
सावन में अब आग लगी जब,
सांझ सकार सबै पट खोला ||


खेत किसान खिझाय रहे सब,
दूभर होगय भातन रोटी |
नागर पाथर दूर भयो अब,
जेखर भैसन तेखर लाठी ||


सावन में जब आग लगी तब,
मीन जरै सब राख लगायो |
वारि तरुवर खूब हँसै सब,
जीव धरा पर टेर लगायो ||


सोंच विचार करो पढ़ने सब,
भूख पियास सबै मिट जायो |
कौन गरीब अमीर भयो अब,
डीएप्रकाश सबै सुधि लायो ||

सोवत जागत बात करें सब
पावन सावन है अकुलानी |
कानन से खग भाग गयेअब
रोवत हैं सब बादर पानी ||


दादुर मोर कपोत सबै मिलि
जीव चराचर लाज बचावें |
सावन मे दुख भोग रहें सब
प्रकाश विलोकि आग बुझावे ||



मैं डी.ए.प्रकाश खाण्डे घोषणा करता हूँ की उक्त रचना मेरी मौलिक है |
[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर इमेल करें अथवा ✆ 8982161035 नंबर पर व्हाट्सप करें, कृपया देखें-नियमावली] 

शनिवार, जून 13, 2020

विटप :डी.ए.प्रकाश खाण्डे


विटप

तुझसे बहार आए,
तुझसे आहार आए |
तुझसे नीर-हवाएं ,
एक पौधा हम लगाएं ||

सब जीवो का आधार,
पानी,पवन और वयार |
पर्यावरण की है पुकार,
दो बच्चेऔर वृक्ष हजार ||

विटप विपुलता से भरे,
बारिस निश्चित होता है |
विनयशील मानव बने ,
चहुँ दिशि शीतल होता है ||

आज न काटें वृक्ष हम,
आगे की परवाह करें |
वृक्ष हमारे मित्र सम ,
नित जीवन निर्वाह करें ||

हरे-भरे वृक्ष जहाँ पर,
बच्चे मन मौज उड़ाते हैं |
वृक्षों को प्रकृति मानकर,
निस दिन जल चढ़ाते हैं ||

डी.ए.प्रकाश खाण्डे, अनूपपुर म.प्र.
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गुरुवार, जून 11, 2020

पावस पर्व (कविता)--डी.ए.प्रकाश खाण्डे


पावस पर्व
पावन पावस पर्व प्रकृति का,
बूंदो का बौछार जहां।
वन-उपवन आलिंगन करते ,
नदियों की सौ धार जहां।
मृदा मृदुल; हो जाती है,
पर्ण प्रसून अम्बार जहाँ।
पशु-पक्षी प्यास बुझाते ,
हरियाली श्रृंगार जहाँ।
धरती की आभा से सब,
नित उड़ते पर्जन्य जहाँ।
मोर नाचता पंख पसारे ,
पावस ऋतू है धन्य जहाँ।
आषाढ़ सावन और भादों में,
सुन्दर सुखमय हों किसान।
वर्षा जल संरक्षित करके ,
जग में अपनी हो पहचान।
हरियाली और कजलियाँ ,
मिल-जुल पावस पर्व मनाएं।
जल-वन और अन्न का हम ,
पावन प्रकृति पर्व मनाएं।
पावन पावस पर्व सुहावन,
पादप सभी लगाते हैं।
नदी प्रगति;मुदित सरोवर,
जल-थलचर हर्षाते हैं।
ऊषा से रजनी तक वर्षा,
नियम प्रकृति बतलातें हैं।
जल- समीर सुवासित हो,
हम सुपावस पर्व मनाते हैं।
Ⓒडी.ए.प्रकाश खाण्डे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,जिला--अनूपपुर(मध्यप्रदेश)

बुधवार, जून 10, 2020

शिक्षा से रिश्ता (लघु कथा )- डी.ए.प्रकाश खाण्डे


शिक्षा से रिश्ता

गाँव में एक गरीब परिवार का बालक था जिसे किसी भी समाज के लोग पसंद नहीं करते थे पर  अपने माता -पिता के लिए वह लाडला प्यारा बेटा था। शांत स्वभाव होने के कारण माता-पिता ने उसका नाम ऋषि रख दिया था। ऋषि अपने नाम के अनुसार सिर्फ अपने लक्ष्य पर ध्यान देता था, खेल में उसकी रूचि नहीं थी जिसके कारण साथी लोग उसकी उपेक्षा करते थे। कम बोलता था तो गाँव के लोग उसे बेवकूफ समझते थे। हर कोई उससे नफरत करता था।

ऋषि बढ़ता गया और गाँव के विद्यालय से हायर सेकंडरी उत्तीर्ण होकर उच्च शिक्षा के लिए पास के विश्व विद्यालय में प्रवेश लेकर अध्ययन करने लगा। फिर भी गाँव वालों की नजर  में वह गँवार  ही था। माता-पिता के आशीर्वाद से वह एम्.एससी. कर लिया। साथ ही नेट पास कर लिया। समय बदलता गया, माता-पिता के मेहनत का रंग दिखने लगा। फिर भी उसे कोई बेटा, भाई कहकर नहीं बोलता था। यहाँ यह कहावत चरितार्थ होता है "बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद" जहां शिक्षा का अभाव हो वह गाँव सिर्फ धन को ही महत्व देता है। ऋषि के पास तो योग्यता थी कि वह शासन के उच्च पदों  में जाए।

सौभाग्य से शासन ने सहायक प्राध्यापक का पद निकाला और ऋषि का चयन हो गया। माता-पिता में अपार खुशियां आयी। ऋषि की तपस्या पूर्ण हुई। होली में ऋषि गाँव आया  जो साथी उससे बोलते नहीं थे वे लोग यार-दोस्त कहकर बात करने लगे। जो लोग देखते तक नहीं थे वे बेटा कहकर बोलने लगे। समाज के सभी लोग ऋषि से आत्मीय रिश्ते से सम्बोधन करने लगे। शिक्षा; समाज में बदलाव लाती है, वैचारिक क्रान्ति लाती है , बेरिश्तों को रिश्तों में पिरोती है, समाज में खुशियां लाती है।

आज पूरे गाँव के लोगों ने ऋषि के साथ आत्मीय रिश्ता जोड़ लिया उन सभी के सोच-विचार में बदलाव आ गया, रिश्ते की असीम धारा बहने लगी शिक्षा से ऋषि के रिश्तों में बदलाव आया



रचनाकार -डी.ए.प्रकाश खांडे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,जिला -अनूपपुर मध्यप्रदेश

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...