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सोमवार, मार्च 08, 2021

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : कब और क्यों - सुरेश यादव



हम सब आज के दिन को अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मना रहे हैं ? लेकिन क्या हम जानते हैं आज ही के दिन को महिला दिवस के रूप में क्यो मनाया जाता है ?

अगर हम कारण जानना चाहते हैं तो हमे 110 वर्ष पहले का इतिहास देखना होगा । जब आज ही के दिन न्यूयार्क की सड़कों पर 15 हजार से ज्यादा महिला कामगारों ने काम के घन्टे तय करने ,मातृत्व अवकाश ,समान वेतन औऱ देश के चुनाव में मताधिकार  की मांग को लेकर आंदोलन शुरु किया था । 

1 वर्ष बाद 1909 में अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी ने इस तारीख को राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित कर दिया ।

1910 में कॉपेनहेगेन  में महिला कामगारों के अन्तराष्ट्रीय सम्मलेन में एक अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता  *क्लारा जेटकिन* ने इस तारीख को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने का सुझाव दिया ,जिसे उपस्थित सभी सदस्यों ने मान लिया। 

और अगले वर्ष 1911 में 4 राष्ट्रों में इसे मनाया जाने लगा ।
इसके बाद 1975 में इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने अधिकृत मान्यता प्रदान कर दी ।और पूर्ण वर्ष को महिला वर्ष के रूप में,घोषित कर दिया ।

अमेरीका और रूस में आज के दिन महिलाओं को विशेष अवकाश मिलता है तो चीन में महिलाओं के लिए आधे दिन की छुट्टी रहती है ।साथ ही कुछ देशों में तो आज राष्ट्रीय अवकाश  रहता है ।

क्या आप जानते है कि " अन्तराष्ट्रीय पुरुष दिवस " भी मनाया जाता है 19 नवम्बर 1990 से इसकी शुरुवात हुई है । और 60 देशों में इसे मनाया जाता है ।लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ से इसको अब तक मान्यता नही मिली है ।

तो साथियों जिस प्रकार मई दिवस या मजदूर दिवस कामगारों के आंदोलन से उपजा उसी प्रकार महिला दिवस भी कामगारों के आंदोलन की उपज है। 

सुरेश यादव  @ इंदौर
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शनिवार, अप्रैल 25, 2020

एक तरफ़ महँगाई की मार दूसरी तरफ आय में कटौती: सुरेश यादव


एक तरफ़ महँगाई की मार दूसरी तरफ आय में कटौती

कौरौना जैसी वैश्विक महामारी से न सिर्फ देश बल्कि लगभग सम्पूर्ण दुनिया अपने घरों मैं कैद हो गयी। देश में एक माह तक आर्थिक,  वाणिज्यिक,
उत्पादन एवं निर्माण की गतिविधियां बन्द रहीं। आपातकालीन  को छोड़कर स्वास्थ्य सुविधाएं भी
कार्यालय, सब्जी-फल-फूल और कृषि उपज मंडियां भी बन्द रहीं, रोजमर्रा का जनजीवन ठप रहा। कुछ शर्तों के साथ आज से ग्रामीण इलाकों में राहत प्रदान की गई है।

मैंने हमारे शिक्षक साथियो से पूछा कि इस लोकडॉउन से हमारे आसपास  क्या- क्या प्रभावित हुआ, आप क्या महसुस करते हैं?  साथियों ने अपनी आर्थिक बचत, हमसे जुड़े दिहाड़ी कामगारों, घरों में सहयोग आने वाली बहनों, लॉन्ड्री, सब्जी, सलूंन,ब्यूटी पार्लर, किराणा, और सीजनल काम करने वाले लोगों जैसे ज्युस आइस्क्रीम, मेलों और साप्ताहिक बाजार में छोटा  काम करने वाले और रेहड़ी गाड़ी लगाकर व्यवसाय वाले निर्माण कार्यों और बाजार तथा इन सब  में सहायता करने करने वाले मजदूर और इनकी सम्पूर्ण आर्थिक श्रृंखला प्रभावित हुई ।

सामान्य समझ की बात है। एक माह में सभी आर्थिक गतिविधयां ठप होने से अगले वित्त वर्ष में जहां उत्पादन में कमी आएगी,  राजस्व प्राप्तियों में भी गिरावट होगी। निजी क्षेत्र और बाजार का मुनाफा भी कम होगा,  इस आर्थिक चक्र का प्रभाव हम पर होना स्वाभाविक है।

कहने का आशय यह है कि देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था बैपटरी हो गई है एवं अगले वित्त वर्ष में इसमें विकास की अपेक्षा संकुचन की आशंका है। यह बात सोचने के लिए अर्थशास्त्री होने की आवश्यक्ता नहीं है।

उत्पादन में कमी के कारण मांग और पूर्ति का संतुलन  बिगड़ेगा और महंगाई में वृद्धि होने की आशंका सदा बनी  रहेगी।

उत्पादन और राजस्व वसूली में कमी  के कारण  केंद्र व राज्य सरकारों को  अपने खर्चों में कटौती करना ही हैं। केंद्र सरकार ने खर्चों में  कटौती करने के क्रम में सांसदों के वेतन में 30% की कटौती आगामी 12 माह एवं सांसद को प्राप्त होने वाले विकास निधि पर 2 वर्ष के लिए रोक दी है। अब केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के महंगाई भत्ते एवं पेंशनरों की महंगाई राहत की 18 माह तक मिलने वाली किश्त रोक दी हैं। लेकिन आश्चर्य की बात है यह कटौती केंद्रीय सुरक्षा बलों पुलिस एवं केंद्र सरकार के स्वास्थ्य कर्मियों पर भी की गई है। जो लॉकडॉउन के इस मुश्किल दौर में दिन-रात देश की सेवा कर रहे हैं।

राज्य सरकारें भी इसका अनुसरण करेंगी। कुछ राज्य जैसे महाराष्ट्र, तेलंगना, राजस्थान में मार्च माह के  वेतन में ही कटौती प्रारम्भ कर दी गई थी व केरल  सरकार तो 5 माह के लिए  अपने कर्मचारियों के वेतन से 20 % कटौती करने का निर्णय लिया है। आप सभी जानते है मध्यप्रदेश में D.A. में वृद्धि जुलाई 2019 से नही हुई है, और अब जून 2021 तक नहीं मिलना तय  है। आप जानते है कि 18 माह तक DA नही मिलने से मूल वेतन का लगभग 124 % वेतन  प्राप्त नहीं होगा और यदि 24 माह का DA भुगतान नही किया गया तो मूल वेतन का लगभग  244 % वेतन नहीं मिलेगा।

चूंकि सरकारें इतना बड़ा कदम उठा रहीं है तो निजी क्षेत्र भी इसी तरह काम करेगा, यही नहीं  वहाँ  तो छटनी और रोजगार में कमी की भी आशंका है।

इसका सीधा सीधा असर हमारी ख़र्च की आदत पर पड़ेगा  और हमसे जुड़ी आर्थिक श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हो जाएगी  कई लोगो के रोजगार छीन जाएंगे। खर्च में कमी आएगी मंदी से उबरने की सम्भावना कम होती जाएगी ।

चूंकि  सरकार  ऐसे मुश्किल वक्त में  कड़े फैसले ले सकती है  और उसे व्यापक जन समर्थन मिलता है, लेकिन इस प्रकार से आम जनता के विरुद्ध  फैसले लेने से सरकारों को बचना चाहिए।

कर्मचारियों का प्रतिनिधि होने के नाते सरकारों से आग्रह है कि इस फैसले पर पुनर्विचार करें और यदि यह निर्णय आवश्यक ही हो गया हो तो
(1) सरकारें रोजमर्रा से जुड़ी वस्तुओं जैसे किराना, पेट्रोल, खाद्यान्न, सब्जियों के दाम नियंत्रित करें, बस-रेल, बीमा, स्वास्थ्य, बैंकिंग सेवाओं के दाम अगले जून  तक नही बढ़ने दें।
(2) सरकारें सुरक्षाबलों, अर्द्ध सैनिक बलों और कोरोना योद्धा के रूप में कार्य कर रहे  लोगों के महँगाई भत्ते की बढ़ोत्तरी  पर किसी प्रकार की रोक न लगाएं।
(3) पेंशनरों को इस फैसले से मुक्त रखें।
(4) कर्मचारियों को आयकर में उतनी राशि  का स्टेनडर्ड डिडक्शन प्रदान किया जाए जितना महंगाई भत्ते का लाभ वे प्राप्त करते।
(5) EMI वसूली पर तीन माह की रोक के साथ साथ इस अवधि  के ब्याज पर भी रोक लगाई जाए।
(6) राज्य कर्मचारियों से वृत्तिकर न वसूलें।
(7) सरकारें अपने विलासितापूर्ण खर्चो पर रोक लगायें।
(8) बिजली, सड़क, पानी,  स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा को छोड़कर कोई नया निर्माण कार्य प्रारम्भ न किया जाए।
(9) बड़े उद्योगों को राहत पैकेज न देकर, लघु और कुटीर उद्योगों को राहत दें।
(10) गरीबों को अगले 18 माह का राशन निःशुल्क प्रदान किया जाए।

हम कर्मचारी और देश का मध्यम वर्ग सरकार के प्रत्येक फैसले में उसके साथ है हमारी अपेक्षा है कि सरकार भी हमारे साथ रहे। कुछ साथी कहेंगे कि सरकार मजबूत हाथों में  बेशक सरकार मजबूत हाथों में है लेकिन हमारे हाथ मजबूत होंगे तो हम सरकार को और मजबूत करेंगे।

सुरेश यादव
रतलाम/इंदौर

गुरुवार, अप्रैल 23, 2020

अफवाहों पर हत्या और मीडिया की भूमिका :सुरेश यादव


महाराष्ट्र के पालघर में जो हुआ समाज को शर्मशार करता है इससे पहले बुलन्दशहर के पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या, राजस्थान के बूंदी में करतब दिखाने वाले बच्चों की बेरहमी से पिटाई , राजकोट में कचरा बीनने वाले दम्पत्ति की पिटाई कर के हत्या, मनावर में इंदौर के किसानों की हत्या या ऊना में दलित युवकों की पिटाई की घटनाओं सहित अनेकानेक  घटानायें आप के अवचेतन में है तो आप जानते होंगे कि उक्त सभी घटनाओं का एक ही कारण है, "सन्देह"। इस प्रकार की घटनायें  बच्चा चोरी, चोरी, गौवध  के सन्देह के आधार पर कई वर्षों से होती आई हैं।

सोशल  मीडिया के इस दौर में इनकी घटनाओं की पुनरावृति बहुत तेजी से हो रहीं है। लेकिन हम देख रहें हैं, इन घटनाओं की  उत्पत्ति के पीछे  मुख्यधारा के मीडिया  की भूमिका भी संदिग्ध और गैर जिम्मेदाराना है। मैं ज्यादा नही लेकिन इंदौर औऱ रायसेन के ही कुछ उदाहरण आप के समक्ष प्रस्तुत करना चाहूँगा,  जहाँ  दो  फल बेचने वाले लड़कों को लॉकड़ाउन के प्रारंभिक समय में भीड़ ने उनकी गलत पहचान के आधार पर पीट दिया। घटना के बाद उनकी पहचान  हिन्दू निकली लेकिन मुख्यधारा के मीडिया ने उक्त घटना पर  गलत रिपोर्टिंग की और सच्चाई सामने आने पर  कोई सफाई प्रस्तुत नही की। इसी तरह पैसा फेंकने की दो घटनाएँ  मीडिया  में  इस प्रकार रिपॉर्ट  की गईं जैसे किसी ने कोरोना फैलाने के उद्देश्य से नोट फेंके हों,  उक्त दोनों ही घटनाओं में पैसों के दावेदार  एक LPG गैस हॉकर और एक पुलिसकर्मी निकले, लेकिन मीडिया ने उक्त घटनाओं की गलत रिपोर्टिंग  पर कोई  सफाई प्रस्तुत नहीं  की। आज भी वही समाचार कतरने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहीं हैं और नोट फेंकने की तथाकथित अन्य घटनाओं का कारण बन रही हैं। इसी प्रकार रायसेन में फलों पर थूक लगा कर बेचने का जनवरी माह  का वीडियो  कोरोना के दौरान वायरल हुआ और पुलिस ने बुजुर्ग पर प्रकरण दर्ज कर लिया जांच में यह जानकारी मिली कि  यह वीडियो जनवरी माह का है और बुजुर्ग मानसिक बीमार है।

सम्भवतः आपको मालूम होगा, वर्ष 2000 में जब हम नई सदी में प्रवेश कर रहे थे दुनिया भर की एक  सबसे बड़ी अफवाह आकार ले रही थी, ' सदी बदलते ही दुनिया के सभी कम्प्यूटर समाप्त हो जायेगें’ इसे Y2K कहा गया था। इस अफवाह की उत्पत्ति इंगलैण्ड के एक टेबलॉयड (अखबारों का एक प्रकार जो शाम को छपते हैं और उनकी खबरे सनसनी फैलाने का कार्य करतीं है) से हुई थी जिसने एक सॉफ्टवेयर कंपनी के हवाले से यह समाचार छापा था। इस अफवाह का हश्र आप जानते ही हैं।

असल में पालघर जैसी घटनाएँ हमारे समाज की उस विकृत मानसिकता का परिचायक है जो चाहती है कि फैसले का अधिकार भीड़ के पास हो, यह मानसिकता विधि द्वारा स्थापित न्याय और प्रक्रिया में समय व्यतीत नही करना चाहती।

मुझे आशंका है कि लॉकडॉउन के दौरान अविश्वास का जो वातावरण बनाया गया है। लॉकडॉउन के बाद पैसा फेंकने,फलों को दूषित करने या थूकने की घटनाओं के नाम पर कई विवाद होंगे।

आप सभी से निवेदन है कि  आप को किसी पर कोई सन्देह है तो कानून की सहायता लें और उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनने से स्वयं भी बचें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बचाएं।

मंगलवार, मार्च 31, 2020

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के 10 वर्ष: सुरेश यादव


शिक्षा का अधिकार अधिनियम  को 10 वर्ष पूर्ण हो गए । एक शिक्षक होने के नाते कह सकता हूँ कि -निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के अंतर्गत देश के 6 से 14 वर्ष तक के अभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की सुविधा प्रदान की गई। लेकिन  लगता है नीति निर्माताओं का लक्ष्य सिर्फ छात्रों के नामांकन तक ही सीमित था, ठहराव के लिए ,निःशुल्क गणवेश, मध्यान्ह भोजन एवं पाठ्यपुस्तकों की व्यस्वथा कारगर साबित नही हुए। कागजों पर छात्रों के नामांकन तो 6 से 14 वर्ष  की आयु तक निरंतर होते रहे लेकिन, बहुत बड़ी संख्या में कक्षाओं में अनुपस्थिति  चिंता का विषय रही । इसे  हम विद्यालयों में वास्तविक ठहराव नही कह सकते कोई भी शिक्षक इस विषय पर खुल कर बात नही कर सकता क्योंकि इस कमी  केलिए शासन के नीति निर्माता शिक्षक को ही जिम्मेदार ठहरा देंगे । असल मे इस सबके  लिए क्षेत्र के भौतिक ,आर्थिक एवं सांस्कृतिक कारक जिम्मेदार हैं। इन पर कार्य करना आवश्यक  है। निजी विद्यालयों की 25 % सीट वंचित वर्गों के लिये आरक्षित की गई -सतही तौर पर यह कदम हमें क्रांतिकारी नजर आता है परन्तु इस कारण कस्बों व उनके आस पास के शासकीय विद्यालय  छात्र विहीन हो गए ।  इस तथ्य का समर्थन सरकारी आंकड़ें स्वयं करते है ,सरकारी विद्यालयों में छात्र उसी अनुपात में कम हुए जिस अनुपात में निजी शालाओ में छात्र संख्या को बढ़ाया गया।

हम प्रायःसमाचार पत्रों में यह रिपोर्ट देखते है कि किसी बड़े विद्यालय से इन छात्रों को गणवेश विभिन्न प्रकार के  शुल्कों  की कमी या सामाजिक - आर्थिक असमानताओं के कारण शाला से निकाल दिया गया इस प्रकार यह कार्य छात्रों में हीन भावना को बढाने वाला साबित हुए।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन - यह कार्य छात्र के समग्र एवं निरंतर  मूल्यांकन के लिए अत्यंत आवश्यक है परंतु जिन छात्रों ने अध्ययन नहीं किया या नियमित विद्यालय में  उपस्थित नहीं हुए उन्हें भी सिर्फ एक टेस्ट के माध्यम से कक्षोन्नत करना होता है,  इन वर्षों में कुछ छात्र ही रुचि के साथ अध्ययन करने में अग्रसर थे बाकी अन्य उदासीन थे और अभिभावक तो छात्रों से भी दस कदम आगे निकले। बिल्कुल उदासीन और बेपरवाह। यदि शिक्षक छात्र के घर गृह संपर्क पर गए तो उन्होंने शिक्षक की जरूरत समझी स्वयं की नहीं । अधिनियम में पालक की भी जिम्मेदारी तय की गई थी, लेकिन इसपर कोई अमल नही हुआ। अब कक्षा 5 वीं और 8वीं बोर्ड कर दी गई यह सिर्फ शिक्षक के सर पर दोष मढ़ने की पूरी तैयारी है, जबकि विभिन्न कक्षाओं में अब भी अनुत्तीर्ण नही किया जाना है, यह विरोधाभास है।

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का नामांकन - अधिनियम द्वारा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य विद्यालयों  में दर्ज करने के नियम हैं परन्तु न तो शिक्षक इसके लिए प्रशिक्षित हैं न ही विद्यालयों  में उनके अध्यापन की।

शिक्षकों की कमी - अधिनियम शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए कहता है, न्यूनतम पैमाना प्राथमिक विद्यालय में 2 शिक्षकों और माध्यमिक विद्यालय में 3 शिक्षकों का  है लेकिन जो न्यूनतम पैमाना तय किया गया है, राज्य सरकारें उनकी भी पूर्ति नही कर पाई  हैं।  निजी विद्यालयों में न्यूनतम  प्रशिक्षण योग्यता  की पूर्ति करने के लिये केंद्र  द्वारा अब जाकर  दूरस्थ पाठ्यक्रम तैयार किया गया । वर्तमान में प्राथमिक शालाओं मे 5 शिक्षक और माध्यमिक शालाओं मे विषयवार 6 शिक्षकों की पूर्ति असंभव लगतीं है।

शिक्षकों की समस्याओं का निराकरण -अधिनियम में शिक्षकों की सुविधा और समस्याओं के निराकरण की व्यवस्था तो है लेकिन   धरातल पर ऐसा कुछ नजर नही आता, यही नहीं  शिक्षको के वेतन भत्ते तय करने का अधिकार भी राज्य सरकार के पास होने से देश भर में एकरूपता नहीं  है। अधिनियम में शिक्षा की असफलता की जिम्मेदारी सिर्फ शिक्षक पर क्यों ??? इन वर्षों में शिक्षा छात्रों की पहुँच से और दूर हुई, शिक्षकों को सिर्फ आंकड़ों को सजाने में व्यस्त रखा गया है। शिक्षक को पढ़ाने का समय कम उपलब्ध हुआ, सरकारी शिक्षक चाह कर भी इस दुर्दशा को देखने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता। शिक्षक को शाला चलाने की रूपरेखा अपनी आवश्यकता अनुसार बनाने का अवसर प्राप्त हो। शिक्षक के प्रतिवेदन पर छात्रों की अनुपस्थिति के लिए जिम्मेदार लापरवाह पलकों पर कार्यवाही हो। शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्य से मुक्त हों। शाला की सफाई के लिए सुस्पष्ट नीति बने। और उसका अलग बजट हो। स्थानीय प्रशासन शिक्षकों  को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने उन्हें बदनाम करने  की अपेक्षा शिक्षा स्तर क्यों गिरा इसकी समीक्षा  करे। अधिनियम के अनुसार शिक्षा सभी को मिलना जरूरी है पर  अध्यापन पर बार-बार प्रयोग बंद होने चाहिए। शिक्षकों को कटघरे में खड़ा करने के स्थान पर   पालकों की भी जिम्मेदारी तय की जाए। शिक्षकों से वर्ष भर कोई गैर शैक्षणिक कार्य न कराये जायें।  छात्रों को परीक्षा में अनुत्तीर्ण करने का नियम पुनः लागू हो । वास्तविकता यह है कि    अधिनियम में शिक्षक अपने आप को प्रतिबंधित मानता है क्योकिं  समस्त अधिकार वरिष्ठ अधिकारियों में निहित है। शिक्षकों की अभिव्यक्ति प्रतिबंधित है या कहें शैक्षणिक योजना निर्माण मे शिक्षकों कि कोई भूमिका नहीं है। जिसके चलते शाला हित ,छात्र हित, शिक्षक हित प्रभावित हो रहा है । शिक्षक और शिक्षाविदों से विचार अपेक्षित है। जिसके चलते शुचिता एवं वैचारिक स्वत्रंत्रता मिल सके।

समीक्षा हो दोषारोपण नहीं- 10 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में कई चढ़ाव-उतार आए। कई प्रकार के प्रयास किए गए किंतु जहां तक मैं समझता हूं शिक्षा को सरल और सहज बनाने की अपेक्षा उसे और अधिक जटिल बनाया गया। कुल मिलाकर मैं इस अधिनियम के संबंध में यह समझ पाया हूं कि जिन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर यह कानून बनाया गया था हम उन उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो पायी है। हां इसके कुछ सकारात्मक पहलू हो सकते हैं जैसे प्रत्येक गाँव मे प्राथमिक शाला प्रत्येक 3 किलोमीटर मे माध्यमिक शाला, भवन शौचलाय की उपलब्धता किंतु वह अपेक्षा के अनुरूप  नहीं है। शिक्षा के बेहतर परिणाम के लिए शासन द्वारा बनाई गई बेहतर शिक्षा नीति और अध्यापन  के लिए शिक्षक और अध्ययन  के लिए छात्र के घर में अध्ययन करने और नियमित शाला भेजने के लिए अभिभावकों का सजग रहना आवश्यक होता है । शिक्षकों का प्रतिनिधि होने के नाते कह सकता हूँ कि  भविष्य में प्रदेश के शिक्षक अधिनियम के अध्ययन-अध्यापन ,छात्र एवं ,शिक्षक हित विरोधी प्रावधानों के खिलाफ और नीति निर्माण मे शिक्षकों की भूमिका के लिए बड़ा आंदोलन भी कर सकते हैं।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं)

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...