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शनिवार, अक्टूबर 31, 2020

लौह पुरुष की ऐसी छवि:अनिल पटेल


लौह पुरुष की ऐसी छवि,       
न देखि न सोची कभी।    
आवाज मे सिंह सी दहाड़ थी,
हृदय मे कोमलता की पुकार थी।।    
एकता का स्वरूप जो इसने रचा,  
देश का मानचित्र पल भर मे बदला।।      
गरीवो का सरदार था वो,
दुश्मनो के लिए लोहा था वो।  
आंधी की तरह वहता गया, 
ज्वालामुखी सा धधकता गया।
बनकर गांधी का अहिंसा का शस्त्र, 
महकता गया विश्व मे कोई ब्रम्हास्त्र।
इतिहास  के गलियारे खोजते है जिसे,
ऐसे सरदार पटेल अब न मिलते पूरे विश्व मे।।      
खंड खंड  को जोड़ जिसने,    
अखंड राष्ट्र का सृजन किया।
उन शिल्पी वल्लभ को सबने, 
लौह पुरुष कह नमन किया।। 
खेड़ा से राण  मे  रखे कदम,
भर हुंकार बारदौली मे बोले।
न दे लगान कि रत्ती हम,   
वाणी मे थी सिंह गर्जना।    
पांच सौ  पैसठ रजवाड़ो को,
कूटनीति से विलय किया।।
रचना:अनिल पटेल,
ग्राम-पोस्ट नगनौड़ी, तहसील-जयसिंहनग
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बुधवार, जून 17, 2020

बारूद :अनिल पटेल


सम्हल जाओ ऐ दुनिया वालो,    
वसुंधरा पर करो घातक प्रहार नहीं।
प्रकृति करती आगाह हर पल 
प्रकृति पर घोर अत्याचार नहीं॥

लगा बारूद पहाड, पर्वत उडाए,
स्थल रमणीय सघन रहा नहीं।
खोद रहा इन्सान खुद कब्र अपनी,
जैसे जीवन की अब  परवाह  नहीं॥

लुप्त  हुए  अब झील और झरने
वन्यजीवों को मिला मुकाम नहीं।
मिटा रहा खुद जीवन के अवयव 
धरा  पर बचा जीव का आधार नहीं॥

नष्ट किये हमने हरे भरे वृक्ष, लताएं  
दिखे कहीं हरियाली का अब नाम नहीं।  
लहलहाते थे कभी वृक्ष हर आंगन में     
बचा शेष उन गलियारों  का श्रंगार नहीं॥
   
कहाँ  गये  हंस और कोयल गौरैया,
गउओं का घरों में स्थान नहीं।   
जब बहती थी कभी दूध की नदियाँ 
कुओं, नलकूपों में जल का नाम नहीं॥

Ⓒअनिल पटेल,
नगनौड़ी, तहसील-जयसिंहनगर जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)
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मंगलवार, जून 16, 2020

सृष्टि विकासशील है: अनिल कुमार


सृष्टि विकासशील है    
एक व्यक्ति अच्छी कविता लिखता है,
भाषा विज्ञान का पण्डित है,
एक व्यक्ति ने राजनीति में कमाल हासिल किया है।
एक व्यक्ति अच्छा संगीतज्ञ है,
एक व्यक्ति चित्रकार है,
एक व्यक्ति अभिनेता है,
सारांश कोई कुछ है, कोई कुछ है,
सबमें  विभिन्नता है।
सबका  दिलो-दिमाग अलग-अलग है,
ऐसा होता रहा है, ऐसा हो रहा है ऐसा होता रहेगा।
सृष्टि में तरह-तरह के फूल खिलते रहेंगे,
और सृष्टि चलती  रहेगी।
ये विभिन्न फूल फूलकर, अपनी सार्थकता समाप्त करते रहेंगे,
इन विभिन्नताओं के बावजूद सबमें कुछ एकताएँ हैं। 
सबको भूख लगती है,
सबको नींद आती है
सबको काम सताता है,
सबको डर लगता है,
साम्यवाद ने मानव समाज को आश्वासन दिया है,
लेकिन वह अधूरा है।
जिसमें सबकी आवश्यकताएं पूरी हो,
और सब स्वतंत्र रहें, वह तन्त्र कौन सा है?
 हमें उसी तन्त्र की प्रतीक्षा है।
क्या मानवता की आशा कभी पूरी होगी?
या वह सदा अधूरी रहेगी?
सृष्टि विकासशील है।
वह  विकसित होती रहेगी
और एक दिन मानवता का सपना सच होगा।

-अनिल पटेल
नगनौड़ी, तहसील-जयसिंहनगर जिला-शहडोल  


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बुधवार, सितंबर 04, 2019

पहली महिला शिक्षिका:सावित्री बाई फुले



आधुनिक युग में जहाँ बालिकाओं को पढ़ाने के लिए सरकारी सहायता दी जाती है। फिर भी बालिकाओं को उच्च शिक्षा तक जोड़े रखना कठिन महसूस होता है। तब सावित्री बाई फुले जैसी विदुषी को याद करना लाजिमी हो जाता है जिसने  तमाम विरोधों के बावजूद न केवल बालिकाओं को पढने-लिखने के लिए प्रोत्साहित किया बल्कि इसके लिए स्वयम अनेक विद्यालय भी खोले। सावित्री बाई फुले ने समाज से लड़कर देश की हर महिला के लिए पढ़ने का हक़ दिलाया। महिला शिक्षा के क्षेत्र में आज भी हमारा देश काफी पिछड़ा है। देश के कई हिस्से ऐसे है जहाँ आज भी बालिकाओं को पढ़ाया-लिखाया नहीं जाता।

ज़रा सोचिये आज से करीब 160 साल पहले क्या हाल रहा होगा और कल्पना कीजिए एक औरत के बारे में जिसने उस जमाने में महिला शिक्षा के लिए लोगों को प्रेरित किया। क्या कहेंगे आप उस महिला को?  भारत की उस बहादुर महिला  ने डेढ़ सौ साल पहले समाज के भारी विरोध के बाद भी देश की महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाई। वह महानायिका थी भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्री बाई फुले।

जन्म और बचपन

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले  का जन्म 3 जुलाई 1831 को हुआ था। सावित्री बाई फुले को  बचपन में स्कूल नहीं भेजा गया था क्योंकि उस  वक्त लड़कियों को पढ़ाना-लिखाना गलत समझा जाता था और ऐसा माना जाता था कि लड़कियों का काम शादी से पहले माता-पिता के घर की सेवा करना और शादी के बाद ससुराल की देखभाल करना ही होता है।

एक बार सावित्री कोई किताब पलट रही थी। यह देखकर उनके पिता बहुत क्रोधित हुए और सावित्री से किताब छीन ली। उनके पिता ने किताब ज़रूर छीन ली थी पर सावित्री के मन  से पढने का ज़ज्बा वे नहीं निकाल पाए।

ज्योतिबा फुले से विवाह और जिंदगी में बदलाव 

कहते है न जहाँ चाह है वहां राह है। 9 वर्ष की आयु में सावित्री का विवाह ज्योतिबा फुले से हुआ जो प्रसिद्ध समाजसेवक  और शिक्षक थे ज्योतिबा की देखरेख में सावित्री ने पढ़ना सीखा। 1848 में सावित्री ने भारी विरोध के बाद भी देश का पहला कन्या विद्यालय खोला। उस समय उस स्कूल में मात्र 9 बालिकाओं ने दाखिला लिया था।  सावित्री बाई उन बालिकाओं की मुश्किलें समझती थी क्योंकि जब सावित्री बाई स्वयं पढने जाती थी तो लोग उन पर भी पत्थर फेंकते थे और तरह तरह से परेशान करते थे। देखते ही देखते एक वर्ष में विद्यालयों की संख्या एक से बढ़कर पांच कन्या विद्यालयों की हो गयी।

सावित्री बाई फुले देश की पहली महिला शिक्षक तो थीं ही। उन्हें ही देश की पहली महिला प्रधानाध्यापक होने का भी गौरव प्राप्त हुआ। ज़रा सोचिये उस दौर में सावित्री बाई के लिए लड़कियों की पढाई के लिए लड़ना कितना मुश्किल रहा होगा लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और भारत में महिला शिक्षा की शुरुआत करके ही दम लिया। 10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। प्लेग के छूत से प्रभावित एक बच्चे की सेवा करने के कारण उनको भी छूत लग गया। और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।

सावित्री बाई फुले ने जो किया उसके लिए भारत की हर लड़की उनकी ऋणी रहेगी। सावित्री बाई फुले सिर्फ अपने स्कूल की लड़कियों की ही शिक्षक नहीं थी वो तो भारत की हर महिला की शिक्षक थी आखिर सावित्री बाई फुले ही तो थी जिनकी वजह से आज ना सिर्फ हर महिला आसानी से पढ़ सकती है अपितु पुरुष से कन्धे से कन्धा मिलाकर चल सकती हैं।

देश की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई को हमारा नमन।
प्रस्तुति: अनिल पटेल, नगनौड़ी 
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