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गुरुवार, मई 06, 2021

अच्छा-अच्छा सोचो जी: धर्मेंद्र कुमार पटेल



अच्छा अच्छा सोंचो जी
🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔

जो करता है वो भरता है,
अच्छा अच्छा सोंचो जी।
दुनिया से जब जाना तय है,
तो मीठा मीठा बोलो जी।।
अच्छा अच्छा सोंचो .....

हंसी - खुशी से जीवन जी लो,
याद यही तो आएगा।
अमन चैन से रहना सीखो,
 झगड़े टंटे छोड़ो जी।।
अच्छा अच्छा सोंचो......

जलना, कुढ़ना, नफरत, धोखा,
तकलीफें ही देता है।
प्यार ,मोहब्बत के दरवाजे,
अपने अपने खोलो जी।।
अच्छा अच्छा सोंचो......

मिलना- जुलना,आना -जाना,
मीठा मीठा बतियाना।
जरा जरा सी बात पकड़ कर,
रिश्ते यूं न तोड़ो जी।।
अच्छा अच्छा सोंचो......

रब ही जाने ,जाने कैसी,
फितरत है इंसानों की।
कदम कदम पर क्यूं देते हैं,
अपनों को ही धोखा जी।।
अच्छा अच्छा सोंचो......

आपका भाई धर्मेन्द्र कुमार पटेल✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
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गुरुवार, दिसंबर 24, 2020

किसान की करूण पुकार: धर्मेंद्र कुमार पटेल



किसान दिवस स्पेशल 
🌾🌾🌾🌾🌾🌾
कल दिनांक 23 दिसंवर को किसान दिवस मनाया गया, एक दूसरे को किसान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं दी गई,परन्तु  जैसे ही दिल्ली की सड़कों पर बैठे किसान आन्दोलन पर नजर पड़ी तो किसान दिवस की खुशियां ओझल हो गई। अगर किसानों की पीड़ा समझना है तो अपने अपने गांव के सोसायटी और दलालों की स्थिति देखिए,न तो समय पर खाद मिलता और न खरीदी होती, यहां तक कि अपने पैसे निकालने के लिए किसान बैंक के चक्कर लगाने को मजबूर होता है।यह दोष किसका है और कौन दूर करेगा। अगर चुप रहेंगे तो बहुत ही जल्द गुलामी रूपी दानव अपना शिकार करने के लिए लालायित हो रहा है।
जागो किसानों और आवाज बुलंद करो।

        करुण पुकार पंक्तियां 

दिसंबर का महीना, ठंड की पड़ रही मार।
किसान बैठे सड़कों पर, दया करो सरकार।।

खेती करना है मुश्किल, उत्तम है व्यापार।
खेती  करने वाले, दुःखी हैं और लाचार।।

रात - दिन का पहरा, छोड़ अपना घर द्वार।
किसान रहता खेतों में, स्वस्थ्य हो या बीमार।।

फटी लंगोटी पसीने से लथपथ, परिश्रम को तैयार।
किसानों की पीड़ा कोई न समझे,
बताना है बेकार।।

ब्यापारी बैठे हैं महलों में, 
अफसर मारे हुंकार।
दलालों की बल्ले बल्ले, किसान की हालत बंटाधार।।

कृषि कानून अच्छा है तो,
क्यों मचा है हाहाकार।
बीच का रास्ता जल्दी निकालो,
नहीं तो है धिक्कार।।

 आपका भाई - धर्मेंद्र कुमार पटेल
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मंगलवार, जुलाई 14, 2020

सावन गीत: धर्मेन्द्र कुमार पटेल


🌧️🌧️सावन गीत🌧️🌧️
🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️🌤️

बहुत ही व्यथित भाव से यह सावन गीत लिख रहा हूं,जिस सावन में घनाघोर वारिस होती थी, ठण्डी हवा प्रवाहित होती थी,आज परिस्थितियां उल्टी हो गयी हैं उमस और गर्मी से हालत गंभीर बनी हुई है...... एहसास करें🙏
  1.
सावन का महीना,धूप है चहुं ओर।
गर्मी ऐसे लागे, जैसे आग लगे  चारों ओर।।

गर्मी ऐसे लागे..........

सावन का महीना...........2

       2.

कहां गये बदरिया , कहां पवन का झकझोर।
मेघ गर्जन बिजली चमकन, का थम गया है शोर।।

मेघ गर्जन बिजली चमकन........

सावन का महीना............2

       3.

धान का पौधा तैयार हो गया ,रोपा का है इंतजार।
बिन पानी सब सून पड़ी है, खेत बाड़ी खनिहार।।

बिन पानी सब सून........

सावन का महीना...............2

                 4.

किसान भाई हैरान हो रहे,और हो रहे परेशान।
जल्दी आओ बरसने वाले , बनकर तुम मेहमान।।

जल्दी आओ बरसने..........

सावन का महीना.............2

आपका भाई - धर्मेंद्र कुमार पटेल✍️✍️
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मंगलवार, अप्रैल 28, 2020

कोरोना (कविता)आल्हा तर्ज:धर्मेन्द्र कुमार


कोरोना (कविता)आल्हा तर्ज

चीन देश से निकला कोरोना,
मचा दिया है हाहाकार।
सूक्ष्म कणों से इतनी भयानक,
सूक्ष्म कणों से इतनी भयानक
हो रही जग में नरसंघार॥

चीन देश..........

इतनी घातक मारक क्षमता,
मिसाइल भी बौने पड़ जाएं।
ब्रिटेन,अमेरिका,इटली,जर्मनी,
ब्रिटेन ,अमेरिका, इटली, जर्मनी,
इस प्रकोप से बच नहिं पाएं॥

चीन देश से............

विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालत,
नाजुक , सहमें और लाचार।
बडे़ बडे़ डाक्टर, और वैज्ञानिक,
बडे़ बडे़ डाक्टर और वैज्ञानिक,
शोध कार्य में दिन - रात गुजार॥

चीन देश से..........

सर्दी खांसी बुखार के लक्षण,
कोरोना अपनी पहचान बताय।
आम नागरिक थर थर कांपें,
आम नागरिक थर थर कांपें
कोरोना हम तक पहुंच न जाय॥

चीन देश से............

भारत में जब पहुंचा कोरोना,
जनता कर्फ्यू दियो लगवाय।
जब इतनें में भी  बात बनी न,
जब इतनें में भी बात बनी न
लाकडाउन की घोषणा हो जाय॥

चीन देश से .........

स्कूल कालेज,उद्योग धंधे,
बंद हो गया है यातायात।
बाजार की रौनक फीकी पड़ गयी,
बाजार की रौनक फीकी पड़ गयी
अर्थव्यवस्था में पहुंचा आघात॥

चीन देश से...........

सोशल डिस्टेंसिंग साफ-सफाई,
चेहरे में मास्क लगाय।
सैनटाइजर उपयोग अधिकतम,
सैनटाइजर उपयोग अधिकतम
कोरोना से यही बचाय॥

चीन देश से............

बाहर न घूमना घर में रहना ,
देश भक्त की यही पहचान।
एक दिन हारेगा कोरोना,
एक दिन हारेगा कोरोना
जीतेगा मेरा हिन्दुस्तान॥

चीन देश से ........

स्वास्थ्य कर्मी,पुलिस प्रशासन,
जय जय हो भारत सरकार।
नमन् है कोरोना योद्धायों को,
नमन् है कोरोना योद्धायों को
जिसने किया है कडा़ प्रहार॥

चीन देश से............

आपका भाई-✍✍ धर्मेंन्द कुमार पटेल


शनिवार, अप्रैल 18, 2020

जग में सुंदर हैं दस काम:धर्मेंद्र कुमार पटेल


💐💐💐💐💐💐💐💐
जग में सुंदर हैं दस काम
☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️

जग में सुन्दर हैं दस काम,
चाहे सुबह करो या शाम।
जग में सुन्दर........2

पहला काम योग - व्यायाम,
मिलता तन को बडा़ आराम।
दूसरा काम स्वास्थ्य की रक्षा,
तभी लगे यह जग अच्छा।।

जग में सुन्दर....... ‌‌

तीसरा काम बड़ा महान्,
पढ़ना चाहिए कला-विज्ञान।
चौथा काम सर्वश्रेष्ठ कहलाए,
ईश भक्ति और अन्तरध्यान।।

जग में सुन्दर ...........

पांचवां काम है कठिन परिश्रम,
बन जाते सब बिगडे़ काम।
छंठवां काम अनुशासित जीवन,
कभी न होगे तुम बदनाम।।

जग में सुन्दर..........

सातवां काम तीर्थों से बढ़कर,
माता-पिता गुरु की आज्ञा मान।
आठवां काम है दान पुन्य का कभी न हो मन में अभिमान।।

जग में सुन्दर .........

नौवां काम है जनसेवा का,
मानवता  की यही पहचान।
दसवां काम है हरपल खुश रहना,
हो जाएंगें सारे विपत्ति निदान।।

जग में सुन्दर............

काव्य रचना- धर्मेन्द कुमार पटेल✍️✍️ 

सोमवार, मार्च 23, 2020

कोरोना त्रासदी: धर्मेंद्र कुमार पटेल


🙏नवरात्रि भगत गीत🙏
😌😌😌😌😌😌😌
देश विदेश में फैला करोना,इसकी क्या है दवाई हो मां मैया
इसकी क्या है दवाई हो मां मैया
देश विदेश में ............2

बडे़ बडे़ डाक्टर और वैज्ञानिक कर रहे इसकी खोजाई हो मां मैया
कर रहे इसकी खोजाई हो मां मैया
देश विदेश में.............2

पहली दवाई साफ सफाई,और मास्क लगवाई हो मां मैया।
और मास्क लगवाई हो मां मैया।
देश विदेश में...........2

दूसरी दवाई भीडभाड से स्वयं को अलग करवाई हो मां मैया।
स्वयं को अलग करवाई हो मां मैया
देश विदेश में.............2

तीसरी दवाई सब कोउ अपने अपने घर  घुस जाई हो मां मैया।
अपने घर घुस जाई हो मां मैया।
देश विदेश में............2

चौथी दवाई कानून का पालन
नागरिक फर्ज निभाई हो मां मैया।
नागरिक फर्ज निभाई हो मां मैया।
देश विदेश में ...............2

यहै भगत का भोग लगाई,
अपनी जान बचाई हो मां मैया।
अपनी जान बचाई हो मां मैया।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

आपका भाई - धर्मेन्द कुमार पटेल✍️✍️
[23/03, 11:48 AM] Dharmendra Patel Naugawan: 💐करोना त्रासदी पंक्तियां💐
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

फैला करोना जग में 2 , मची त्राहि त्राहि हो।
कैसे करें कैसे बचें, कैसे जान बचाई हो।।
कैसे करें . ...........2

फैला करोना ..........

आवागमन बन्द होइगय, कर्फ्यू दियो लगाई हो।
बाहर न निकलें ,घर में रहें ,अपनी जान बचाई हो ।।
फैला करोना ............

तेजी से फैल रहा ,कोरोना  महामारी हो।
सजग रहें , सतर्क रहें ,ध्यान रखें सफाई हो।।
फैला करोना..............

भीड़भाड़ से दूर रहके , अकेले समय बिताई हो।
स्वस्थ्य रहें मस्त रहें, कोरोना की यही दवाई हो।।

फैला करोना................

सरकार के फैसले की ,सब करें बडाई हो।
तभी होगी जल्दी होगी कोरोना की विदाई हो।।

फैला करोना.............

आपका भाई धर्मेन्द कुमार पटेल✍️✍️

शुक्रवार, जनवरी 10, 2020

बेटे की पढ़ाई


बेटे की पढ़ाई

सुसैनी नामक गांव में एक गरीब किसान संतू रहता था। उसका एक ही बेटा हितेश था। संतू और उसकी पत्नी श्रुतिया खेत में कठिन परिश्रम करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। उन्होंने किसी प्रकार अपने बेटे को गांव के ही स्कूल में बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी करवाई ।


संतू और उसकी पत्नी की कोशिश थी कि हितेश उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए शहर के कालेजों में एडमिशन ले। हितेश भी पढ़ने में बहुत होशियार था। तभी तो उसने बारहवीं की परीक्षा  88% अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी।

संतू ने कुछ पैसों का इंतजाम करके बेटे को शहर के डिग्री कॉलेज में प्रवेश करवा दिया।

सब ठीक चल रहा था कि अचानक श्रुतिया की तबीयत बिगड़ी और कुछ दिनों बाद वह चल बसी। अब संतू घर में अकेला हो गया, घर की स्थति बिगड़ने लगी। संतू को चिंता सताने लगी कि बेटे की पढ़ाई कैसे पूरी होगी? और हितेश भी चिंतित रहता कि पिता जी की देखभाल कैसे करूं, कभी-कभी तो पढ़ाई को बीच में ही छोड़ने का विचार आने लगा।

कुछ दिनों बाद संतू की आंख में दिखने की समस्या होने लगी तो हितेश ने शहर के अस्पताल में पिता जी की आंखों का आपरेशन भी करवा दिया। आंखों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए डाक्टर ने खेत में काम करने के लिए संतू को मना कर दिया।

अब संतू घर में अकेला रहता था। उसके चचेरे भाई की नजर संतू के खेत को हडपनें में थी, वह जब भी आता तो यही कहता भाई खेत को बेंच दो और पैसे लेकर बेटे के पास शहर चले जाओ।पर संतू खेत बेचने के लिए राजी नहीं हुआ।

अगले साल बारिश भी नहीं हुई और कुआं भी सूख गया था। संतू परेशान होकर बेटे के लिए चिट्ठी लिखवाया और कहा कि बेटा कुछ दिनों के लिए घर आ जाओ और कुएं को गहरा करवा दो।

हितेश चिट्ठी पढ़कर हैरान हो गया और सोचने लगा कि क्या करूं, घर चला जाऊंगा तो परीक्षा की तैयारी में विपरीत असर होगा। उसे एक उपाय सूझी, उसने चिट्ठी में लिखा कि पिताजी कुएं में मां ने दादी द्वारा दी गई सोने की मोहरें छिपाई  थी। इसलिए कुएं में किसी को न घुसने देना। मैं जब आऊंगा तभी खुदाई शुरू करेंगे।
हितेश की चिट्ठी संतू को मिली तो अपने चचेरे भाई के पास जाकर बोला कि इसे पढ़कर सुनाओ।

चचेरे भाई ने चिट्ठी में लिखे शब्दों को बदलकर पढ़ दिया।

लेकिन उसके मन में मोहरें प्राप्त करने की इच्छा जागृत हो गई। वह रात को अपने बीबी-बच्चों के साथ रात भर कुएं की खुदाई करता। इससे मोहरें तो नहीं मिलीं लेकिन कुआं में  पानी जरूर भर गया।

चचेरा भाई परेशान हो गया और वापस चला गया।

संतू सुबह उठकर देखा तो आश्चर्य चकित हो गया। पानी की समस्या खत्म हो गई थी। पढे-लिखे बेटे की चतुराई से।

कुछ दिनों बाद हितेश की पढ़ाई पूरी हो गई और वह वापस गांव आ गया। गांव में ग्राम सचिव के पद पर नौकरी भी मिल गई। और अगले साल विवाह हो गया।

अब संतू बेटे-बहू के साथ सुखद जीवन जीने लगा। लेकिन बेटे की पढ़ाई के दौरान आए मुसीबतों को याद करते हुए आंसू टपकने से नहीं रोक पाता।

संदेश- लाख मुसीबतों का सामना करते हुए भी बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाएं और बच्चों को भी मुसीबतों का सामना करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी करनी चाहिए।अधूरी पढ़ाई किसी काम की नहीं होती।


धर्मेंद्र कुमार पटेल 

मंगलवार, दिसंबर 31, 2019

नया साल: धर्मेंद्र कुमार पटेल


💐💐नया साल💐💐
आया आया देखो आया,
देखो कैसे रंग है लाया।
365 दिन और 12 महीने,
जीवन में हम ऐसे ही गिनें।।

पहला रंग जनवरी का महीना,
जिसमें धूम होगी संक्रांति का।
गणतंत्र दिवस का महापर्व
भारत दिखता  दुनिया का स्वर्ग।।

दूसरी रंग फरवरी का महीना,
छाई होगी चहुं बसंत बहार।
शिव की होगी आराधना ।
प्रकृति की अनुपम उपहार।।

तीसरा रंग मार्च का महीना,
होली की रंगों से सराबोर।
दुनिया दिखती रंग बिरंगी,
नाचें गाएं हो भाव विभोर।।

चौथे रंग में अप्रैल का महीना,
पहला दिन है फूल का।
जब आए महुआ और बैसाखी,
गर्मी के दिनों की हुई सुरुआती।।

पांचवां रंग म‌ई का  महीना,
गर्मी से बहने लगे पसीना।
लू चले धधक धधक कर,
आम के फल गिरें टपक टपक कर।।

छठवां रंग जून का महीना,
गर्मी ने कर दिया मुश्किल है जीना।
बादल छाने लगे चारों ओर से,
तूफान चलने लगे बड़े जोरों से।।

सातवां रंग जुलाई का महीना,
चलो बच्चों स्कूल है जाना।
किसान भाई करें किसानी,
खेतों में भर गया है पानी।।

आठवां रंग अगस्त का महीना,
सावन का मौसम बड़ा सुहाना।
स्वतंत्रता दिवस की होती है धूम,
राखी बिन भाई की कलाई रहे न सून।।

नवमां रंग सितंबर का महीना,
गणेश जी का होगा आना जाना।
खेतों की फसलें लहर लहलहाए,
किसान भाइयों का मन बहुत हर्षाए।।

दशवां रंग अक्टूबर का महीना,
दुर्गा पूजा और विजयादशमी मनाना।
जब आए खलिहानों में दाना,
किसान का मन फूले नहीं समाना।।

ग्यारहवां रंग है नवम्बर का महीना,
माता लक्ष्मी की पूजा आराधना।
ठंडी हवा से लगे जी घबराना,
फिर भी लगता बहुत सुहाना।।

बारहवां रंग दिसंबर का महीना,
ठंडी हवा हमें मारें ताना।
क्रिसमस की धूम धमाल,
सेहत का रखना ख्याल।।

🙏🙏हैप्पी न्यू ईयर 2020🙏🙏
आपका भाई -धर्मेंद्र कुमार पटेल✍✍ 

सोमवार, दिसंबर 23, 2019

ठंडी गीत:धर्मेन्द्र कुमार पटेल

ठंडी गीत
रात या बैरी लागे ठंडी के महिनवा हो।
कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले दिनवा हो।।
हां कैसी कटी कैसे कटी ठंडी वाले के महिनवा हो....2

 धूप या ऐसी लागे, जैसे जले अगेठिया हो।
कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले महिनवा हो।।
हां कैसे कटी कैसे कटी.........

रजाई या ऐसा लागे, जैसे सगे हों मितवा हो।
कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले महिनवा हो।।
हां कैसे कटी कैसे कटी.........

कपड़े तो ऐसे लागे, जैसे लगे प्रियतमा हो।
कैसे कटी कैसे कटी ठंडी वाले महिनवा हो।।
हां कैसे कटी कैसे कटी.......
रचनाकार:धर्मेन्द्र कुमार पटेल
नौगवां, मानपुर जिला-उमरिया(मध्यप्रदेश)
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शनिवार, नवंबर 23, 2019

कि हां हां हो कि हूं हूं हो...विकास गीत:धर्मेन्द्र पटेल


विकास गीत ( ब्याह गीत की धुन में)

                  1.
बदल रहो है समाज हमारा ,आओ खुशियां मनाई हो,
कि हां‌ हां हो कि हूं हूं हो......
कुम्भकरणी नींद जो सोवत हैं , उन्हें भी आज जगाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो.....
                2.
सामाजिक कुरीतियां और आडम्बर मिलकर दूर भगाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो....
बच्चों को शिक्षा दिलवाई उन्हें भी शिक्षित करवाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो...
              3.
बेरोजगारी दूर भगाई कौंनौं रोजगार अपनाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो...
खूब करो कठिन परिश्रम होगी बहुत कमाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो.....
               4.
घर मुहल्ले गांव वालों से कबहूं न करियो लड़ाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो
हो सके तो खुशियां बांटो उनकी करो  बड़ाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो.....
            5.
चारों तरफ शांति माहौल बने ऐसी जुगत भिड़ाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो....
भाईचारा और मुहब्बत की सब देने लगें दुहाई हो,
कि हां हां हो कि हूं हूं हो.....

रचनाकार:धर्मेन्द्र कुमार पटेल
नौगवां, मानपुर जिला-उमरिया(मध्यप्रदेश)
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शुक्रवार, नवंबर 15, 2019

आप मुझे नहीं जानते:धर्मेन्द्र कुमार पटेल आलेख


 आप मुझे नहीं जानते

अगर कोई किसी को नहीं जानता तो इसमें किसका दोष है?उसका जो नहीं जानता या जिसे नहीं जाना जा रहा ?"
असल में हम जितने छोटे होते हैं,हमारा अहंकार उतना ही बड़ा होता है, जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, अहंकार छोटा होता जाता है इस बड़े-छोटे का उम्र से कोई रिश्ता नहीं है, यह आपके अंतर्मन की यात्रा और उसके फलने -फूलने के तौर-तरीकों पर निर्भर करता है

किसी अजनबी व्यक्ति से परिचय करनेकी पहल से इसे समझा जा सकता है। कई बार अपने पार्श्व में बैठे सहयात्री से परिचय जाने बिना ही सैकड़ों मील की यात्रा कट जाती है। और कई बार कुछ ही मिनटों में एक-दूसरे का हाल-चाल ऐसे जान लिया जाता है जैसे वे दोनों बहुत पुराने परिचित हों वास्तव में दो व्यक्तियों के मध्य अहम् की ही दूरी होती है यही अहम कई बार भय और शंका को जन्म देता है. ऐसे में जो व्यक्ति पहले पहल करता है बडप्पन दिखाने का श्रेय उसकी ही झोली में जायेगा क्योंकि उसने अपने अहम से ऊपर उठकर पहल करने की कोशिश की है हो सकता है सामने वाला व्यक्ति परिचय देने में कोई रूचि न दिखाए और ऐसे में स्वयम के अपमान होने का खतरा तो है ही! किन्तु इस खतरे का आभास कौन कराता है? यही अहम! और कई बार ऐसा होता है कि लोग अपने पड़ोसी के बारे में कई सालो तक कुछ नहीं जानते

कई बार हम अपनी दीनता के भाव से भी परिचय बनाने से कतराते हैं। यह भी एक तरह का अहम ही है. हम दीं हैं तो हमारे अपमान होने का खतरा अधिक है क्योंकि व्यक्ति हमारे बारे में कुछ भी कहने के लिए ज्यादा स्वतंत्र है। उसे मालूम है कि हम उसकी प्रतिक्रिया नहीं दे सकेंगे। किन्तु उसके व्यवहार से उत्पन्न होने वाले अपमान का एहसास तो हमें हमारे भीतर का अहम ही कराता है। आजकल ज्यादातर लोग अपने काम से मतलब रखने लगे हैं। जिसका परिणाम यह है कि लोगों के मध्य समरसता का अभाव है और भाईचारे की भी कमी है। और अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि आप तो मुझे जानते ही नहीं!

अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझना, उतना ही अनुचित है, जैसे दूसरे से स्वयं को कमतर समझना जीवन में संतुलन का भाव कैसा हो इसे स्वयं पर नियंत्रण से समझा जा सकता है। हमारा मन अपने आप में शोध का विषय और ऊर्जा का भंडार है, जितना अधिक स्वयं को जानेंगे, दूसरों को जानना उतना ही सरल होता जाएगा 

आइए एक-दूसरे को जानें और समझें
शिवमंगल सिंह "सुमन" ने ठीक ही लिखा है-
"मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा,
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ रोड़ा अटकता ही रहा।
निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है, चलना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे, कुछ बीच में ही फिर ग‌ए,
गति न जीवन की रुकी,जो गिर ग‌ए सो गिर ग‌ए।
रहे जो हर दम डटे ,उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है, चलना हमारा काम है।

जब तक मंजिल पा न सकूं, तब तक मुझे न विराम है,
क्या राह में परिचय कहूं मैं, राही हमारा नाम है।
बस चलना हमारा काम है, चलना हमारा काम है।"
रचनाकार:धर्मेन्द्र कुमार पटेल
नौगवां, मानपुर जिला-उमरिया(मध्यप्रदेश)
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गुरुवार, नवंबर 07, 2019

सत्य एक निर्मल धारा:धर्मेन्द्र कुमार का आलेख


सत्य एक निर्मल धारा
आप सभी ने बचपन में क‌ई कहानियां सुनी होगी, और उनमें से क‌ई ऐसी कहानियां भी सुनी होगी जिनमें सत्य की विजय का वर्णन किया गया होगा।

आखिर में इस सत्य को जानने की उत्सुकता मन में आ ग‌ई होगी तो आप अपने माता-पिता और शिक्षकों से सत्य के बारे में पूछा भी होगा, तो उन्होंने विभिन्न मान्यताओं और प्रेरक प्रसंगों  के  माध्यम से सत्य के सम्बन्ध  में विस्तार से जानकारी दी होगी। और जो भी, जैसा भी आपको बता दिया गया होगा आप उसे मान गये होंगे।

ठीक आपकी  ही तरह मेरे साथ भी ऐसा ही  हुआ मैंने सत्य जानने की इच्छा गुरु जी से जताई और मेरे गुरु ने हरिश्चंद्र की कथा सुना दी, पुनः जिज्ञासा हुई तो यही प्रश्न अपने माता से किया तो उन्होंने  श्रीराम और रावण के बीच हुए सत्य की विजय का कथा सुना दी, अपने पिता से सत्य के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कौरवों पर पाण्डवों की जीत को सत्य की जीत के रुप में बताया। एक दिन अपने चाचा जी से पूछ बैठा कि आप बताइए सत्य के बारे में तो उन्होंने गौतम बुद्ध के द्वारा किए गए जनकल्याण कार्यों को ही सत्य की खोज बताया। मैं अपने मित्र से कहा कि  जितने लोगों से सत्य के बारे में पूछता हूँ, सब अलग-अलग तरह से बताते हैं आप सही-सही बताओ मित्र ने कहा-आधुनिक युग के मसीहा मोहन दास करमचंद गांधी द्वारा रचित  "मेरे सत्य के प्रयोग" नामक रचना को पढ़ लो तो  तुम्हें सत्य का ज्ञान हो जाएगा।

मैं इन सभी  माध्यमों  से असली सत्य को जानने की कोशिश करता रहा अनगिनत कोशिशें  करते हुए क‌ई पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों का अध्ययन किया, महापुरुषों की जीवनियां पढ़ी, नाटक , कहानियां आदि स्रोतों से सत्य के बारे में जानने की कोशिश करता रहा।

एक दिन मन में अजीब सी हलचल पैदा होने लगी और दिल से आवाज आई कि सत्य एक अविरल धारा और निर्मल प्रवाह के रूप में स्थापित मानवता के गुणों से सुसज्जित दि‌व्य ज्योति के रूप में जन्म जन्मांतर से हम सभी को अच्छे कर्मों को करने के लिए प्रेरित करता हुआ मार्ग है।

इस मार्ग पर चलने वाले जितने भी लोग हैं विभिन्न कठिनाइयों को सहन करते हुए अपना कर्म, वचन और मन को शांति प्रदान करने के लिए, विश्व को एकसूत्र में बांधने के लिए, मानवता की भलाई के लिए,जीव मात्र की रक्षा के लिए लगे रहते हैं ।

सत्य के मार्ग पर चलने वाले  हरिश्चंद्र,श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतम बुद्ध, गांधी जैसे अनेकानेक महापुरुष  हमें सत्य के लिए प्रेरित करते रहते हैं , यही सत्य है।

अतः निष्कर्ष रुप में कहा जा सकता है कि सत्य  पत्थर पर खींची गई लकीर की तरह है जो कि अमिट और कभी न खत्म होने वाला मानव धर्म के रूप में स्थापित गुण हैं। सत्य एक सतत  निर्मल धारा है।

रचनाकार:धर्मेन्द्र कुमार पटेल
नौगवां, मानपुर जिला-उमरिया(मध्यप्रदेश)

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सोमवार, सितंबर 09, 2019

दिखावटी इंसान:धर्मेन्द्र कुमार की कविता



                        दिखावटी इंसान                   धर्मेन्द्र कुमार 

ऐ इंसान तू दिखावा बिल्कुल भी न कर,
एक दिन सब कुछ ओझल हो जाना है।
कुछ भी अमर नहीं यह समझ लेना,
यह जग है नश्वर सबकुछ मिट्टी में मिल जाना है।।

झूठ पाखंड के रास्ते पर चलने वाले दरिंदे,
वक्त रहते सम्भल सको तो सम्भल जाना।
वरना प्रकृति हर पल सब कुछ निहार रही,
यह समझ कर सुधर सको तो सुधर जाना।।

क्या लेकर आया है जग में क्यों इतना इतराता है,
झूठे वादे करके लोगों पर झूठी रौब जमाता है।
पर मत भूलो यह तुम्हारी बहुत बड़ी अज्ञानता है,
यहां जो भी है सब झूठी काया और झूठी माया है।।

जो भी है तुम्हारे पास सबकुछ प्रकृति ने दिया है,
मनमोहक जिन्दगी मिली जिसे  दिल खोलकर जिया है।
फिर भी तेरे जीवन में खुशियों की कमी झलक रही है,
क्योंकि तू इंसान नहीं है बल्कि इंसान दिखावटी  है।।

जब तक रहो सृष्टि में हंसकर जी लेना तुम,
गिले-शिकवे भुलाकर एकजुट  रह लेना तुम।
नफरत करने वालों पर दमनचक्र चला दो तुम,
प्यार मुहब्बत सौहार्दपूर्ण के रंग जग में भर दो तुम।।

ऐ इंसान आज तुम्हें साबित करना ही होगा,
मानवता की रक्षा के लिए  सहयोग करना ही होगा।
गलत आचरण कुप्रथाओं का त्याग करना ही होगा,
 दिखावटी इंसान नहीं बल्कि वास्तविक इंसान बनना ही होगा।

रचना: धर्मेन्द्र कुमार पटेल, नौगवां, मानपुर जिला-उमरिया (मध्यप्रदेश)
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