गति से प्रगति: ई.प्रदीप




प्रेम और नफरत 

दो किनारे हैं 


कि  आदमी जब भी 

किसी किनारे पर होता है 

वह ठहर जाता है ।


किनारे नदी का  रूढ़ स्वभाव है 

किनारे बदलाव का प्रतिकार है ।


नदी का जल सतत है 

निरंतर परिवर्तन का वेग है ।


कि जब भी हिस्सा बनना 

जल के वेग का ही हिस्सा बनना 

जो बह जाय 

कहीं रुके नहीं ।


मैंने देखा था 

एक तालाब के पानी को 

जिसे किनारों ने बांध लिया था ।


उसके आगोश में 

जल भी रूढ़ हो गया 

ठहराव उसका चरित्र न था ।


फिर उस ठहराव में 

उसका चरित्रहीन हो जाना स्वाभाविक था ।


मन्त्र मुग्ध था अपने ठहराव पर 

और ठहराव में खिले कमल के फूल पर ।


पर यह तो सतह की चमक थी 

धरातल पर तो जमा हुआ  कीच था ।


ठहराव  ने आनंद के भ्रम को उपजा था 

ठहराव  ने शोक संतृप्त मन को किया था ।



ठहराव ने स्मृति में कैद कर दिया मन को  

ठहराव ने उत्सुकता को मृत कर दिया था ।


कि जब भी ठहराव और गतिशीलता को चुनना हो 

गतिशीलता को चुनना ।


कि जब भी हिस्सा बनना 

जल के वेग का ही हिस्सा बनना 

जो बह जाय 

कहीं रुके नहीं।

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